| नायक-खलनायक, हास्य कलाकार सहित विविध पात्रों के रूप में पांच दशकों तक मराठी रंगभूमि, मराठी सिनेमा और हिंदी सिनेमा में स्वयं का वजूद सिद्ध कर नाना पाटेकर सदा के लिए रंगमंच से चले गए, परंतु उनकी यादे प्रशंसकों के दिल में सदैव विद्यमान रहेगी। |
नाना पाटेकर को केवल अभिनेता कहना उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना होगा। वे रंगमंच के अभिनेता थे, सिनेमा के अभिनेता थे, परंतु उससे भी पहले वे मनुष्य को पढ़ने वाले कलाकार थे। उनकी आंखें दर्शकों के भीतर उतरती थीं और उनकी आवाज उसके भीतर छिपे तनाव को बाहर निकाल देती थी। कभी वह आवाज क्रोध बनकर फूटती थी, कभी व्यंग्य बनकर चुभती थी, कभी करुणा में बदल जाती थी और कभी ऐसी सहज हंसी पैदा करती थी कि दर्शक भूल जाता था कि सामने वही अभिनेता है, जिसकी आवाज कुछ देर पहले किसी अपराधी या हत्यारे के रूप में उसे डरा रही थी।

8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ भारतीय रंगमंच और सिनेमा ने एक ऐसी आवाज खो दी, जिसकी नकल सम्भव है, पर उनकी जगह लेना लगभग असम्भव है। पांच दशक से अधिक के उनके अभिनय जीवन में मराठी रंगभूमि, मराठी सिनेमा और हिंदी सिनेमा तीनों ने उन्हें अलग-अलग रूपों में देखा। ‘नटसम्राट’ का गणपतराव बेलवलकर, ‘पुरुष’ का हिंसक पुरुष, ‘परिंदा’ का अन्ना, ‘प्रहार’ का सैनिक, ‘क्रांतिवीर’ का विद्रोही प्रवीण तिलक, ‘अब तक छप्पन’ का कठोर पुलिस अधिकारी और ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी- इन सबको जोड़ें तो एक ही अभिनेता दिखाई देता है, परंतु कोई भी भूमिका दूसरी की छाया नहीं लगती। यही नाना की सबसे बड़ी शक्ति थी।
नाना का मूल नाम विश्वनाथ पाटेकर था। सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा लेने वाले नाना ने विज्ञापन क्षेत्र में काम किया, चित्र बनाए और फिर रंगमंच की ओर चले गए। उनके लिए रंगमंच नौकरी नहीं था, वह जीवन का चुनाव था। आरम्भिक दिनों में आर्थिक स्थिति कठिन थी। ‘हमीदाबाईची कोठी’ जैसे नाटकों के दौर में उन्हें एक प्रयोग के बहुत कम पैसे मिलते थे, जबकि उनकी पत्नी नीलकांति बैंक में अधिकारी थीं। उन्होंने संघर्ष का वह समय देखा, जब अभिनय से मिलने वाली प्रतिष्ठा से पहले रोटी का प्रश्न सामने था, यही संघर्ष उनके अभिनय में दिखाई देता रहा। नाना ने कभी अपने चेहरे को नायक की पारम्परिक सुंदरता का सहारा नहीं बनाया। उन्होंने अपनी आवाज को हथियार बनाया, आंखों को संवाद बनाया और अपने चेहरे की कठोर रेखाओं को चरित्र की भाषा बना दिया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे संवाद बोलते समय केवल शब्द नहीं बोलते थे। वे शब्दों के पीछे की मनःस्थिति को बोलते थे। ‘वजूद’ फिल्म में माधुरी दीक्षित के लिए कही गई कविता ‘कैसे बताऊं तुम्हें तुम मेरे लिए क्या हो…“ ने हमेशा गम्भीर दिखनेवाले नाना का रोमांटिक चेहरा दिखाया, उनके आवाज की गहराई प्रेमी के भावों की गहराई बन गई।

