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****दीपक जेवणे****
संतों का समाज में समरसता भावजागरण में योगदान अमूल्यऔर अतुलनीय है। संतों के इस कार्य के विभिन्न आयाम हैं। मगर इन सारे संतों की विचारधाराओं में हम कुछ समान बिंदु देख पाते हैं। ये समान बिंदु इस प्रकार हैं-
* मुक्ति पाने हेतु प्राणी को मानव जन्म प्राप्त हुआ है।
* मुक्ति का अर्थ संतों ने ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति, ईश्वर प्राप्ति और जन्म मरण के चक्र की समाप्ति इस तरह किया है।
* आत्मबोध को मुक्ति का साधन माना गया है। आत्मबोध अर्थात स्व-स्वरूप का ज्ञान होना।
* संतों की मान्यता है कि आत्मा ही परमात्मा है। जीव माया मोह के भ्रम में फंसकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है। असल में वह स्वयं ईश्वरस्वरूप है। वह अपने शिवस्वरूप का सही ज्ञान न होने के कारण स्वयं को जीव मानता है।
संत सूरदास जी कहते हैं कि-
सकल तत्त्व ब्रह्मांड देव पुनि माया सब विधिकाल।
‘‘प्रकृति पुरुष श्रीपति नारायण सब है अंश गोपाल॥
इस तरह संतों ने यह प्रतिपादित कर दिया कि, सभी मनुष्य परमात्मा के ही अंश हैं और वापस परमात्मस्वरूप की प्राप्ति करना यही सभी मनुष्यों का समान लक्ष्य है। जातिगत भेदभाव को तिलांजलि देते हुए स्वामी रामानंद जी ने उद्घोषित किया –
‘‘जाति पॉंति पूछै नहिं कोई,
हरि को भजै सो हरि का होई॥
गोस्वामी तुलसीदास अत्यंत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत कर कहते हैं कि, संतों की दृष्टि में सभी प्राणी समान होते हैं। वे सभी का हित उसी प्रकार करना चाहते हैं जैसे अंजलि में रखे पुष्प बाएँ-दाएँ हाथ का भेद नहीं करते और दोनों हाथों को समान रूप से सुगंधित करते हैं।
‘‘बंदउ सन्त समान चित हित अनहित नहिं कोऊ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगन्ध कर दोऊ॥
आगे चलकर गोस्वामी यह भी कह देते हैं कि संतों के लिए शत्रु-मित्र समान होते हैं।
‘‘सत्रु न काहू करि गनै, मित्र गनै नहिं काहि।
तुलसी यह मत सन्त को, चालै समता याहि॥
अगर सभी जीवों का मूल्य और लक्ष्य समान बन जाता है तो उनके अधिकार भी समान मानना आवश्यक बन जाता है। इसलिए मनुष्य में पाए जाने वाला प्राथमिक भेद अर्थात नर-नारी इस भेद को मानना संतों ने अस्वीकार कर दिया। यह भेद तो प्राकृतिक है। जब यही भेद संतों ने अस्वीकार किया तो फिर मनुष्यनिर्मित उँच-नीच भेद मानना संतों की दृष्टि में गलत ही था। इसलिए संतों ने एक वाक्य में घोषणा की – ‘नर हो अथवा नारी हो या फिर तथाकथित शूद्र वर्ण के लोग हो! इन सभी को परमेश्वर की भक्ति कर मुक्ति प्राप्त करने का समान अधिकार है।’ संतों के इस कथन का अधिष्ठान था श्रीमद्भगवद्गीता जिसे हिंदू अपना धर्मग्रंथ मानते हैं और वह महर्षि व्यास द्वारा निर्मित महाभारत ग्रंथ का अभिन्न अंग है। इस गीता ज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकट किया है।
गीता नवम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
इसका सुलभ भावार्थ है – स्त्रियां, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनी माने गए लोग भी मेरी शरण में आकर परम गति को प्राप्त होते हैं।
