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****डॉ. ओंकारलाल श्रीवास्तव****
देश मेंे स्वतंत्रता के ६७वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। हमारे देश में रेल, सड़क एवं हवाई सेवाओं में वृद्धि हुई है। इंटरनेट, फेसबुक, व्हाटस्एप, ट्वीटर के इस युग में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का नारा पुष्ट हो रहा है। सारा विश्व ‘ग्लोबल विलेज’ बन गया है। हमारी वर्चुवल गतिशीलता बढ़ी है। वहीं हमारे बीच भाषा, जाति, क्षेत्रीयतावाद एवं धर्म रूपी दूरियां निरंतर बढ़ रही हैं। सामाजिक समरसता के बजाए हम सामाजिक विघटन एवं विषमता की ओर बढ़ रहे हैं।
डॉ. अंाबेडकर का जन्म १४ अपै्रल १८९़१ को महू (मध्यप्रदेश) में हुआ था। डॉ. अंाबेडकर तत्कालीन सभी भारतीय नेताओं से अधिक शिक्षित थे। वे बी.ए, एम.ए, एम.एस.सी(लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स), पीएच.डी, एल.एल.बी, डी.लिट्, डी.एस.सी(लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स) और एल.एल.डी (कोलंबिया वि.वि.) से थे, जिसमें डी.लिट् की उपाधि उस्मानिया विश्वविद्यालय एवं एल.एल.डी. कोलंबिया वि.वि. द्वारा मानद रूप से प्रदान की गर्ई थी। डॉ. आंबेडकर ने अपने युग एवं समाज की स्थापित व्यवस्था एवं विचारधाराओं की न तो अधीनता स्वीकार की और न ही समझौता किया। वे वैज्ञानिक चिंतन के साथ परंपरागत समाज की अन्याय एवं शोषणकारी शक्तियों के विरूद्ध आजीवन संघर्षरत रहे।
श्रीमद्भगवत्गीता अध्याय ४, श्लोेक १३ में श्रीकृष्ण के कथन ‘‘चातुर्वण्यर्ं मया सृष्टम्, गुण कर्म विभागश:’’ अर्थात् चार वर्ण मैनें ही बनाए हैं, जो गुण व कर्म के आधार पर हैं। इस श्लोक के अनुसार डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ब्राह्मण ही नहीं थे वरन् वाल्मिकि, वेदव्यास एवं विश्वामित्र की तरह ब्रह्मर्षि थे। डॉ. आंबेडकर मानते थे कि हिन्दू धर्म की १३७ स्मृतियों में से सबसे खराब मनु स्मृति थी जिसने उक्त कर्म आधारित शब्द के स्थान पर जन्म आधारित शब्द को प्रतिस्थापित किया और इसीलिए २४ सितंबर १९२७ को उन्होेंने मनु स्मृति नामक ग्रंथ को जला कर अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने स्वयं स्वतंत्रता, समानता एवं लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित अपने विचारों को समय-समय पर प्रकाशित एवं प्रचारित किया। उनका सोचना था कि संविधान कितना ही अच्छा क्यों न हो यदि लोगों में नागरिक कर्तव्यबोध एवं नैतिकता नहीं होगी तो लोकतंत्र की सफलता केवल नागरिक अधिकार देने से संभव नहीं होगी। डॉ. आंबेडकर गहन अध्ययन एवं मनन के बाद ही किसी विषय पर अपने विचार व्यक्त करते थे। वे भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक विषमताओं को मिटाना चाहते थे। डॉ. आंबेडकर ने अपने विचार राष्ट्रहित में रखे और अपने वर्गीय या निजी स्वार्थ या भय या दबाव को हावी होने नहीं दिया। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में जाति उच्छेद, हिन्दू सामाजिक व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, विभिन्न धर्मों, साम्प्रदायिक उन्माद, राजभाषा, साम्यवाद, अल्पसंख्यकों की समस्याओं एवं पाकिस्तान की मांग तथा आरक्षण सहित अनेक विषयों पर मौलिक विचार रखे। वे दूरदृष्टि संपन्न एवं युगद्रष्टा थे। उन्होंने राष्ट्र के सम्मुख आने वाली विभिन्न चुनौतियों जैसे भाषावाद पर कहा कि ‘एक राष्ट्र एक भाषा (हिन्दी राष्ट्रभाषा)’ के सिद्धांत को भारत में क्रियान्वित किया जाना चाहिए जबकि वे स्वयं मराठी भाषी थे। राज्यों को अपनी भाषा चुनने देने के वे प्रबल विरोधी थे।
