कोकण से अपार संभावनाएं

समुद्र को पीछे हटाकर परशुराम ने कोकण, अपरांत की भूमि का निर्माण किया। कोकण को प्राकृतिक सौंदर्य का वरदान प्राप्त है। कोकण अगर पृथक देश होता तो संभवतः पूरे कोकण की अर्थव्यवस्था केवल पर्यटन पर ही आधारित होती।

कोकण में औद्योगिकरण को पर्यटन की तुलना में ज्यादा महत्व दिए जाने के कारण वर्तमान में पूरा कोकण अपना सच्चा स्वरूप खोता चला जा रहा है। कोकण की जीवनरेखा कही जाने वाली नदियां औद्योगिकरण की भेंट चढ़ रही हैैं, इस कारण इन नदियों का पानी विषाक्त हो गया है।

कोकण प्राकृतिक रूप से बहुत सुंदर प्रदेश है। शांत तथा स्वच्छ समुद्री किनारा, नारियल तथा अन्य विशाल वृक्षों की छाया से मन को एक अलग ही प्रकार का आनंद प्राप्त होता है। कोकण के मंदिर भी परम पवित्र हैं। धान यहां की प्रमुख उपज है। इसके अलावा कुछेक पूरक उद्योग कोकण क्षेत्र की उपयोगिता को और ज्यादा बढ़ा देते हैं। कोकण के हापुस आम तो विश्व प्रसिद्ध हैं। काजू, कटहल, कोकम, करौंदे, जामुन के उत्पादन में कोकण क्षेत्र का विशेष रूप से उल्लेख किया जाता है। इस क्षेत्र में उत्पादित होने वाले सभी फसलों की विदेश में अच्छी मांग है।

साढ़े सात सौ किलोमीटर का समुद्री क्षेत्र में मत्स्योत्पादन एक बड़े उद्योग के रूप में यहां स्थापित हो चुका है। इन सभी उद्योगों को अगर सरकार की ओर से उचित महत्व दिया गया होता तो कोकण के विकास का ग्राफ और बढ़ता। इसी तरह अगर फल प्रक्रिया प्रकल्प को महत्त्व दिया जाता तो आज कोकण का चेहरा ही अलग रहता। दुर्भाग्य से कोकण के विकास का जो सपना देखा गया था, उसे अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है।

कोकण के स्थानीय उत्पादनों पर आधारित उद्योगों को चालना, प्रोत्साहन देने के स्थान पर राज्य और केंद्र सरकार ने कोकण में अलग ही तरह के उद्योग स्थापित किए हैं। कोकण का समुद्री किनारा वरदान की जगह अभिशाप कैसे सिद्ध हो, इसके प्रयास ही ज्यादा किए गए हैं, इस कारण कोकण के अंतर्गत आने वाले ठाणे, रायगड, रत्नागिरी इन तीन जिलों का औद्योगिक विकास बड़ी तेजी से हुआ। इस औद्योगिकीकरण में सरकार ने प्रदूषण मुक्त कारखानों को महत्व दिया होता तो भी कोकण को अपना प्राकृतिक सौंदर्य टिकाये रखने में सफलता प्राप्त हो जाती, पर सरकार ने इस तरह की कोई भूमिका नहीं ली। पूरे विश्व में जिन उद्योगों को अनुमति नहीं दी गई है,उन उद्योगों को सरकार ने कोकण में बड़ी आसानी से अनुमति प्रदान की है।

एब एसिड से संबंधित उद्योग कोकण के औद्योगिक क्षेत्र में भारी प्रमाण पर स्थापित किए गए हैं। पातालगंगा (पनवेल), धाटाव (रोहा), महाड, लोटे परशुराम (चिपलूण), ये कोकण के चार बड़े औद्योगिक क्षेत्र हैं। चिपलूण के पास स्थित खेर्डी, संगमेश्वर ये छोटे औद्योगिक क्षेत्र हैं। रायगढ़ जिले में ही माणगांव में नया सिरे से औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की जा रही है। मांग के अनुरूप जल, विस्तीर्ण क्षेत्र तथा कार्य करने व्यक्तियों की उपलब्धता जिन स्थानों पर होती है, उन स्थानों पर औद्योगिकीकरण की काफी तेजी से होता है, ऐसा दावा अर्थशास्त्रियों ने किया है।