अब प्रश्न यह निर्माण होता है कि, अगर पुराने काल में ही यह बात कही गई है तो उसके बाद समाज में इतने भेदभाव और विषमता कैसी निर्माण हो गई? इसका सारा दोष समाज के उन ठेकेदारों को जाता है जिन लोगों ने समाज के धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों को पूरी तरह से हथिया लिया था। यह वही त्रैवार्णिक समाज था, जो अपने आप को शूद्रातिशूद्र वर्ण से श्रेष्ठ मानता था। धार्मिक सत्ता पर ब्राह्मण जाति, राजनीतिक सत्ता पर क्षत्रिय जाति और आर्थिक सत्ता पर वैश्य जाति का कब्जा हो गया था और शूद्र मानी गई जातियों के लिए केवल सेवाधर्म ही बच गया था। धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक सत्ता से वंचित हो जाने के कारण यह शूद्र वर्ग वास्तविक दृष्टि में उपेक्षित हो गया। वह न तो विद्यासंपादन कर सकता था, न विद्यादान कर सकता था। वह शासक बनने के लायक भी न रहा और व्यापार करने में भी अपात्र बन गया।
यह सत्ता के अधिकार जिन वर्गों ने हथिया लिए थे वे तो शूद्र वर्ग में यह भ्रम बनाने में सफल हो गए कि, शूद्र वर्ण हीन जाति का है और उसे केवल तीन वर्णों की सेवा करने का ही अधिकार है। इस में बड़ा अंत:र्विरोध था। केवल सेवा करने से चौथा वर्ण मुक्ति का अधिकारी बनने में असमर्थ था और मनुष्य जन्म के प्रधान लक्ष्य से ही उसे वंचित कर दिया गया था। इसमें स्व-धर्म अर्थात नियत कर्म ऐसा गलत अर्थ लगाया गया था। इसमें कर्म और धर्म में कोई अंतर ही माना नहीं गया था और चौथा वर्ण इस अंतर को जानने में असमर्थ बन गया था। संतों ने इस व्यवस्था के विरोध में खुलकर विद्रोह किया।
संत कबीर ने कहा कि ऊंची जाति वाले अपनी जाति के अहंकार में नष्ट हो गए क्योंकि उनके रोमरोम में अहंकार भरा पड़ा है। आत्मज्ञान के बिना, शरीर को ही आत्मा मानने वाले चारों वर्ण चमार अर्थात शूद्र ही हैं।
‘‘बड़े गए बड़ा पे रोम रोम अहंकार।
सतगुरू को परचै बिना चारिउ बरन चमार॥
इस तरह भेदमूलक व्यवस्था पर तमाचा लगाते हुए उन्होंने यह घोषणा कर दी कि सभी मानव मुक्ति के अधिकारी हैं।
संत रैदास कहते हैं –
‘‘जीव कै जाति बरन कुल नाहीं, जाति भेद है जग मूरखाई।
नीति-स्मृति-शास्त्र सब गावैं, जातिभेद शड मूढ बतावे॥
अर्थात, जीव की न जाति है न वर्ण है; मगर शड और मूर्ख लोग जीवों का जातियों में बंटवारा करते हैं।
आज कोई नेता आकर सनातन धर्म को नकारने के लिए कहना चाहता है कि, हम लोग तो रविदासी धर्म के लोग हैं, हम हिंदू नहीं हैं। मगर स्वयं रैदास जी ने मुसलमान मजहब स्वीकार करने से इन्कार करते हुए यह कहा है कि,
‘‘कुरान बहिश्त न चाहिये, मुझको हूर हजार।
वेद धरम त्यागूँ नहीं जो गल चलै कटार॥
आगे यह भी कहा है कि –
‘‘वेद धरम है पूरण धरमा, करि कल्याण मिटावे भरमा।’’
रैदास जी ने ढोंगधतुरे का सदा विरोध किया, मगर पूजा का विरोध कभी नहीं किया। पूजा का आडंबर बनाने वालों को वह दो टूक भाषा में कहते हैं कि – किस से पूजा करूं? नदी का जल मछलियों ने गंदा कर दिया है, फूल को भौंरे ने जूठा कर दिया है, गाय के दूध को बछड़े ने झूठा कर दिया है, अत: मैं तो हरदम से ही पूजा कर रहा हूं। इस तरह पारंपरिक पवित्रता-अपवित्रता की भावना को उन्होंने गलत बताया है।
