मर्यादा की हर कसौटि पर खरे उतरे राम

‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की उपाधि एक बहुत महान और कठिन कर्तव्य है, और प्रभु श्री राम जीवन के हर पड़ाव पर अपने इस कर्तव्य पर बिल्कुल खरे उतरे हैं।

स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, भगवान श्री राम सत्यता और नैतिकता का अवतार, एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति और सबसे बढ़कर एक आदर्श राजा थे। वह बुराई पर अच्छाई की जीत का सबसे अच्छा उदाहरण थे। रामायण की कहानी के मूल में कई संदेश हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं, उनमें से एक महत्वपूर्ण सीख है महिलाओं का सम्मान करना। प्रभु श्री राम द्वारा निर्धारित कई सकारात्मक उदाहरणों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

एक श्रेष्ठ और उदाहरणात्मक पुरुष की पहचान इस बात से होती है कि वह महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है। महिलाओं का आदर-सम्मान, पुरुष की सर्वोत्कृष्टता का सबसे बड़ा प्रमाण है। भगवान राम को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित किया जा सकता है जो महिलाओं के प्रति नैतिक आचरण के साथ-साथ सामाजिक आचरण के भी आदर्श हैं।

विष्णु भगवान के सातवें अवतार के रूप में श्री राम का जन्म हुआ। राजा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र होने के नाते, श्री राम अयोध्या के सिंहासन पर अपने अधिकार का दावा कर सकते थे, लेकिन अपनी सौतेली मां कैकेयी के आग्रह पर उन्होंने अपना सारा राजपाट छोटे भाई भरत को देना स्वीकार किया। उन्होंने निःसंकोच 14 साल के कठिन वनवास के निर्णय का पालन कीया। अपनी माताश्री का आदेश श्री राम के लिए सर्वोपरि था। उसके आगे कोई राजपाट मायने नहीं रखता था। हंसी-खुशी वनवास जाने का निर्णय, श्री राम का अपनी माताश्री के प्रति अत्यधिक प्रेम, आदर और सम्मान को प्रदर्शित करता है।

जितना आदर-सम्मान श्री राम अपनी माताश्री का करते थे, उतना ही प्रेम वह अपनी अर्धांगिनी सीता से करते थे। श्री राम नारी की निर्णायकता का पूर्ण समर्थन करते थे। उनके इस व्यक्तित्व का परिचय सीता को विवाह के समय मिला था। श्री राम से शादी करना उनका निर्णय था, उनकी पसंद थी। जब श्री राम ने सीता से विवाह किया, तो उन्होंने सबसे पहली बात अपनी पत्नी से यह कही कि उन्होंने अपने विवाह के संदर्भ में अपने आचरण को निर्धारित कर लिया है। उस प्राचीन काल में कई विवाहों का एक नियमित अनुष्ठान होने के बावजूद, श्री राम ने आजीवन पुनर्विवाह नहीं करना चुना। वह अपनी पत्नी सीता के प्रति निष्ठावान रहे और एक पत्नी-वृता रहे।

जब वनवास जाने का समय आया, तब समझदारी और धैर्य दिखाते हुए उनकी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण ने उन्हें साथ ले जाने का तर्क दिया। एक पति के रूप में, भगवान राम ने अपनी पत्नी को अधिकार और निर्णय लेने की पूरी शक्ति दी और उनके अटल निर्णय का विनम्रतापूर्वक पालन भी किया।

जब लंका नरेश ने सीता का अपहरण कर लिया, तब श्री राम ने अपनी पत्नी सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी पत्नी से अलग होकर श्री राम ने बड़ी से बड़ी मुश्किलों का धैर्य और साहस से सामना किया। अपनी प्रिय पत्नी को खोजने की इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प में उन्होंने रावण जैसे बलशाली, शूरवीर योद्धा के खिलाफ निडर रहते हुए युद्ध छेड़ दिया, ताकि वह सम्मानपूर्वक अपनी पत्नी को वापस घर ले जा सकें। सीता की गरिमा और सम्मान की रक्षा कोई साधारण लड़ाई नहीं थी, यह एक शक्तिशाली युद्ध था जिसे आने वाली अनेक सदियों तक याद किया जाएगा।

