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वैदिक ज्ञान विज्ञान के तत्वों को संसार के समक्ष अपने विशुद्ध रूप में रख कर इस विषयक अज्ञान को दूर करने का श्रेय अधिकांश में वेदों के परम आचार्य महर्षि दयानंद को ही है। आर्य समाज की स्थापना उन्होंने वेदों के इसी सत्य ज्ञान के प्रसार-प्रचार के लिए की थी।

अखिल विश्व में आज तक जितने भी महापुरुषों ने अपने जन्म से जगज्जननी वसुंधरा को विभूषित किया है उनमें आधुनिक युग के क्रांतिकारी निर्माता, तपोधन महर्षि आनंदकंद दयानंद का स्थान अत्यंत पावन एवं अनोखा है। वे अपने विचारों में हिमालय के तुल्य उच्च एवं अड़िग थे, सागर के समान गहन तथा गंभीर थे, हिम के सदृश्य पवित्र और निष्कलंक थे, सत्य के प्रति उनकी आस्था सर्वथा अचल थी। सत्य के स्वरूप का उन्होंने स्वयं साक्षात्कार किया था और उसके प्रचार व प्रसार में उनका परम आग्रह था। भारत की प्राचीनतम् वैदिक परंपराओं के वे मूर्तिमान् रूप थे, साथ ही वेदों विधि-विधान के अनुसार ही आचरण को मानव कल्याण के लिए एकमात्र उपयुक्त स्वीकार किया था। अवैदिक तथा अनार्य जीवन पद्धति को उन्होंने अस्वीकार किया था। वे मानव के समग्र उत्थान का केंद्र हिंदू वेदों को ही मानते थे। इस संबंध में उन्होंने किसी से भी किसी प्रकार के समझौते को स्वीकार नहीं किया। न कभी अपने इन विचारों में परिवर्तन ही किया। हिमालय के समान अचल रह कर अत्यंत निर्मीकता के साथ वे अंतिम क्षण तक यही बात कहते रहे कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। वेदों का गहन अध्ययन करने के पश्चात् उनका यह विचार नितांत परिपक्व हो गया था। अपने अद्वितीय ग्रंथ ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका को लिख कर वे वेदों के पवित्र ज्ञान पर खड़े हुए अज्ञान के परदे को हटाने में समर्थ हुए। आज कोई भी विद्वान इस ग्रंथ को पढ़ कर वेदों के प्रति आस्थावान बने बिना नहीं रह सकता। भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में वेदों पर जो भी आक्षेप संभव हो सकते थे उनका निराकरण महिर्ष दयानंद ने अपने इस विलक्षण ग्रंथ-रत्न में प्रस्तुत किया है।

