बाबरी विध्वंस से पड़ी भव्य श्रीराम मंदिर की नींव

“इसका मुझे बहुत आनंद है कि मैं उस समय कार सेवा में गया था। वह मेरे जीवन का अविस्मरणीय गौरवमय दिन था। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे राम काज करने का मौका मिला। उस स्वर्णिम दिन को स्मरण कर गर्व की अनुभूति होती है।”

अयोध्या श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए लगभग पिछले 500 वर्षों से जिसका संपूर्ण हिंदू जनमानस इंतजार कर रहा था वह शुभ घड़ी आखिरकार आ ही गई। इस शुभ अवसर पर यकायक 6 दिसंबर 1992 के उस दिन की भी याद ताजा हो रही है, जब लाखों राम भक्तों के सब्र का बांध टूटा था और जो 500 वर्षों में जो नहीं हुआ वह बाबरी ढांचा रूपी कलंक को ध्वस्त कर मिटा दिया गया। उस दिन को शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। कैसे पूरे भारत के हर राज्य से राम भक्त कार सेवा के लिए अयोध्या आए? बाबरी ढांचे का विध्वंस करने के लिए कैसी व्यूह रचना बनाई गई थी? कैसी अभूतपूर्व तैयारी की गई थी? और उस समय का क्या माहौल था? आइए, उस समय कार सेवा में शामिल मुंबई के विश्व हिंदू परिषद के नेता परशुराम दुबे से बाबरी विध्वंस का आंखों देखा हाल जानते हैं।

मुंबई से अयोध्या यात्रा

राम जन्मभूमि को मुक्त करने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने कार सेवा करने हेतु देश से आवाहन किया था। उसी के प्रतिसाद स्वरूप पूरे देश भर से राम भक्तों का जत्था अयोध्या की ओर कूच करने लगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्गदर्शन में विहिंप, भाजपा और संघ के सभी सहयोगी संगठनों ने जोरदार तैयारी की थी। महाराष्ट्र से लगभग 60 हजार से ज्यादा लोग अयोध्या गए थे। मुंबई के गोरेगांव भाग से 600 के करीब लोग मेरे साथ गए थे। जब हम सभी बांद्रा में अवध एक्सप्रेस ट्रेन में बैठे, उस समय का नजारा अद्भुत अविस्मरणीय था। रेल्वे स्टेशन में चारों ओर से केवल ’जय श्री राम’ ’जय श्री राम’ के नारों की सिंह गर्जना सुनाई दे रही थी। मुंबई के अन्य भागों से भी हजारों – हजारों कार सेवक उस ट्रेन में बैठे हुए थे। हमारी भीड़ इतनी ज्यादा थी कि आम लोग जिन्होंने कंफर्म टिकट ले लिए थे उन्होंने अपने टिकट कैंसिल करके टिकट के पैसे वापस ले लिए और अपनी यात्रा रद्द कर दी। ट्रेन खचाखच राम भक्तों और बजरंगियों की भीड़ से पूरी तरह भर चुकी थी। उस माहौल से प्रभावित होकर स्टेशन मास्टर को घोषणा करनी पड़ी कि यह अवध एक्सप्रेस नहीं बल्कि अयोध्या एक्सप्रेस है। सभी का जोश व आत्मविश्वास अपने चरम पर था। सभी में भक्ति की शक्ति हिलोरे मार रही थी। पूरा सफर ट्रेन का लोगों के गाते बजाते भजन गाते कब बीत गया, कुछ पता ही नही चला। हर स्टेशनों पर संगठन के माध्यम से खानेपीने की व्यवस्था की गई थी। विशेषकर संजीवनी हॉस्पिटल के डॉ. श्याम अग्रवाल जी के पिताजी ने हर डिब्बों में खानेपीने की बेहतरीन व्यवस्था कर दी थी। हम सभी अपने दल के साथ लखनऊ में उतर कर फिर दूसरी ट्रेन से अयोध्या पहुंचे थे। सरयू तट के किनारे नया घाट पर महाराष्ट्र का कैंम्प लगाया गया था। हम सभी वहां पहुंच गए। देश भर से जितने प्रांतों से लोग आए थे, उन सभी को अलग – अलग रंग के आईडी कार्ड दिए गए थे। हमारे महाराष्ट्र का आईडी कार्ड केसरी रंग का था। हम सभी में इस बात का बहुत हर्ष और जोश था कि इस बार हमें कार सेवा करने का मौका मिलेगा। लेकिन हमें प्रशासन से सूचना मिली कि केवल सरयू की मिट्टी लेकर वहां पर जाना है उसे रखना है और फिर वहां से चले जाना है, कुछ करना नहीं है। तब कारसेवकों के सब्र का बांध टूट गया। फिर यह तय किया गया कि अभी नहीं तो कभी नहीं, आर या पार, सभी लोग यह मन बना चुके थे। अब हमसे और इंतजार नहीं सहा जाता। 90के दशक में कार सेवकों का जो बलिदान हुआ था। मुल्ला मुलायम ने निहत्थे कार सेवक राम भक्तों पर गोलियां चलवाकर उनकी निर्मम हत्या कर दी थी। उसका भी आक्रोश लोगों के मन में ज्वालामुखी की तरह उबल रहा था। लोगों में बहुत अधिक गुस्सा था।

