पर्यावरण संरक्षण : भारतीय दृष्टिकोण

पर्यावरण का संकट आज जब विश्व के सामने गहराता जा रहा है, तब विद्वज्जनों को उसकी चिन्ता सता रही है। यह चिन्ता सर्वव्यापी नहीं है और न सब गंभीरतापूर्वक इस विषय पर चिन्तन तथा विचारमंथन कर रहे हैं। इस कारण समस्या का कोई समाधानकारक सार्थक प्रयास नहीं हो रहा है। सम्पन्न तथा सुविधाभोगी अपने वर्चस्व तथा गरिमा को तनिक भी दूसरे के सामने कम होने नहीं देना चाहते। इस कारण मात्र औपचारिक चर्चा भर हो रही है। जो पिछड़े हैं या दूसरे-तीसरे स्थान पर है वे आगे बढ़ने की होड़ में औचित्य का विचार करने को तैयार नहीं। जो बहुत पीछे हैं वे मतिभ्रम के कारण पर्यावरण संतुलन बिगाड़ने वाले कारकों को प्रगति का कारण मानते हैं। इन सब के पीछे का कारण है पर्यावरण संकट के प्रति आन्तरिक चेतना की उदासीनता और तत्कालिक लाभ पाने के प्रति तीव्र जागरूकता।

पर्यावरण-चेतना के प्रति उदासीनता के पीछे विकासशील देशों में आने और बढ़ने वाला दोष है अपने संस्कारों के प्रति उपेक्षा का भाव, परानुकरण जो हीन भावना के कारण अपने को प्रगत बताने के लिए सत्य की ओर से आंख बंद करके अपनी बातों को छोड़कर दूसरों की नकल वह भी आवश्यकता से सामंजस्य बैठाये बिना। अपनी हर सही बात छोड़ने की मानसिकता ही ऐसी विकृति उत्पन्न करती है जो सहज विनाश का कारण बनती है। पश्चिमी दुनिया के लोग, जिस बात और व्यवहार को हानिकारक मानकर छोड़ रहे हैं उनको भी ऐसे लोग हर्ष से अपना रहे हैं, मानो वह ही उनके जीवन को उन्नति के शिखर पर पहुँचायेगा। परन्तु वे बातें उनके विनाश का कारण बनती हैं। तत्काल प्रत्येक व्यक्ति पर सीधा प्रभाव न देखने के कारण इसे समझाना कठिन होता है। अन्य जीवों का जीवन मनुष्य की तुलना में छोटा होने के कारण उन पर प्रभाव का अध्ययन सरल होता है। परन्तु प्रभाव दीर्घजीवी प्राणियों पर भी होता है। प्रकृति तथा परिस्थिति से उचित सामंजस्य नहीं बैठा पाने के कारण सैंकड़ों वर्ष की आयु वाले प्राणी अब धरती पर नहीं बचे।

वर्तमान युग में विज्ञान की प्रगति और भौतिकतावादी चकाचौंध तथा सुविधावादी वृत्ति के बढ़ने के कारण सामान्यत: मनुष्य अपनी मानवीय शक्ति, सामर्थ्य, भावना तथा भविष्य के प्रति उदासीन होता जा रहा है। सभी शोधकर्ता और अनुसंधानकर्ता, उन्हें जो काम दे रहा है, सुविधा तथा धन दे रहा है उसके प्रति व्यावसायिक दृष्टि से वे कार्य कर रहे हैं। आज का संवाद-माध्यम भी विज्ञापन की होड़ में इसे पूरी तरह से नष्ट करने में पीछे नहीं इस कारण श्रेयकारी चर्चा के स्थान पर प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। एक या कुछ व्यक्ति नहीं, बहुत बड़ा वर्ग तथा देश एक साथ इसी दिशा में कार्य कर रहे हैं और कहते हैं क्या मैं इस विनाश के लिए उत्तरदायी हूँ?