डॉ. आंबेडकर का चिंतन वैज्ञानिक दृष्टियुक्त एवं बहुआयामी था। आरंभिक शोध कार्य अर्थशास्त्र में किया फिर उनकी रूचि सामाजिक, सांस्कृतिक, विधिक एवं राजनैतिक विषयों के अध्ययन में बढती गई। डॉ. आंबेडकर संविधान विज्ञ, समाज सुधारक, दलितों के प्रेरणास्रोत राजनेता थे। उनके जीवन का मूल उद्देश्य दलित समाज को पारंपरिक दासता से मुक्ति दिलाना था। डॉ. आंबेडकर ने दलित समस्या का विशद अध्ययन किया और सिद्ध किया कि शास्त्रों के कुछ प्रक्षिप्त अंश जैसे ॠग्वेद के दसवें मण्डल का उन्नीसवां सूक्त, जिसे पुरूष सूक्त कहते हैं, का ग्यारहवां व बारहवां मंत्र वर्ण व्यवस्था से संबंधित है। जिसमें शूद्रों की उत्पत्ति पैरों से बताई गई है। किन्तु ॠग्वेद में ही अन्य कई स्थानों पर सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन ‘पुरूष सूक्त’ से पृथक है। अत: डॉ.आंबेडकर ने विभिन्न साक्ष्यों से सिद्ध कर दिया कि ‘पुरूष सूक्त’ ॠग्वेद का मूल अंश नहीं है। यह प्रक्षिप्त है। यहां यह उल्लेखनीय है कि सामवेद में न वर्ण व्यवस्था का और न ही पुरूष सूक्त का कोई उद्धरण है। शुक्ल यजुर्वेद का पुरूष सूक्त ॠग्वेद से भिन्न है वहीं कृष्ण यजुर्वेद तैंत्तरीय संहिता में एक स्थान पर ़ॠग्वेद जैसा पुरूष सूक्त है किन्तु दूसरे स्थान पर भिन्न वर्णन किया गया है। अथर्ववेद में पुरूष सूक्त के श्लोकों का क्रम ॠग्वेद से पृथक् है। शतपथ ब्राह्मण एवं तैंत्तरीय ब्राह्मण भी वर्णों की उत्पत्ति के ॠग्वेदीय सिद्धांत का अनुमोदन नहीं करते। विष्णु पुराण, हरिवंश पुराण, भागवत पुराण, वायु पुराण एवं रामामण के वर्ण उत्पत्ति के सिद्धांतों में भी मतैक्य नहीं है। डॉ. आंबेडकर ने विभिन्न धर्म ग्रंथों के तुलनात्मक अध्ययन से यह सिद्ध किया कि वर्ण व्यवस्था ईश्वरीय नहीं है एवं पुरूष सूक्त ॠग्वेद का मूल अंश नहीं है। यह अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ब्राह्मणों द्वारा चुपचाप जोड़ा गया अंश है।
डॉ. आंबेडकर ने अपने शोध लेख ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में कहा है कि वर्ण व्यवस्था का कठोर स्वरूप जाति व्यवस्था है और जाति व्यवस्था समाज विरोधी, नैतिकता विरोधी होने के साथ साथ आर्थिक दृष्टि से भी हानिकारक है। जाति ‘श्रम विभाजन’ नहीं ‘श्रमिकों का विभाजन’ की व्यवस्था बनाई गई एवं यह हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार एवं विकास में बाधक है। डॉ. आंबेडकर कहते थे कि जाति समाज में भेदभाव, असंगठन एवं पृथकता को बढ़ावा देती है। अत: संगठित एवं मजबूत हिन्दू समाज के अस्तित्व की रक्षा एवं प्रगति के लिए जाति व्यवस्था का अंत जरूरी है। एक संगोष्ठी में ‘‘भारत में जातिप्रथा: संरचना, उत्पत्ति और विकास’’ पर बोलते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा कि जाति की समस्या सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक रूप से एक विकराल समस्या है। यह समस्या जितनी व्यावहारिक रूप से उलझी है उतना ही इसका सैद्धांतिक पक्ष इन्द्रजाल है। प्रसिद्ध नृजाति-विज्ञानियों के अनुसार, भारतीय समाज में आर्यों, द्रविडों, मंगोलों और शकों का सम्मिश्रण है। पूरे भारत में भ्रमण करने पर दिक्रदिगंत में यह साक्ष्य मिलेगा कि इस देश के लोगों में शारीरिक गठन और रंग-रूप की दृष्टि से कितना अंतर है। रक्त-भेेद की दृष्टि से सभी