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****मल्हार गोखले****

            अति प्राचीन काल से               भारत में ज्ञान के छह दर्शन माने गए हैं। ये हैं सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा। परंपरा इसका उल्लेख ‘षट्दर्शन’ शब्द से करती है। भारत में हजारों वर्षों से योग दर्शन प्रचलित है। वर्तमान काल में योग का जो ज्ञान उपलब्ध है वह पतंजलि ऋषि द्वारा प्रवर्तित किया गया है। इसलिए उसे ‘पातंजल योग दर्शन’ नाम से जाना जाता है। परंतु पतंजलि योग के प्रथम ज्ञाता नहीं हैं। उनके पूर्व हजारों वर्षों से चली आई योग परंपरा को पतंजलि ने एक सूत्र में बांधा। एक संगठित, अनुशासनबद्ध रूप दिया। आधुनिक इतिहासविद, पतंजलि तथा उनके पातंजल योग दर्शन की रचना का काल ईसा पूर्व दूसरी शती यानी आज से लगभग २२०० वर्ष पूर्व का मानते हैं।

 भारत से पश्चिम में जाकर योगासन, प्राणायाम और ध्यान का प्रचार-प्रसार करने वाले अनेक साधु-संत वहां बड़े लोकप्रिय हुए। ध्यान, मेडिटेशन के नाम से; प्राणायाम, ब्रीदिंग कंट्रोल के नाम से तथा योगासन ‘योगा’ इस नाम से अत्यंत लोकप्रिय हुए।

 फिलहाल पश्चिमी क्या, और पूर्वी क्या; सारा मानव समाज इतनी अवनत स्थिति में है कि वह स्वार्थ के सिवा कुछ समझता ही नहीं। जब वह यह समझने, अनुभव करने लगा है कि योगा, ब्रीदिंग कंट्रोल तथा मेडिटेशन के कारण उसे शारीरिक तथा मानसिक आरोग्य मिल रहा है, थोड़ी सी शांति, शक्ति तथा मानसिक आरोग्य मिल रहा है तो सारा मानव समाज योग दर्शन की ओर मुड़ रहा है। हालांकि यह भी कुछ कम नहीं है।

 हिंदू तथा बौद्ध संप्रदाय की परंपरा हजारों वर्षों की है। यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम की परंपरा उस तुलना में बहुत ही नई है। इन परंपराओं में आसन, प्राणायाम, समाधि इत्यादि का कोई उल्लेख नहीं है। शायद इन संप्रदायों के उद्गाता क्रमश: मूसा यानी मोजेस, ईसा याने जीजस और मुहम्मद के सामने जो समाज था, वह बहुत ही प्राथमिक अवस्था में था। इसलिए मूसा ने कुछ यम-नियमों के पालन पर जोर दिया। मूसा की दश आज्ञाएं-टेन कमांडमेंट्स यहूदी संप्रदाय का आधार है। ईसा ने प्रत्याहार और ध्यान को सामूहिक प्रार्थना, प्रेम और सेवा में परिवर्तित किया। मुहम्मद ने प्रार्थना और प्रेम इन मुद्दों को और परिष्कृत करते हुए परमात्मा को संपूर्ण शरणशीलता और उस की सामूहिक प्रार्थना पर जोर दिया। इस्लाम इस अरबी शब्द का अर्थ ही परमात्मा को संपूर्ण शरणागत होना है।

अर्थात, यहूदी, ईसाई और इस्लाम की मूल आध्यात्मिक उपासना में योग है। बौद्ध संप्रदाय का तो सवाल ही नहीं। बौद्ध चिंतन में षड्ग योग है ही।

