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हमें महर्षि देव दयानंद सरस्वती के रूप में एक ऐसी विद्युत अग्नि के दर्शन हुए जिसने अपनी कड़कती प्रखर प्रज्ञा के प्रहार से वेद-ज्ञान को आवृत करने वाले घने काले बादलों को खण्ड़-खण्ड़ करके अस्तित्वहीन ही कर दिया। वेद ईश्वरीय ज्ञान है, इस पर आशंका के बादल छंट गए।

वेद ईश्वरीय ज्ञान है इस बात को अस्वीकार करने में हठवादिता, दुराग्रह एवं कथित, कल्पित जातीय अभिमान के अतिरिक्त तर्क एवं प्रमाणयुक्त कोई कारण नहीं। इन जात्यभिमानियों के लिए डार्विन का वह विकासवाद ही प्रमुख आधार है, जिसे आज उन्हीं के वैज्ञानिक अनुसंधान निराधार और कल्पना-प्रसूत सिद्ध कर चुके हैं। विज्ञान के क्षेत्र में चाहे विकासवाद की ‘एक्सपायर डेट’ निकल चुकी हो, मगर अपने कथित गुण-गौरव की सुरक्षा के लिए पाश्चात्य जगत आज भी उसी का सहारा लेने को विवश है। वेद के सम्बंध में वे विकासवाद के खूंटे से कितनी जड़ता पूर्वक बंधे हुए हैं, इस सम्बंध में योगी अरविंद लिखते हैं- ‘पाश्चात्य विद्वानों के मन में विकासवाद के प्रति आग्रह इतना प्रबल है कि यदि वेदों का कोई अर्थ विकासवाद की पुष्टि नहीं करता तो वे या तो अर्थ को तोड़-मरोड़ देते हैं, या मंत्र के कालांतर में प्रक्षिप्त होने की घोषणा कर देते हैं।’
विकासवाद के खोखलेपन पर लिखने लगें तो विषयांतर के साथ लेख का कलेवर भी अनियंत्रित हो उठेगा, फिर भी इतना संकेत तो अवश्य देना चाहेंगे कि चार्ल्स डार्विन के सहयोगी डॉ. रसेल वालेस ने भी विकासवाद की भावना का स्पष्ट खण्ड़न करते हुए ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया है। डार्विन के पुत्र जॉर्ज डार्विन ने विकासवाद को अनुपयोगी बताया था। यूं ही रेत की दीवार से हवाई किले बनाना उनकी सत्यशीलता को धूमिल कर डालता है। वेदों की दिव्य आभा को धुंधलाने के प्रयास इन्होंने कई स्तरों पर किए। पराधीन काल में देश के अच्छे संस्कृतज्ञों को स्कॉलरशिप देकर यूरोप भेजा कि उच्च शिक्षा के लिए यूरोपीय विद्वानों को गुरु बनाओ। यूरोपीय विद्वानों की गुरुता और भारतीयों को, यूरोप भेजने की मनसा एक प्रसंग से ही नंगी होकर सामने आती है।

एक संस्कृत के विद्वान को अधिक विद्वता दिलाने के लिए अंग्रेज सरकार ने मैकड़ानल के पास भेजा। मैकड़ानल पाश्चात्य जगत के मूर्धन्य विद्वानों में गिने जाते हैं। जब यह भारतीय विद्यार्थी अपने पाश्चात्य गुरु से मिला तो संस्कृत में वार्तालाप करने लगा। मैकड़ानल सामान्य संस्कृत बोलने से कतराते हुए अपने होने वाले शिष्य से बोले- ‘यह मैं स्वीकार करता हूं कि संस्कृत की आपकी जितनी योग्यता मेरी नहीं है। आप यहां संस्कृत-साहित्य के अध्ययन के लिए भेजे भी नहीं गए हैं। यहां तक आप केवल इसलिए आए हैं कि आप पश्चिमी विद्वानों की अन्वेषण प्रणाली को सीख लें।’ संस्कृत में सामान्य संभाषण मे असमर्थ पाश्चात्य विद्वान जिनको अन्वेषण करना सिखाएंगे वे कैसा अन्वेषण करेंगे इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। कुछ भी हो इतना तो हो ही गया कि भारत में भी वे एक ऐसा वर्ग खड़ा करने में सफल हो गए, जो अपने गौरव-गरिमामय वैदिक वाङ्मय की जड़ें खोदने का काम निष्ठापूर्वक आज भी कर रहा है।