कोकण में आने वाले उद्योगों के प्रति अनुकूल वातावरण होने के कारण यहां औद्योगिकीकरण की अपार संभावनाएं हैं। कोकण के पास ही देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के स्थित होने के कारण मुंबई स्थित बंदरगाह तथा श्रीवर्धन के विकसित हो रहे दिधि बंदरगाह से भी इस क्षेत्र के औद्योगिक विकास में तेजी आने से इंकार नहीं किया सकता।

औद्योगिकीकरण के कारण कोकण को क्या प्राप्त हुआ, इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर खोजना ठीक नहीं है। यह भी सच है कि स्थानीय युवकों को यहां जारी औद्योगिकीकरण का लाभ रोजगार के रूप में मिला है, लेकिन रोजगार पाने वाले युवकों की संख्या बहुत कम है। औद्योगिकीकरण के अंतर्गत जो रोजगार दिया जा रहा है, उसका स्तर अच्छा न होने के कारण ज्यादातर युवा यहां रोजगार करने के लिए हामी नहीं भर पा रहे हैं। अपनी जमीनें देने के कारण जो किसान प्रकल्पग्रस्तों की सूची में आ गए हैं, वे अपने पुनर्वास की लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रकल्पग्रस्त किसान अपनी रोजी-रोटी की तलाश में दर- दर भटक रहे हैं। कुछ प्रकल्पग्रस्त किसानों ने गुजरात की ओर रूख कर लिया है। स्थानीय स्तर पर कोकण के युवकों को रोजगार नहीं मिल रहा, इसका मुख्य कारण यही बताया जा रहा है कि कारखानों में रोजगार पाने के लिए जिस तरह के प्रशिक्षण की जरूरत होती है, वैसा प्रशिक्षण कोकण के युवकों को नहीं दिया जा रहा है। तहसील स्तर पर संचालित सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र भी स्थानीय स्तर के कारखानों में रोजगार के अवसर बढ़ाने में असफल ही रहे हैं। आज भी इन औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्रों से सिलाई, मोटर मैकेनिक, लोहा कटाई, इलेक्ट्रीशियन, वायरमैन जैसे स्वयं रोजगार का प्रशिक्षण देने का कार्य किया जा रहा है। यहां जो कारखानों स्थापित हैं, उनमें इस तरह के प्रशिक्षण प्राप्त युवकों की कोई जरूरत नहीं होती, ऐसे में उनका प्रशिक्षण बेकार ही साबित हो जाता है और उसे रोजगार से विमुख होना पड़ता है। प्रशिक्षण के अभाव में कोकण के युवकों को स्थानीय कारखानों में अगर किसी तरह रोजगार उपलब्ध भी हो गया तो उसे अकशुल मजदूर के रूप में कारखाने में काम मिलता है। उसकी नियुक्ति ठेका पद्धति के नियमों के तहत की जाती है।

कोकण को प्रदूषण की मार से भी दो-चार होना पड़ रहा है। रासायनिक कारखानों से बाहर निकलने वाले विषाक्त पानी को रिफाइंड करके उसे नदी में छोड़ा जा रहा है। प्रत्येक कारखाने से निकलने वाली रासायनिक गैसों को शुद्ध करने का प्रकल्प स्थापित करना जरूरी होने के बावजूद रायगढ़ और रत्नागिरी जिलों के औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित कारखानों में इस प्रकर का प्रकल्प स्थापित नहीं किए गए हैं।