 

राम मंदिर के साथ होगा राष्ट्र का नवनिर्माण

मेरे जीवन काल में भव्य मंदिर बन जाए और जीते जी मैं प्रभु रामलला का दर्शन कर पाऊं, बस यही मेरी आखिरी इच्छा है। अब मैं शांति से मृत्यु का वरण कर सकता हूं। जब भी मंदिर का इतिहास लिखा जाएगा, तब देशव्यापी आंदोलन, संघर्ष करने वालों और गोली खाने वाले रामभक्तों का नाम भी लिखा जाएगा। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ढांचा विध्वंस हुआ उसका भी जिक्र किया जाएगा। उस दिन प्रशासन की ओर से मुझसे मंजूरी मांगी गई थी कि गोली चलाई जाए या नहीं? तब मैंने उन्हें किसी भी हाल में गोली न चलाने का आदेश दिया था। गोली चलाने से बड़े नरसंहार और खूनखराबे की आशंका थी। मुझे अपने फैसले पर गर्व है। मुझे सरकार गिरने का कोई अफसोस नहीं है। इतिहासकार यह भी लिखेंगे कि भव्य राम मंदिर निर्माण की भूमिका 6 दिसंबर 1992 को ही बन गई थी। मुझे लगता है कि ढ़ाचा न गिरता तो न्यायालय से मंदिर को जमीन देने का निर्णय भी शायद नहीं हो पाता। मुझे पूर्ण विश्वास है कि राम मंदिर दुनिया के सबसे भव्य और विराट मंदिरों में से एक होगा। राम मंदिर की शान का दूसरा कोई मंदिर नहीं होगा। यह भारत की संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का भी प्रतीक होगा। मैं मानता हूं कि राम मंदिर ने देश की एकता और अस्मिता को बल दिया है। राम मंदिर के साथ राष्ट्र निर्माण भी शुरू हो जाएगा। यह मंदिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के अभियान का भी आधार बनेगा। देशवासियों में आत्मविश्वास निर्माण होगा और इससे अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
  – कल्याण सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