समरसता की घोषणा का बीज हम नाथ संप्रदाय में पा सकते हैं। भागवत संप्रदाय की नींव रखने वाले संत ज्ञानेश्वर इसी संप्रदाय के अनुयायी थे।
नाथ संप्रदाय यह अखिल भारतीय सांस्कृतिक धर्म इतिहास में विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है। नाथ संप्रदाय के आदिनाथ भगवान शिव माने जाते हैं और उन से ही पाशुपत, लाकुलीश, कालमुख, नागेश, वरेश, माहेश्वर, काश्मिरी शैव आदि संप्रदाय निर्माण हो गए हैं। आदिनाथ शिव के दो अंगभूत लक्षण माने जाते हैं – १. आदिनाथ शिव यह शक्तिमुक्त है और २. शक्तिमुक्त शिव ही जगद्गुरू हैं।
रोचक बात यह है कि, शिव और शक्ति यह द्वैत इस संप्रदाय को स्वीकार नहीं है, शिवशक्ति की एकरूपता अर्थात समरसता ही इस इस संप्रदाय को अभिप्रेत है। ज्ञानेश्वर ने अपने ‘अमृतानुभव’ नामक ग्रंथ में शिवशक्ति की समरसता बार-बार प्रतिपादित की है जो बात गोरखनाथ ने भी बार -बार कही है। नाथ संप्रदाय के मत्स्येंद्रनाथ, जालंधरनाथ और हरिनाथ को भगवान आदिनाथ से ज्ञान प्राप्त हुआ था। मत्स्येंद्र बंगाल से, जालंधर पंजाब से और हरिनाथ विदर्भ से थे। नाथसिद्धों ने गुरुशिष्य परंपरा को अधोरेखित किया है। इस परंपरा के गोरक्षनाथ ने ही पदपिंडसामरस्य सिद्धान्त प्रस्तुत किया है और ज्ञानेश्वरी के षष्ठम् अध्याय में संत ज्ञानेश्वर ने इसको आगे बढ़ाया। ज्ञानेश्वर अपने ज्येष्ठ भ्राता निवृत्तिनाथ से अनुग्रहित थे और गहिनीनाथ ने निवृत्तिनाथ को अनुग्रह दिया था। गहिनीनाथ ने ही श्रीकृष्ण नामसंकीर्तन का प्रसार किया था और श्रीकृष्ण-विट्ठल को उपास्य देवता बनाकर शिव को गुरू बताया था। गुरू और उपास्य देवता में अभेद माना गया था। कीर्तनभक्ति के प्रसारक नामदेव इसी नाथ संप्रदाय से थे।
संत नामदेव कहते हैं कि,
‘‘कहत नामदेव हरि की रचना, देखहु रिदै विचारी।
घट घट अंतरी चरम निरंतरी, केवल एक मुरारी॥
तथा वह समाज से प्रश्न पूछते हैं कि,
‘‘नाना वर्ण बाबा उनका एक वर्ण दूध।
तुम कहॉं के बम्मन हम कहॉं के सूद॥
वारकरी पंथ का आगे संत एकनाथ जी और संत तुकाराम जी ने विस्तार किया तो संत रामदास जी ने समाज में रामभक्ति का आंदोलन खड़ा कर दिया।
संत एकनाथ जी ने कह दिया –
‘‘गुरुकृपा अंजन पायो मेरे भाई, राम बिना कछु खाली नाही॥
एका जनार्दनी भाव नीको, जी देखू ते राम सरीको॥
संत तुकाराम ने कहा है –
‘‘जा तन सूं मुजे कछु नहीं प्यार,
असते के नहि हिंदू धेड चमार॥
ज्याका चित लागा मेरे राम को नाम,
कहे तुका मेरा चित लागा त्या के पास॥
संत रामदास ने जाति, धर्म के नाम पर चलते झगड़े देख कह दिया कि,
‘‘रे भाई काहे कु लडते, सब लडते सो पडते॥
एक ही जमीन एक ही पानी, एक अतश असमाना॥
और संत रामदास आगे बताते हैं,
‘‘जित देखें उत रामही रामा, जित देखों उत पूरणकामा॥
