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****स्वामी चैतन्य कीर्ति****

      पतजलि योग पर ओशो के १०० प्रवचन हैं। इस प्रवचनमाला का नाम है: योगा दि अल्फा एंड ओमेगा। इनके अतिरिक्त, एक और प्रवचनमाला है चेतना का सूर्य, जिसमें, ओशो ने आधुनिक युग को ध्यान में रखकर योग के नए आयामों की वैज्ञानिक चर्चा की है।

 प्रस्तुत लेख इस प्रवचनमाला से उद्धृत ओशो का एक संक्षिप्त संकलन है। पूरा पढ़ने के लिए यह पुस्तक ‘योग: नए आयाम’ उपलब्ध है। योग एक विज्ञान है, कोई शास्त्र नहीं है। योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। लेकिन चाहे जीसस, चाहे मोहम्मद, चाहे पतंजलि, चाहे बुद्ध, चाहे महावीर, कोई भी व्यक्ति जो सत्य को उपलब्ध हुआ है, बिना योग से गुजरे हुए उपलब्ध नहीं होता। योग के अतिरिक्त जीवन के परम सत्य तक पहुंचने का कोई उपाय नहीं है। जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है।

 योग का पहला सूत्र : योग का पहला सूत्र है कि जीवन ऊर्जा है, लाइफ इज़ एनर्जी। जीवन शक्ति है। बहुत समय तक विज्ञान इस संबंध में राजी नहीं था; अब राजी है। बहुत समय तक विज्ञान सोचता था: जगत पदार्थ है, मैटर है। लेकिन योग ने विज्ञान की खोजों से हजारों वर्ष पूर्व से यह घोषणा कर रखी थी कि पदार्थ एक असत्य है, एक झूठ है, एक इल्यू़ज़न है, एक भ्रम है। भ्रम का मतलब यह नहीं कि नहीं है। भ्रम का मतलब : जैसा दिखाई पड़ता है वैसा नहीं है और जैसा है वैसा दिखाई नहीं पड़ता है।

 अठारहवीं सदी में वैज्ञानिकों की घोषणा थी कि परमात्मा मर गया है, आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है, पदार्थ ही सब कुछ है। लेकिन बीसवीं सदी में ठीक उलटी स्थिति हो गई है। विज्ञान को कहना पड़ा कि पदार्थ है ही नहीं, सिर्फ दिखाई पड़ता है। ऊर्जा ही सत्य है, शक्ति ही सत्य है। लेकिन शक्ति की तीव्र गति के कारण पदार्थ का भास होता है।

 अणु तीव्रता से घूम रहे हैं, उनके घूमने की गति तीव्र है इसलिए चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती हैं। जगत में कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है। और जो चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती हैं, वे सब चल रही हैं। अगर वे चीजें ही होती चलती हुई तो भी कठिनाई न थी। जितना ही विज्ञान परमाणु को तोड़ कर नीचे गया तो उसे पता चला कि परमाणु के बाद तो फिर पदार्थ नहीं रह जाता, सिर्फ ऊर्जा कण, इलेक्ट्रांस रह जाते हैं, विद्युत कण रह जाते हैं। उनको कण कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि कण से पदार्थ का खयाल आता है। इसलिए अंग्रेजी में एक नया शब्द उन्हें गढ़ना पड़ा, उस शब्द का नाम क्वांटा है।

 क्वांटा का मतलब है: कण भी, कण नहीं भी; कण भी और लहर भी, एक साथ। विद्युत की तो लहरें हो सकती हैं, कण नहीं हो सकते। शक्ति की लहरें हो सकती हैं, कण नहीं हो सकते। लेकिन हमारी भाषा पुरानी है, इसलिए हम कण कहे चले जाते हैं। ऐसे कण जैसी कोई भी चीज नहीं है। अब विज्ञान की नजरों में यह सारा जगत ऊर्जा का, विद्युत की ऊर्जा का विस्तार है। योग का पहला सूत्र यही है: जीवन ऊर्जा है, शक्ति है।

 दूसरा सूत्र योग का : शक्ति के दो आयाम हैं-एक अस्तित्व और एक अनस्तित्व; एक्झिस्टेंस और नॉन-एक्झिस्टेंस। शक्ति अस्तित्व में भी हो सकती है और अनस्तित्व में भी हो सकती है। अनस्तित्व में जब शक्ति होती है तो जगत शून्य हो जाता है और जब अस्तित्व में होती है तो सृष्टि का विस्तार हो जाता है।