जातियों का रक्त मिश्रित प्रजाति का है। इस प्रायद्वीप को छोड़कर संसार में कोई ऐसा देश नहीं है जिसमें इतनी सांस्कृतिक समरसता हो। कुछ लोग जातिप्रथा के समर्थन में जैविक दलील देतेे हुए कहतें हैं कि जाति का उद्देश्य प्रजाति की शुद्धता और रक्त की शुद्धता को परिरक्षित रखना है। भारत ऐसा राष्ट्र है जहां की ९० प्रतिशत जनता सैनिक सेवा के लिए अयोग्य है और हिन्दू प्रजाति सी-३ आनुवांशिक वर्ग में आती है जिसे शारीरिक क्षमता के अनुसार घटिया माना जाता है। इससे स्पष्ट है कि जाति प्रथा आधुनिक वैज्ञानिकों की कसौटी पर भी खरी नहीं उतरती। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग एण्ड स्पीचेस (अंक ३, खण्ड २, अध्याय २-३) में लिखते हैं कि हिन्दू समाज में सीमित लोंगों को ही उन्नति का अधिकार प्राप्त होने से उसके विकास की संभावना नगण्य है। अंतर्निहित वर्गीकृत असमानता, अन्याय एवं शोषण संबंधी अंतविर्र्रोधों के कारण हिन्दू समाज का विघटन संभावित है। यदि हम अपने शास्त्रों में अभी भी संशोधन नहीं करेंेगे तो और भी हिन्दू लोग धर्म छोड़कर अन्य धर्मों में जाना पसंद करेंगे जहां उन्हें समानता एवं न्याय मिल सके। डॉ. आंबेडकर की दृष्टि में राजनैतिक शक्ति की प्राप्त्ाि और उसके प्रभावशाली उपयोग के बिना दलित सवर्णों के अत्याचारों से मुक्त नहीं हो सकते।
डॉ. आंबेडकर सामंतवादी व्यवस्था के विरोधी थे। वे किसी भी ऐसी व्यवस्था के पक्षधर नहीं थे जो व्यक्ति के अधिकार एवं कर्म के आधार पर न करके किसी विशेष परिवार के जन्म के आधार पर करती हो। डॉ. आंबेडकर ने व्यक्ति के स्वाभाविक विकास के लिए स्वतंत्रता, समानता एवं सहानुभ्ाूति को परमावश्यक बताया है। हिन्दू विज्ञान कहता है कि ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ अर्थात् ईश्वर सर्वव्यापी है और सबसे समानता का व्यवहार करो किन्तु उपनिषदों के सिद्धांतों का हिन्दुओं के सामाजिक बोध में कहीं दर्शन नहीं होता है। यह तो असमानता एवं एक-दूसरे को निम्न मानने-दिखाने एवं शोषण में अद्यतन व्यस्त है।
भारतीय सामाजिक संरचना का जो आंबेडकरीय प्रारूप है उसमें पंचतत्व-धम्म, व्यक्ति, सामाजिक प्रजातंत्र, राजनैतिक प्रजातंत्र और राज्य समाजवाद शामिल है। डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र के माध्मम से सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना था जो कि मनुष्यों मेंं भ्रातृत्व भाव, समानता, स्वतंत्रता एवं साामाजिक न्याय पर आधारित है, इसीलिए उन्होंने दलितों हेतु आरक्षण का प्रावधान केवल दस वर्षों के लिए किया था। वास्तव में ब्राह्मणों एवं उच्च जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था तो मनुस्मृति के माध्यम से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व ही कर ली गई थी। ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ में वे लिखते हैं कि यदि कोई समाज अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है तो उन्हें समान अवसर एवं सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए। समाज के सभी नागरिकों को समुचित अवसर देने के लिए सदियों से पीड़ित, शोषित एवं बहिष्कृत लोगों को समाज की मुख्य धारा में लाने हेतु एवं समानता का लक्ष्य पाने के लिए सीमित समय तक आरक्षण एवं विशेष रियायतें, सुविधाएं प्रदान करने का उन्होंने समर्थन किया। उन्होंने दलितों को आह्वान करते हुए कहा कि ‘शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो’। राजशेखरैया ने अपने लेख ‘डॉ. आंबेडकर एण्ड पालिटिकल मोबिलाइजेशन ऍाफ द शेड्यूल कॉस्ट्स’ (१९८९) में कहा है कि डॉ. आंबेडकर दलितों को स्वावलंबी बनाना चाहते थे, यही कारण है कि संविधान सभा में दलितों के आरक्षण पर जितना जोर सरदार पटेल ने दिया उतना डॉ. आंबेडकर ने नहीं।