वेदनित्य है या अनित्य, वेदों में मानवी अनित्य इतिहास है या नहीं, वेद ऋषि-कृत हैं या ईश्वरीय ज्ञान, वेदों का समय ईसा पूर्व कुछ शताब्दियों या सहस्राब्दियों का है या अनादि, वेदमंत्र मात्र यज्ञपरक अर्थ ही रखते हैं या उनमें ज्ञान-विज्ञान संबंधी चर्चा भी है, वेदों का मूल रूप क्या है? क्या ब्राह्मण-ग्रंथ भी वेद हैं? या वे वेदों के व्याख्यानपरक ग्रंथ ही हैं, वेदों में यज्ञ के अवसर पर पशु वध का विधान है या नहीं वेदों में मूर्तिपूजा का संकेत है या नहीं, वेदों में ईश्वर को साकार माना गया है या निराकार, वेदों के अनुसार अनादि पदार्थ कितने हैं और कौन कौन से हैं, वेदों का ज्ञान प्रत्येक सर्ग में समान रहता है या पृथक्-पृथक् इत्यादि अनेक उलझे प्रश्नों का समुचित उत्तर महर्षि ने अपने ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका-ग्रंथ में विस्तार के साथ प्रस्तुत किया है। उन्होंने अंत तक तथा ब्रह्यसाक्ष्य के द्वारा उपर्युक्त विषयों पर सुनिश्चित एवं सही तथ्य प्रस्तुत किया है।
महर्षि दयानंद के वेद संबंधी कार्य के विषय में यह निश्चित धारणा बन चुकी है कि उनसे पूर्व जिन भी वैदिक पंडितों ने वेदार्थ संबंधी विचार प्रस्तुत किए हैं, वे किन्हीं पूर्वग्रहों से अथवा अपनी तात्कालिक परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त नहीं थे। इस विषय में हम सायण, महीधर, उद्भट आदि भारतीय तथा मैक्समूलर, ग्रीफिथ आदि पाश्चात्य पंडितों का नाम ले सकते हैं, जिन्होंने वेदार्थ को समझने में अवश्य ही भूलें की हैं। इसलिए वे वेदों के साथ समुचित न्याय नहीं कर सके।
इन उपर्युक्त विद्वानों के द्वारा किए गए वेदार्थों को पढ़ कर किसी भी विचारशील व्यक्ति की वेदों पर श्रद्धा नहीं रह सकती। हमें यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि वैदिक ज्ञान विज्ञान के तत्वों को संसार के समक्ष अपने विशुद्ध रूप में रख कर इस विषयक अज्ञान को दूर करने का श्रेय अधिकांश में वेदों के परम आचार्य महर्षि दयानंद को ही है। महर्षि दयानंद द्वारा किए गए वेदार्थ के संबंध में आधुनिक युग के महान् विचारक योगिराज श्री अरविंद ने लिखा है ः- “वेदों का अंतिम तथा पूर्ण प्रामाणिक भाष्य कोई भी हो, दयानंद का स्थान उपयुक्त संज्ञा के प्रथम आविष्कारक के रूप में सर्वोच्च है। उसने अपनी दृष्टि से पुराने अज्ञान तथा भ्रम के बीच में से सत्य की खोज की। जिन वेदों के द्वारों को समय ने बंद-सा कर दिया था उसकी चाबी को उसने प्राप्त किया।”
श्री अरविंद की यह सम्मति महिर्ष दयानंद के वेद संबंधी कार्यों के विषय में असाधारण महत्व रखती है।
महर्षि दयानंद के वेद-संबंधी विचारों की इससे बड़ी विजय क्या हो सकती है? कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज के विद्वान प्रोफेसर पंडित सत्यव्रत सामान के भी वेद-संबंधी अनेके विचार महर्षि दयानंद के विचारों से समता रखते हैं। उन्होंने अपने त्रयीसंग्रह नामक वेद-विषयक ग्रंथ में लिखा, “यह स्पष्ट है कि वही मनुष्य वेदों का योग्य भाष्यकार हो सकता है जिसे कृषि शास्त्र, व्यापार, भूगर्भविद्या, ज्योतिष, जलस्थिति-विद्या, अग्निविद्या, वनस्पति-विज्ञान, जीवशास्त्र, शरीर-शास्त्र, युद्धविद्या आदि का ज्ञान है। ऐसे व्यक्ति के द्वारा किया गया भाष्य ही पूर्ण संतोष दे सकता है और सब तरह के संदेहों को दूर कर सकता है।”
महर्षि दयानंद योगी थे। वे योग के द्वारा अनेक रहस्यों का ज्ञान अनायास ही प्राप्त करने में सक्षम थे। यही कारण है कि वेदों के रहस्यों को उद्घाटित करने में समर्थ हो सके।
आर्य-समाज की स्थापना उन्होंने वेदों के इसी सत्य ज्ञान के प्रसार-प्रचार के लिए की थी। आर्य समाज अपनी स्थापना के डेढ़ सौ वर्ष पूर्ण करने के करीब है। उसे यह देखना है कि उसने महर्षि के कार्य को कितना आगे बढ़ाया और कितना उसे इक्कीसवीं शताब्दी में पूरा करना है। महर्षि दयानंद के कार्य को आगे बढ़ा कर ही हम वास्तव में इस युग के मानव की कुछ सेवा कर सकेंगे। संसार को सत्य का मार्ग बताना ही आर्य समाज का प्रमुख कार्य है। उसी में उसे आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

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