 जो भी है, वह न होने में भी समा सकती है। जिसका जन्म है, उसकी मृत्यु है। जिसका होना है, उसका न होना है। जो दिखाई पड़ती है, वह न दिखाई पड़ सकती है। योग का मानना है, इस जगत में प्रत्येक चीज दोहरे आयाम की है, डबल डाममेंशन की है। इस जगत में कोई भी चीज एक-आमामी नहीं है। जगत है, जगत नहीं भी हो सकता है। हम हैं, हम नहीं भी हो सकते हैं। जो भी है, वह नहीं हो सकता है। नहीं होने का आप यह मतलब मत लेना कि कोई दूसरे रूप में हो जाएगा। बिलकुल नहीं भी हो सकता है।

 अस्तित्व एक पहलू है, अनस्तित्व दूसरा पहलू है। सोचना कठिन मालूम पड़ता है कि नहीं होने से होना कैसे निकलेगा? होना, नहीं होने में कैसे प्रवेश कर जाएगा? लेकिन अगर हम जीवन को चारों ओर देखें तो हमें पता चलेगा कि प्रति पल, जो नहीं है, वह हो रहा है; जो है, वह नहीं होने में खो रहा है। यह सूर्य है हमारा। यह रोज ठंडा होता जा रहा है। इसकी किरणें शून्य में खोती जा रही हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि चार हजार वर्ष तक और गरम रह सकेगा। चार हजार वर्षों में इसकी सारी किरणें शून्य में खो जाएंगी, तब यह भी शून्य हो जाएगा। अगर शून्य में किरणें खो सकती हैं तो फिर शून्य से किरणें आती भी होंगी, अन्यथा सूर्यों का जन्म कैसे होगा?

 विज्ञान कहता है कि हमारा सूर्य मर रहा है, लेकिन दूसरे सूर्य दूसरे छोरों पर पैदा हो रहे हैं। वे कहां से पैदा हो रहे हैं? वे शून्य से पैदा हो रहे हैं। वेद कहते हैं कि जब कुछ नहीं था, उपनिषद भी बात करते हैं उस क्षण की जब कुछ नहीं था। बाइबिल भी बात करती है उस क्षण की जब कुछ नहीं था, ना-कुछ ही था, नथिंगनेस ही थी। उस ना-कुछ से होना पैदा होता है और होना प्रति पल ना-कुछ में लीन होता चला जाता है। अगर हम पूरे अस्तित्व को एक समझें तो इस अस्तित्व के निकट ही हमें अनस्तित्व को भी स्वीकार करना पड़ेगा।

 अनस्तित्व को पकड़ना बहुत कठिन है। अस्तित्व तो हमें दिखाई पड़ता है। इसलिए योग की दृष्टि से, जो सिर्फ अस्तित्व को मानता है, जो समझता है कि अस्तित्व ही सब कुछ है, वह अधूरे को देख रहा है। और अधूरे को जानना ही अज्ञान है। अज्ञान का अर्थ न जानना नहीं है, अज्ञान का अर्थ अधूरे को जानना है। जानते तो हम हैं ही, अगर हम इतना भी जानते हैं कि मैं नहीं जानता, तो भी मैं जानता तो हूं ही। जानना तो हममें है ही। इसलिए अज्ञान का अर्थ न जानना नहीं है। अज्ञानी से अज्ञानी भी कुछ जानता ही है। अज्ञान का अर्थ योग की दृष्टि में आधे को जानना है।

 योग कहता है कि ऊर्जा के दो रूप हैंै। और जो दोनों ही रूप को समझ लेता है, वह योग में गति कर पाता है। जो एक रूप को, आधे को पकड़ लेता है, वह अयोगी हो जाता है। जिसको हम भोगी कहते हैं, वह आधे को पकड़े हुए आदमी का नाम है। जिसे हम योगी कहते हैं, वह पूरे को पकड़े हुए का नाम है। योग का मतलब ही होता है दि टोटल। योग का मतलब होता है जोड़। गणित की भाषा में भी योग का मतलब जोड़ होता है। अध्यात्म की भाषा में भी योग का मतलब होता है इंटीग्रेटेड, दि टोटल, पूरा, समग्र।

