आधुनिक ऋषि

कॉलेज में था तब धनंजय कीर लिखित स्वातंत्र्यवीर सावरकर का चरित्र पढ़ा था। उसमें यह जिक्र था कि सावरकर की स्वास्थ्य जांच के लिए डॉ. साठे और डॉ. गोाडबोले जाया करते थे। मुझे तब लगा कि सावरकर से इतनी नजदिकी रखने वाला व्यक्ति कितना भाग्यशाली होगा। सावरकर का अलौकिक त्याग, देश की स्वाधीनता के लिए उनके कष्टों, अंडमान की जेल में वहां की कैदियों को साक्षर बनाने के लिए किए गए उनके प्रयासों, वहां का ग्रंथालय, सामाजिक सुधारों के लिए उनका आग्रह, उनके वैज्ञानिक द़ृष्टिकोण पर आधारित निबंध, उनकी भावविभोर करने वाली कविताएु और मास्टर दीनानाथ द्वारा गाये उनके तेजस्वी नाट्यगीत आदि अनेक कारणों से तब सावरकर के बारे में आकर्षण था। इस तरह के अलौकिक पुरुष का स्वास्थ्य जांच के कारण ही क्यों न हो, परंतु उनसे सदा मिलने वाले, सहज बात करने वाले डॉ. अरविंद गोडबोले के भाग्य के बारे में कौतुक उभरे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। धनंजय कीर के चरित्र में ये सारी बातें आई थीं और वे मन में काफी घर कर रह गईं।

बाद में मैं हमारे डोंबिवली गांव में ही रहने वाले विख्यात मराठी साहित्यिक पु. भा. भावे के पास आने‡जाने लगा। उनसे और चाची से याने प्रभावती भावे से बात करते समय कभी कभी डॉ. भावे की भी चर्चा होती थी। डॉ. भावे यानी पु. भा. भावे के छोटे भाई। वे फार्माकालॉजी के प्राध्यापक थेा उसी विषय में पीएच.डी. के लिए वे इंग्लैण्ड गए थे। मेडिकल कॉलेज में वे फार्माकालॉजी पढ़ाते थे। उनके बारे में भावे चाचा से बात हो तो अनायास डॉ. अरविंद गोडबोले का नाम भी सामने आता था। ध्यान में आता था कि भावे चाचा और भावे चाची दोनों डॉ. गोडबोले का नाम बड़े सम्मान और आदर से लेते थे। बाद में पता चला कि वे डॉ. भावे के प्रिय छात्र थे। डॉ. भावे को जब दिल का दौरा पड़ा तब उन्होंने अरविंद गोडबोले को ही बुलाने के लिए कहा था, यह भावे चाची बताया करती थी। ये डॉ. गोडबोले वही होंगे जिसका धनंजय कीर की किताब में जिक्र आया है, ऐसा मुझे लगता था। एक दिन मैंने भावे चाची को इस बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘एकदम सही। वही है।’ यह बताते समय भावे चाची का चेहरा एकदम स्नेहमयी और आदरयुक्त भाव लिए था।

बाद में मैं ‘महाराष्ट्र टाइम्स’ में उपसम्पादक बन गया। वहां एक दिन एक सज्जन को देखा। हाथ में ब्राउन पेपर की कवर वाली पत्रिकाएं और पुस्तकें हाथ में लिए, एकदम टिपटॉप व्यक्तित्व के धनी, देखते ही उनकी अलग हस्ती महसूस होती थी। वे आए और उस समय के सहसम्पादक दि.वि.गोखले की केबिन में चले गए। कई दिनों बाद फिर आए और गोखले जी के साथ महाराष्ट्र टाइम्स के सम्पादक गोविंद तलवलकर के केबिन में गए। बाद में पता चला कि वे ही डॉ. अरविंद गोडबोले हैं। मन दफन यादें ताजा हो गईं और तय हुआ कि वे वही डॉ. गोडबोले हैं।

डॉ. गोडबोले का महाराष्ट्र टाइम्स में बीच बीच में आना‡ञाना होता ही था। लेकिन मेरा और उनका परिचय नहीं था। वैसा वह हो इसका भी कोई कारण नहीं था। लेकिन बाद में भावे चाचा बीमार हुए। उन्हें डोंबिवली के अस्पताल में भर्ती किया गया। एक दिन भावे चाची ने उनके स्वास्थ्य के बारे में एक चिट्ठी मुझे दी और कहा कि यह डॉ. गोडबोले को पहुंचा दें। उसे लेकर मैं डॉ. गोडबोले के माटुंगा स्थित कंसल्टिंग रूम में गया। वहां भारी भीड़ लगी हुई थी। लेकिन मैंने चिट्ठी अंदर पहुंचाई। तुरंत ही डॉ. गोडबोले दरवाजा खोल कर बाहर आए। मुझे अंदर बुलाया और चिट्ठी पढ़ी और चाची के लिए संदेशा दिया। वह मेरी और डॉ. गोडबोले की पहली मुलाकात थी।