मराठी रंगमंच ने इस कलाकार को गढ़ा। ‘पुरुष’ इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस नाटक में नाना ने जिस पुरुषवादी हिंसा को मंच पर उतारा, वह केवल किसी व्यक्ति की कहानी नहीं थी, वह समाज में उपस्थित सत्ता, वर्चस्व और स्त्री के प्रति हिंसक मानसिकता का चेहरा था। दिलचस्प बात यह है कि नाना ने एक समय महसूस किया कि दर्शक उनके खल चरित्र के प्रवेश पर भी तालियां बजाते हैं तो उन्हें यह बात परेशान करने लगी। उनके लिए अभिनय का उद्देश्य बुराई का महिमामंडन नहीं, उसे दर्शक के सामने असहज प्रश्न की तरह खड़ा करना था। ‘पुरुष’ के लम्बे रंगमंचीय यात्रा ने नाना को अभिनेता से आगे एक सामाजिक कलाकार बनाया।
मराठी रंगभूमि की उनकी यात्रा ‘नटसम्राट’ में अपने चरम पर पहुंची। गणपतराव बेलवलकर का चरित्र निभाना केवल किसी वृद्ध रंगकर्मी की भूमिका निभाना नहीं था। यह उस कलाकार की त्रासदी थी, जिसने पूरा जीवन दूसरों को भावनाएं दर्दी और अंत में स्वयं अपने परिवार के बीच भावनात्मक रूप से अकेला हो गया। नाना ने इस भूमिका में अभिनेता के भीतर छिपे आदमी को और आदमी के भीतर छिपे अभिनेता को एक साथ सामने रखा। नाना स्वयं मानते थे कि
‘नटसम्राट’ का रंगमंचीय रूप करना उनके लिए अत्यंत कठिन होता, उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा था कि इतने प्रयोगों के बाद कदाचित् उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता।
हिंदी सिनेमा में नाना का प्रवेश ‘गमन’से हुआ, पर उनकी असली पहचान धीरे-धीरे बनी। ‘सलाम बॉम्बे’, ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘प्रहार’ और फिर ‘क्रांतिवीर’ ने उनके अभिनय का वह संसार बनाया, जिसमें नायक की परिभाषा बदल गई। वे पारम्परिक नायक नहीं थे। वे टूटे हुए, गुस्सैल, असहमत, जिद्दी और भीतर से घायल आदमी के अभिनेता थे।
‘परिंदा’ का अन्ना इस बात का शानदार उदाहरण है। अन्ना अपराध की दुनिया का आदमी है। वह भावुकता को कमजोरी मानता है। उसके लिए रिश्ते भी अपराध की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। उसका प्रसिद्ध वाक्य- धंधे में कोई किसी का भाई नहीं… उस चरित्र की पूरी मानसिकता खोल देता है। नाना ने अन्ना को केवल हिंसक नहीं बनाया, उन्होंने उसके भीतर का भय भी दिखाया। इसीलिए अन्ना, को देखते हुए दर्शक उससे घृणा करता है, पर अपनी दृष्टि हटाना कठिन पाता है। नाना के अभिनय की यही शक्ति थी, वे अपने खलनायक को भी एक जीवित मनुष्य बना देते थे।
‘प्रहार’ में यही अभिनेता पूरी तरह बदल जाता है। सैनिक अधि-कारी के रूप में उनका शरीर, चाल, आवाज और आदेश देने का ढंग कठोर हो जाता है। यह भूमिका केवल वर्दी पहन लेने से नहीं बनी थी। नाना ने इस फिल्म के लिए मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ कठोर सैन्य प्रशिक्षण लिया था। आगे चलकर सेना के साथ उनका वास्तविक जुड़ाव कारगिल तक पहुंचा।
‘तिरंगा’ में शिवाजी राव वागले एक अलग नाना है। सामने राजकुमार जैसा भारी व्यक्तित्व और संवादों की आवश्यकता थी। ऐसे अभिनेता के सामने नाना ने अपनी आवाज को दबाया नहीं बल्कि अपनी अलग लय बनाई। राजकुमार की संवादशैली शाही और नाटकीय थी, जबकि नाना की आवाज अधिक बेचैन और धारदार। दोनों की टकराहट ने फिल्म को एक अलग ऊर्जा दी।

