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यह एक बड़ा भारी भ्रम है कि राजनीति का धर्म से कोई संबंध नहीं है। राजनीति का जन्म ही धर्म की रक्षा के लिए है। धर्म की रक्षा के लिए राजनीति तो बड़ा काम देती है, उसी प्रकार राजनीति के बिना धर्म भी सुरक्षित नहीं रह सकता।

आर्य समाज केवल धार्मिक संस्था है, स्वराज्य के साथ अथवा राजनीति के साथ उसका कोई संबंध नहीं है, ऐसा कई महानुभावों का कथन है। वे मानते हैं कि समाज सुधार और वैदिक धर्म प्रचार करना केवल यही समाज का मुख्य उद्देश्य है। यही तर्क, उक्त सम्मति वाले महाशय अपने पक्ष की पुष्टि के लिए ऋषि के बनाए हुए आर्य समाज के दस नियमों में यह निम्न नियम बड़े जोरों के साथ पेश करते हैं कि- “संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात आत्मिक, शारीरिक एवं सामाजिक उन्नति करना।” वे तर्क करते हैं कि जब संसार का उपकार करना आर्य समाज का उद्देश्य है तो फिर देश-विदेश के लिए स्वराज्य का यत्न करना यह सिद्धांत के विरुद्ध है। अंग्रेज भी तो हमारे भाई ही हैं- “वसुधैव कुटुम्बकम्।” सज्जनों के लिए तमाम मंडल ही कुटुम्बवत है। राजा कोई भी स्वदेशी या विदेशी-उसको आर्य बनाना ही अपना कर्तव्य है। इसलिए ऐसे विचार रखने वाले महानुभावों की दृष्टि में- आर्य समाज के प्लेटफॉर्म से राजनीतिक आंदोलन के व्याख्यान होना वे सिद्धांत के विरुद्ध समझते हैं इत्यादि।
आज हमें ऐसी सम्मति रखने वाले महानुभावों की ही समालोचना करना है कि उनकी उक्त सम्मति कहां तक ठीक है।
जो लोग यह कहते हैं कि आर्य समाज केवल एक धार्मिक संस्था है – अर्थात धार्मिक विधानों की रक्षा करना ही इसका उद्देश्य है, राजनीति से इसका कोई संबंध नहीं उनसे हम पूछते हैं कि राजधर्म की धर्म के अंदर गणना है या नहीं? यदि नहीं तो संपूर्ण राजधर्म अधर्म ठहरता है। यदि धर्म है तो फिर उसे आर्य समाज के उद्देश्यों के अनुकूल मानना पड़ेगा। ऋषि दयानंद जी भी राजधर्म को सामान्य धर्म का एक विशेष अंग मानते थे। तभी उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में छठे समुल्लास (अध्याय) का समावेश किया। यदि वे राजनीति को पृथक समझते तो कदापि छठे समुल्लास का उल्लेख न करते। छठे समुल्लास में स्वामीजी ने स्पष्ट किया है। कि :-

“त्रीणि राजाना विदथे पुरुणिपरि विश्वानि भूषथः सदांसि” ऋ. अर्थात् राष्ट्र की व्यवस्था करने के लिए तीन प्रकार की सभाओं का होना आवश्यक है। 1) एक विद्या सभा 2) दूसरी धर्म सभा 3) तीसरी राज सभा। जिस प्रकार देश में शिक्षा की व्यवस्था के लिए विद्या सभा और धार्मिक विधानों के प्रचार आदि के लिए धर्म सभा जरूरी है, उसी प्रकार राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति तथा रक्षा के लिए राज सभा का भी होना परम आवश्यक है। स्वामी जी ने उक्त वेद मंत्र के आधार पर ही इन तीनों सभाओं का होना लिखा है।

फिर कौन कह सकता है कि राज सभा आदि के साथ आर्य समाज का कोई संबंध नहीं। प्रश्न हो सकता है जब आर्य समाज का यह दावा है कि वैदिक धर्म विश्वव्यापी धर्म है, सारा विश्व ही इसका राष्ट्र है तो फिर किसी देश का भी राजा हो, चाहे स्वदेशी चाहे विदेशी। यदि वह आर्य सिद्धांतों का पालन करता है तो उसके राज्य करने में क्या दोष है? इसका उत्तर तो स्वयं स्वामी जी का वह लेख है जिसमें उन्होंने स्पष्ट तौर से प्रतिपादन किया है कि सब देशों में अपना स्वदेशी ही राजा होना चाहिए। विदेशी राजा चाहे भाई के समान भी बर्ताव करता हो तो भी स्वदेशी राजा के बराबर नहीं हो सकता। कारण जितना प्रेम उसका स्वमातृभूमि से होगा उतना विदेश से कदापि नहीं हो सकता। अतएव स्वदेश में स्वदेश का ही राजा होना सर्वश्रेष्ठ है। और यह सिद्धांत सार्वत्रिक होना चाहिए। जो देश परतंत्र अर्थात स्वदेशी राजा के स्थान में जहां विदेशी राजा राज्य करते हैं वहां की राज सभाओं का परम कर्तव्य है कि स्वराज्य की स्थापना और विदेशी राजाओं को इस विश्वव्यापी सिद्धांत की महिमा समझा कर अलविदा कर दें। उक्त तत्व को सामने रख कर ही स्वामीजी सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैंः-

