देश युद्ध काल में जागृत होता है

चीन की सेना ने लद्दाख में भारतीय सीमा में लगभग 19 कि.मी. तक घुसकर अपनी चौकी बना ली थी,जिस पर वे पिछले बीस दिनों से कब्जा जमाये बैठे थे। दोनों देशों की उच्च स्तर की बातचीत के बाद समझौता हुआ और चीन ने अपनी सेना वहां से हटा ली है। इस घटना के बाद कांग्रेस सरकार आनन्द मना रही है कि खतरा टल गया, परन्तु चीन की आज तक की धोखाधड़ी और विस्तारवाद की भूमिका को देखते हुए उसका यह कदम अचंभित करने वाला है। चीन की प्रवृत्ति और आज तक की कृतियों को देखते हुए कांग्रेस सरकार को स्पष्ट और गम्भीर विदेश नीतियों के साथ चीन की करतूतों पर ध्यान देना जरूरी है। पर जब चीन ने भारत की सीमा के अन्दर घुसपैठ की थी, तब हमारे प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने कहा कि यह ‘स्थानीय समस्या’ है और यह मुद्दा अधिक गम्भीर नहीं है। इतिहास में हुई गलतियों से सीख लेना और वर्तमान का ध्यान रखकर जीना ‘कॉमन सेंस’ है। चीन के सन्दर्भ में भारतीय नेतृत्व के पास इसी का अभाव नजर आता है।
‘पंचशील’ और ‘हिंदी‡चीनी भाई‡भाई’ जैसे स्वप्नों से छलावा कर सन 1962 में हुए चीन के आक्रमण को हाल ही में 50 वर्ष पूरे हुए हैं। मनमोहन सिंह का चीन की घुसपैठको अधिक तवज्जो न देने का दृष्टिकोण जवाहरलाल नेहरू का अनुकरण करने जैसा है। मनमोहनजी! गांधी‡नेहरू का इतना अन्धानुकरण करने की प्रवृत्ति देश के लिए घातक हो सकती है। 1962 के युद्ध में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने का सपना देखने वाले भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने कुछ ऐसी ही भूमिका निभायी थी, जो भारत के लिए बहुत महंगी साबित हुई। इस युद्ध में भारत की पराजय हुई। यह पराजय सेना की नहीं थी। उस समय भारतीय नेतृत्व हिंदी‡चीनी भाई‡भाई के सुख-सपनों में खोया हुआ था और उसका भारत की सीमाओं पर ध्यान ही नहीं था। अपना विस्तार करने पर आमादा चीन ने इसी बात का फायदा उठाया। अब फिर एक बार चीन की घुसपैठ जैसी गम्भीर समस्या को ‘स्थानीय समस्या’ बताते हुए प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने इतिहास के सम्बन्ध में अपने अज्ञान को दर्शाया है।

चीन हमेशा से ही अपना विस्तार करने के लिए तैयार रहा है। एशिया का नेतृत्व करना चीन के लिए महत्वपूर्ण है। भारत की सीमा में चीन की घुसपैठ चीन के बढ़ते और भारत के कम होते राजनैतिक प्रभाव का संकेत है। लगभग 10 वर्ष पूर्व ही चीन ने अपने ध्येय निश्चित करके उन्हें सार्वजनिक स्वरूप दिया था। 1) सन 2015 तक भारत, ताइवान, वियतनाम जैसी क्षेत्रीय शक्तियोंको डराकर अपने सामने झुकने के लिए बाध्य करना। 2) 2020 तक रूस, जापान और यूरोप के साथ दो‡दो हाथ करने की दृष्टि से स्वयं को सामर्थ्यवान बनाना। 3) 2050 तक अमेरिका के सामर्थ्यों की बराबरी करना।

