चंद्रपुर क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण

मेरे चंद्रपुर निर्वाचन क्षेत्र का चंद्रपुर शहर देश में सर्वाधिक प्रदूषण वाले शहरों की सूची में दूसरे नम्बर पर है। जिले के वरोरा, भद्रावती, वणी इलाकों में भी प्रदूषण के भयानक परिणाम दिखाई देने लगे हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के अति दोहन के कारण पर्यावरण प्रदूषण का संकट मानव जाति के समक्ष है। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की चर्चा आज सर्वत्र हो रही है और विश्व स्तर पर बैठकें कर उसके निवारण के उपाय खोजे जा रहे हैं। मानव ने अपनी जरूरतें हद से ज्यादा बढ़ा दी और उन्हें पूरा करने के लिए पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ने का प्रयास करने से आज हमें ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। पिछले कुछ दशकों से उपभोग, विलासिता को मनुष्य ने अधिक प्रश्रय दिया जिससे स्थिति अधिक कठिन हो गई है। इस बात के लिए स्थानीय से लेकर विश्व स्तर पर एक दूसरे पर दोषारोपण होता दिखाई दे रहा है।

पूरे विश्व में प्रदूषण ने कहर ढा दिया है और ध्वनि, अवकाश और जल प्रदूषण से मानव का अस्तित्व ही दांव पर लग गया है। स्वाधीनता के बाद देश में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के प्रयास हुए इसमें गलत कुछ नहीं है। लेकिन हम देश की आवश्यकताओं की पहचान न कर पश्चिम का अंधानुकरण करते रहे, जिससे आज हमारे सामने समस्याएं खड़ी हो गई हैं। हमारे देश में कोयले के भंडार होने के कारण हम ताप बिजली परियोजनाएं चलाने की जिद पर डटे हुए हैं। ताप बिजली परियोजनाओं से भारी पैमाने पर पर्यावरण प्रदूषण होने पर भी औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण प्रदूषण को ही अधिक बढ़ा रहे हैं। इसकी न उद्योगों को चिंता और खेद है, न ही सरकार को।

चंद्रपुर लोकसभा क्षेत्र में प्रचंड मात्रा में प्रदूषण बढ़ने से समाज का स्वास्थ्य खतरे में पड़ गया है। पिछले कुछ वर्षों से विकास के नाम पर उद्योग व बिजली परियोजनाओं को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है। हमें जरूरत हो या न हो लेकिन औद्योगिक विकास के नाम पर जल, जमीन और जंगल को बड़े पैमाने पर नष्ट करने का षड्यंत्र ही मानो इस देश में चल रहा है। हमारे चंद्रपुर, गडचिरोली और यवतमाल जिलों में भारी पैमाने पर वन, खनिजों व जल सम्पदा उपलब्ध होने से सीमेंट, कोयला खानें, पेपर मिल, बिजली परियोजनाएं, फेरोमैग्नीज, स्टील एवं स्पांज आयर्न, लौह अयस्क के उद्योग बड़े पैमाने पर आ गए हैं। इससे जिले की जनता को प्रदूषण के परिणाम भोगने पड़ रहे हैं।

अमेरिका के अंतरिक्ष संगठन ‘नासा’ ने ओजोन निरीक्षण उपग्रह के माध्यम से ओजोन की परत के बारे में सर्वेक्षण कर ओजोन पोजीशन के छायाचित्र लिए। इस बारे में अमेरिका की एक वैज्ञानिक पत्रिका में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के अनेक शहरों पर नाइट्रोजन, कार्बन मोनो, कार्बन डायआक्साइड के बादल निर्माण हो गए हैं और इसमें चंद्रपुर शहर का भी समावेश है। वहां नाइट्रोजन आक्साइड के बादल बन जाते हैं वहां भविष्य में अम्लवर्षा का खतरा अधिक होता है। उद्योगों व्दारा पर्यावरण मानकों का पालन न करने से चंद्रपुर जैसे शहरों में अम्लवर्षा का खतरा पैदा हो गया है।