आज वायुमण्डल का ताप बढ़ रहा है। वायु की संरचना में घातक तत्त्वों का अनुपात बढ़ रहा है। रासायनिक खाद तथा औद्योगिक केन्द्रों के हानिकारक अपशिष्ट के कारण धरती के गुण बदल रहे हैं। वर्षा का पानी उन्हें सोखते हुए पुन: धरती में समाता है तो कुएँ तालाब का पानी विकृत होता जा रहा है। कुछ दिन पूर्व अच्छे पानी के जल स्रोत फ्लोराइड या अन्यान्य दोषों से विकृत होकर हानिकारक बन रहे हैं।

शासनारूढ़ सत्तादल बहुसंख्यक समाज को, जो गंभीरतापूर्वक दीर्घगामी दुषप्रभावों पर विचार नहीं कर पाता, मनभावन लुभावने वादों से प्रभावित करने की दिशा में ही लगा रहता है। इस कारण पर्यावरण शुद्धि की बात केवल हवाई चर्चा मात्र होती है। अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों की गोष्ठी भी वाग्विलास की वस्तु बन रही है क्योंकि उनके सुझावों के क्रियान्वयन की ओर सक्रियता, प्रतिबद्धता और निष्ठा किसी भी देश में नहीं है। तब पर्यावरण संकट का प्रभावपूर्ण निराकरण संभव कैसे हो सकता है?

ऐसी स्थिति में सामाजिक चेतना द्वारा ही समस्या के निदान के प्रयास संभव हैं। किसी देश में शासन ने विश्व व्यापार संगठन के दबाव में विदेशी कम्पनियों को व्यापार की छूट दी हो किन्तु उस देश के नागरिकों ने यदि उन वस्तुओं के बहिष्कार का निर्णय लिया तो उस कम्पनी को स्वत: ही वापिस जाना पड़ेगा।

भारतेतर विश्व की सभी संस्कृति एवं सभ्यताओं में प्रकृति को निर्जीव तथा मनुष्य के उपयोग के लिए माना जाता है। इसके कारण पश्चिम में पेंड़ों का विनाश किया। खनिज पदार्थों के खनन में भी सीमाओं का ध्यान नहीं रखा। इस कारण ऊर्जा संकट भी सामने विकराल रूप ले रहा है। वनस्पतियों की कमी के कारण श्वसन के लिए उपयुक्त और पर्याप्त शुद्ध वायु का संकट उत्पन्न हो रहा है। रासायनिक द्रव्यों के अपशिष्टों से धरती, जल तथा वात (गैस) के कारण तापमान वृद्धि, ओजोन परत में छिद्र आदि होता जा रहा है। पाश्चात्य जगत के द्वारा इसका निराकरण होना संभव नहीं।

भारतीय संस्कृति में प्रकृति को परमेश्वर की शक्ति के रूप में आंका गया है। प्रकृति से खिलवाड़ या उपेक्षा विनाश का कारण बनेगी। अतिभौतिकतावादी दृष्टिकोण भारत में मान्य नहीं तथापि भौतिकता की उपेक्षा भी नहीं है। देश की धरती को ‘अन्नवतां मोदनवतां’ आदि विशेषणों से संयुक्त किया गया है। ‘मोदनवतां’ कहते ही आनन्द और सुख की सामग्री की प्रचुरता की अपेक्षा है। इस हेतु पुरुषार्थ तथा प्रकृति दोनों में परस्पर श्रेष्ठता, पवित्रता तथा आत्मीयता का भाव है। ‘माता पृथ्वी पुत्रोऽहं पृथिव्या:’ कहा है धरती को ‘विष्णुपत्नी’ कहा है। साथ ही ‘वीर भोग्य्रा वसुन्धरा’ भी कहा है अर्थात् अकर्मण्यता, निष्क्रियता भारतीय संस्कृति में अपेक्षित नहीं। किन्तु अतिभौतिकता की ओर मनुष्य उन्मुख न हो इसलिए ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत्, तेन त्यक्तेन भुंजीथा: मा गृध: कस्यस्विद्धनम्’ भी कहा है।

