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***पल्लवी अनवेकर****

 यहां सब कुछ बिकता है दोस्तों, जरा रहना संभाल के,

 बेचने वाले हवा भी बेच देते हैं, गुब्बारों में डाल के।

             यह शेर हरिवंश राय बच्चन जी की बहुत प्रसिद्ध कविता      का है। बच्चन जी ने बहुत बारीकी और मार्मिकता से वर्णन किया है कि आज इंसान प्रकृति के द्वारा प्रदत्त हवा और पानी जैसी वस्तुओं को बेचने में भी संकोच नहीं करता तो उसके द्वारा आविष्कारित ज्ञान को बेचने में वह क्यों संकोच करेगा। लेकिन इन सारी बातों का योग से क्या संबंध है? संबंध है क्योंकि आज योग का भी पूरी दुनिया में बड़ा भारी मार्केट बन चुका है। अर्थशास्त्र के अनुसार किसी भी वस्तु के, जिसे मार्केट की भाषा में ‘प्रोडक्ट’ कहा जाता है बाजार में आने और सफल होने के पीछे कई कारक होते हैं। इनमें से प्रमुख हैं-गुणवत्ता, आवश्यकता, समय, स्थान और विज्ञापन। हम आज अगर ‘योग’ को भी किसी ‘प्रोडक्ट’ के रूप में देखें (बहुत से लोगों को यह खटक सकता है, इसके लिए क्षमस्व) तो पाएंगे कि  योग के सफल होने का यह सर्वोत्तम समय है।

 यहां सफल होने का मतलब व्यक्ति की आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक उन्नति से बिलकुल नहीं है। योग से यह संभव है यह सभी जानते हैं। यहां सफल होने का शुद्ध अर्थ है भारत के इस विज्ञान के वैश्विक प्रसार के कारण भारत को मिलने वाला आर्थिक लाभ। साथ ही पिछले कुछ सालों में विकसित देशों की तुलना में भारत को पिछड़ा हुआ माना जाने लगा है। वैश्विक पटल पर भारत की गरिमा को फिर से उभारने, जिसे मार्केट की भाषा में ‘गुडविल’ कहा जाता है, में भी योग सहायक होगा।

  मार्केट में कभी भी हवाई बातें काम नहीं करतीं। जैसा कि पहले कहा गया है कि जिस प्रोडक्ट को मार्केट में उतारा जा रहा है उसके सफल होने के पीछे के कारकों में गुणवत्ता, आवश्यकता, समय, स्थान और उपयोगिता प्रमुख हैं। योग की गुणवत्ता के संदर्भ में कभी भी कोई शंका न थी, न होगी। जिस साधक ने योग को सही रूप में साधा उसे लाभ मिलना निश्चित है। आज की जीवनशैली, रफ्तार, रहन-सहन के मापदंड, भोजन करने का बदलता समय और बदलते भोज्य पदार्थ इत्यादि ने मानव शरीर और मन पर इतने विपरीत प्रभाव किए हैं कि वह तमाम शारीरिक और मानसिक बीमारियों से ग्रस्त हैं। योग में ऐसी शक्ति है कि वह मानव शरीर पर शारीरिक और मानसिक रोगों पर एक साथ परिणाम कर सकती है। इसलिए अब योग की आवश्यकता धीरे-धीरे बढ रही है। किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर वह वस्तु मिलना ही सबसे उचित समय होता है। आज संपूर्ण विश्व की शांति के लिए योग आवश्यक है और ऐसे समय में भारत की ओर से किए गए प्रस्ताव का यूनो द्वारा मान्य करना इसके उचित समय को इंगित करता है। योग के संबंध में स्थान की बात करें तो इसकी कोई भौगोलिक सीमा तो है नहीं। यह तो ‘वर्ल्डवाइड’ है। जितने देशों में इसका प्रसार होगा, जितने लोग उसे स्वीकार करेंगे, विश्वशांति की ओर उतने ही कदम उठेंगे।

 अब बारी आती है सबसे आखरी परंतु महत्वपूर्ण विषय की, मार्केटिंग या विज्ञापन की। योग की मार्केटिंग से क्या तात्पर्य है? यह किसी वस्तु की तरह तो है नहीं कि इसका प्रसार माध्यमों में विज्ञापन दिया जाए। हम जो विज्ञापन देखते हैं वे भी किसी योग केन्द्र के या किसी व्यक्ति द्वारा योग सिखाने वाले वीडियो सीडी के होते हैं, योग के नहीं होते। योग की मार्केटिंग के लिए ‘माउथ पब्लिसिटी’ सबसे बेहतर तरीका है। किसी व्यक्ति द्वारा योग करने पर उसे वांछित लाभ मिलना और उसके द्वारा अन्य किसी को भी योग करने के लिए प्रेरित करना, यही योग प्रसार का उत्तम तरीका है।