इसे क्या कहें
वेद ईश्वरीय ज्ञान है, यह धारणा और विश्वास तो मानव के इतिहास के जन्म से लेकर आज तक हमारे मनोमस्तिष्क में बैठा हुआ है। महाभारत काल तक किसी ने इसका प्रतिवाद नहीं किया। महाभारतोत्तर कालीन वेद भाष्यकारों की कतिपय कुतर्की तालिकाओं के कारण मानव का यह विश्वास डगमगाने लगा। संस्कृत की एक प्रसिद्ध उक्ति है – ‘बिभेति अल्प श्रुतात् वेदो मामयं प्रहरिष्यति’ वेद कम विद्या वाले से डरता है कि यह मुझ पर प्रहार करेगा। हमारे कुछ वेद भाष्यकारों ने वेदों के इस भय की चिंता न करते हुए अपनी अल्पज्ञता का ऐसा प्रहार किया कि उनकी निष्कलंक पावन- प्रभा को मानवीय ज्ञान के आवरण में एक लम्बे काल तक छिपा दिया। यद्यपि उन सभी भाष्यकारों ने वेदों को ईश्वरीय ज्ञान ही माना, तथापि वे उसे इस रूप में प्रस्तुत नहीं कर सके।
महाभारत काल के बाद ही धीरे-धीरे बढ़ने वाला ये अज्ञानांधकार सायण और महीधर आदि के वेद भाष्यों की कृपा से और गहराने लगा। यह विष-बीज समय पाकर अंकुरित हुआ, पुष्पित- पल्लवित होकर बाइबिल व कुरान आदि के रूप में ऐसे फल देने लगा, जिनके सेवन से ही नहीं सम्पर्क में आने मात्र से मानव की बुद्धि उन्मादग्रस्त होकर अनर्थ पर अनर्थ करने लगी। इस विषैले धर्मोन्माद से विज्ञान को शैशवकाल से ही संघर्ष करना पड़ा, कई बलिदान भी दिए। अज्ञान से विज्ञान का यह संघर्ष उस उषाकाल की तरह था, जो ज्ञान के प्रखर सूर्य के उदय होने का पूर्वाभास देता है। प्राकृतिक नियमों का सहारा लेकर चलने वाला विज्ञान धर्मोन्माद-जन्य अज्ञान से संघर्ष में ज्यौं-ज्यौं प्रबल होने लगा त्यौं-त्यौं वह इस उन्माद -जन्य अज्ञान के मूल स्रोत बना दिए गए, वेद पर प्रहार करने लगा। प्रभु की असीम कृपा और करूणा मानव जाति पर पुन: प्रकाशित हुई, हमें महर्षि देव दयानंद सरस्वती के रूप में एक ऐसी विद्युत अग्नि के दर्शन हुए जिसने अपनी कड़कती प्रखर प्रज्ञा के प्रहार से वेद-ज्ञान को आवृत करने वाले घने काले बादलों को खण्ड़-खण्ड़ करके अस्तित्वहीन ही कर दिया। वेद-भानु विश्व के जन-मन व कण-कण को आलोकित करने लगा, मगर अंधकार की अभ्यस्त आंखों वाले कुरानी-किरानी तथा उष:काल के लिए लड़ने वाले अचानक उद्दीप्त इस निष्कलंक वेद-भानु के चमचमाते प्रकाश को सहन न कर सके। अचम्भा जो हुआ था उनके सामने। इन्होंने सोचा होगा कि अभी सूर्य निकलेगा, उसकी गुनगुनी सुहानी धूप का आनंद लेंगे फिर धीरे-धीरे प्रखर होता जाएगा, यही तो क्रम है, विकासवाद क्रमिक विकास ही तो बताता है। वे चाहे कुछ भी सोचें, कुछ भी कहें