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अंग्रेज सरकार ने हरिद्वार में गंगा को बांध कर गंगा नहर निर्माण करने की योजना जब बनाई उस समय मां गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह को सुरक्षित रखने की, हिन्दू समाज की आस्था की, लड़ाई महामना मदनमोहन जी मालवीय ने प्रारम्भ की। अंग्रेज सरकार झुकी और सरकार ने मालवीय जी के साथ १९१६ ई. में गंगा की निर्बाध अविरल धारा के लिए एक समझौता किया।
जीवन के अंतिम समय में मालवीय जी ने शिवनाथ काटजू जी (केन्द्र सरकार में मंत्री रहे श्री कैलाशनाथ जी काटजू के सुपुत्र तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता) को अपने पास बुलाकर कहा था कि गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह के लिए मेैं जीवन भर प्रयत्न करता रहा हूं। मुझे शंका है कि भविष्य में भी गंगा को बांधने के प्रयास किए जा सकते हैं। उस समय गंगा के प्रवाह को निर्बाध व अविरल बनाए रखने का दायित्व मैं तुम्हें सौंपे रहा हूं।
श्री शिवनाथ काटजू जी कालांतर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात्त वे विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तब एक अवसर पर उन्होंने श्री अशोक जी सिंहल को यह प्रसंग सुनाते हुए कहा था कि तब मैं यह समझ नहीं सका कि मालवीय जी ने मुझ से यह बात क्यों कही? मुझे यह दायित्व क्या सोच कर सौंपा? परंतु आज विश्व हिन्दू परिषद का अध्यक्ष बनने पर मुझे यह रहस्य समझ में आ रहा है इसलिए विश्व हिन्दू परिषद को गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह को बनाए रखने का कार्य करना है। मैं तो अपने जीवन में शायद ही कुछ कर सकूं?
भागीरथी और भिलंगना के संगम पर गढ़वाल के टिहरी नगर में सोवियत संघ की तकनीकी सहायता से बांध निर्माण करके जल विद्युत परियोजना तैयार की गई, जैसे ही योजना की बारीकियां इस विषय से संबंधित कुछ लोगों के सामने आईं तभी वैज्ञानिक डॉ. वाल्दिया और भूगोलवेत्ता डॉ. नित्यानंद ने बांध के कारण बनने वाली विशाल झील से उत्पन्न खतरों से समाज को अवगत कराते हुए अपना विरोध व्यक्त किया था। केन्द्र सरकार में ऊर्जा सचिव रहे श्री टी.एन.शेषन (जो कालांतर में चुनाव आयुक्त बने) ने भी पर्वतीय क्षेत्र में ४००० फुट की ऊंचाई पर इतने बड़े बांध की सुरक्षितता पर प्रश्नचिह्न लगाया था। आंध्र के वैज्ञानिक डॉ. शिवाजी राव ने टिहरी बांध को टाइम बम बताते हुए एक पुस्तक प्रकाशित की।
वर्ष १९८३ ई. में प्रथम बार (भारत माता-गंगा माता) तथा वर्ष १९९५ ई. में दूसरी बार (भारत माता-गंगा माता-गऊ माता) के माध्यम से विश्व हिन्दू परिषद के तत्त्वावधान में विराट जन-जागरण किया गया था। इन जन जागरण अभियानों को एकात्मता यात्रा नाम दिया गया था। १९८३ ई. में देवोत्थान एकादशी से गीता जयंती तक सम्पन्न ३० दिवसीय एकात्मता यात्रा में तीन प्रमुख यात्राएं एवं ३५० उपयात्राएं थीं। देश के गांव-गांव में लगभग १० करोड़ लोगों तक सम्पर्क हुआ था और गंगा मां के प्रति परंपरा से चली आ रहे आस्था नं मूर्त रूप धारण किया था।
नवम्बर, १९९६ में दिल्ली में आयोजित सप्तम धर्मसंसद अधिवेेशन में मां गंगा की अविररलता, निरंतरता के लिए प्रस्ताव स्वीकार किया गया था।
प्रधान मंत्री श्री राजीव गांधी से मिल कर उन्हें गंगा की अवस्था के बारे में अवगत कराया गया। श्री राजीव गांधी जी ने कहा था कि वे गंगा की पवित्रता बनाए रखने के लिए एक विस्तृत योजना का प्रारूप तैयार कर रहे हैं, जिसके भविष्य में सुखद परिणाम आएंगे।