फिर आया ‘क्रांतिवीर’ यहां नाना केवल अभिनेता नहीं रहे, वे अपने समय के आक्रोश की आवाज बन गए। प्रवीण तिलक के चरित्र में व्यवस्था से मोहभंग, अपराध, साम्प्रदायिकता और राजनीति से पैदा हुई निराशा सब एक साथ उपस्थित हैं। फिल्म के चरम दृश्य में उनका प्रश्न- यह मुसलमान का खून, यह हिंदू का खून… – आज भी इसलिए याद है कि वह किसी जटिल राजनीतिक तर्क के बजाय मनुष्य के शरीर में बहने वाले रक्त की समानता के सामने धर्म की दीवार खड़ी करता है। अंतिम सीन में जब नाना कहते हैं “आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने….“ तो उस दृश्य में नाना की आवाज केवल ऊंची नहीं होती, वह भीतर से आती है। उनकी आंखों में गुस्सा है, चेहरे पर थकान है और आवाज में उस आदमी की निराशा है, जिसने समाज को टूटते हुए देखा है। यही कारण है कि ‘क्रांतिवीर’ का संवाद केवल फिल्मी संवाद नहीं रहा, वह सामाजिक स्मृति का हिस्सा बन गया।
नाना की संवादशैली का रहस्य केवल उनकी भारी आवाज नहीं था। वह आवाज कभी-कभी फुसफुसाहट में भी उतनी ही प्रभावी होती थी। वे शब्दों के बीच लम्बा विराम लेते थे। कई बार ऐसा लगता था कि संवाद बोलने से पहले पात्र अपने भीतर उससे लड़ रहा है। उनकी यही शैली ‘अब तक छप्पन’ में बिल्कुल अलग रूप में दिखाई देती है। ‘अब तक छप्पन’ का साधु आगाशे एक ऐसा पुलिस अधिकारी है जो अपराधियों से लड़ते-लड़ते स्वयं भी भीतर से कठोर हो चुका है। यहां नाना ने अपने अभिनय को नियंत्रित किया। ‘क्रांतिवीर’ का आक्रोश यहां चिल्लाता नहीं, वह आंखों में बैठा रहता है। बंदूक चलाने वाला पुलिस अधिकारी बोलते समय भी ऐसा लगता है जैसे हर शब्द नापकर बोल रहा हो। नाना ने वास्तविक जीवन से प्रेरित पुलिस चरित्रों को निभाने में इसी संयम का प्रयोग किया। आगे चलकर ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’ में भी उन्होंने मुम्बई पुलिस के अधिकारी का चरित्र निभाया।
यही नाना जब ‘वेलकम’ में आते हैं तो उदय शेट्टी को देखकर दर्शकों को एहसास होता है कि नाना पाटेकर कितना अद्भुत हास्य अभिनेता भी हो सकता है। ‘कंट्रोल उदय, कंट्रोल’ जैसे छोटे से वाक्य को उन्होंने जिस तरह बोला, वह संवाद से अधिक चरित्र की पहचान बन गया। उनकी हास्य शैली में कोई बनावटीपन नहीं था। वे चुटकुले नहीं सुना रहे थे। वे पूरी गम्भीरता से एक विचित्र परिस्थिति में फंसे आदमी की तरह व्यवहार करते थे और हास्य उसी गम्भीरता से पैदा होता था। यही नाना की विशेषता थी- वे कॉमेडी करने के लिए अपना अभिनय नहीं बदलते थे, वे गम्भीर अभिनय को हास्य परिस्थिति में रख देते थे। 2022 में आई ‘तड़का’ फिल्म में उन्होंने खाने के शौकीन व्यक्ति का किरदार निभाया है। मछली पकाने से पहले वे जिस तरह प्लेट में रखी मछली से बात करते हैं, वो देखने वाले के चेहरे पर मुस्कान ले आती है।
उनकी फिल्मों की सूची देखें तो अभिनय की यह विविधता और स्पष्ट होती है। ‘खामोशी’ में संवेदनशीलता, अग्निसाक्षी में मनोवैज्ञानिक जटिलता, ‘वजूद’ में विचित्रता, ‘अपहरण’ में राजनीतिक अपराध का संसार, ‘राजनीति’ में सत्ता की चालें, ‘टैक्सी नम्बर 9211’ में सामान्य व्यक्ति का तनाव और ‘वेलकम’ में हास्य- नाना किसी एक छवि में कैद नहीं हुए। बाद के वर्षों में उन्होंने वास्तविक व्यक्तियों से प्रेरित भूमिकाएं भी निभाई। ’अब तक छप्पन’ के साधु आगाशे से लेकर ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’, ’डॉ. प्रकाश बाबा आमटे’ और ‘द वैक्सीन वॉर’ तक। एक साक्षात्कार में नाना ने अभिनय के बारे में बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी कि कलाकार को किसी एक भूमिका में अटकना नहीं चाहिए। यदि अभिनेता एक भूमिका में ही रम गया तो अगला काम कैसे करेगा? यह बात उनके पूरे करियर पर लागू होती है। वे अपने पुराने पात्र की लोकप्रियता को अगली भूमिका पर हावी नहीं होने देते थे।