यह बात सूत्रों या विद्वानों के बीच तक न रह जायें इसलिए इसे लोकव्यापी बनाया गया है। चार प्रकार के प्राणियों (जरायुज, अण्डज, स्वेदज एवं उद्भिज) में समस्त वनस्पतियाँ उद्भिज श्रेणी की हैं। इनमें प्राण है। ये अचर जीव श्रेणी में है। वर्तमान विज्ञान में प्राणिशास्त्र और आणविक प्राणिशास्त्र (माइक्रो बायबाजी) विषय विकसित किये गये हैं। इन्हें अकारण कष्ट पहुंचाना तोड़ना आदि निषेध है। रात्रि में विशेष रूप से पेड़ों के स्पर्श का वर्जन है। लोक व्यवहार में, वे रात्रि में सोते हैं, ऐसा कहा जाता है।

मनुष्य शरीर की संरचना यद्यपि ईश्वर ने मूलत: शाकाहारी बनाया है परन्तु वह अप्राकृत मांसाहार की ओर भी प्रवृत्त हो गया है। यह वैज्ञानिक शोधों से प्रमाणित हो चुका है कि मांसाहार से सैकड़ों असाध्य रोग उत्पन्न होते हैं। अण्डों का प्रयोग भी मांसाहार की श्रेणी में आता है। यह मांसाहार और अण्डों का प्रयोग अनपढ़ पिछड़े या मूर्ख ही नहीं, विद्वान और जानकार लोग, इसमें अग्रणी हैं। वैज्ञानिक और शोधकर्ता तथा ऐसे डाक्टर, जो मांसाहार तथा तम्बाखू के दुष्प्रभाव से लोगों को सचेत करते हैं, भी शामिल हैं।

भारतीय संस्कृति में अन्य उपाय भी अपनाये हैं। एक है श्रद्धा का निर्माण। वैसे तो आयुर्वेद के अनुसार एक भी वनस्पति विश्व में ऐसी नहीं है जिसका औषधीय प्रयोग न हो। जो अत्यधिक उपयोगी तथा सहज सुलभ है इन्हें देवताओं से सम्बन्धित कर दिया है ऐसे वृक्ष तथा पौधों में कुछ है- दूर्वा, तुलसी, पीपल, नीम, बरगद, बेल आदि। विशेष रूप से दूर्वा को गणेश से, तुलसी, विष्णु से, बेल शिव से नीम देवी से, पीपल तथा बट (बरगद) को विष्णु से तथा उनका ही माना जाता है। पुष्पों, जड़ों, फलों के साथ भी ऐसे संबंध है। दूसरा उपाय है, भय या घृणा का। हरे वृक्षों को काटना, रात्रि के समय पेड़ों को हिलाना, फूल या पत्ती तोड़ना, आवश्यकता से अधिक या अनावश्यक रूप से लोभ के कारण पेड़ों को कष्ट पहुँचाना पाप है। पेड़ काटना पुत्रहत्या के समान है। इसके साथ ही एक वृक्ष लगाना, उसका पोषण करना सौपुत्रों के समान कल्याणकारी माना गया है।
तुलसी को विष्णुप्रिया ही नहीं, लक्ष्मीस्वरूपा भी कहा गया है। बेल के वृक्ष को शिवस्वरूप बताया गया है। बिल्वष्टक में कहा गया है कि ‘मूलता ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपाय अग्रत: शिवरूपाय’ गीता में ‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम्’। पीपल में ब्रह्म का वास है तो एक श्लोक में वटस्य पत्रस्य पुटेसायानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि’। सफेद आक की जड़ में गणेश की प्रतिकृतिका निर्माण आदि वृक्षों के संरक्षण की प्रेरणा देता है। वृक्षों की पत्तियों के बन्दनवार आदि का प्रयोग वनस्पतियों से निकटता बढ़ाने में सहायक होता है। इसलिए इनके पोषण और सेवा का आग्रह किया गया है।

अनेक पर्वो में विशेष वृक्षों के पूजन तथा उनकी निकटता आवश्यक मानी जाती है। सोमवती अमावस्या, वट सावित्री व्रत, आवला नवमी आदि तथा सत्यनारायण कथा व्रतादि में कदली (केले) का, वन्दनवारी में आम, अशोक आदि के पत्रों का उपयोग, विजयादशमी पर शमीपत्र का बजलियां में बालों का आदान-प्रदान आदि की अपरिहार्यता के कारण वृक्षों का संरक्षण हिन्दू करता ही है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से इस सहज आस्था को आघात लगा है।