चीन विश्व का एक मात्र ऐसा देश है, जिसका पन्द्रह से अधिक देशों के साथ सीमाओं को लेकर विवाद चल रहा है और अधिकांशत: इस विवाद को मिटाने के लिए उसने युद्ध, आक्रामकता और धमकियों का सहारा लिया है। विश्व में चीन के प्रति अविश्वास की भावना अधिक है। भारत के सन्दर्भ में भी चीन की ओर से कुछ न कुछ समस्याएं हमेशा से ही खड़ी की जाती रहती हैं। अरुणाचल प्रदेश की ओर चीन की वक्रदृष्टि, चीन की सीमा पर निर्माण की गयी आधारभूत सुविधाएं, भारतीय प्रदेशों में होने वाली घुसपैठ, भारत के पड़ोसी राज्यों से चीन के बढ़ते सम्बन्ध इत्यादि बातों को देखते हुए भारत‡चीन के मध्य अगर फिर से युद्ध छिड़ गया तो…? भारत के सेनाध्यक्ष कहते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो चीन के आक्रमण का मुंह तोड़ जवाब देने मेंवे सक्षम हैं। पंडित नेहरू के समय से चीन के सम्बन्धों में चली आ रही डरपोक प्रवृत्ति को अब बदलना होगा। हरकतों को सहन करने की एक सीमा होती है, परन्तु मनमोहन सिंह की सीमा अभी भी नेहरू काल में ही स्थिर है। जो कांग्रेसी सरकार 19 कि.मी. की रक्षा नहीं कर सकती, वह देश के सैकड़ों मील की रक्षा कैसे करेगी? यह प्रश्न देश की जनता के मन में भी उठ रहे होंगे। 1962 के चीनी आक्रमण से हमने क्या सीख ली? फिर अगर चीन के साथ युद्ध हुआ तो क्या हमारी सेना तैयार है? कई वर्षों बाद भी सीमावर्ती क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं का न होना सेना की राह का रोड़ा है। चीन की सेना द्वारा अत्याधुनिक रास्ते भारत की सीमा तक तैयार कर दिये गए हैं। परन्तु भारत के रास्ते अभी भी सीमा से 50‡60 कि. मी. दूर तक बने हैं। हमारी सेना सीमा का संरक्षण करने में सक्षम है, परन्तु अब भारत को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो शीत युद्ध या युद्ध की स्थिति में सशक्त विदेश नीति से निर्णय ले सके। हमारी सरकार इसी बात से बेफिक्र है।

चीन की विस्तारवादी नीति और दूसरों को पीछे धकेलने की मंशा का भारतीय जनता सफलता पूर्वक सामना करना चाहती है। इस अप्रत्यक्ष युद्धजन्य परिस्थिति का फायदा देश की एकता को अधिक मजबूत करने के लिए किया जा सकता है। भ्रष्टाचार, राजनैतिक नौटंकी, भय का वातावरण इत्यादि से साबित होता है कि पिछले कुछ वर्षों में देश क्षीण हो गया है। कहा जाता है कि ‘देश युद्ध काल में जागृत होता है और शान्ति काल में विश्राम करता है।’ कारगिल युद्ध के दौरान हमने इसे अनुभव भी किया है। भारत की राजनीति क्षेत्रीय, जातिवादी और व्यक्ति प्रधान हो गयी है। संकट के समय में इस तरह की घातक भावनाओं को दूर किया जाता है, परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि राष्ट्रीय एकता को दृढ़ बनाने के समय भी कांग्रेस के नेता राष्ट्रीय समस्याओं से अधिक अपनी पार्टी और सोनिया गांधी के स्वार्थ का अधिक विचार करते हैं। चीन की घुसपैठ को ‘स्थानीय समस्या’ कहने वाले कांग्रेसी नेता चीनियों को सीमा स्तर पर, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में तथा व्यापार में मात देने की बात सोचने की जगह अपने विरोधियों को उखाड़ फेंकने के लिए उत्साहित हैं।

चीन का केवल चर्चा करके सीमा से बाहर निकल जाने का कदम अचंभित करने वाला है। इस प्रकार कदम पीछे लेना चीन का स्वभाव नहीं है। चीन जरूर दूर की सोच रहा है। चीन की घुसपैठ की समस्या को चर्चा से सुलझा लेने के भारत के प्रयासों को अब अगर चीन की तरफ से ठेस पहुंची, तो ‘साम’ भूल कर ‘दण्ड’ हाथ में लेना होगा। देश का आत्मविश्वास कायम रखने के लिए यह आवश्यक भी है। इसके लिए ताकतवर सेना के साथ आवश्यक है देश में समर्थ नेतृत्व का होना। अत: अब प्रयत्न करना होगा डरपोक मानसिकता को जड़ से उखाड़ने और देश को सक्रिय‡सामर्थ्यवान बनाने के लिए।

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