“परदेशी स्वदेश में व्यवहार या राज्य करें तो बिना दरिद्रता और दुःख के दूसरा कुछ भी नहीं हो सकता” इस संबंध में उदाहरण के तौर पर आगे चल कर लिखते हैंः-

“जबसे विदेशी मांसाहारी इस देश में आकर गौ आदि पशुओं के मारने वाले मद्यपी अधिकारी हुए हैं तब से ही क्रमशः आर्यों के दुःख की बढ़ती होती जाती है” और वास्तव में यह एक सत्यकथा ऐतिहासिक घटना है। आप दुनिया का इतिहास उठा कर देख लें जिस-जिस देश में परदेशी राजाओं का राज्य हुआ वे ही देश मालामाल हुए। अमेरिका, इटली और आयरलैण्ड इसके प्रत्यक्ष उदाहऱण हैं। जब इन देशों में विदेशी राज्य था तब क्या दशा थी और जब स्वदेशी राज्य है, क्या दशा है। यह भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसी अवस्था में जो आर्य समाज संसार में सुख और शांति फैलाने के महान उद्देश्य को लेकर कार्य करता है वह किस प्रकार राजनीतिक क्षेत्र से पृथक रह सकता है। जो लोग यह कहते हैं कि राजनीति का धर्म से कोई संबंध नहीं यह उनका बड़ा भारी भ्रम है। कारण राजनीति का जन्म ही धर्म की रक्षा के लिए है। धर्म की रक्षा के लिए राजनीति तो बड़ा काम देती है, उसी प्रकार राजनीति के बिना धर्म भी सुरक्षित नहीं रह सकता।
यहां यह प्रश्न हो सकता है यदि स्वामी जी को यही सिद्धांत इष्ट था कि स्वदेश में स्वदेशी ही राजा होना चाहिए परदेशी नहीं तो उन्होंने ऋग्वेदादि-भाष्य-भूमिका में यह क्यों लिखा है किः “हें प्रभो… हम लोग परम प्रीति से मिल कर सब उत्तम ऐश्वर्य अर्थात चक्रवर्ती राज्य आदि सामग्री से आनंद को आपके अनुग्रह से सदा भोंगे।” यदि एक देश दूसरे देश पर राज्य करने का अधिकारी नहीं तो चक्रवर्ती राज्य कैसे हो सकता है? कारण चक्रवर्ती तो वही हो सकता है जो स्वदेश और परदेश सब पर राज्य करता हो। अतः स्वामी के इन दोनों लेखों में बड़ा भारी विरोध आता है। यदि स्वदेश में स्वदेशी ही राजा हो तो चक्रवर्ती राज्य नहीं हो सकता और यदि चक्रवर्ती राजा होना ठीक है तो स्वदेश में विदेशी राजा नहीं होना चाहिए यह गलत ठहरता है। इस उक्त सिद्धांत नहीं, इत्यादि इसका उत्तर यह हैः


चक्रवर्ती राज्य का तात्पर्य यह नहीं कि एक देश दूसरे पर राज्य करें किंतु इसका यह अर्थ है कि जिस प्रकार में चक्र में नेमियां अलग- अलग होते हुए एक ध्रुव में संबंध रहती हैं इस प्रकार हरएक को स्वतंत्र होते हुए विश्व संबंधी चक्रवर्ती राज्य सभा में सम्मिलित होना चाहिए।

संसार की शक्तियों की समता और विश्वव्यापी शांति स्थापित करने वाली यह चक्रवर्ती सभा है और इसके सभापति को चक्रवर्ती राजा की उपाधि है। इस स्वामी जी के कथन में अणुमात्र भी विरोध नहीं आता। इसलिए ऋषि दयानंद के अनुसार आर्य समाजों का कर्तव्य है कि जिस प्रकार वे धर्म सभा तथा विद्या सभा को चला रहे हैं, इसी तरह राज सभा की भी स्थापना कर स्वयं भी, स्वराज्य प्राप्ति को और अन्य परतंत्र देशों को स्वतंत्र बनाए और संसार सब मिल कर एक चक्रवर्ती राज्य की स्थापना करें। जिस दिन ऋषि का यह दिव्य स्वप्न पूर्ण होगा उसी दिन संसार में सच्ची शांति की स्थापना होगी। परमेश्वर वह शुभ दिन शीघ्र लाएं।

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