कुत्ता भले हो, पर फंछी भी हैं

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भांप के छल्लों से फूरे रसोईघर में गर्माहट थी। विभिन्न फकवानों की गंध शरीर में समा रही थी। एकदम फवित्रता, उत्साह, हल्कापन महसूस होने लगा। हर सांस एकदम तलुए तक जाकर फिर लौटने लगी। कानों केें किनारे भी किंचित गर्म हो गए। बालों में भी मामूली गीलापन आ गया। थोड़ी भांफ छंटने के बाद रसोइये, अन्य कर्मचारी स्वच्छ, गंभीर और आश्वासक देवदूत जैसे दिखाई देने लगे।

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