युवाओं के बीच प्रोटीन पाऊडर पीने का जबरदस्त क्रेज है। यह शरीर के लिए क्यों, कितना और कब आवश्यक है? क्या यह पेट के लिए हानिकारक हो सकती है, डालते हैं इसपर एक दृष्टि।
आजकल जिम जाने वाले युवा से लेकर ऑफिस में बैठे मिडिल-एज लोग तक, अधिकतर के बैग में एक पाउच अवश्य दिखाई देता है-प्रोटीन पाउडर। मसल ग्रोथ, वेट लॉस और फास्ट रिकवरी के आकर्षक दावों के बीच बहुत कम लोग यह पूछते हैं कि क्या यह सप्लीमेंट वाकई इतना निर्दोष है? सच यह है कि गलत तरीके से, बिना आवश्यकता के या कम गुणवत्ता वाला प्रोटीन पाउडर पेट और पूरे शरीर के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।
डेयरी-आधारित व्हे या कैसीन प्रोटीन में लैक्टोज होता है। भारत में लाखों लोग लैक्टोज असहिष्णुता या संवेदनशीलता से जूझते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह पाउडर गैस, पेट फूलना, ऐंठन, दस्त और पेट दर्द का सीधा कारण बन जाता है। कई ब्रांड्स में मिलाए जाने वाले कृत्रिम स्वीटनर, फ्लेवर और केमिकल्स पाचन तंत्र को और बिगाड़ देते हैं। व्हे प्रोटीन में फाइबर लगभग शून्य होता है, जिससे कब्ज की शिकायत आम हो जाती है। वहीं प्लांट-बेस्ड विकल्प जैसे मटर या सोया प्रोटीन में फाइबर ज्यादा होने से गैस और सूजन की समस्या पैदा हो सकती है। परिणाम -सुबह-शाम शेक पीने के बावजूद पेट हमेशा भारी और बेचैन। किडनी और लिवर पर दबाव एक गम्भीर मुद्दा है। आवश्यकता से ज्यादा प्रोटीन शरीर की फिल्ट्रेशन क्षमता पर अतिरिक्त बोझ डालता है। जिनकी किडनी पहले से कमजोर है, उनके लिए यह खतरा और बढ़ जाता है।

कई सस्ते और बिना प्रमाणित ब्रांड्स में आर्सेनिक, लेड और कैडमियम जैसी भारी धातुएं पाई गई हैं। लम्बे समय तक ऐसे प्रोडक्ट का सेवन धीरे-धीरे शरीर में विष जमा कर सकता है। फ्लेवर्ड पाउडर में छिपी हुई चीनी और अतिरिक्त कैलोरी वजन बढ़ाने के साथ ब्लड शुगर भी असंतुलित कर सकती है। अब सवाल यह है कि क्या आपको वाकई इसकी आवश्यकता है? एक सामान्य भारतीय व्यक्ति को प्रतिदिन अपने वजन के हिसाब से लगभग 0.8 से 1 ग्राम प्रोटीन प्रति किलोग्राम पर्याप्त होता है। दाल, दूध, पनीर, अंडा, सोया, मछली, चिकन और नट्स जैसे प्राकृतिक खाद्य पदार्थों से यह आसानी से पूरा हो जाता है। विशेषज्ञों का साफ मत है-यदि आप सामान्य जीवन जी रहे हैं और कोई भारी बॉडीबिल्डिंग या प्रोफेशनल एथलेटिक ट्रेनिंग नहीं कर रहे, तो अलग से प्रोटीन पाउडर की कोई विशेष आवश्यकता नहीं।
फिर भी अगर सप्लीमेंट लेना ही है तो कुछ सावधानियां आवश्यक हैं। हमेशा डॉक्टर या न्यूट्रिशनिस्ट से सलाह लें। थर्ड-पार्टी लैब द्वारा टेस्टेड, कम सामग्री वाला (क्लीन लेबल) और भरोसेमंद ब्रांड चुनें। पर्याप्त पानी पिएं क्योंकि प्रोटीन का चयापचय शरीर से ज्यादा पानी मांगता है। प्रोटीन पाउडर न तो जादू की गोली है और न ही विष। सही मात्रा, सही गुणवत्ता और सही आवश्यकता के साथ यह सहायक हो सकता है। लेकिन बिना सोचे-समझे प्रतिदिन शेक पीना पेट, किडनी और समग्र स्वास्थ्य के लिए महंगा सौदा साबित हो सकता है। प्रकृति ने हमें पर्याप्त प्रोटीन के स्रोत दिए हैं। उन्हें अनदेखा कर केमिकल युक्त पाउडर पर निर्भर होना समझदारी नहीं। स्वस्थ शरीर की नींव संतुलित आहार और जागरूकता पर टिकी होती है, किसी पाउच पर नहीं।