दुर्भाग्य से पु.भा.भावे इस बीमारी में बच नहीं सके। उनके जाने के बाद पु.भा.भावे स्मृति समिति गठित हुई। बाद में मेरी और डॉ. गोडबोले की मुलाकातें लगातार होने लगीं। समिति के वे एक बड़े आधार स्तंभ थे। समिति ने कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन से लेकर प्रसिघ्द अर्थशास्त्री डॉ. स.ह. देशपांडे तक कई प्रसिध्द व्यक्तियों को भावे स्मिृत दिवस पर निमंत्रित किया। उन सभी से सहजता से संवाद स्थापित करने वाले व्यक्ति डॉ. गोडबोले ही थे। उनका विभिन्न विषयों का अच्छा अध्ययन था। वे स्वयं प्रसिध्द मधुमेह विशेषज्ञ थे। मधुमेह पर उन्होंने भरपूर लेखन किया। लेकिन इसके अलावा भी उन्होंने विचारगर्भित और सशक्त लेखन किया। फिलहाल जेरेंटॉलॉजी अथवा जेरेटिक्स शब्द बारबार सुनाई देते हैं। जब ये शब्द आज जैसे प्रचलिन नहीं थे या चिकित्सा विज्ञान की ये शाखाएं भी हो सकती हैं इसकी लोगों को जानकारी तक नहीं थी तब डॉ. गोडबोले ने मराठी में वृध्द और उनकी समस्याओं पर ग्रंथ लिखा। समर्थ रामदास ने कहा है, ‘अभ्यासोनी प्रगटावे’ जिसका अर्थ है अध्ययनशील बने रहे। इसे चरितार्थ करते हुए उन्होंने सिक्खों के इतिहास का लेखन किया। गुरुनानक के दर्शन का गहन अध्ययन किया। सच पूछें तो हर बात को तात्विक दृष्टि से टटोलना उनका सहज स्वभाव था।

युवावस्था में ही उन्हें स्वातंत्र्यवीर सावरकर का सानिध्य मिला। उनके व्यक्तित्व की अमिट छाव उनके मन पर थी। लेकिन इसमें सावरकर की वैज्ञानिक दृष्टि की छवि अधिक थी। इसी कारण चिकित्सा विज्ञान में क्या परिवर्तन हो रहे हैं उन्हें वे जान लेते थे और अपने को आधुनिक बनाए रखते थे। चिकित्सा विज्ञान ही नहीं, विज्ञान की अन्य शाखाओं की ओर भी उनकी दृष्टि होती थी और नए‡नए परिवर्तनों की जानकारी उनके पास होती थी। कृष्ण विवर और विश्व के बारे में मूलभूत अनुसंधान करने वाले स्टिफन हॉकिंग का चरित्र वे लिखना चाहते थे और उसकी तैयारी शुरू कर दी थी। केवल इस बात से ही यह पता चल जाता है कि उन्हें विज्ञान की सभी शाखाओं में किस तरह रुचि थी। वे सोचते थे कि हमारा क्षण अच्छे काम में लगे, हर क्षण का उपयोग हमारे ज्ञान में वृध्दि के लिए हो, हर रोज हमें नया कुछ सीखना चाहिए और अपनी जानकारी व ज्ञान की कक्षाएं व्यापक बनानी चाहिए। इसी कारण मुंबई की एशियाटिक सोसायटी डॉ. गोडबोले का प्रिय स्थान थी। वे वहां के ग्रंथ प्रेमियों में रम जाते थें। वे मानते थे कि अखंड ज्ञानार्जन ही सफलता का मार्ग है। वे सारी आयु इसी तरह जीते रहे।