उनका ‘सटका दिमाग’ भी इसी स्वतंत्रता का हिस्सा था। वे बात को सजाकर रखने वाले व्यक्ति नहीं थे। उन्हें फिल्म उद्योग की चमक-दमक से प्रभावित होकर बोलने की आवश्यकता नहीं थी। निर्देशक से मतभेद हो, सह-अभिनेता से असहमति हो या उद्योग की किसी प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाना हो- नाना अपनी बात कह देते थे। उनकी स्पष्टवादिता कई बार गुस्से जैसी लगती थी। वास्तव में उनके व्यक्तित्व में गुस्सा था भी, पर उस गुस्से के पीछे संवेदनशील व्यक्ति था। कदाचित् इसीलिए उनका क्रोध दर्शक को केवल डराता नहीं था, कई बार बेचैन भी करता था। वे भी अपने भीतर की बेचैनी को छिपाते नहीं थे।
नाना का निजी जीवन भी इसी सादगी और स्पष्टता से बना था। उन्होंने कभी अपने जीवन को सितारों की चमक में लपेटने का प्रयास नहीं किया। संघर्ष के दिनों में उन्होंने कम पैसे में जीवन जिया। उनकी पत्नी नीलकांति बैंक में अधिकारी थीं। नाना ने अपने शुरुआती वर्षों में आर्थिक कठिनाइयों को स्वीकार किया। वे बताते थे कि अभिनय से पहले जीवन में बहुत कम साधन थे। यह अनुभव आगे चलकर उनकी सामाजिक संवेदना का आधार बना। उनका रहन-सहन भी सामान्य रहा। करोड़ों की फिल्मों में काम करने वाला व्यक्ति गांव की मिट्टी में सहज दिखाई देता था। वे स्वयं को फिल्म उद्योग का व्यक्ति नहीं मानते थे। फिल्में उनका काम थीं, जीवन कहीं और था। इसी कारण उनकी प्रसिद्धि उन्हें भीतर से बहुत बड़ा नहीं बना सकी। कदाचित् वे जानते थे कि अभिनेता की लोकप्रियता दर्शक देता है और दर्शक कभी भी दूसरी दिशा में जा सकता है।
कारगिल उनके व्यक्तित्व का सबसे असाधारण अध्याय है। 1999 में कारगिल युद्ध के समय वे केवल सैनिकों से मिलने नहीं गए। उन्होंने युद्ध क्षेत्र में लम्बे समय तक सैनिकों के साथ समय बिताया। उनके अनुसार यह अवधि लगभग 60 दिनों की थी। ‘प्रहार’ के लिए प्राप्त सैन्य प्रशिक्षण और सेना से बना उनका सम्बंध इस समय वास्तविक अनुभव में बदल गया। वे क्विक रिएक्शन टीम के साथ भी रहे।
कारगिल जाने वाला अभिनेता कदाचित् ही कभी केवल अभिनेता रह सकता है। वहां कैमरा नहीं था, निर्देशक नहीं था, रिटेक नहीं था। वहां वास्तविक गोलियां थीं और वास्तविक जवान थे। नाना ने उस अनुभव को अपने भीतर रखा। कदाचित् इसलिए बाद में सैनिकों की बात करते समय उनकी आवाज में फिल्मी राष्ट्रवाद नहीं, व्यक्तिगत अनुभव का भार दिखाई देता था।
नाना के जीवन की सबसे बड़ी सामाजिक भूमिका किसानों के बीच दिखाई देती है। महाराष्ट्र के किसान संकट और आत्महत्याओं के समाचार उन्हें लम्बे समय से परेशान करते थे। वे स्वयं कहते थे कि पहले वे इन समाचारों को देखते थे, दुखी होते थे और फिर अपने जीवन में लौट जाते थे। एक समय उन्हें लगा कि केवल दुखी होना पर्याप्त नहीं है। इसी सोच से मकरंद अनासपुरे के साथ ‘नाम फाउंडेशन’ का काम शुरू हुआ। सितम्बर 2015 में शुरू हुए इस प्रयास का लक्ष्य किसान और ग्रामीण जीवन को केवल तत्काल आर्थिक सहायता देना नहीं बल्कि पानी, खेती, रोजगार और गांव के पुनर्निर्माण से जोड़ना था।