यहाँ यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण रहेगा कि अपनी अर्धांगिनी सीता के चरित्र पर स्वयं श्री राम ने कभी भी, एक पल के लिए भी संदेह नहीं किया, लेकिन दुर्भाग्य से उनकी प्रजा ने कई प्रश्न उठाए। एक राजा के रूप में, यह उनका पहला कर्तव्य था कि वह अपनी प्रजा के विश्वास को अटल रखें, और इसलिए श्री राम के समक्ष जब अपनी पत्नी और अपनी प्रजा के बीच किसी एक के चुनाव का सवाल आया, तो न्याय परायण अयोध्यापति श्री राम ने अपनी प्रजा का चुनाव किया। अग्नि परीक्षा श्री राम के लिए उतनी ही कष्टकारी रही जितनी उनकी पत्नी सीता के लिए रही थी।

शबरी के उल्लेख के बिना रामायण अधूरी होगी। शबरी का चरित्र धैर्य, दृढ़ता, भक्ति, पवित्रता और सेवा की भावना का प्रतीक है। शबरी ने श्री राम पर बहुत गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ा। यद्यपि श्री राम और शबरी के बीच की मुलाकात बहुत संक्षिप्त थी, लेकिन इन प्रेमपूर्ण, निर्णायक क्षणों ने शबरी की तपस्या और राम भक्ति को पुरस्कृत किया। महान सूर्यवंशी राजकुमार को एक गरीब बूढ़ी महिला द्वारा पहले से ही चखे हुए जूठे फल (बेर) खाने में कोई परेशानी नहीं था। यह प्रभु श्री राम के स्नेह का शुद्धतम रूप था।

रावण को मारने के बाद, जब युद्ध समाप्त हो गया था, भगवान श्री राम एक चट्टान पर आराम कर रहे थे। उन्हें वहां एक छाया महसूस हुई। वह छाया एक महिला की थी। पुष्टि होने पर श्री राम ने अपनी आंखें ऊपर नहीं उठाईं क्योंकि वह सीता के अलावा किसी महिला की ओर नहीं देखते थे। श्री राम की यह खासियत थी कि अपनी पत्नी के अलावा वह किसी अन्य महिला की परछाई भी नहीं छूते थे। श्री राम आश्चर्य करते हैं कि वह छाया किसकी है? वह पूछते हैं कि वह व्यक्ति कौन है? छाया रावण की पत्नी, मंदोदरी की थी। उसने अपना परिचय दिया। श्री राम ने मंदोदरी के आने का कारण पूछा तो मंदोदरी ने कहा कि उसने सुना कि उसका पति रावण युद्ध में मारा गया। उसने बताया कि रावण एक ऐसा राजा था जिसने अपने दुश्मनों के दिलों में डर बैठा दिया था। हर कोई उसे अजेय और अमर मानता था। और फिर भी, अंत में वह किसी के द्वारा मारा गया। वह अपने पति की हत्या करने वाले व्यक्ति को देखने के लिए युद्ध के मैदान में आई थी। वह जानना चाहती थी कि श्री राम के पास ऐसा क्या गुण हैं जो उन्होंने रावण को युद्ध में परास्त कर दिया। प्रभु श्री राम ने तब मंदोदरी से पूछा कि उसने उनमें क्या गुण देखे? मंदोदरी ने कहा कि भगवान राम की खासियत यह थी कि उनकी पत्नी के अलावा वह किसी महिला की परछाई भी खुद को छूने नहीं देते थे। और दूसरी ओर, रावण, किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी को छल-कपट से अपना बनाने के प्रयास में इतने सारे जीवनों का बलिदान करने को तैयार था। दोनों के चरित्र में बहुत अंतर है। मंदोदरी ने कहा कि भगवान राम के इन्हीं गुणों ने उनकी जीत का मार्ग प्रशस्त किया। मंदोदरी को आभास हो गया था कि श्री राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, बल्कि भगवान विष्णु का अवतार हैं।

युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद, भगवान राम ने विभीषण को लंका पर शासन करने और विकास और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की सलाह दी। उन्होंने विभीषण को मंदोदरी से विवाह करने की सलाह भी दी, और उसे लंका की शासक रानी के रूप में पुनः स्थापित किया। उन्होंने मंदोदरी को सांत्वना दी और उन्हें लंका की रानी के रूप में उनके कर्तव्यों की याद दिलाई। यह राजधर्म का एक आदर्श उदाहरण था।

भगवान राम को उनके जीवन की सफलताओं के लिए नहीं पूजा जाता, लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपने जीवन में चुनौतियों का संचालन किया, उसके लिए पूजा जाता है। ’मर्यादा पुरुषोत्तम’ की उपाधि एक बहुत महान और कठिन कर्तव्य है, और प्रभु श्री राम जीवन के हर पड़ाव पर अपने इस कर्तव्य पर बिल्कुल खरे उतरे हैं। जय श्री राम, जय जय श्री राम!

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