हमें जो ज्ञात है, जो समझा है या जिसका अनुभव किया है उसे अन्य को बताने के इरादे से ही उन्होंने सावरकर के वैचारिक विश्व को तलाशने वाली और छोटे बच्चों को हमारी संस्कृति के अलग‡अलग पहलुओं को खोलने वाली किताब लिखी। छोटे बच्चों के लिए लिखना वैसा भी कठिन काम है। इसके लिए भाषा बहुत सरल रखनी होती है। भाषा को इसी तरह रख कर विषय और आशय पेश करना कौशल का काम होता है। कई लोगों को इसमें से एकाध हिस्सा ही जमता है। सरल भाषा, आशय बड़ा और विषय पर अविवास्पद प्रभुत्व ये तीनों बातें बहुत कम लेखक निभा पाते हैं। क्योंकि इसके लिए मन को लचीला रखना पड़ता है। नया ग्रहण करने की, उस पर चिंतन और मनन करने की मन की क्षमता जरूरी होती है। भावुकता का प्रदर्शन न करते हुए मन की संवेदनशीलता बनाए रखनी होती है। डॉ. अरविंद गोडबोले ने यह सहज साध्य कर लिया था। उन्हें देखने पर उनके मन की संवेदनशीलता का तुरंत अनुमान नहीं हो पाता था, लेकिन पु. भा. भावे गए तब उनका चेहरा निरंतर पसीने से तरबतर होते मैंने देखा है। आंखें ही नहीं, पूरा चेहरा दु:ख प्रकट कर रहा था।

डॉ. राजाभाऊ के बारे में भी वे इसी तरह भावुक हो जाते थे। (‘अंतर्नाद’ नामक एक मराठी पत्रिका में उन्होंने अपनी बीमारी के बहाने एक लेख लिखा था। अपने प्रति कितनी तटस्थता से देखा जा सकता है और अपनी कमियों का किस तरह खुला हिसाब रखा जा सकता है, इसका यह लेख एक मिसाल ही है!) डॉ. भावे एक बेहतरीन अध्यापक थे। वही गुण डॉ. अरविंद गोडबोले में भी आ गया था। ज्ञान प्राप्त करना और ज्ञान बांटना ऋषि के कर्तव्य माने जाते हैं। मुंबई विश्वविद्यालय की एम.डी. की परीक्षा में दो सुवर्ण पदक पाने वाले और बाद में इंग्लैण्ड के ग्लासगो व एडिंबरा में उच्च शिक्षा पाने वाले डॉ. गोडबोले ने इन दोनों बातों को निरंतर अपनाया था।

कुछ वर्ष पूर्व मैं केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एक संक्षिप्त पाठ्यक्रम के लिए गया था। तब उन्होंने तत्काल कहा था, ‘रॉय पोर्टर की किताब अवश्य पढ़ें। वह इस विषय की अच्छी किताब है। इसके चार दिनों बाद केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पाठ्यपुस्तकों की सूची प्राप्त हुई, जिसमें डॉ. गोडबोले की सुझाई किताब का नाम पहले था।

आयुर्विज्ञान में प्रसिध्दि पाने वाले डॉ अरविंद गोडबोले के पिता भी डॉक्टर ही थे। उनकी पत्नी भी डॉक्टर व पुत्र भी डॉक्टर ही हैं। उनका पोता भी मुंबई के जी. एस. मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई कर रहा है। (डॉ. गोडबोले मुंबई के जी. एस. मेडिकल कॉलेज में पढ़े, उनके पुत्र ने वहीं अध्ययन किया और अब उनका पोता भी वहीं पढ़ाई कर रहा है। तीन पीढ़ियों का यह संगम अनोखी बात है।) एक तरह से चिकित्सा व्यवसायच इस परिवार का धर्म बन गया है और डॉ. अरविंद गोडबोले उसी पर चलते रहे। अपने मरीज को अधिकाधिक समय देने और उनकी सभी शंकाओं का समाधान करने के लिए वे सदा तत्पर रहा करते थे। इसे ध्यान में रख कर ही उन्होंने मधुमेह, आहार, वृध्दत्व, औषधियां, स्वास्थ्य आदि पर पुस्तकें लिखीं।

केवल चिकित्सा विज्ञान को ही नहीं, कुल विज्ञान को ही धर्म मानने वाले, वैचारिक लेखन के प्रति आकर्षित होने वाले, जीवन के हर अंग को तात्विक दृष्टि से देखने वाले नर्म हृदयी डॉ अरविंद गोडबोले एक तरह से आधुनिक ऋषि ही थे। भावना की अपेक्षा बुध्दि पर, कल्पना की अपेक्षा यथार्थ पर और बोलने की अपेक्षा प्रत्यक्ष काम पर बल देने वाले डॉ अरविंद गोडबोले के निधन से एक प्रज्ञावान डॉक्टर हमारे बीच से उठ गया।

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