दिल्ली की सड़कों पर पिछले कुछ दिनों से और विशेष तौर पर आज जो घटनाक्रम देखने को मिला है, उसने एक बार फिर देश की आंतरिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और विधि के शासन के समक्ष गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
तथाकथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में जो प्रदर्शन आयोजित किए गए जिन्हें लेकर प्रशासन ने एहतियातन सख्ती बरतते हुए कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया या नजरबंद किया उसकी आड़ में एक बहुत बड़ा वैचारिक और अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र चल रहा है। इस पूरे परिदृश्य को निष्पक्षता से परे हटकर पूरी दृढ़ता और तथ्यों के साथ परखना आवश्यक है।
जब देश में किसी प्रकार का हिंसक या अनियंत्रित उपद्रव होता है और राज्य सरकार तथा पुलिस बल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियातन कार्रवाई करते हैं, तो तुरंत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (UN Human Rights) के बयान सामने आ जाते हैं। यह कोई साधारण संयोग नहीं है।
नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में जिस प्रकार पिछले कुछ समय में सुनियोजित तरीके से ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) के खेल खेले गए, ठीक उसी तर्ज पर भारत की स्थिर, मजबूत और प्रचंड बहुमत से चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ी आबादी वाले देश को कुछ अराजक तत्व और विदेशी इशारों पर नाचने वाला कम्युनिस्ट इकोसिस्टम बंधक बना सकता है? भारत का संविधान और यहाँ का कानून इसकी बिल्कुल इजाजत नहीं देता।
यह विडंबना ही है कि जब निर्वाचन आयोग पूरी पारदर्शिता और वैधानिक नियमों के तहत ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) जैसी प्रक्रिया को पूरा कर रहा है, तब इसे लेकर प्रायोजित हंगामा किया जा रहा है। एसआईआर (SIR) को लेकर फैलाए जा रहे 13 करोड़ नाम काटे जाने के दावे पूरी तरह आधारहीन हैं।
निर्वाचन आयोग के स्पष्ट आंकड़ों के अनुसार, मतदाता सूची से नाम केवल चार अत्यंत स्पष्ट और वैध परिस्थितियों में ही हटाए जाते हैं या तो मतदाता अनुपस्थित (Absent) है, या उसकी मृत्यु (Deceased) हो चुकी है, या दोहरी प्रविष्टियाँ (Duplicate) हैं, अथवा वह स्थायी रूप से स्थानांतरित (Shifted Permanently) हो चुका है। इन मामलों के पुख्ता आंकड़े इस प्रकार हैं:
* अनुपस्थित: 3.01 करोड़
* मृत: 2.80 करोड़
* दोहरी प्रविष्टियाँ: 1.02 करोड़
* स्थायी रूप से स्थानांतरित: 6.30 करोड़
* अन्य कारण: 26 लाख
यह पूरी प्रक्रिया बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) द्वारा घर-घर जाकर की जाती है और इसकी सूचियाँ राजनीतिक दलों के बूथ स्तरीय एजेंटों (BLAs) के साथ भी साझा की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग 3 करोड़ ऐसे संदिग्ध मतदाता भी रहे जिन्होंने अपने वैधानिक शपथ पत्र या आवश्यक पात्रता प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने ऐतिहासिक निर्णयों में एसआईआर की पूरी प्रक्रिया और इसकी वैधता को पूरी तरह से बरकरार रखा है। न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को यह चुनौती दी थी कि वे अदालत के सामने एक भी ऐसा व्यक्ति पेश करें जिसका नाम अवैध रूप से काटा गया हो, परंतु वे एक भी साक्ष्य या पीड़ित व्यक्ति को प्रस्तुत करने में पूरी तरह असमर्थ रहे।

इसके बावजूद, जब सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका यह कहता हैं कि “पुलिस कौन होती है हमें परमिशन देने वाली,” और बिना किसी अनुमति के सड़कों पर भीड़ इकट्ठा कर अराजकता फैलाने का प्रयास करते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश के कानून और संविधान को चुनौती देना है।
हाल ही में पिछले महीनों में नीट परीक्षा के विरोध के नाम पर या अन्य मुद्दों पर जिस प्रकार भीड़तंत्र का इस्तेमाल किया गया और आज जिस तरह से एहतियातन प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से लेकर रविवार को सर्वोच्च न्यायालय तक इस पर सवाल खड़े किए गए यह सब इस बात का प्रमाण है कि भारत की संप्रभुता को घेरने के लिए एक सुनियोजित नेक्सस सक्रिय है।
अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA और वैश्विक कम्युनिस्ट इकोसिस्टम के तार इसी गठजोड़ की ओर इशारा करते हैं, जहाँ अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क जैसे लोग भी लगातार भारतीय व्यवस्था पर निशाना साधते हैं और देश के भीतर विपक्षी दल राजनीतिक रोटियाँ सेकते हैं।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने समापन भाषण में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संवैधानिक तरीकों को अपनाने पर बल दिया था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए क्रांति, सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह जैसे असंवैधानिक तरीकों का सहारा लेने के बजाय संवैधानिक मार्ग अपनाया जाना चाहिए।
उन्होंने इन तरीकों को ‘अराजकता का व्याकरण’ (Grammar of Anarchy) की संज्ञा दी और चेतावनी दी कि संवैधानिक मार्ग उपलब्ध होने पर असंवैधानिक तरीकों को उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने यह भी आशंका व्यक्त की थी कि भारत में लोकतंत्र अपना बाहरी स्वरूप बनाए रखते हुए भी वास्तविकता में तानाशाही में बदल सकता है।
वर्ष 2014 के बाद भारतीय राजनीति की दिशा को गहराई से प्रभावित करने वाली एक महत्त्वपूर्ण परिघटना के रूप में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का राजनीतिक विस्तार केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्षेत्रीय चुनावों में भी इसके गहरे प्रभाव दिखाई दिए।
अक्टूबर 2024 में हरियाणा में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना, नवंबर 2024 में महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन की सरकार में निर्णायक भूमिका निभाना, फरवरी 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में लगभग 27 वर्षों बाद सत्ता में वापसी करना और नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरना इस बात के उदाहरण हैं कि पार्टी ने अपनी संगठनात्मक क्षमता और रणनीतिक विस्तार के बल पर राज्यों में भी अपनी स्थिति मजबूत की है।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 282 सीटें और लगभग 17.17 करोड़ मत प्राप्त करने वाली भाजपा ने वर्ष 2019 में 303 सीटें और लगभग 22.91 करोड़ मत हासिल किए। इसके बाद वर्ष 2024 के आम चुनावों में सीटों की संख्या घटकर 240 अवश्य हो गई, परंतु पार्टी के पक्ष में मतदान करने वाले नागरिकों की संख्या बढ़कर लगभग 23.60 करोड़ हो गई और मत प्रतिशत 31.34 प्रतिशत से बढ़कर 36.56 प्रतिशत तक पहुंच गया।
इस आंकड़े की व्याख्या को लेकर राजनीति विज्ञान में दो भिन्न दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। एक दृष्टिकोण यह मानता है कि सीटों में गिरावट के बावजूद मत प्रतिशत और कुल मतदाताओं की संख्या में वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि पार्टी का व्यापक जनाधार और मतदाता दायरा कमजोर होने के बजाय और अधिक विस्तृत हुआ है।
वहीं, दूसरा दृष्टिकोण यह रेखांकित करता है कि लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत का न मिलना और क्षेत्रीय स्तर पर सहयोगियों पर बढ़ती निर्भरता इस बात का संकेत है कि मतदाता देश में एकदलीय प्रभुत्व के स्थान पर राजनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अधिक तरजीह दे रहे हैं।
हालांकि, इस राजनीतिक वर्चस्व और विस्तार के दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं, विरोध प्रदर्शनों के स्वरूप और बाहरी हस्तक्षेप के आरोपों को लेकर गंभीर सार्वजनिक विमर्श भी छिड़ा है। अक्टूबर 2026 में दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे को लेकर हुए प्रदर्शनों और उस दौरान उठे राजनीतिक विवादों ने इस बहस को और तेज कर दिया।
“लोकतंत्र की हत्या हो रही है” का रोना रोने वाले कम्युनिस्टों और विपक्षी दलों का असली चेहरा अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। जब-जब देश में राष्ट्रवादी और मजबूत नेतृत्व लोकतांत्रिक जनादेश के बल पर आगे बढ़ता है, तब-तब ये ताकतें भारत की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए विदेशी ताकतों के हाथों की कठपुतली बन जाती हैं।