 बुद्ध की हठयोग संबंधी साधनाओं एवं क्रियाओं की पहल ‘गुहासमाज’ नामक ग्रंथ से मिलती है। और यह ग्रंथ ईसवी सन की तीसरी शताब्दी का लिखा हुआ है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि बहुत से जिज्ञासुओं और श्रद्धालु पुरुषों ने बुद्ध के उदाहरण से उत्साहित होकर उन्हीं साधनों को आरंभ कर दिया जिसने बुद्ध को सिद्धि प्राप्त हुई थी। भगवान बुद्ध के कतिपय शिष्यों ने उन्हीं साधनों का सम्यक् प्रकार से अनुष्ठान कर अनेक सिद्धियां प्राप्त कीं जिनसे उनके जीवन में उनकी बड़ी ख्याति हुई। गुह्य समाजकार कहते हैं कि जीवन में सिद्धि प्राप्त करने के लिए षङ्योग की साधना करनी चाहिए। योग के छह अंगों के नाम उसी ग्रंथ में उल्लेखित हैं: १) प्रत्याहार, २) ध्यान, ३) प्राणायाम, ४) धारणा, ५) अनुस्मृति और ६) समाधि। बौद्ध योग के परिशीलन के लिए आजीवन अध्ययन करने की आवश्यकता है। बौद्ध और वैदिक योग में खासा मतभेद है। इन दोनों पद्धतियों का समन्वय कर देने से महान फलसिद्धि हो सकती है।

 ‘योग’ शब्द ‘युज’ धातु से बना है। संस्कृत में ‘युज’ धातु दो हैं। एक का अर्थ है जोड़ना और दूसरे का अर्थ है, ‘समाधि।’ इनमें से जोड़ने के अर्थवाली ‘युज’ धातु को जैनाचार्या ने योग में स्वीकार किया है। जैन आगमों में योग का अर्थ मुख्यत: ‘ध्यान’ लिखा है। ध्यान मूलत: चार प्रकार के हैं। १) आर्त, २) रौद्र ३) धर्म और ४) शुक्ल। इनमें पहले के दो ध्यान तम और रजोगुणविशिष्ट होने के कारण योग में उपयोगी नहीं हैं। धर्म और शुक्ल योग उपयोगी हैं। इनमें शुक्ल ध्यान अत्यंत मोक्ष साधक है। इसके द्वारा दु:खरूप जीवन सुखरूप होता है। इस विषय में जैन शास्त्रों में समाधि शतक, ध्यान शतक, ध्यान विचार, ध्यान दीपिका, आवश्यक निवृत्ति, अध्यात्म कल्पद्रुम टीका जैसे अनेक ग्रंथ हैं। जब आत्मा विकास की दिशा में प्रयाण करती है तब मोक्ष प्राप्त होने की अवस्था की योग्यता के चौदह गुण जैन आगमों में बताए गए हैं- १) मिथ्यात्व २)सास्वादन ३) मिश्र ४) सम्यक् दर्शन ५) देशविरति ६) प्रमत्त श्रामणत्व ७)अप्रमत्त श्रावणत्व ८) अपूर्वकरण ९) अनिवृत्ति १०) सूक्ष्म लोभ ११) उपशांतभो १२) क्षीणमोह १३) सयोगी केवली और १४) अयोगी केवली।

 ईसाइयों का ध्येय परमात्मा से मिल जाना है। बाइबल में ध्येय के संदर्भ में जो वर्णन मिलता है उसका अर्थ है परमात्मा की इच्छा को जीवन का संचालक एवं पथदर्शक मानना, अपने आपको ईश्वर के मन में मिला देना। साथ में मन में इस बात का निश्चय रखना कि मनुष्य का परम ध्येय यही है, और उसी में आनंदित होना है। बाइबल यीशू का जीवन वृत्तांत तथा उपदेशों का संग्रह है। उसमें योग सबंधी साधनाओं का उल्लेख बहुत ही कम है। उपदेश कार्य में ईसा मसीह ने चालीस दिन का उपवास किया था। किन्तु उन्होंने यह उपवास तप और साधना के रूप में किया हो ऐसा नहीं मालूम होता है। ईसाइयों की धारणा है कि उपवास जीवन में आत्मा के प्रभु तत्व का द्योतक है। इस कारण ईसाइयों में उपवास का महत्व अधिक है। पर  ईसाइयों में बहुत लोग ऐसे हैं जिनकी यह धारणा है कि ईसाई धर्म में योग का महत्व जितना समझाया गया है, उसकी अपेक्षा कही अधिक है।

 मो. : ७२०८५५५४५८

 

 

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