 योग का तीसरा सूत्र : अस्तित्व के दो रूप हैं। मैंने कहा: ऊर्जा एक सूत्र। दूसरा: ऊर्जा के दो रूप अनस्तित्व, अस्तित्व। फिर तीसरा सूत्र: अस्तित्व के दो रूप हैं एक जिसे हम चेतन कहें और एक जिसे हम अचेतन कहें। लेकिन दो रूप ही हैं, दो चीजें नहीं हैं। जिन्हें हम धार्मिक लोग कहते हैं, वे भी दो चीजें सोच लेते हैं। वे भी समझ लेते हैं कि चेतना अलग, अचेतना अलग; शरीर अलग, आत्मा अलग! ऐसी अलगता नहीं है।

 ठीक से समझें, तो आत्मा का जो हिस्सा इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है उसका नाम शरीर है और शरीर का जो हिस्सा इंद्रियों की पकड़ में नहीं आता उसका नाम आत्मा है। चेतन और अचेतन, अस्तित्व के दो रूप हैं। एक पत्थर पड़ा है। वह है, लेकिन अचेतन है। आप उसके पड़ोस में खड़े हैं। आप भी हैं। होने में कोई फर्क नहीं है, दोनों एक्झिस्टेंट हैं, दोनों का अस्तित्व है, लेकिन एक चेतन है और एक अचेतन है। लेकिन पत्थर चेतन बन सकता है और आप पत्थर बन सकते हैं। कनवर्टिबल हैं। इसलिए तो आप गेहूं खा लेते हैं और खून बन जाता है। इसलिए तो आपके शरीर में लोहा जाता है और जीवंत हो जाता है। अगर हम आदमी के शरीर का सब सामान निकाल कर बाहर टेबल पर रखें, तो कोई पांच रुपये से ज्यादा का सामान नहीं निकाल सकता। थोड़ा सा लोहा है, अल्युमिनियम है, फास्फोरस है, तांबा है, ये सब चीजें निकलेंगी। और बड़ा हिस्सा तो पानी का है। कोई पांच रुपये का सामान है आदमी के भीतर। लेकिन आदमी के भीतर होकर वे चेतन और जीवित हैं। हाथ को चोट लगती है तो पीड़ा उठती है। और यही हाथ का हिस्सा कल बाहर था और पीड़ा नहीं उठती थी। कल फिर बाहर हो जाएगा।

 चेतन और अचेतन, अस्तित्व के दो रूप हैं। दो अस्तित्व नहीं हैं, अस्तित्व के ही दो रूप हैं। इसलिए कनवर्टिबल हैं, रूपांतरित हो सकते हैं। इसलिए चेतन से अचेतन आ सकता है, अचेतन चेतन में जा सकता है। रोज हो रहा है। रोज हम यही कर रहे हैं। रोज हम जड़ अचेतन को भोजन बना रहे हैं और हमारे भीतर वह चेतन बनता जाता है। और रोज हमारे भीतर से मल निष्कासित हो रहा है बहुत रूपों में और जड़ होता जा रहा है। आदमी इधर से चेतन होता है, उधर से चेतन होता है। इधर से अचेतन को लेता है, और भीतर चेतन होता जाता है। चेतन और अचेतन भी दो चीजें नहीं हैं। चेतन और अचेतन, अस्तित्व के एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं। चेतन अचेतन हो सकता है, अचेतन चेतन होता रहता है। यह तीसरा सूत्र है योग का। ये सूत्र समझ लेने जरूरी हैं, क्योंकि फिर इन्हीं सूत्रों के ऊपर योग की सारी साधना का भवन खड़ा होता है।

 चेतन-अचेतन, अब विज्ञान को राजी हो गई है यह बात भी। अब विज्ञान एक नए शब्द का प्रयोग करता है, वह मैं आपसे कहूं।

 नई मेडिसिन, अब किसी बीमारी को…पहले बीमारियां दो तरह की समझी जाती थीं फिजिकल और मेंटल। एक मानसिक बीमारी है और एक शारीरिक बीमारी है, क्योंकि मन अलग है और शरीर अलग है। अब चिकित्साशास्त्र एक नए शब्द का प्रयोग करता है साइकोसोमेटिक। अब चिकित्साशास्त्र कहता है, कोई बीमारी न तो अकेली मानसिक है और न अकेली शारीरिक है। बीमारी मनोशारीरिक, साइकोसोमेटिक है। दोनों ही छोर उसके हैं। अगर आपका मन बीमार हो जाए तो आपका शरीर भी बीमार हो जाता है। और अगर आपका शरीर बीमार हो जाए तो आपका मन भी बीमार हो जाता है।