विश्व हिन्दू परिषद ने ‘गंगा रक्षा समिति’ बनाई। समिति ने यह निर्णय लिया कि गंगा की वस्तुस्थिति जानने के लिए गंगासागर से हरिद्वार तक मोटरबोट के द्वारा एक जलयात्रा की जाएगी और गंगा के दोनों तटों पर स्थित नगरों में गंगा रक्षा हेतु समाज को जागृत करने के लिए सभाएं करेंगे। गंगासागर से स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जी एवं श्री जीवेश्वर मिश्र ने मोटरबोट के द्वारा यात्रा प्रारम्भ की, लगभग २५ संत भी थे। बीस दिन की इस यात्रा के पश्चात जब जलयात्रा प्रयागराज पहुंची तो प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि हरिद्वार तक पहुंचने के लिए गंगा के प्रवाह में इतना जल नहीं है कि उसमें मोटरबोट चल सके, इसलिए हमारा आग्रह है कि आप इस यात्रा को यहीं विराम दें। जबकि मोटरबोट को चलने के लिए मात्र डेढ़ मीटर गहरे जल की ही आवश्यकता थी। यात्रा को प्रयागराज में ही विराम देने का निर्णय लेना पड़। २५०० कि.मी. लम्बी गंगा की वस्तुस्थिति को समझने का इससे अच्छा कोई प्रयास नहीं हो सकता था।
हरिद्वार से दिल्ली तक पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज के नेतृत्व में गंगा रक्षा यात्रा निकाली गई। यात्रा की पूर्णता के बाद गंगा रक्षा समिति का एक प्रतिनिधि मंडल टिहरी बांध के निर्माण को रोकने के लिए तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला था। परंतु वार्तालाप सार्थक न रही। उस समय के ऊर्जा मंत्री श्री कुमार मंगलम ने दो टूक कहा था कि यदि बांध निर्माण से गंगाजल की गुणवत्ता प्रभावित होती होगी तो यह बांध नहीं बनेगा।
टिहरी बांध के विरुद्ध पनप रहे जनाक्रोश के देखते हुए रूड़की विश्वविद्यालय ने एक सेमिनार का आयोजन किया, जिसमें विभिन्न विधाओं के देश के ख्यातिनाम वैज्ञानिक सम्मिलित हुए। अनेक वैज्ञानिकों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से अपने विचार व्यक्त किए। श्री अशोक जी सिहल ने एक मिनरल वॉटर की बोतल सबको दिखाते हुए प्रश्न किया था कि वैज्ञानिक तरीके से शुद्ध किए गए जल की इस बोतल पर उपयोग की अंतिम तिथि यानि एक्सपायरी डेट ६ माह लिखी है परन्तु गंगाजल के उपयोगिता की कोई अंतिम तिथि निश्चित नहीं है, क्योंकि वह वर्षानुवर्ष तक शुद्ध बना रहता है, गंगाजल में यह आत्मशुद्धि का जो स्वाभाविक गुण है क्या इसके ऊपर देश में कोई शोध हुआ है? सभी का उत्तर नकारात्मक था। इस सेमिनार में दो निष्कर्ष मुख्य रूप से सामने आए-
१. भूकम्प से टिहरी बांध को कोई खतरा नहीं है।
२. गंगा के आत्मशुद्धि के गुण पर कोई वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक भारत में नहीं हुआ।
प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से आग्रह किया गया कि भविष्य में किसी संभावित भूकम्प के कारण टिहरी बांध को होने वाले खतरे, उसके दुष्परिणाम तथा ऊंचे बांध के कारण बनने वाली झील में एकत्र गंगाजल की गुणवत्ता पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ेगा या नहीं, यह जानने के लिए एक विशेषज्ञ जांच समिति का गठन करें। डॉ. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में और डॉ. माशेलकर के नेतृत्व में समिति का गठन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रधान मंत्री को सौंपी। रिपोर्ट के निष्कर्षों से देश अभी तक अनभिज्ञ हैं।
भारतीय संसद को एक याचिका प्रस्तुत की गई थी। संसदीय समिति में सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था। कि यह बांध बाढ़ नियंत्रण एवं गंगा में जलधारा का प्रवाह बनाने के लिए बनाया जा रहा है तथा वर्षाकाल मेें ही वर्षा के जल से इस बांध को भरा जाएगा।