 चूंकि यह ‘प्रोडक्ट’ भारत की फैक्टरी का है, अत: आवश्यक है कि इसका प्रसार पहले भारत में ही अधिक हो। हालांकि हम भारतवासियों की यह प्रवृत्ति है कि जब तक कोई विदेशी हमारी वस्तु को अच्छा होने का ठप्पा लगाकर हमें नहीं लौटाता हम उसे अच्छा नहीं मानते। हमारे आयुर्वेद को भी जब तक ‘हर्बल’ का रिमार्क नहीं मिलता हम उसे स्वीकार नहीं करते। इसके लिए यह आवश्यक है कि इसके पहले कि योग विद्या को विदेशी हमें सिखायें हमें ही इसे अपनी दिनचर्या का भाग बना लेना चाहिए। भारत के कई ऐसे विद्यालय, महाविद्यालय हैं जहां योग का नियमित अभ्यास कराया जाता है। आनेवाली पीढ़ी को योग से अवगत कराने का यह उत्तम उपाय है। विद्यार्थी अपने दिन का अधिकांश समय विद्यालय या महाविद्यालय में गुजारते हैं। अगर उन्हें यहां योग का नियमित अभ्यास कराया जाएगा तो नियमितता रहेगी और उनके  व्यक्तित्व तथा शिक्षा में भी प्रगति होगी। अब तो विभिन्न महाविद्यालयों द्वारा योग के विभिन्न कोर्स भी कराए जा रहे हैं। व्यवस्थित पाठ्यक्रम के कारण कई युवा योग शिक्षक, ट्रेनर के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। योग उनके लिए स्वास्थ्य लाभ के साथ ही आय का साधन भी बन गया है।

 आज मार्केट में विभिन्न प्रकार की वीडियो सीडी उपलब्ध हैं, जिनमें योग की शिक्षा दी जाती है। वास्तव में इनमें आसनों की शिक्षा दी जाती है, जो कि योग का ही एक भाग है। कई लोग इनके माध्यम से आसनों को सीख रहे हैं और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इन सीडी के अधिकाधिक विक्रय के कारण सीडी बनाने वाली कंपनियों को भी भरपूर फायदा हो रहा है। यहां तक कि शिल्पा शेट्टी और बिपाशा बसु जैसी फिल्म अभिनेत्रियों ने तो अपने नाम से योग की सीडी को मार्केट में उतारा है। जाहिर सी बात है कि इनके द्वारा किया गया योग का प्रचार लोगों पर प्रभाव डालेगा ही; क्योंकि आजकल जिस आकार का शरीर लोगों को अपेक्षित है वैसा इन अभिनेत्रियों का है और जब वे स्वयं ही इसका कारण योग बता रही हों तो लोग उस ओर आकर्षित होंगे ही। यही विज्ञापन का तरीका है। अपने प्रोडक्ट को उचित माध्यम और उचित व्यक्ति के द्वारा लोगों तक पहुंचाना ही सफल विज्ञापन की कुंजी है।

 पिछले एक साल में भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने जितनी भी विदेश यात्राएं कीं लगभग वे सभी सफल रहीं। वैश्विक स्तर पर उनकी और भारत की छवि में निरंतर निखार आ रहा है। ऐसे में नरेन्द्र मोदी द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ का सुझाव देना और यूनो में उसे मान्यता देना सही व्यक्ति के द्वारा सही समय में सही जगह अपने गुणवत्तापूर्ण प्रोडक्ट का विज्ञापन करने जैसा ही है। यह निश्चित ही भारत के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

 भारत के अलावा अन्य देशों के नागरिक भी योग सीखने हेतु भारत आ सकते हैं। भविष्य में ‘योग पर्यटन’ भारतीय अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख बिंदु भी बन सकता है। जिस तरह विदेशी लोग भारत की संस्कृति, यहां की भौगोलिक विरासत, अध्यात्म, दर्शन आदि की ओर आकर्षित होते हैं उसी तरह वे योग के प्रति भी और अधिक आकर्षित होंगे।

 यहां पर कुछ बातों का ध्यान रखना भी आवश्यक है। विज्ञापनों में देखकर हम किसी वस्तु की ओर आकर्षित होते हैं परंतु व्यावाहारिकता में हम पर उसका विपरीत परिणाम होता है। जैसे किसी साबुन या परफ्यूम की कुछ लोगों को एलर्जी हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह प्रोडक्ट ही खराब है, बल्कि हमारा शरीर उसका प्रयोग करने के लिए तैयार नहीं है।

 योगासन, प्राणायाम या योग की अन्य शाखाओं का अभ्यास शुरू करने के पूर्व यह जान लें कि क्या हमारा शरीर उसके लिए तैयार है? सामान्य निरोगी व्यक्ति के लिए योग में कुछ भी वर्ज्य नहीं है परंतु अगर कोई व्यक्ति किसी रोग से पीडित है तो उसे कौन से आसन या कौन सा प्राणायाम नहीं करना चाहिए यह ध्यान रखना आवश्यक है। अत: शुरु में किसी निर्देशक के निर्देशन में योगाभ्यास करना उचित होगा।

  भारत की एक अनुपम धरोहर के रूप में मिले योग रूपी इस प्रोडक्ट के माध्यम से भारत फिर एक बार यह संदेश देने में सफल रहा है कि उसके पास कई ऐसे रत्न हैं जिनकी वजह से वह अपनी श्रेष्ठता साबित कर सकता है। केवल देर है तो इस बात की कि कब वह अपनी पूरी ताकत के साथ बाजार की प्रतियोगिता में उतरता है।

 मो. : ९०२९०६०९४०

 

 

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