हम मानते हैं कि नदी तटों पर हमारी संस्कृति विकसित हुई। देश के प्रमुख तीर्थस्थल नदी के तीरों पर ही हैं। एक तरह से हम हमारी सांस्कृतिक एकता का द्योतक मान सकते हैं। लेकिन आज देश की सभी नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं। हमारी आस्था की प्रतीक गंगा, यमुना, नर्मदा समेत स्थानीय स्तर पर ‘लोकमाता’ कही जाने वाली स्थानीय नदियां उद्योगों से आने वालें रसायनमिश्रित दूषित जल से प्रदूषित हो गई हैं। इनमें से कई नदियों का पानी तो पीने लायक नहीं रहा है। उद्योगों के लिए पानी के अधिक उठाव और गंदे पानी को नदियों में छोड़ने तथा बढ़ते खान कार्य के कारण नदियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। इससे परम्परागत उद्योगों और सिंचाई पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। हमारे यहां की वर्धा, उमा, झरपट, वैनगंगा ये नदियां प्रदूषित हो गई हैं और इस क्षेत्र की कोयला खानों ने अपने ओपन कास्ट खान से निकले ओ.बी. डम्प को नदियों के तटों पर डम्प किया है। इससे नदियों के किनारे संकरे हो गए हैं और ‘कृत्रिम बाढ़’ की स्थिति पैदा हो गई है। केंद्र और राज्य सरकार ने वर्धा नदी के तट पर 25 से अधिक बिजली परियोजनाओं को अनुमति दी है। इससे भविष्य में वर्धा नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। नदी प्रदूषित होने से सिंचाई व पेय जल के लिए पानी देना मुश्किल हो रहा है। जल प्रदूषित होने से नदियों में जलचर विविधता नष्ट हो रही है और जलचरों पर आधारित मत्स्यव्यवसाय के संकट में पड़ने का खतरा है। इसके अलावा जल प्रदूषण से जल संक्रमित रोग बड़े पैमाने पर फैल रहे हैं। इन रोगों से मानव के साथ पशु भी पीड़ित हो रहे हैं। राज्य के प्रसिध्द ताड़ोबा अंधारी अभयारण्य में भी इसका वन्य प्राणियों पर प्रभाव दिखाई पड़ रहा है। बढ़ते प्रदूषण का पक्षियों पर भी असर पड़ा है और उनकी संख्या में कमी आई है। कुछ विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए हैं। महाराष्ट्र राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल के राष्ट्रीय जल निगरानी कार्यक्रम के अंतर्गत हर माह नदी जल की जांच करना अनिवार्य है। मंडल इसका पूरी तरह अनुपालन नहीं करता और इस कारण उद्योगों की बन आई है तथा नदियां अधिक प्रदूषित हो रही हैं। इसका असर आम लोगों पर पड़ रहा है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल की एक रिपोर्ट के अनुसार चंद्रपुर जिले के 130 उद्योग अति प्रदूषण फैला रहे हैं। प्रदूषण करने वाले इन उद्योगों व्दारा मानकों की अवहेलना के बावजूद इन उद्योगों पर कार्रवाई न होने से जिले में प्रदूषण बेहद बढ़ रहा है। यहां निरंतर बढ़ने वाला तापमान, प्रदूषण से होने वाले श्वसनरोग, चर्मरोग और अन्य संक्रामक रोगों में सतत होने वाली वृध्दि के कारण भविष्य की पीढ़ी का स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए प्रदूषण पर तुरंत नियंत्रण करने की आवश्यकता है। चंद्रपुर, गडचिरोली व यवतमाल जिलों में भरपूर खनिज सम्पदा पर आधारित उद्योग आरंभ करने केंद्र व राज्य सरकार की जिद के कारण यहां की जनता को प्रदूषण की भीषण खतरा झेलना पड़ रहा है। चंद्रपुर, वणी इलाकों में कोयले पर आधारित बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन केंद्र और लौह अयस्क पर आधारित उद्योग आरंभ करने के लिए केंद्र व राज्य सरकार ने अनुमति देने में तेजी लाई है, जिससे भविष्य में यहां केवल प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों का साम्राज्य ही स्थापित होगा। इससे लोगों का जीवन खतरे में पड़ने वाला है। राज्य सरकार ने विदर्भ को उपनिवेश मान कर उसका उपयोग किया है। इस इलाके में कोयला, लाइम स्टोन, लौह अयस्क आदि खनिजों का भंडार होने से प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को अनुमति देकर इस इलाके के स्वास्थ्यकर जीवन जीने पर ही सरकार ने प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

केंद्र व राज्य सरकार ने इस इलाके की जनता की इच्छाओं, आकांक्षाओं का ध्यान न रख अडियल तरीके से जनता की भावनाओं को कुचलने का प्रयास कर इस इलाके की जनता से दोयम नागरिक की तरह बर्ताव किया जा रहा है। घर में कचरा रखने की जगह जिस तरह होती है उसी तरह जनता से खिलवाड़ करने वाले प्रदूषणकारी उद्योगों को अनुमति देकर सरकार इस क्षेत्र का कचराघर के रूप में इस्तेमाल कर रही है। यही नहीं, इलाके की जनता के विरोध को तवज्जो न देकर बार‡बार प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को अनुमति दी जा रही है। इसे देख कर जनता से चतुर्थ श्रेणी का बर्ताव करने की भावना बलवती होती जा रही है। जिले के प्रदूषणकारी उद्योगों के कारण नवजात को भी सांस लेना दूभर हो रहा है। संक्रामक रोगों के फैलने, जल, जमीन व जंगल पर होने वाले दुष्परिणामों के कारण भविष्य में इस क्षेत्र में जीवन को ही खतरा पैदा होने वाला है। इन सारी बातों की केंद्र व राज्य सरकारों को जानकारी देने के बावजूद प्रदूषणकारी उद्योगों को अनुमति दी जाना अंग्रेजों की काले पानी की सजा की तरह ही है।
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