जेन-जी पीढ़ी डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया के बीच पली-बढ़ी है, जो अपने अधिकारों के प्रति पहले से कहीं अधिक सजग और मुखर है। लेकिन इसी डिजिटल जीवनशैली ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गम्भीर संकट भी खड़ा कर दिया है।
सदियों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में हमेशा से ही ऐसा होता रहा है कि युवा पीढ़ी खुद को अपनी पूर्व पीढ़ी से बेहतर, समझदार तथा सूचना सम्पन्न मानती है। उसे लगता है कि ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’। सच तो यह है कि हर पीढ़ी अपने समय की चुनौतियों के अनुरूप समाज और राजनीति को नई दिशा देने का प्रयास करती है। स्वतंत्रता संग्राम की पीढ़ी ने स्वतंत्रता का सपना साकार किया, जबकि उसके बाद की पीढ़ियों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने और आर्थिक विकास की नींव रखने में योगदान दिया।
वर्तमान में दुनिया जिस पीढ़ी की ओर सबसे अधिक आशा से देख रही है, वह है जेनरेशन-जेड। माना जाता है कि वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं की यह पीढ़ी डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक सम्पर्क के युग में पली-बढ़ी है। इनके सोचने, संवाद करने और अपनी बात रखने के तरीके पहले की पीढ़ियों से काफी अलग हैं।
भारतीय जनसंख्या अनुमान (2026) के विश्लेषण से पता चलता है कि वयस्क जनसंख्या में 18-29 साल के लोगों की हिस्सेदारी 29.2 प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में, देश में प्रत्येक तीन योग्य मतदाताओं में एक जेन-जी है। 2026 के लिए जारी जनसंख्या अनुमान के अनुसार, बिहार में जेन-जी वोटरों का हिस्सा सर्वाधिक है। यहां 18-29 साल के लोगों की स्वतंत्रता 36.8 प्रतिशत है। भारत में दुनिया की सबसे बड़ी जेन-जी जनसंख्या रहती है। यहां मौजूदा साल में 14-29 वर्ष के आयु के लोगों की संख्या 40.7 करोड़ है। चीन में 26.4 करोड़ व पाकिस्तान में 7.9 करोड़ जेन-जी हैं। वर्ष 2029 तक भारत में अल्फा भी 41.7 करोड़ होंगे।
अपने अधिकारों के प्रति मुखर
जेन-जी की सबसे अच्छी बात यह है कि वे अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग और मुखर हो गए हैं।
स्टैटिस्टा के आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 से 2026 के बीच दुनिया में कम से कम 10 देशों में बड़े पैमाने पर युवा-नेतृत्व वाले प्रदर्शन देखने को मिले। जेन-जी के इन आंदोलनों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उनकी मूल मांगे लगभग एक जैसी हैं, जिनमें बेहतर शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार पर रोक, लोकतांत्रिक और जवाबदेह शासन की मांग शामिल है।
एक फोन पर दुनिया मुट्ठी में
आज की युवा पीढ़ी इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में बड़ी हुई है। जेन-जी (जेड) केवल डिजिटल दुनिया में ही रमा नहीं रहता, वह आभासी दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं कराना चाहता, बल्कि विश्व स्तर पर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक बदलाव में निर्णायक भूमिका निभाने को तत्पर है।
नकारात्मक पहलू
हाल ही में हुए एक रिसर्च ने यह संकेत दिया है कि इस पीढ़ी में मानसिक स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, और इसका मुख्य कारण सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग हो सकता है। वास्तव में, डिजिटल नेटिव के तौर पर जेन-जी तकनीकी रूप से काफी सम्पन्न तो है, लेकिन इन माध्यमों की अपनी चुनौतियां हैं। अपुष्ट सूचनाएं, अफवाहें तथा भ्रामक सामग्री अक्सर तनाव का कारण भी बन जाती हैं। इसका एक ताजा उदाहरण पंजाब की लवली प्रोफेशनल संस्थान का हमें देखने को मिलता है, जहां एक छात्रा के साथ हुए शारीरिक यौन शोषण की अफवाह ने कितना बड़ा बवाल खड़ा कर दिया। जेन-जी के जीवन को सोशल मीडिया कई तरह से कुप्रभावित कर रहा है:
सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों, जैसे इंस्टाग्राम, टिकटॉक, और स्नैपचैट पर बिताए गए लम्बे समय के कारण जेन जेड के युवाओं में चिंता, अवसाद, और आत्मसम्मान की समस्याएं बढ़ रही हैं।
मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं युवाओं में कार्यक्षमता घटने का एक बड़ा कारण बन रही हैं। इस तरह की परेशानियों से बचे रहने के लिए विशेषज्ञ सोशल मीडिया से ब्रेक लेने, नियमित व्यायाम और मेडिटेशन से मानसिक संतुलन बनाए रखने की राय देते हैं।
लाइफस्टाइल और आहार की गड़बड़ी ने कई तरह की क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ा दिया है। हाई कोलेस्ट्रॉल हो या ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और दिल की बीमारियां अब काफी आम होती जा रही हैं।
आज की जेन-जी पीढ़ी खुद को पहले से ज्यादा स्मार्ट, टेक-फ्रेंडली और फास्ट लाइफ जीने वाली मानती है, लेकिन इसी तेज गति की जिंदगी ने उनमें भी कई तरह की बीमारियों का जोखिम काफी बढ़ा दिया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, देर रात तक मोबाइल और लैपटॉप के इस्तेमाल, घंटों बैठे रहकर पढ़ाई या काम करने, जंक फूड पर बढ़ती निर्भरता और नींद की कमी ने युवाओं की सेहत पर गहरा असर डाला है। अगर समय रहते इन आदतों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो कई ऐसी बीमारियां कम उम्र में ही आपक घेर सकती हैं, जिनके लिए जीवनभर दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
रचना प्रियदर्शिनी
