पुरुषार्थ चतुष्ट्य

भारतीय संस्कृति में जीवन को सर्व प्रकारेण आनंदपूर्ण मनाने के लिए पुरुषार्थ चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की उद्भावना को रखा गया है। सबसे पहले धर्म की अवधारणा है। यदि धर्म को सर्वप्रथम न रखा गया होता, तो ‘अर्थ’ और ‘काम’ के पीछे-पीछे भागते रहने से समाज में अव्यवस्था फैल जाती। मानव केवल ‘अर्थ’ के पीछे ही भागता रहता और जीवन का अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ को भुला बैठता। ‘अर्थ’ के साथ ‘काम’ की कामना तो पशुता है, जिसमें माना गया है- ‘आहार, निद्रा, भय, मैथुनम् च’ समान्य एतत पशुभिः नराणाम अर्थात् आहार लेना, सोना, भय और मैथुन करना यह पशुओं और मनुष्यों के समान कार्य है। ‘अर्थ’ और ‘काम’ की आसक्ति तो आसुरी जीवन को आमंत्रण देना है, इसलिए हमारी संस्कृति में तो सर्वप्रथम धर्म को प्राथमिकता दी गई है। सबसे पहले धर्म फिर उसके बाद ही ‘अर्थ’ और ‘काम’ की उपासना की बात हमारे धर्मग्रंथों में कही गई है, क्योंकि ‘अर्थ’ और ‘काम’ के बगैर भी जीवन नहीं चल पाएगा । मानव ‘अर्थ’ और ‘काम’ से मुक्त भी तो नहीं हो सकता, इसलिए ये दोनों पुरुषार्थ भी आवश्यक हैं। केवल ‘अर्थ’ और ‘काम’ के पीछे भागता हुआ मनुष्य कहीं अमर्यादित न हो जाए, कहीं अर्थ के पीछे पागल न हो जाए। जैसा कि कहा गया है-

‘‘कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय।
या खाए बौराये नर, वा पाए बौराय।’’

‘अर्थ’ की अधिकता या अर्थ पाने मात्र से मानव में पागलपन सवार हो जाता हैं, यह तो रही अर्थ प्राप्ति की विकराल परिस्थिति। इसी प्रकार ‘काम’ की प्रबलता से सामाजिक मर्यादायें ध्वस्त हो जाती हैं-

‘‘काम आतुरी नार।’’

नारी में काम की प्रधानता को भली-भाँति परिलक्षित करती है कि जब काम की प्रधानता होती है तो सभी मान-मर्यादाएँ ढह जाती हैं और समाज में उच्छृंखलता का परिवेश बढ़ता जाता है। आज समाज में इन्हीं दोनों पुरुषार्थों के पीछे, ‘मोक्ष’ के कल्याणकारी पुरुषार्थ की उपेक्षा से समाज में भ्रष्टाचार, अनाचार और व्यभिचार बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि मानव आंतरिक रूप से बेचैन है, अशांत है और विभ्रम की स्थिति तक पहुंच गया है, इन्हीं दुष्टाचारों के जनक ‘अर्थ’ और ‘काम’ के पहले ‘धर्म’ पुरुषार्थ की अवधारणा को हमारे ऋषि-मनस्वियों ने सबसे पहले जोड़ा है।

‘अर्थ’ और ‘काम’ की आसक्ति तो आसुरी जीवन को आमंत्रण देना है, इसलिए हमारी संस्कृति में तो सर्वप्रथम धर्म को प्राथमिकता दी गई है। सबसे पहले धर्म फिर उसके बाद ही ‘अर्थ’ और ‘काम’ की उपासना की बात हमारे धर्मग्रंथों में कही गई है, क्योंकि ‘अर्थ’ और ‘काम’ के बगैर भी जीवन नहीं चल पाएगा ।

धर्म का अंकुश ही ऐसा हथियार है, जो कलुषित भावनाओं और अनियंत्रित आर्थिक अभिलाषाओं पर नियंत्रण रखकर अपने जीवन को सरल, शांत और आनंदमय बनाये रखने के लिए आदेशित करता है। ‘धर्म’ के लिए कहा गया है-

‘यतोऽभ्युदयनि:श्रेयस् सिद्धि:स धर्म:’’ अर्थात जिससे अभ्युदय और नि:श्रेयस यानी लौकिक और पारलौकिक (मोक्ष) दोनों की सिद्धि हो, वह धर्म है। ‘मोक्ष’ प्राप्त करना तो हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य है ही, जबकि ‘धर्म’ धारण करना हमारा सर्वप्रथम उद्देश्य है, इसीलिए भारतीय संस्कृति में सनातन काल से ही विश्व कल्याण की बात ‘सर्व भूत हिते रता:’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की व्यापक अवघारणा को व्यवहृत करने के लिए धर्म को प्राधानता दी गई है। हमारा अनादि काल से चला आने वाला धर्म हिंंदू धर्म’ है। इसमें सभी पूजा एवं उपासना पद्धति, सगुण- निर्गुण को मानने वाले, शैव-शाक्त-वैष्णव-गाणपत्य आदि व्यापक स्तर पर आत्मसात करता हुआ यह र्िंहंदू धर्म मानव मात्र के कल्याण के लिए आवश्यक है। इसमें पुरुषार्थ चतुष्ट्य का प्रथम पुरुषार्थ ‘धर्म’ हमारे अंतिम पुरुषार्थ ‘मोक्ष’ की प्राप्ति के निमित्त है। ‘अर्थ’ और ‘काम’ की भी अवधारणाओं को मनुष्य को इस लोक के सुखों के लिए आवश्यक माना गया है। हम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के आराधक बनकर अपना लोक और परलोक बनायें।

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