पानी उनके सामाजिक काम का केंद्रीय विषय बना। महाराष्ट्र के सूखे क्षेत्रों में जलस्रोतों का पुनरुद्धार, नदी-नालों का गहरीकरण, गाद निकालना, जलसंचय और भूजल पुनर्भरण जैसे काम किए गए। नाम फाउंडेशन के अनुसार 2015 से 2025 के बीच हजारों जलस्रोतों और सैकड़ों नदियों तथा नालों पर काम किया गया। यहां नाना का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि वे कृषि विशेषज्ञ नहीं थे। वे जल वैज्ञानिक नहीं थे, परंतु उन्होंने अपनी लोकप्रियता को समस्या की ओर ध्यान खींचने के साधन में बदला। उन्होंने किसान को दया का पात्र नहीं, आत्मसम्मान से जीने वाला व्यक्ति माना। पानी बचाना उनके लिए केवल
पर्यावरण का प्रश्न नहीं था, वह किसान के जीवन
और गांव की अर्थव्यवस्था का प्रश्न था। उनका सामाजिक संज्ञान उनकी राजनीति से भी अलग था। वे अनेक राजनीतिक नेताओं के सम्पर्क में रहे, पर स्वयं सक्रिय राजनीति से दूर रहे। विभिन्न राजनीतिक विचारों के लोगों से उनके सम्बंध रहे और उन्होंने किसी एक दल की चौखट में स्वयं को सीमित नहीं किया। किसान, विकास, जाति और धर्म के प्रश्नों पर वे अपनी स्वतंत्र राय रखते थे। यही कारण है कि नाना को किसी एक विचारधारा के अभिनेता के रूप में बांधना कठिन है। वे जिस बात को सही मानते थे, उसके पक्ष में बोलते थे और जिस बात को गलत मानते थे, उसके विरोध में। यह स्वतंत्रता उनके अभिनय में भी थी और जीवन में भी।
उनका एक और पक्ष कम चर्चा में आता है- वे भीतर से बहुत भावुक व्यक्ति थे। वे स्वयं कहते थे कि फिल्म देखते समय वे भी रोते हैं। यह बात मामूली लग सकती है, पर नाना के अभिनय को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। जो अभिनेता दूसरों के दुख को महसूस नहीं कर सकता, वह करुणा का अभिनय कितनी देर कर सकता है? नाना की आंखों में जो बेचैनी दिखाई देती थी, उसका एक स्रोत कदाचित् यही संवेदनशीलता थी।
नाना पाटेकर का जीवन एक विचित्र विरोधाभास है। वे गुस्सैल थे, पर संवेदनशील भी। वे कठोर थे, पर भीतर से कोमल। वे प्रसिद्ध थे, पर सामान्य रहना चाहते थे। वे करोड़ों दर्शकों के अभिनेता थे, पर गांव के किसान की चिंता करते थे। वे पर्दे पर बंदूक उठाते थे, परंतु वास्तविक जीवन में पानी बचाने के लिए फावड़ा उठाने वालों के साथ खड़े होते थे। इसलिए नाना पाटेकर को याद करने का सबसे सही तरीका उनके संवादों की सूची बनाना नहीं है। उनके संवादों के पीछे खड़े व्यक्ति को समझना है। उनकी आवाज अब नई फिल्म में नहीं सुनाई देगी, परंतु उनकी आवाज की प्रतिध्वनि लम्बे समय तक सुनाई देती रहेगी। जब कोई कलाकार अपनी लोकप्रियता को किसानों तक पहुंचाता है, पानी के लिए काम करता है, सैनिकों के बीच जाता है और फिर भी अपने लिए किसी महानायक की मुद्रा नहीं बनाता, तब उसका जीवन उसकी फिल्मों से बड़ा हो जाता है। नाना पाटेकर की सबसे बड़ी भूमिका कदाचित् किसी फिल्म की भूमिका नहीं थी। वह भूमिका थी- अपने समय का व्यक्ति बने रहना।
नाना ने मंच पर भी जीवन जिया, पर्दे पर भी और पर्दे के बाहर भी। यही कारण है कि उनका जाना केवल एक अभिनेता का जाना नहीं है। यह उस दुर्लभ कलाकार की विदाई है, जिसके अभिनय में वह व्यक्ति था, जिसकी आंखों में समाज था और जिसकी बेचैनी में अपने समय की सच्चाई।
पल्लवी अनवेकर
