पुरुषार्थ चतुष्ट्य

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भारतीय संस्कृति में जीवन को सर्व प्रकारेण आनंदपूर्ण मनाने के लिए पुरुषार्थ चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की उद्भावना को रखा गया है। सबसे पहले धर्म की अवधारणा है। यदि धर्म को सर्वप्रथम न रखा गया होता, तो ‘अर्थ’ और ‘काम’ के पीछे-पीछे भागते रहने से समाज में अव्यवस्था फैल जाती।

गुरु-भक्त स्वामी विवेकानंद

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स्वामी विवेकानंद मुस्कुराये और पाद वन्दन करते हुए विनीत भाव से बोले ‘‘गुरुवर! आप ही ने तो नरेन्द्र को विवेकानंद बनाया था। आप जैसे गुरु का पारस स्पर्श था, जो आपके समक्ष है। आपकी ही प्रेरणा से मैं यहां तक पहुंचा हूं।...’’

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