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आम आदमी एक तरह से सीला हुआ बम ही तो है। भ्रष्टाचार, कुशासन, मंहगाई के शोलों में सुलगता रहता है, मगर फटता नहीं। हालांकि उसके चारों ओर की गर्मी कई बार इतनी बढ जाती है कि वह अपनी उच्चतम सीमा पर सुलगने लगता है। देखने वालों लगता है कि अब तो ये जरूर फटेगा। पर नहीं, वह तो बेचार सीला हुआ बम है। फुस्स्स्स…..
 
पटाखे के बाजार में खड़े हैं वे। उनका नाम यहां इसलिए नहीं बताया जा रहा है कि बाजार को उनके नाम से क्या मतलब। उसके लिए अर्थ से समर्थ हर व्यक्ति एक उपभोक्ता है बस! भले ही उसका नाम दिवालिया सिंह या फकीरचंद क्यों न हो। बाजार की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है! इसलिए इस उपभोक्ता को हम नाम से नहीं जनाब से संबोधित करेंगे। ठीक है जनाब!
तो जनाब! जनाब खड़े हैं पटाखे के बाजार में।
ये वाला बम कितने का? बम का दाम सुनते ही जनाब फट पड़े, लूट मचा रखी है। पटाखे वाले ने फौरन बम की दूसरी वैरायटी पेश की। जनाब को इसकी कीमत का पता चलते ही मिर्ची लग गई। आंखें लाल, चेहरा पीला पड़ गया। जनाब सी-सी करते हुए गालिब के अंदाजे बयां में सिसिआए, मिर्ची बम अगर है इतनी मंहगी तो, शिमला मिर्च बम होता तो क्या होता? अच्छा तो बुलेट बम देख लीजिए- पटाखेवाले ने नया विकल्प फोड़ा। रहने दे-रहने दे भाया। सोचता हूं इस बार बम नहीं अपना माथा ही फोड़ूं- जनाब उवाचे।
अपनी अंगुली फोड़ते (चटकाते) हुए इस दुकान से उस दुकान जनाब विचरण करते हुए कुछ विचार भी रहे हैं। अभी गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति लेनी है। खील-बतासे लेने हैं। मिठाई का चक्कर अलग से। और न जाने क्या हेन-तेन! पटाखे का बजट कम करना पड़ेगा। पटाखे तो चारों खाने पटखनी दे रहे हैं। कोई पटाखेवाला पट भी तो नहीं रहा। चक्करघिन्नी कैसे? जनाब ने डरते-डरते पूछा। चक्करघिन्नी ने उन्हें बेभाव का चक्कर खिला दिया। जनाब यकायक महसूसने लगे कि वे इंसान नहीं घनचक्कर हैं। ब्रांड देखिए- चाइनीज नहीं है- पटाखे वाला समझा रहा है। वह मुर्गा ब्रांड की बात कह रहा है, तो जनाब खुद को बकरा समझ रहे हैं। पटाखेवाला अद्यतन जानकारी से उन्हें लैस कर रहा है और जनाब परपंरा-संस्कृति-इंसानियत की दुहाई देते हुए उसे किसी तरह से पटाने की कोशिश में लगे हुए हैं- खुद को नहीं छुड़ाना है यार… वह तो बच्चे की जिद्द है।
सच मानो तो अब उत्सव में उत्साह-सामाजिकता-सौहार्द्र सूखता जा रहा है। अब तो त्योहार एक औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं है। देखो न! लक्ष्मी चंचल होती है और आम आदमी होता है सीधा-सादा, फिर बेचारा कैसे पकड़ पाएगा उनको? इसलिए…इसलिए आम आदमी सारी जिंदगी हाथ मलता रहता है। मगर पटाखेवाले पर इन सब बातों का कोई असर नहीं हो रहा। एक तो घोड़ा-घास वाली बात, दूजे-बाजार भावनाओं से नहीं भावनाओं के भड़कने-भड़काने से चलता है। जनाब को यह बात नहीं मालूम या जानबूझकर अनजान बन रहे हैं शायद।
तो जनाब, बाजार में खड़े जनाब के जेहन में इस वक्त पैसे से जुड़ी न जाने कितनी लोकोक्तियां, कहावतें, मुहावरे, श्लोक बरबस बरस रहे हैं। पैसा पैसे को खींचता है… से लेकर सर्वे गुणाः कांचनामाश्रयंति… अर्थात सारे गुण पैसे पर आश्रित होते हैं…तक। पैसे से जुड़ी बहुकहित-बहुपठित-बहुचर्चित एक बात मगर याद नहीं आ रही हैं उन्हें। वह यह कि पैसा तो हाथ का मैल होता है। बाजार में खड़ा कोई विरला ही ऐसा सोच सकता है। जनाब कबूतर की तरह उधर-उधर आंखें मटका रहे हैं। दुकान दर दुकान डोल रहे हैं। हलाल होने से पहले खूंखार जानवर भी मासूम दिखने लगता है, कुछ वैसे ही दिख रहे हैं वे। पटाखों से ठसी-पटी दुकान पर एक सरसरी-सी नजर फिर मारी उन्होंने। कुछ पटाखों की पैकेटों पर छपी हसीन तस्वीरों ने उनके दिल को फौरी राहत पहुंचाई और नजरों को ठंडक की निःशुल्क सप्लाई की। मुंबइया फिल्मी हिरोइनों की तस्वीरोंवाले पटाखे हैं ये। कहीं रखे-रखे ही विस्फोट न हो जाए। आजकल की हिरोइनें खुद को हॉट जो कहती हैं। जनाब ने तुरंत अपनी सेफ्टी के बारे में सोचा। पूछने पर पता चला कि आग बुझाने के लिए वहां किनारे रखी बाल्टी में बालू भरी हुई है। जनाब के जान में जान आई। (साथ में जनाब को अपने हास्यबोध पर गर्व भी हुआ।)