 योग का कहना है कि हमारे भीतर शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर चेतन और अचेतन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर एक ही अस्तित्व है, जिसके दो छोर हैं। और इसलिए किसी भी छोर से प्रभावित किया जा सकता है। शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं; शरीर और मन एक ही चीज का विस्तार हैं, एक ही चीज के अलग-अलग वेवलेंथ हैं। चेतन और अचेतन एक का ही विस्तार हैं। योग के सारे के सारे प्रयोग इस सूत्र पर खड़े हैं।

 इसलिए योग मानता है, कहीं से भी शुरू किया जा सकता है। शरीर से भी शुरू की जा सकती है यात्रा और मन से भी शुरू की जा सकती है। बीमारी भी, स्वास्थ्य भी, सौंदर्य भी, शक्ति भी, उम्र भी शरीर से भी प्रभावित होती है, मन से भी प्रभावित होती है। तो सारी बात इस पर निर्भर करती है कि हमारे व्यक्तित्व के दो हिस्से है चेतन और अचेतन। और जगत के भी दो हिस्से हैं चेतन और अचेतन। जिसे हम पदार्थ कह रहे हैं वह जगत का अचेतन हिस्सा है, जिसे हम जीवन कह रहे हैं वह जगत का चेतन हिस्सा है। इस सारे चेतन और इस सारे अचेतन में कोई विरोध नहीं है। ये दोनों एक-दूसरे से संबंधित हैं।

 योग का चौथा सूत्र : जगत में कुछ भी असंबंधित नहीं है, एवरीथिंग इज़ रिलेटेड, दि वर्ल्ड इज़ ए फैमिली। यह जो जगत है, एक परिवार है। यहां असंबंधित कुछ भी नहीं है, यहां सब जुड़ा है, यहां टूटा कुछ भी नहीं है। यहां पत्थर से आदमी जुड़ा है, जमीन से चांद-तारे जुड़े हैं, चांद-तारों से हमारे हृदय की धड़कनें जुड़ी हैं, हमारे विचार सागरों की लहरों से जुड़ें हैं, पहाड़ों के ऊपर चमकने वाली बर्फ हमारे मन के भीतर चलने वाले सपनों से जुड़ी है। यहां टूटा हुआ कुछ भी नहीं है, यहां सब संयुक्त है, यहां सब इकट्ठा है। यहां अलग-अलग होने का उपाय नहीं है, क्योंकि यहां बीच में गैप नहीं है, जहां से चीजें टूट जाएं। टूटा होना सिर्फ हमारा भ्रम है। इसलिए योग का चौथा सूत्र आपसे कहता हूं: ऊर्जा संयुक्त है, ऊर्जा का परिवार है। न चेतन अचेतन से टूटा है, न अस्तित्व अनस्तित्व से टूटा है, न पदार्थ मन से टूटा है, न शरीर आत्मा से टूटा है, न परमात्मा पृथ्वी से टूटा है, प्रकृति से टूटा है। टूटा होना शब्द ही झूठा है। सब जुड़ा है, सब इकट्ठा है, संयुक्त और इकट्ठा शब्दों से गलती मालूम पड़ती है, क्योंकि ये शब्द हम उनके लिए लाते हैं जो टूटे हुए हैं। यह एक ही है।

 योग का पांचवां सूत्र है : जो  अणु में है, वह विराट में भी है। जो क्षुद्र में है, वह विराट में भी है। जो सूक्ष्म से सूक्ष्म में है, वह बड़े से बड़े में भी है। जो बूंद में है, वही सागर में है। इस सूत्र को सदा से योग ने घोषणा की थी, लेकिन विज्ञान ने अभी-अभी इसको भी समर्थन दिया है। सोचा भी नहीं था कि अणु के भीतर इतनी ऊर्जा, इतनी शक्ति मिल सकेगी, अत्यल्प के भीतर इतना छिपा होगा, ना-कुछ के भीतर सब-कुछ का विस्फोट हो सकेगा। अणु के विभाजन ने योग की इस अंतर्दृष्टि को वैज्ञानिक सिद्ध कर दिया है। परमाणु तो दिखाई भी नहीं पड़ता आंख से। लेकिन न दिखाई पड़ने वाले परमाणु में, अदृश्य में विराट शक्ति का संग्रह है। वह विस्फोट हो सकता है। व्यक्ति के भीतर आत्मा का अणु तो दिखाई नहीं पड़ता है, लेकिन उसमें विराट ऊर्जा छिपी है और परमात्मा का विस्फोट हो सकता है। योग की घोषणा कि क्षुद्रतम में विराटतम मौजूद है, कण-कण में परमात्मा मौजूद है, यही अर्थ रखती है।

