कार्यकर्ता निर्माण में अटलजी

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“वैसे तो अटल जी बहुत विनोदी स्वभाव के थे, लेकिन किसी नए व्यक्ति से मिलते समय जल्दी नहीं खुलते थे। कार्यकर्ता नया हो या पुराना, उनके सामने जाकर उनके बिना बोले भी उनके हाव-भाव से भी कुछ न कुछ सीख कर आता। थोड़े दिनों में ही बहुत खुल जाते थे।…

गांव की बेटी, सबकी बेटी

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दादी अपने जीवन में छुआछूत का विषेश व्यवहार करती थीं। दरवाजे और आंगन, खेत-खलिहान में काम करने वाली महिला-पुरुषों को कभी अपना शरीर नहीं छूने देतीं। पर उनसे मुहब्बत भी बहुत करती थीं। गांव में किसी जाति की बेटी का ब्याह हो, वे हम बहनों को लेकर पहुंच जातीं।

बरखा बहार आई

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वर्षा क्या आई, मानो पृथ्वी पर बहार आ गई। मोर ही नहीं नाचता, मनुष्य का मन मयूर भी नाच उठता है। वर्षा मात्र पानी नहीं देती। हमारे मन के अंदर भी हरियाली भर देती है।

कमला आडवाणी – एक पहचान

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घर-गृहस्थी तो कमला जी ने ही संभाली थी। आडवाणी जी उनका सहयोग करने में प्रसन्न होते। ....दाम्पत्य के इस मर्म को समझना होगा कि एक दूजे के लिए समर्पित जीवन जीते हुए भी अपनी-अपनी पहचान बनाए रखी जा सकती है। कमला आडवाणी जी की अपनी भी एक पहचान थी।

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