तो जनाब- बाजार में खड़े हुए जनाब के जान में जान तो आई, मगर कुछ देर के लिए। क्योंकि थोड़ी देर बाद ही पटाखेवाले से उन्होंने छुरछुरी के दाम हिम्मत जुटाकर पूछ ही लिए। उनके बच्चे की इस्पेशल फरमाईश भी है यह। सो पूछना पड़ा। छुरछुरी ने जनाब के बदन में सुरसुरी दौड़ा दी। ससुरी इतनी मंहगी! जनाब बड़बड़ाए। पूछने को तो रॉकेट के दाम भी पूछे, यह सोचकर कि पूछने में अपने बाप का क्या जाता है। बाप का भले न कुछ गया हो, मगर जनाब के होशोहवास को रॉकेट उड़ा ले गए। इसके भाव तो आसमान छू रहे हैं। जनाब ने यह बात पटाखेवाले से कही। पटाखेवाला भी कहां पीछे रहने वाला था। इसके बदले उसने झट से अनार उनके सामने धर दिया। जैसे इंश्योरेंस एजेंट कोई पॉलिसी पसंद न आने पर दूसरी पॉलिसी रख देते हैं। अनार का जब दाम सुना तो मुंह खुला रह गया जनाब का। काटो तो खून नहीं। कमबख्त अनार ने तो खून ही सूखा दिया। खाने वाले अनार से कम यह भी नहीं बरखुरदार- जनाब बुदबुदाए। बंदूक ले चलें- दूसरे पल जनाब को ख्याल आया। इससे न चिड़िया मरेगी न ही खुद को मारने के काम आएगी। गोली मारो यार। पटाखे छुड़ाने से पहले छक्के छूट गए- जनाब ने सोचा। इस सोच के समानांतर उन्होंने यह भी सोचा कि अगर वे यहां ज्यादा देर खड़े रहे, तो खड़े ही खड़े स्वाह हो जाएंगे। आग बुझाने के लिए रखी हुई बालू कहीं खुद के ही डालनी न पड़ जाए। आग लगे- आतिशबाजी के लिए जान की बाजी थोड़े ही लगाएंगे।
तो जनाब! हमारे यह जनाब अब किसी तरह से पटाखा बाजार से बाहर निकलने का उपक्रम कर रहे हैं। हैलो बॉस, अपनी चटाई तो लेते जाइए- पटाखेवाला बोला। महंगाई ने तो खाट खड़ी करके रख दी है। झोले में चटाई रखकर जनाब फुसफुसाए। गिनती के पटाखों को झोले में रख कुछ सोचते हुए घर आ रहे हैं वे। जनाब को यकायक महसूस हुआ कि उनके अंदर कुछ सुलग रहा है। सुलगने का निहितार्थ यह निकला कि आम आदमी एक तरह से सीला हुआ बम ही तो है। भ्रष्टाचार, कुशासन, मंहगाई के शोलों में सुलगता रहता है, मगर फटता नहीं। वो सब तो ठीक है, मगर घर पहुंचकर बच्चे को क्या समझाएंगे? इत्ते बड़े झोले में इत्ती से फटाखे! झोला भर न सही अंजुरी भर तो है- उन्होंने खुद को समझाया। मगर बच्चे की जिद्द बारूद समान! मासूम बच्चा मंहगाई-वंहगाई, मजबूरी-वजबूरी क्या जाने! तभी जनाब को स्कूल की दीवार पर कुछ दिखा। पटाखा मुक्त, प्रदूषण मुक्त दीवाली! उन्हें लगा कि जैसे साक्षात् कृष्ण प्रकट हो गए हो और उनका चीर हरण होने से बचा लिया हो।
तो जनाब! जनाब के घर पहुंचते ही उनके माहताब ने झोला लपक लिया। चंद पटाखे निकालने के बाद शिकायती लहजे में बोला, क्या पापा बस इतना ही। देखो बेटा- पटाखे से प्रदूषण फैलता है, ज्यादा शोर कान के लिए ठीक भी नहीं, अनार-वनार जलाने से जलने का खतरा भी बना रहता है इसलिए ज्यादा पटाखे नहीं दगाने चाहिए। तुम तो मेरे समझदार बच्चे हो। हो कि नहीं? तुम्हारी भलाई के लिए ही कम पटाखे लाया हूं… और तुम्हारे स्कूल में भी तो यही सिखाया जाता है। क्या तुम गंदे बच्चे बनना चाहते हो? स्कूल वालों को अगर पता चल गया कि तुमने पटाखे फा़ेडे हैं तो अगले टेस्ट में कम नंबर देंगे… चंद पटाखे लाने के सबब को जनाब अपने बच्चे को हरचंद समझाने की कोशिश कर रहे हैं। जनाब को समझ में ही नहीं आ रहा है कि वास्तव में वे किसे समझा रहे हैं। कहीं बच्चे के बहाने खुद को तो नहीं बहला रहे हैं! इस कवायद में पता नहीं क्यों वह अपने को एक सीला हुआ बम समझ रहे हैं, यद्यपि उनका दिल जोरो से धड़क रहा है…

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