औषधीय प्रयोग के लिए वनस्पतियों को विशेष नक्षत्र में निमंत्रण देकर दूसरे दिन उनको लेना चाहिए तथा उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वे लोककल्याण के लिए प्राणियों की जीवन रक्षा में सहायक हों तभी उनसे पूर्ण लाभ प्राप्त होता है। स्पष्टत:, वनस्पतियों के संरक्षण में ये बातें सहायक होती रही हैं।

आज की आवश्यकता है कि हम अपनी परम्पराओं के प्रति निष्ठावान हों। उसको आज के संदर्भ के सात रहकर जब हम लोगों को बतायेंगे तब जो लोकचेतना जागृत होंगी वह अंधविश्वास की कथित दीवार को ही गिराकर मनुष्य के मन में जगी हुई भौतिकता की कामना पर भी अंकुश लगायेगी। संयम, संतुलन एवं सामंजस्य के सहारे पर्यावरण की रक्षा में प्रगति सार्थक तथा स्थायी होगी। यह ध्यान रखना होगा कि सामने वाले व्यक्ति की प्रवृत्ति तथा तथ्य को समझने की क्षमता के अनुरूप ही बात को रखा जाय। हमारी बात उसे बेझिल या परिहासपूर्ण एवं उपेक्षणीय न लगे।

ऐसे ही हमें प्रदूषण रोकने के विषय में भी सोचना चाहिए। खेतों में विभिन्न प्रकार के रासायनिक अपद्रव्य जो हानिकारक हैं उनका छिड़काव प्रतिबंधित होना चाहिए। ऐसे उद्योग जिनके रासायनिक अपद्रव्य मलामल आदि जो प्राणिमात्र के लिए हानिकारक हैं- उनका नगर, ग्राम बस्ती में उत्पेक्षण न हो और न नालों से होता हुआ नदी में जाय। अब आधुनिक रासायनिक खाद, औद्योगि केन्द्रों से निस्सारित अपद्रव्यों के कारण जल की मूल संरचना ही बदल रही है। फ्लूराइड आदि की समस्या तो अब ऐसे स्थानों में भी देखने में आ रही है। जहाँ का पानी पहिले अच्छा रहा है। इसलिये प्रत्येक स्तर पर प्रदूषण रोकने की बात चर्चा में आती है।

भारतीय जीवन पद्धति में जलाशय, नदी, तालाब, कूप, झरने आदि के निकट मल-मूत्र विसर्जन करना निषिद्ध रहता है, कम से कम 100 गज दूर करने को कहा है। हवा, वर्षा या अन्यान्य कारणों से भी ये पदार्थ तथा प्रदूषणकारी द्रव्य जलाशय में न पहुँच सकें।

नदियों के प्रति पवित्र भाव, श्रद्धा एवं मोक्षदायी भावना, उनके श्रेष्ठ गुणों की रक्षा की प्रेरणा भक्ति भावना के कारण सहज उत्पन्न होती है। गंगा का जल कभी खराब नहीं होता तथा उसका कीटाणुनाशक गुण तो विलक्षण है। अन्य पवित्र नदियों का जल वर्ष भर खराब नहीं होता, साधारण नदियों का जल सप्ताह भर खराब नहीं होता जबकि विश्व की अनेक नदियों का जल नदी से निकालने के 5-10 मिनट बाद ही खराब हो जाता है। ब्रिटिश काल में और स्वतंत्र भारत में इन नदियों की श्रेष्ठता नष्ट करने के प्रयास दूरगामी योजना से बने। नगर के नालों से मलमूत्र, चर्म तथा अन्य उद्योगों के निस्तारित पानी को, जो अत्यन्त हानिकारक हैं-सीधा ही नगर-ग्राम के पास जोड़ा गया और अब प्रदूषित गंगा जैसी बातों की चर्चा की जा रही है। आवश्यकता है ऐसे जनमल तथा अपद्रव्यों को नदी में सीधा न मिलाया जाये। जीवन की सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं भावों की पवित्रता के लिए सभी सुविधाओं का त्याग करना उचित है। ‘जी है तो जहान है’, की उक्ति ध्यान में रखना चाहिए। जैसे स्वतंत्रता की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का धन श्रेष्ठ भावना की महत्ता को प्रकट करता है।