महाड तथा चिपलूण जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में कारखानों के संगठनों ने केंद्र तथा राज्य सरकार की ओर से आर्थिक सहयोग लेकर सामायिक शुद्धीकरण प्रक्रिया केंद्र की स्थापना की थी। आज इस शुद्धीकरण प्रक्रिया केंद्र की हालत बहुत खराब है। पनवेल की पातालगंगा, महाड की सावित्री, रोहा की कुंडलिका, चिपलुण की वाशिष्टी इन सभी नदियों से निकलने वाला प्रदूषण कोकण की प्राकृतिक सुंदरता को खराब कर रहा है।

कोकण में खारे पानी की मछली को मारने की तरह ही पीने के पानी में मछली मारना भी लाभ देने वाला ही साबित हुआ है। आज की स्थिति में यहां पीने योग्य पानी में मछली मारने की प्रक्रिया पूर्णतः बंद हो गई है। पीने योग्य पानी में मछली मारने से जुड़े लोगों का जीवन बहुत ही दयनीय हो गई है। कहीं रेत का कचरा निकाल करके तो कहीं हमाली करके मछुआरे अपना तथा अपने परिवार के लोगों का पेट भर रहे हैं। कठिन श्रम करके भी इन लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो पा रही है।

जल प्रदूषण के कारण पर्यावरण खतरे में है। नदी से सटी कृषि जमीन अर्नुवर हो गई है। इस अर्नवर जमीन का क्या किया जाए? इस सवाल को लेकर किसान परेशान हैं? वे इस जमीन को कौड़ी के मोल बेंचने के लिए तैयार हैं, पर कोई खरीददार नहीं मिल रहा। कोकण में कृषि जमीन घटने से यहां के किसानों का क्या होगा, यही सबसे बड़ा सवाल है। दूसरी ओर कारखानों से होने वाले वायु प्रदूषण से परिसर के आसपास के गांवों के लोगों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। कारखाना क्षेत्र के निकट रहने वाले बच्चों को छोटी उम्र से ही दमा तथा सांस संबंधी बीमारियां घेर रही हैं। कुछ बच्चे दमा तथा सांस की बीमारी लेकर ही पैदा हो रहे हैं। कुछ बच्चे पीलिया, क्षयरोग से ग्रसित बच्चों तथा मजदूरों की संख्या भी यहां काफी बढ़ रही है। सरकार की ओर से कारखाना क्षेत्र के अंतर्गत रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

बैरिस्टर अंतुले जब राज्य के मुख्यमंत्री थे, उस समय उन्होंने कोकण को कैलिफोर्निया बनाने का सपना यहां के लोगों को दिखाया था, पर तीन दशक की कालावधि बीत जाने के बाद भी कोकण की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ। सरकार की गलत नीतियों के कारण कोकण की हालत इतनी खराब हुई है, इतना होने के बावजूद राज्य की आघाडी सरकार जैतापुर में परमाणु ऊर्जा प्रकल्प शुरु कर उसे राख में तब्दील करने पर आमादा है।

समुद्र को हटाकर परशुराम ने कोकण का निर्माण किया था और हम लोग समुद्र को पूरी तरह बर्बाद कर कोकण की प्राकृतिक संपदा को ही नष्ट कर रहे हैं। अभी-भी समय है, यदि कोकणवासी एकजुट होकर कोकण की प्राकृतिक सुंदरता कोे बरकरार रखते हुए समुद्री किनारे को पर्यावरण की दृष्टि से अच्छा बनाने के अभियान में जुट जाएंगे तो कोकण की प्राकृतिक सुंदरता फिर से वापस आ जाएगी।
कोकण पर हो रहे औद्योगिक तथा औष्णिक आक्रमण को रोकने के लिए कोकणी लोगों को मिलकर आंदोलन करने के लिए तैयार हो जाना चहिए। कोकण का अस्तित्व, कोकण का सौंदर्य अगर टिकाए रखना है तो परशुराम के परशु को अब कोकणी व्यक्ति को उठाना ही लेना चाहिए, क्योंकि परशु के वार से ही कोकण की परंपरा बरकरार रह पाएगी।
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