 योग का छठवां सूत्र है कि ऐसा नहीं है कि जो क्षुद्र दिखाई पड़ता है वह और जो विराट दिखाई पड़ता है वह, इनमें विराट दाता हो और क्षुद्र सिर्फ ग्राहक हो, भिखारी हो, ऐसा नहीं है। छठवां सूत्र है योग का: दान और ग्रहण, भिखारी होना और सम्राट होना,सबके साथ इकट्ठा है। यहां बूंद भी सागर को दान देती है और सागर से दान लेती है। यहां क्षुद्र भी विराट को देता है और यहां विराट भी क्षुद्र में अपने को उंड़ेलता है। यहां यह देना और लेना बिलकुल बराबर चल रहा है। उस आदमी को मैं योगी कहूंगा, जो जितना लेता है, उतना दे देता है और हिसाब सदा चुकता है। कबीर जब कह सके मरते वक्त कि ज्यों की त्यों रख दीन्हीं चदरिया, तो उसका मतलब है। उसका मतलब है: लेन-देन सब बराबर है। खाते में न कुछ देना बचा, न कुछ लेना बचा। हिसाब-किताब पूरा हो गया, हम जाते हैं। कोई उधारी नहीं है। ऐसा नहीं कि लिया ही हो और दिया न हो। हम सारे लोग लेते तो हैं, लेकिन दे नहीं पाते, बांट नहीं पाते। और लेने तक में कंजूसी कर जाते हैं तो देने में तो कंजूसी करेंगे ही। लेते तक खुले मन से नहीं हैं, वहां भी दरवाजे बंद रखते हैं, पता ही नहीं। और देने में तो बहुत कठिनाई है। जैसा मैंने कहा, आनंद में ज्यादा मिलता है, वैसे ही आनंद में ज्यादा दिया जाता है। मौन में ज्यादा मिलता है, मौन में ज्यादा दिया जाता है।

 एक सूत्र मैंने आपसे कहा : जीवन ऊर्जा है और ऊर्जा के दो आयाम हैं- अस्तित्व और अनस्तित्व। और फिर दूसरे सूत्र मेंे कहा कि अस्तित्व के भी दो आयाम हैं- अचेतन और चेतन। सातवें सूत्र में चेतन के भी दो आयाम हैं स्व-चेतन, सेल्फ-कांशस और स्व-अचेतन, सेल्फ-अनकांशस। ऐसी चेतना जिसे पता है अपने होने का और ऐसी चेतना जिसे पता नहीं है अपने होने का। जीवन को यदि हम एक विराट वृक्ष की तरह समझें, तो जीवन-ऊर्जा एक है वृक्ष की पींड़। फिर दो शाखाएं टूट जाती हैं अस्तित्व और अनस्तित्व की, एक्झिस्टेंस और नॉन-एक्झिस्टेंस की। अनस्तित्व को हमने छोड़ दिया, उसकी बात नहीं की, क्योंकि उसका योग से कोई संबंध नहीं है। फिर अस्तित्व की शाखा भी दो हिस्सों में टूट जाती है चेतन और अचेतन। अचेतन की शाखा को हमने अभी चर्चा के बाहर छोड़ दिया, उससे भी योग का कोई संबंध नहीं है। फिर चेतन की शाखा भी दो हिस्सों में टूट जाती है स्व-चेतन और स्व-अचेतन। सातवें सूत्र में इस भेद को समझने की कोशिश सबसे ज्यादा उपयोगी है।

 सातवें सूत्र से योग की साधना प्रक्रिया शुरू होती है। इसलिए इस सूत्र को ठीक से समझ लेना उपयोगी है। सातवें सूत्र में मैंने आपसे कहा, चेतन जीवन के दो रूप हैं स्व-चेतन, सेल्फ-कांशस और स्व-अचेतन, सेल्फ-अनकांशस।

 आठवां सूत्र है: स्व चेतना से योग का प्रारंभ होता है और स्व के विसर्जन से अंत। स्व-चेतन होना मार्ग है, स्वयं से मुक्त हो जाना मंजिल है। स्वयं के प्रति होश से भरना साधना है और अंतत: होश ही रह जाए, स्वयं खो जाए, यह सिद्धि है।

 प

 मो.: ९८१०३६७८०७

 

 

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