बाबरी विध्वंस की रणनीति और व्यूहरचना

इसके बाद फायरिंग की संभावना को देखते हुए व्यूहरचना बनाई गई। उस समय आंध्र प्रदेश के नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। इसलिए रचना बनाई गई कि आंध्र प्रदेश के 62 हजार कार सेवकों को आगे रखा जाएगा। हमारी ओर से साफ संदेश दिया जा चुका था कि यदि फायरिंग करनी है तो पहले आंध्र प्रदेश के लोगों पर करो। नरसिंह राव के गृह जिले के कार सेवकों को सबसे अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया गया था। दूसरे पंक्ति में महाराष्ट्र के कार सेवकों को खड़ा किया गया था क्योंकि तब महाराष्ट्र के शंकरराव चव्हाण देश के गृहमंत्री थे। लाखों लोगों की भीड़ के सामने शासन – प्रशासन बौना साबित हुआ। कार सेवकों के हजारों लाखों की भीड़ बाबरी ढांचे पर चढ़ने लगी और जिसके हाथ में जो कुछ आया, उसी से वह तोड़ने का प्रयास करने लगा। कहा जाता है कि लोगों को हथियार – औजार दिए गए थे लेकिन ऐसा नहीं था। हमें कोई हथियार औजार नहीं दिए गए थे। रास्ते से गुजरते समय जिसके हाथ जो लगा वह उसने उठा लिया। फावड़ा, कुदाल, सरिया, हथौड़ी, कुल्हाड़ी आदि जो मिले, उसे ही शस्त्र और औजार बनाकर वह बाबरी पर टूट पड़े। सभी को सूचना दी गई थी कि जिन्होंने जो चीजें तोड़ी है उसे लेकर वहां से निकल जाए। अन्य लोगों को भी सेवा करने का मौका दे। दूसरे पीछे वालों को भी चान्स मिलना चाहिए। हमारे साथ मलाड के एक साहसी स्वयंसेवक थे उनका नाम हेमंत गोखले है। वह बाबरी का गुंबद तोड़ते समय ऊपर से नीचे गिर गए। लगभग वह 12 घंटे तक बेहोश पड़े रहे। लेकिन व्यवस्था व सुविधा इतनी अच्छी थी कि जैसे ही किसी को चोट या मार लगती थी उसे एंबुलेंस द्वारा हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था। डॉक्टरों की बहुत बड़ी टीम उस समय अपनी सेवा दे रही थी। उत्तर प्रदेश के डॉक्टरों और उस समय के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का मैं अभिनंदन व सराहना करता हूं कि उन्होंने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने बहुत अच्छी व्यवस्था की थी। जिसके चलते यह आंदोलन सफल रहा। लाखों बजरंगियों की सामूहिक शक्ति ने बाबरी के कलंक को सदा सदा के लिए मिटा दिया और बाबरी का विध्वंस कर एक – एक इट अपने घरों में ले जाने लगे। बताया जाता है कि आधुनिक मशीनों से 2 दिन में भी बाबरी को जमींदोज नहीं किया जा सकता था। उसे मात्र 4-5 घंटों में ही ध्वस्त कर दिया गया। जिसे जो मिला ईट, पत्थर, लोहा, दरवाजे की कुंडी, सब अपने साथ उठाकर ले गए। ’जयकारा वीर बजरंगी – हर हर महादेव’ और ’जय श्री राम’ के गगनभेदी नारों से अयोध्या की पावनभूमि गूंज रही थी। 6 दिसंबर की शाम को पता चला कि राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया हैं। शासन प्रशासन द्वारा कठोर कार्रवाई करने की संभावना थी। इससे बचने के लिए कैम्पों में से सभी लोग अयोध्या की सड़कों पर आ गए। रात के 2 बजे तक पूरी आयोध्या से फैजाबाद तक सड़क जाम हो गई थी। कलेक्टर और पुलिस के अन्य आला अधिकारी भी लाखों लोगों के आक्रोश को देखकर डर गए। उन्हें पता चल गया कि इन्हें काबू में करना असंभव है। फिर वह उलटे पांव लौट गए। पूरी रात सड़कों पर कार सेवक डेरा डाले हुए थे। कोई भी इस पार से उस पार नहीं जा सकता था। जब तक भूमि को समतल कर रामलला को विराजमान नहीं किया गया, तब तक हम सभी सड़कों पर ही बैंठे रहे। रामलला की मूर्ति स्थापित होने के बाद ही हम लोग अपने कैंम्पों में गए। इसके बाद जिसको जहां जाना है वहां के बसों की व्यवस्था की गई थी।

परशुराम दुबे – धर्माचार्य सम्पर्क प्रमुख विहिंप कोकण प्रांत

अयोध्या में मनाई गई थी दीपावली

इसके पूर्व उस समय मेरे सामने एक साधु पतरों की एक गुमटी को अपने माथे की टक्कर से तोड़ रहे थे और उनके सर से खून बह रहा था। मैंने उनसे कहां बाबा आप यह क्या कर रहे हैं? आप के सर से तो खून बह रहा है। आप यह गुमटी क्यों तोड़ रहे हैं? तब उस साधु ने कहा कि बच्चा इसी गुमटी में से मुलायम सिंह यादव के गुंड़े पुलिस वालों ने पिछली बार गोली चलाई थी, जिसमें कई लोग मारे गए थे। मैंने अपनी आंखों से वह नरसंहार देखा था। इसलिए मैं इसको तोड़ रहा हूं। इसके बाद हम सभी लोगों ने मिलकर उसे जमींदोज कर दिया। एसे कई प्रसंगों को देखते समय आंखों से आंसू भी आते थे और खुशी भी होती थी। बाबरी विध्वंस के बाद अपार खुशी और विंध्वस होने के पहले गुस्सा अपने चरम पर था। यही भावना सभी जनमानस की थी। बाबरी विध्वंस के बाद आयोध्या में दीपावली का माहौल हो गया था। घर – घर में मिठाई बांटी जा रही थी। सभी के चेहरे खिल गए थे। आसपास के लोग हमें बुलाबुलाकर घर में खाना खिला रहे थे। सभी जगहों पर महाप्रसाद बांटे जा रहे थे। इतनीे खुशी उस दिन अयोध्या में मैंने देखी वैसा नजारा मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा। इसका मुझे बहुत आनंद है कि मैं उस समय कार सेवा में गया था। वह मेरे जीवन का अविस्मरणीय गौरवमय दिन था। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे राम काज करने का मौका मिला। उस स्वर्णिम दिन को स्मरण कर गर्व की अनुभूति होती है।

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