डॉ. रामगोपाल सिंह अपने शोध ग्रंथ ‘डॉ. भीमराव आंबेडकर के सामाजिक विचार‘ में कहते हैं कि ‘कदाचित उनका सोचना था कि एक तो आरक्षण स्थायी नहीं है और न इसे स्थायी करना उचित है और यह परावलंबन को बढ़ावा देता है जो कि डॉ. आंबेडकर के दलितों को स्वावलंबी बनाने की अवधारणा का विरोधी था।‘ अत: आज संविधान को लागू हुए ६५ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और दलितों का आरक्षण भी १० वर्षों से बढ़कर ६५ वर्ष पूर्ण कर चुका है किन्त्ाु क्या दलित समाज स्वावलंबी बन पाया? आज भी आरक्षण के पश्चात् यू.पी.एस.सी, पी.एस.सी एवं अन्य पदों पर न्यूनतम योग्यता वाले अभ्यार्थी नहीं मिल रहे हैं और कई पद रिक्त रखना पड़ रहा है। अत: आरक्षण प्रदान करने की वर्तमान व्यवस्था पर पुनविर्र्चार की आवश्यकता है, जिससे आधुनिक भारत के ॠषि डॉ. आंबेडकर के विचार कार्य रूप में परिणित हो सके। हाल ही में डी.एन.ए. पर शोध कार्य में यह पाया गया कि लोंगोेे का डी.एन.ए. मिश्रित है। अत: समस्त भारतीयों की नस्ल एक है, शायद ‘हिन्दू’। इसीलिए जाति व्यवस्था रूपी कोढ़ की समाप्ति आवश्यक है, जिससे हिन्दू एकता बनी रहे। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारतीय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था जातिगत आधार पर हुई एवं जो व्यक्ति धर्म बदलकर मुसलमान, ईसाई या बौद्ध बन जाता है तब भी उसे हिन्दू धर्म के अंतर्गत दलित जाति का होने के कारण आरक्षण का लाभ मिलता रहता है। जबकि इन धर्मों में जाति का कोई प्रावधान नहीं है। बाबासाहब ने इसीलिए १७ वर्षों के ‘धर्मोंं के गहन अध्ययन’ के पश्चात् हिन्दू धर्म छोड़ा और बौद्ध बने। इस प्रकार तो जन्म आधारित जाति व्यवस्था के उन्मूलन का जो सपना डॉ. आंबेडकर ने देखा था वह कभी संभव नहीं होगा।
जिस जाति व्यवस्था के विरोध स्वरूप एक दलित धर्म परिवर्तन करता है उसी जाति की मुहर ताउम्र उसके ऊपर लगी रहती है और वह भी आरक्षण के आर्थिक लाभ को प्राप्त्ा करने के लिए उस ठप्पे को बनाए रखना चाहता है। इन्होंने ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ में कहा है कि हमारा उच्च दलित शिक्षित वर्ग हमेशा दलित समाज से दूर रहता है और वह अपनी जाति को भी छुपाता है एवं शोषकों के साथ मिलकर शोषण भी करता है। जिन लोगों को आरक्षण का लाभ मिला है वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के लिए जागरूक नहीं है। डॉ. आंबेडकर का सामाजिक लोकतंत्र का सपना आज भी पूर्ण नहीं हो पाया है; क्योंकि विभिन्न सर्वेक्षण बताते हैं कि जिन परिवारों को आरक्षण का लाभ मिल गया उन्होंने अपने दलित समाज के हित में अपनी शिक्षा, हैसियत, आर्थिक सत्ता का उपयोग नहीं किया वरन् वह एक अलग ‘क्लास’ के रूप में देश में बढ़ रहे हैं। इसीलिए यह कहना कि आरक्षण से समग्र समाज का उत्थान होगा उपयुक्त नहीं है, इसके स्थान पर सभी को लाभ पहुंचाने के लिए जिस परिवार को आरक्षण नीति का लाभ मिल चुका है और वह ‘क्रीमी लेयर’ में आ चुका है उसे तथा धर्म परिवर्तन करने वालों को आरक्षण की परिधि से बाहर किया जाना युक्तिसंगत होगा।
मो. : ९४२५२४३६५६
 

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