चुनावी मैदान में लगातार धूल चाटने के बाद इन ताकतों के पास जनता का सामना करने का कोई नैतिक साहस नहीं बचा है। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों में जनता ने इन्हें पूरी तरह नकार दिया है और इस जनमत से बौखलाकर ये लोग संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने के लिए “लोकतंत्र खतरे में है” का घिसा-पिटा राग अलापने लगते हैं, क्योंकि इनका असली मकसद जनहित नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन बचाना और देश में अराजकता फैलाना है।
अक्टूबर 2026 में दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे को लेकर हुए कथित प्रदर्शन कोई स्वतःस्फूर्त आंदोलन नहीं बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) और अन्य पश्चिमी विदेशी ताकतों द्वारा रची गई एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थे। वैचारिक रूप से खोखले हो चुके कम्युनिस्ट और उनके सहयोगी दल हमेशा से ऐसी विदेशी खुफिया एजेंसियों के टूलकिट पर काम करते आए हैं।
सीआईए जैसी विदेशी ताकतें दुनिया भर में चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने या तख्तापलट कराने के लिए पारंपरिक रूप से अराजकता, वित्त पोषण और छद्म आंदोलनों का सहारा लेती रही हैं। जब भी भारत वैश्विक स्तर पर स्वतंत्र विदेश नीति के साथ मजबूत होता है या देश की संस्थाएं राष्ट्रहित में स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, तो ये विदेशी खुफिया एजेंसियां देश के भीतर भाड़े के मोहरों और कम्युनिस्ट वैचारिक सहयोगियों के माध्यम से भीड़ एकत्रित कर तख्तापलट का षड्यंत्र रचती हैं।
संवैधानिक संस्थाओं से पारदर्शिता की मांग करने का ढोंग करने वाले ये लोग असल में सीआईए और उन विदेशी ताकतों की नुमाइंदगी करते हैं जिन्हें भारत की स्थिरता और प्रगति आंख में चुभती है और पारदर्शिता तथा मानवाधिकार के नाम पर देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करना इनका पुराना हथियार रहा है।
इस समूचे घटनाक्रम के बीच यह यथार्थ अपनी जगह स्थिर है कि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में विरोध जताने, असंतोष व्यक्त करने और अपनी बात रखने के अधिकार का सम्मान होना चाहिए, किंतु सड़क पर होने वाले दबाव, सीआईए समर्थित एजेंडे या कृत्रिम जनाक्रोश को चुनावी जनादेश का विकल्प नहीं माना जा सकता।

भारत की राजनीतिक व्यवस्था और सत्ता का वास्तविक निर्धारण किसी अमेरिकी खुफिया एजेंसी या बाहरी शक्ति की इच्छा, राजधानी की सड़कों पर जुटी भाड़े की भीड़ या रणनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि देश की जनता द्वारा अपने मताधिकार के जरिए तय किए गए जनादेश के माध्यम से ही होना चाहिए।
लगातार चुनावों में विजय प्राप्त करने के बाद यह स्पष्ट होता है कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों को विभिन्न राज्यों में व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ है। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का अधिकार जनता के पास है और सरकारों का भविष्य चुनावों के माध्यम से ही निर्धारित होता है। ऐसे में लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार को सड़क पर कुछ सौ या हजार लोगों की भीड़ जुटाकर अपदस्थ करने का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता।
जनादेश का सम्मान करना और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और अब देश की जनता इन तत्वों तथा सीआईए जैसी विदेशी ताकतों के इशारों पर नाचने वाले षड्यंत्रों के कुचक्र को भली-भांति समझ चुकी है।
भारत कोई नेपाल या बांग्लादेश नहीं है जहाँ कोई भी बाहरी ताकत या कम्युनिस्ट इकोसिस्टम मनचाहा खेल खेल सके। देश संविधान, नियमों और कानून से चलता है। मतदाता सूची की शुद्धता और राष्ट्र की संप्रभुता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता। निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपनी पूरी संवैधानिक निष्ठा के साथ कार्य कर रहे हैं। आज देश को आवश्यकता है कि वह इन अराजक ताकतों के खिलाफ एकजुट रहे और देश की विधि व्यवस्था तथा लोकतांत्रिक अखंडता की रक्षा करे।
– दीपक कुमार द्विवेदी