गंगा रक्षा के लिए विभिन्न संगठनों के जो अलग-अलग प्रयास हो रहे हैं उन सभी को एक मंच पर लाने के लिए स्वामी रामदेव जी के नेतृत्व में गंगा रक्षा मंच का निर्माण किया गया। सभी जिला केन्द्रों पर प्रदर्शन कर जिलाधिकारी को पंचसूत्री मांगों का ज्ञापन दिया गया। गंगा रक्षा के विषय को इस कार्यक्रम ने अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। एक प्रतिनिधि मंडल प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी से मिला और अपनी पंचसूत्रीय मांगों के संदर्भ में तत्काल कार्यवाही करने का निवेदन किया। वार्ता के दौरान प्रधान मंत्री जी ने कहा कि हम गंगा के संबंध में एक बड़ी योजना बनाने का विचार कर रहे हैं। प्रतिनिधि मंडल ने प्रधान मंत्री से डॉ. मुरली मनोहर जोशी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि टिहरी बांध ने जो गंगा को बांध दिया है उसकी निर्बाध अविरलता के लिए गंगा की एक धारा झील के पिछले बिंदु से निकाल कर बांध को लांघते हुए गंगा में मिला दी जाए तो गंगा का प्रवाह निर्बाध बना रहेगा। गंगा के निर्बाध प्रवाह को बनाए रखने के इस अतिरिक्त कार्य पर लगभग ४०० करोड़ रूपया खर्च हो सकता है। प्रधान मंत्री जी ने कहा था कि गंगा की अविरलता व निर्मलता के लिए हम धन की कमी नहीं आने देंगे।
ज्ञापन की प्रमुख मांगें
१. गंगा को राष्ट्रीय नदी/धरोहर घोषित किया जाए और गंगा का संरक्षण और सम्मान अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान वैधानिक दृष्टि से किया जाए।
२. गंगा रक्षा के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर एक सक्षम गंगा रक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाए जिसमें भूकम्प, जल, पर्यावरण, मृदा आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ एवं गंगा से जुड़े राज्य सरकारों के प्रतिनिधि और साधु संत व गंगा से जीवन पाने वाले मल्लाह और किसानों के प्रतिनिधि सम्मिलित किए जाएं।
३. गंगा की निर्बाधता एवं अविरलता के संबंध में पं. मदनमोहन मालवीय जी के साथ अंग्रेज सरकार के समझौते का पालन किया जाए, जौ वैधानिक दृष्टि से आज भी मान्य है।
भैरों घाटी, लोहारी नागपाला, पाला मनेरी जल विद्युत परियोजनाओं से गंगा की अविरलता और निर्मलता को पहुंच रही क्षति को ध्यान में रख कर इन योजनाओं को निरस्त कराने के लिए ऊर्जा मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे से गंगा रक्षा मंच का एक प्रतिनिधि मंडल मिला था।
परियोजनाओं के कारण प्रभावित हो रही गंगा की वस्तुस्थिति को समझने के लिए विभिन्न अखाड़ों के महंत, वरिष्ठ संत-महात्मा लोहारी नागपाला गए थे और वहां का दृश्य देखकर सभी आक्रोशित होकर लौटे।
हरिद्वार पूर्णकुम्भ-२०१० में गंगा रक्षा का विषय प्रधान रूप से चर्चा में रहा। दिनांक ५ अप्रैल, २०१० को कुम्भ में एक विराट संत सम्मेलन में गंगा की अविरलता और निर्मलता को ध्यान में रख कर यह निर्णय लिया गया कि ९ अप्रेल, २०१० को प्रात: ९ बजे से लेकर १ बजे तक कुम्भ के सभी शिविरों के कार्यक्रम स्थगित और शिविरों में स्थापित भगवान के कपाट बंद रहेंगे। यह कुम्भ के इतिहास में अद्वितीय घटना थी।
गंगा रक्षा मंच की ओर से हरिद्वार में शंकराचार्य चौक पर स्वामी रामदेव जी और स्वामी सत्यामित्रानंद गिरि जी के नेतृत्व में एक विशाल धरने का आयोजन किया गया। जिसमें सैंकड़ों संतों और हजारों भक्तों ने भाग लिया और जिलाधिकारी को ज्ञापन प्रेषित किया था।
रामसेतु रक्षा
१. भारत के दक्षिणी छोर में रामेश्वरम् के निकट स्थित धनुशकोटि से श्रीलंका तक प्रभु श्रीराम की वानर सेना ने नल व नील के मार्गदर्शन में, समुद्र पर एक सेतु का निर्माण किया था। भारत के प्राचीन ग्रंथों में इसी को सेतुबंध रामेश्वरम् लिखा गया है। अंग्रेजों द्वारा लिखी गई पुस्तकों में इसी को ‘रामार सेतु’ अथवा ‘एडम्स ब्रिज’ लिखा गया है।
२. अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था ‘नासा’ तथा भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था ‘इसरो’ ने इस सेतु के चित्र प्रकाशित किए हैं।