या करें, लेकिन हम तो ऋषि-संतान हैं न, हमारे तो स्वभाव और संस्कारों में बसा है सच्चे ज्ञान का स्वागत करना। विज्ञान के मद में डूबा जातीय उच्चता को सिद्ध करने में लगा पाश्चात्य जगत उस वेद-भानु पर धूल फेंके तो कोई आश्चर्य नहीं – ‘न वेत्ति यो यस्य गुणं प्रकर्ष स तं सदा निन्दति न अत्र चित्रम्’, जो जिसके उत्कृष्ट गुणों को नहीं जानता वह सदा उसकी निंदा ही करता है, यह कोई विचित्र बात नहीं। हम भारतीय ‘अन्धैनेव नीयमाना यथान्धा’ का आचरण करते हैं, तो हृदय कष्ट से भर उठता है कि इसे क्या कहें?
हमें सोचना होगा
वेद ईश्वरीय ज्ञान है, इस बात को स्वीकारना यद्यपि मनुष्य मात्र के गौरव और कल्याण का हेतु है, परमपिता के ज्ञान पर किसी पुत्र का कोई विशेषाधिकार नहीं है। इतना होने पर भी हम भारतीयों को इतना गौरव तो प्राप्त ही है कि उस जगतपिता ने हमें व हमारे पूर्वज ऋषियों को इस दिव्य ज्ञान का माध्यम बनाया है। हम इसे कोई विशेषाधिकार तो नहीं कह सकते, मगर इस वेद ज्ञान को संसार के कोने-कोने में पहुंचाने, मनुष्य मात्र के कानों में ये ज्ञानामृत टपकाने के विशेष कर्तव्य के रूप में तो स्वीकार कर सकते हैं। आज मानवता विज्ञान और विषैले धर्मोन्माद (कथित) के क्रूर पाटों में पिस रही हैं। विज्ञान के शुष्क मदोन्मत्त प्रतिनिधियों ने जितने भी घातक अस्त्र-शस्त्र बना कर तैयार किए हैं, आज वे क्रूर जन संहार में जुटे धर्मोन्मादियों के हाथों में पड़ कर और भी अधिक विनाशक हो उठे हैं। निरीह मानवता चेतना-हीन होकर अज्ञात सी प्रतीक्षा कर रही है कि कब कोई सिरफिरा पागलपन में पड़ कर प्रलय को निमंत्रण दे बैठे। इस विकराल स्थिति में हम ऋषि संतानों, वेदानुयाइयों का कर्तव्य बनता है कि हम वेदामृत का स्वयं पान करें और प्रभु ने हमें- ‘मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततन:। गाय गायत्रं उक्थ्यम्’ (ऋ 1.38.14) मंत्र से जो आदेश दिया है, उसका पूरी शक्ति – सामर्थ्य और निष्ठा से पालन करें। प्रभु ने कहा है कि वेद मंत्रों को अपने मुंह में भर लो और फिर बादल की तरह गर्जते हुए गंभीर स्वर में, प्राण, रक्षक इन मंत्रों को दूर-दूर तक फैला दो। धरा जल रही है, परमाणु बमों के ढेर पर बैठे विश्व के प्राणी मात्र के प्राण सूख रहे हैं, बादल की तरह गरज- गरज कर बरसना है हमें। वेदामृत का पान कर फिर मनुष्य के हृदय में जल रही ज्वालाओं को शमित हम न करेंगे तो कौन करेगा? परम पिता ने यह काम हमें सौंपा है, हमें ही करना होगा। कैसे करें यह पुण्य कार्य ये हमें सोचना होगा।