यह सारी पृष्ठभूमि विस्तारपूर्वक रखने का कारण यही है कि संतों में समरसता की भावना किसी बाह्य कारण से जागृत नहीं हुई थी, यह तो उनकी अंतर्गत प्रेरणा थी। इस प्रेरणा के कारण जो कार्य उनके माध्यम से हुआ उसके फलस्वरूप समाज के विविध दोषों का निवारण होता गया। इन दोषों में जातिभेद का पालन, अंधविश्वास और रूढ़िशरणता, कट्टरतावाद आदि का समावेश होता है। जब मध्ययुग में संतों का कार्य आरंभ हुआ था तब समाजरचना में ये सारे दोष दृढ़ हो गए थे और इन दोषों को उखाड फेंकना था। संतों ने अपने कार्य को ईश्वरी अधिष्ठान बताया और इसके कारण धर्म के नाम पर चलने वाली दूकानदारी बंद करने में होनेवाले अवरोध की तीव्रता कम करने में सहायता मिली। मगर हरेक संत को अपने कार्य में समाज के प्रस्थापित वर्ग से विरोध के वार झेलने पड़े थे। संत तो भक्तिमार्ग के प्रणेता हैं और निवृत्ति मार्ग की शिक्षा देते हैं ऐसा भी उनके बारे में प्रचार किया जाता है। मगर यह कहना गलत नहीं होगा कि, संत तुलसीदास ने और संत एकनाथ जी ने यवनों का शासन जब देश पर चल रहा था तब उसके प्रति विद्रोह जताकर स्व-धर्म में समाज की प्रीति बनाए रखी थी। इन विद्रोही रचना को धार्मिक रचना मानकर मुसलमानी शासकों ने संतों को राजद्रोही नहीं माना था। मगर विदेशी सत्ता के विरोध में संतों ने खुलकर कहा था। तब रावण जैसा अन्यायी शासक यवनी सत्ता का प्रतीक बन गया था। संत तुलसीदास जी ने जनता के आत्मविश्वास को बढ़ावा देते हुए कहा था कि अत्याचारी शासक अवश्य ही नरक में जाता है। रामचरितमानस में अवध कांड में वे कहते हैं –
‘‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी,
सो नृप अवस नरक अधिकारी॥
तुलसीदास जी ने सामाजिक विषमता से संघर्ष किया है। उन्होंने अत्यंत कुशलताफूर्वक समाज के निम्न स्तर पर खड़े व्यक्ति को समाज के सर्वोच्च व्यक्ति द्वारा सम्मान दिलाने की चेष्टा की है। शबरी भीलनी, केवट, निषाद, जटायू आदि पात्र उस समय के वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
प्रभु राम शबरी से कहते हैं-
‘‘कह रघुपति सुनु भायिनि बाता।
मानऊँ एक भगति कर नाता।
जाति पाति कुल धर्म बडाई।
धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा।
बिनु जल वारिद देखिअ जैसा॥
अर्थात, भगवान सबसे उपर भगति का ही नाता मानते हैं और जातिपाति, कुल, धन, चतुराई का उनके लिए कोई महत्व नहीं है। दुर्भाग्य से, मानस के प्रक्षिप्त अंश उठाकर रस्सी को ही सांप समझ कर पीटने का दुस्साहस बुद्धिवादी लोग करते रहते हैं और मानस में छुपे मोती ढूंढ़ने की इच्छा नहीं रखते हैं। इस रामकथा में गुरु वसिष्ठ स्वयं आगे बढ़ कर निषाद केवट को गले लगाते हैं, इसका वर्णन आता है-
‘‘प्रेम पुलकि केवट कहि नामू, कीन्ह दूर ते दण्ड प्रनामू।
रामसखा रिषि बरबस भेंटा, जनु महि लुठत सनेह समेता॥
बात यह है कि, संतों का समरसता का व्यवहार सहज व्यवहार रहा है। उसमें कोई प्रचार करने की बात नहीं रही है। अत्यंत सहज तरीके से समाज में समरसता का भाव बढ़ाने का प्रयास उन्होंने किया, लेकिन बुद्धिवादी लोगों ने इस संदेश को ढंक कर रखने की चालाकी की और भक्तगणों ने इस संदेश को धार्मिक चोला पहना दिया। अत: इस संदेश की सामाजिकता समझने में आज भी समाज स्वयं को असमर्थ महसूस करता है। रामकथा का सामाजिक आशय उजागर करने की आज आवश्यकता है। इस बात की कहीं-कहीं पहल अवश्य दिखाई देती है।
मो. : ९५९४९६१८६४
 

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