३. रामसेतु को बीच में से ३०० मीटर चौड़ा तथा १२ मीटर गहरा तोड़ कर समुद्र में नहर निर्माण की ‘सेतु समुद्रम नहर पारियोजना’ भारत सरकार ने घोषित की।
४. २ जुलाई, २००५ को भारत के प्रधान मंत्री ने इस परियोजना का उद्घाटन किया।
आंदोलन का क्रमिक विकास
संतों ने प्रधान मंत्री जी से निवेदन किया कि वे कोई वैकल्पिक मार्ग खोजें ताकि समुद्र में नहर भी बन जाए और रामसेतु को भी न तोड़ना पड़े। प्रधान मंत्री ने श्री टी.आर. बालू से भेंट करने की सलाह दी, उन्होंने तो रामसेतु के अस्तित्व को ही नकार दिया।
सम्पूर्ण भारत में हस्ताक्षर अभियान हुआ। ३६ लाख हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन २७ सितम्बर,२००६ को महामहिम राष्ट्रपति महोदय को सौंपा गया।
दिसम्बर, २००६ में रामनाथपुरम की जिला अदालत में सिविल वाद दायर करके रामसेतु का पुरातात्विक स्मारक घोषित करने की मांग की गई।
१८ मार्च, २००७ को तमिलनाडु के रामनाथपुरम, कस्बे में, १८ अप्रैल, २००७ को रामेश्वरम् में ५,००० लोगों की ‘रामसेतु रक्षा संकल्प सभा’, १३ मई, २००७ को दिल्ली में सभा हुई जिसमें लगभग ५,००० लोग उपस्थित थे। २७ मई, २००७ को रामलीला मैदान, दिल्ली मेंे सभा हुई जिसमें ५०,००० लोगों के अतिरिक्त ५०० संत भी उपस्थित थे।
जून, २००७ में डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी एवं हिन्दू मुन्नानी (तमिलनाडु) के संस्थापक रामगोपालन जी ने चेन्नई उच्च न्यायालय में रामसेतु की रक्षा के लिए याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने चेन्नई हाईकोर्ट सेे परियोजना संबंधित सभी याचिकाओं को अपने यहां मंगवा लिया।
२२ जुलाई, २००७ को मदुरै में एक विशाल जनसभा हुई, ४०,००० से अधिक लोग उस्थित थे।
२५-२६ जुलाई, २००७ को रामलीला मैदान, दिल्ली मे धर्मसंंसद हुई, ४,००० संत उपस्थित हुए।
१२ अगस्त, २००७ को सम्पूर्ण देश मंें १६०० स्थानों पर धरना, उपवास, यज्ञ के कार्यक्रम हुए।
२६ अगस्त, २००७ को ‘चलो रामेश्वरम्’ का नारा दिया गया, ४०,००० रामभक्त रामेश्वरम् पहुंचे।
रक्षाबंधन को देश के लाखों लोगोें ने ‘रामसेतु रक्षा सूत्र‘ बांधकर सेतु रक्षा का संकल्प लिया।
भारत सरकार द्वारा गोपनीय तरीके से रोमसेतु को डायनामाइट से उड़ाने की योजना का खुलासा हुआ तो सर्वोच्च न्यायालय में ३१ अगस्त, २००७ को एक याचिका दायर की गई और उसी दिन माननीय न्यायालय ने १४ सितम्बर तक रामसेतु को किसी भी प्रकार से क्षतिग्रस्त किए जाने के विरुद्ध स्थगनादेश दे दिया।
१० सितम्बर, २००७ को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय (ए.एस.आई.) ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर कहा कि ‘राम के अस्तित्व को प्रमाणित करने के कोई साक्ष्य नहीं हैं।’ उन्होंने ‘रामायण एवं उसके पात्रों को कपोल-कल्पित बताया।‘ देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
१२ सितम्बर, २००७ को प्रात: ८ से ११ बजे तक देशव्यापी चक्काजाम किया गया।
सरकार ने कोर्ट में दाखिल अपना हलफनामा वापस ले लिया।
अक्टूबर २००७ में केन्द्र सरकार ने सेतु समुद्रम् परियोजना की समीक्षा करने के लिए एक दस सदस्यीय समीक्षा समिति के गठन की घोषणा की।
२० नवम्बर देवोत्थानी एकादशी से २० दिसम्बर, २००७ गीता जयंती तक सम्पूर्ण देश में १,००० रामसेतु शिला यात्राओंं द्वारा ग्रामों में जन जागरण किया गया।
३० दिसम्बर, २००७ रविवार को स्वर्ण जयन्ती (जापानी) पार्क, रोहिणी नई दिल्ली में ऐतिहासिक महासम्मेलन सम्पन्न हुआ। देशभर से दस लाख रामभक्त दिल्ली पहुंचे।
परिणाम भी सामने आया कि सरकार नहर परियोजना के लिए वैकल्पिक मार्ग खोजने को तैयार हुई। रामसेतु तोड़े जाने से बच गया।

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