वेद मानव-रचना नहीं

वेद ईश्वरीय ज्ञान है, यह बीज मनुष्य मात्र के हृदय में पड़ जाए तो मानव ही नहीं, प्राणी मात्र का कल्याण कोई दूर का लक्ष्य नहीं रहेगा। अगर मनुजता को बचाना है तो वेद को ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध करना होगा। सिद्ध करना होगा कि वेद परमात्मा ने अपने अमृत-पुत्र मानव को सृष्टि-संविधान के रूप में दिया था। कुछ महानुभाव वेदों को ऋषियों की रचना कहते हैं, हम उनसे कुछ प्रश्न करेंगे –

हमारे प्रश्न उन विकासवादियों और नास्तिकों को यह मानने पर विवश करेंगे कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है। हमारे प्रश्न हैं- यदि वेद मानवीय रचना है, तो बताएं कि उस आदिम युग में मानव ने भाषा का इतना उत्कृष्ट ज्ञान कैसे कर लिया कि (आपके ही अनुसार) हर क्षेत्र में निरंतर विकसित होता हुआ मानव आज भी उस भाषा से पृथक कोई उसके स्तर की भाषा न बना सका? संस्कृत के वर्णों का लेखन, उच्चारण ओर उसके व्याकरण के सिद्धांत आज की तथाकथित विकास को प्राप्त दुनिया की भाषाओं से बहुत ऊंचे हैं। वैदिक भाषा का मूल स्रोत वेद ही हैं, सदा से संस्कृत के शब्दार्थ व व्याकरण के लिए, उनका वैदिक प्रयोग ही प्रमाणिक माना गया है। अगर वेद ऋषियों की रचनाएं हैं, तो किसी ग्रंथ के लिखने से पूर्व भाषा ज्ञान और व्याकरण की योजना अति आवश्यक है। क्या यह चमत्कार नहीं कि आज विज्ञान के युग में जीने वाले भाषा ज्ञान के बिना एक पत्र नहीं लिख सकते और आदिम युग में बंदरों ने पूंछ घिसने के बाद सबसे पहले वेदों का निर्माण कर दिया! बुद्धिमान हंसेंगे यह सब देख सुन कर। हम इन विकासवादियों को एक चुनौती भी देते र्है कि वे संसार की किसी भी तथाकथित भाषा के कतिपय ऐसे ग्रंथ प्रस्तुत करें, कि इस विज्ञान के युग में भी उनके आधार पर हम उस भाषा का पूरा ज्ञान प्राप्त कर सकें। कल्पना करो कि संसार से अंग्रेजी व अरबी भाषा के सारे ग्रंथ नष्ट हो जाएं केवल बाइबिल और कुरान शेष रहें। ऐसी स्थिति में क्या यह संभव है कि इन ग्रंथों के आधार पर इन भाषाओं के व्याकरण-सिद्धांत और शब्दकोश तैयार किए जा सकते हैं? नहीं, और क्योंकि यह विशुद्ध मानवीय रचनाएं हैं, इनमें मानव सुलभ ज्ञान-अज्ञान निहित है। वेद भी मानव रचना होते तो उनमें भी यह दोष होता। सारा विश्व जानता है कि संस्कृत के सारे व्याकरण ग्रंथ वेदों से पीछे लिखे गए हैं। सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य नष्ट हो जाएं, वेद सुरक्षित रहें, तो जैसे बीज से वृक्ष अंकुरित होकर फूलने-फलने लगता है, वैसे ही सभी विद्याएं, भूतल पर विकसित हो सकती हैं। क्योंकि वेदों में सम्पूर्ण ज्ञान है।
खगोलीय ज्ञान
वेद में एक नहीं अनेक जगह सूर्य और चंद्र आदि के बारे में बड़ा गहरा ज्ञान मिलता है। सूर्य चिकित्सा भी वेदों में है कि सूर्य-किरणों से हमारे कौन-कौन से रोग कैसे दूर होते हैं।
सूर्य की आकर्षण शक्ति से पृथ्वी का परिक्रमण और परिभ्रमण वेद में आता है। ऋ 5.51.2 में तो पृथ्वी का कम्पन युक्त परिक्रमण करना लिखा है। ऋषि देव दयानंद 125-30 वर्ष पूर्व वेद के आधार पर लिख गए थे कि अन्य ग्रहों पर भी जीवन हो सकता है। उपनिषदों के साधनाशील ऋषियों ने सूर्य में काले धब्बों की बात वेद के आधार पर ही लिखी है। इन सब बातों का ज्ञान तो कथित आदि मानव को नहीं हो सकता। हां, विकासवाद को शीर्षासन करा दें तो दूसरी बात है। वेद में सभी सत्य विद्याएं हैं, तर्क की हर कसौटी पर खरी व प्रमाणित हैं। विज्ञान की कोई खोज वेद के एक भी सिद्धांत को गलत सिद्ध नहीं कर सकी है और न कभी कर सकेगी। व्यक्ति से लेकर विश्व स्तर तक और जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त जीवन के हर पक्ष को सफल व सार्थक करने वाली सम्पूर्ण विद्याएं वेदों में हैं। संसार के किसी ग्रंथ का ज्ञान इतना सम्पूर्ण और निभ्रांत नहीं है जितना कि वेद का।
लेख की अपनी सीमाएं होती हैं, आगे भी कुछ आवश्यक बिन्दुओं पर विचार करना है, इसलिए विवेकशील बंधु अन्य समाजशास्त्र, वाणिज्य, संगीत, राजनीति के विभिन्न अंगोपांगों, गणित, विद्या, वास्तुशास्त्र, और प्राणी शास्त्र आदि को लिख कर इस चिंतन को व्यापकता दे सकते हैं। इतना सारा ज्ञान और उसको सूत्र रूप में छंदोबद्ध करके प्रस्तुत करना मनुष्य के लिए आदिम युग में कैसे सम्भव हुआ होगा इसे कोई भी विकासवादी सिद्ध नहीं कर सकेगा। जब तक वे इस बात को सिद्ध न करें तब तक परम्परा से चले आ रहे तर्कसिद्ध तथ्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है। संसार यह कैसे सहन कर लेगा कि पाश्चात्य जगत वेद शास्त्र व उपनिषद के ऋषियों को इतने ऊंचे और पवित्र ज्ञान सम्पन्न भी मानता रहे कि उनकी किसी बात को काट भी न सके और इसी के साथ उनके बार-बार यह घोषणा करने पर भी कि ‘वेद ईश्वरीय ज्ञान है’ इसे विकासवाद की कल्पना के सहारे हवा में उड़ाता रहे। ये दुरभिसंधि अब नहीं चलेगी।

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