वायुमण्डल में भी विकृतियां बढ़ रही है। औद्योगिक नगरियों में तो वर्षा के प्रारंभिक दिनों में अम्ल की वर्षा हो जाती है क्यों कि अम्लीय तत्त्व बाष्प रूप में वायुमण्डल में रहते हैं। आज कल तो दूरदर्शन पर वायु प्रदूषण के परिणाम नित्य घोषित होते हैं। परन्तु उनकी रोकथाम के प्रयास कम हो रहे है। जल तथा वायु को भारतीय जीवन में देवता रूप मानकर उनकी पूजा में सुगंधित श्रेष्ठ द्रव्य अर्पित करने की विधा पनपायी गई। हवन यज्ञ उसी उपक्रम का एक अंग है। रूस के वैज्ञानिकों ने वर्षों पूर्व सिद्ध किया था गाय के गोबर के कण्डों में शुद्ध गोघृत के साथ बिना टूटे चावलों को जलाने से रेडियोधर्मी गुणों का निवारण होता है, इससे वायुमण्डल शुद्ध होता है। अग्नि हवन का विधान सूर्योदय के समय करने को अत्यधिक महत्त्व है। आज वैज्ञानिक शोध भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं इस कारण अनेक देशों के लाखों विदेशी नागरिक भी समयसूचिका (घड़ी) देखकर तीन या पाँच आहुतियाँ दे रहे हैं और हम उदासीन होते जा रहे हैं। उसे घी तथा अन्य द्रव्यों का अपव्यय मान रहे हैं, जबकि वह विश्व भर के प्राणियों के सत्स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

सूक्ष्मकण स्थूलकणों की अपेक्षा अधिक प्रभावी तथा व्यापी होते हैं। इस कारण जिन मनुष्यों या पशुओं को सर्प या विषैले प्राणी काट लें उनका दहन निषिद्ध रहा है। चेचक, मोतीझीरा तथा संक्रामक रोगियों का दहन निषिद्ध रहा है। भारतीय चिन्तन में अत्यन्त सूक्ष्म तथा व्यापक दृष्टिकोण रहा है। एक ओर वायु, जल, पृथ्वी की पवित्रता व स्वास्थ्यवर्धकता बढ़ाने के लिए यज्ञादि कर्म तो दूसरी और निषेध तथा पाप की भावना का विस्तार किया गया।

आज सभी प्रकार के प्रदूषण रोकने तथा पर्यावर को शुद्ध, पवित्र एवं लोककल्याणकारी बनाने के लिए भारतीय चिन्तनधारा तथा तथ्यों का प्रकाशन आवश्यक है। उसकी पुन: प्रतिष्ठा करना चाहिए। श्रद्धा की भावना के साथ आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य भी बताये जायं। लोककल्याणकारी योजनाओं में भवन, सड़क बनाये के साथ साथ नदी, तालाब की शुद्धता, घाटों की स्वच्छता के प्राथमिकता देना चाहिए। थोड़े से द्रव्य तथा भौतिकतावादी सुविधा के लिए मानव-विध्वंस को निमंत्रण देने वाले पूरी शक्ति से प्रत्येक अच्छी बात का विरोध करते है। उनका उसी प्रकार से प्रतिकार तथा लोकजागरण करना चाहिए। अपनी संशयास्पद स्थिति को तोड़कर संकल्पशक्ति से खड़े होकर स्थूल, सूक्ष्म पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं भावनात्मक वैचारिक प्रदूषण को भी समाप्त करने के लिए कहें-वयं राष्ट्रे जागृयाम्।

आपकी प्रतिक्रिया...