सेना तैनात करना ही अंतिम उपाय

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 5 जून को राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक आयोजित की थी। छत्तीसगढ़ में हुए बड़े नक्सली हमले के बाद यह बैठक हुई। बैठक में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा कि गड़चिरोली व आसपास के जिलों में विकास कार्यों का प्राथमिकता दी गई है और नक्सली उत्पाद को रोकने के लिए सक्षम संदेश व्यवस्था, जनजागृति अभियान चलाकर जनता के साथ संवाद स्थापित करने, प्ाुलिस प्रशासन को चुस्त बनाने आदि कदम उठाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन का उद्घाटन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने किया। केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, वित्त मंत्री पी़ चिदम्बरम, प्रधान मंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायण सामी, गृह सचिव आर. के. सिंह की उपस्थिति में मुख्यमंत्रियों ने नक्सलियों का सामना करने के लिए उठाए जा रहे कदमों का ब्यौरा दिया। नक्सलियों के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाने के लिए ग्ाुप्तचर विभाग, केंद्रीय आरक्षित सुरक्षा बल एवं स्थानीय नागरिकों के बीच संवाद व समन्वय से स्थिति पर नियंत्रण करने की भरसक कोशिश की जा रही है। राज्यों के बजट में नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है। यह सब कुछ होने पर भी हिंसक घटनाएं क्यों कम नहीं हो रही हैं? नक्सली इलाकों में घोषणाएं बहुत की जा रही हैं, लेकिन उन पर अमल कब होगा? गंभीरता से अमल करने वाली सरकार भी तो होनी चाहिए।

सच्चाई यह है कि गडचिरोली में जमीनों के प्ाुनर्वितरण और अन्य सामाजिक योजनाओं पर बहुत अमल नहीं हुआ है। इसे राज्य के गृह मंत्री स्वीकार कर चुके हैं। सड़कें, स्वास्थ्र्य सेवाएं, शिक्षा, खाद्यान्न सुरक्षा और रोजगार के मामले में विकास का अनुशेष बहुत है। यह सारी स्थिति विस्फोटक है। उसे सम्हालने के लिए सरकार की कटिबध्दता के अलावा संवेदनशीलता की भी जरू री है। क्या यह संवेदनशीलता खत्म हुई है?

अप्रैल 2010 में दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों के सब से बड़ े हमले में 75 से अधिक जवान शहीद हो चुके हैं। 25 मई को हुआ हमला भी उतना ही भीषण था। अब तक बड़े हमले के लिए नक्सली सुरक्षा जवानों को निशाना बनाते थे, लेकिन अब उन्होंने पहली बार किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल को निशाना बनाया है। इस भीषण नरसंहार के कारण कई कटु प्रश्न उपस्थित हुए हैं। प्ाुलिस/सीआरपीएफ का प्रशिक्षण, नेतृत्व, प्रशासन (चिकित्सा सहायता) कमजोर एवं निम्न कोटि की थी? गृह मंत्रालय, सीआरपीएफ और प्ाुलिस अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या अधिकारियों ने प्रशिक्षण लिया था? डीआईजी/आईजी जैसे अधिकारियों ने जंगल में जवानों के साथ कभी गश्त लगाई थी? कभी जंगल में पेट्रोलिंग किया था? वातानुकूतिल कमरे में बैठना आसान होता है, लेकिन सीना तान कर साहस और शौर्य दिखाना उतना ही कठिन होता है। हर साल नक्सली हमलों में 200-300 प्ाुलिस जवान मारे जाते हैं, लेकिन कोई अधिकारी नहीं मारा जाता। आईपीएस प्ाुलिस अधिकारियों की वीरता की गाथाएं अभी सुनी नहीं है। वरिष्ठ प्ाुलिस अधिकारी क्या कर रहे थे? उन्हें तो लड़ने का बहुत कम अनुभव है। सीआरपीएफ का स्वरूप प्ाुलिस से बदल कर फौजी दल के स्तर पर बढ़ाया जाना चाहिए। लड़ने की तैयारी सेना दलों जैसी ही होनी चाहिए।
40 फीसदी सेना कश्मीर व प्ाूर्वोत्तर भारत में 1955 में नगाओं का विद्रोह कुचलने के लिए पहली बार भारतीय सेना को तैनात किया गया। इसके बाद मिजो, बोडो, उल्फा आदि बढ़ते जा रहे आंदोलनों को खत्म करने के लिए नगालैण्ड, मणिप्ाुर, मिजोरम, त्रिप्ाुरा, असम, मेघलय और अरुणाचल प्रदेश में सेना को तैनात किया गया। 1988 में कश्मीर में पाकिस्तान समर्थन आंदोलन को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर सेना को लगाया गया और बगावत कुचल दी गई।

नक्सली आंदोलन का मुकाबला करने की जिम्मेदारी अब तक अर्धसैनिकी बलों तथा स्थानीय प्ाुलिस को सौंपी गई है। लेकिन प्ाुलिस नक्सलियों का सामना नहीं कर पा रही है। अर्धसैनिक बलों की सीमाएं हैं। नक्सली आंदोलन को देश से प्ाूरी तरह खत्म करना हो तो फौजी कार्रवाई की जरूरत है। लेकिन, दुर्भाग्य यह कि हमारे रक्षा मंत्री ए़ के. एंटनी ही कहते फिर रहे हैं कि नक्सलियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। हम यह भी समझ नहीं पा रहे हैं कि ऐसे बयानों से नक्सलियों का आत्मबल बढ़ता है। माओवादियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल किस स्थिति में और कब किया जाएगा? सेना की कार्रवाई कितने दिन चलेगी? सुरक्षा व्यवस्था बाद में कैसी होगी? वास्तव में सेना का तुरंत इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्योंकि हर वर्ष निर्दोष आदिवासी, प्ाुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान मारे जा रहे हैं। क्या हम फिर से दंतेवाड़ा या अन्य नरसंहारों का इंतजार कर रहे हैं?

बोल बचनों की अपेक्षा….

नक्सलियों के हमले के बाद मीडिया में सेना को तैनात किए जाने के बारे में चर्चा हो रही है। अब नहीं तो कब? शीघातिशीघ और जबर्दस्त प्रहार, जड़ से हटा दो, सेना ही एकमात्र विकल्प, सेना का फिर क्या उपयोग आदि तेज सवाल प्ाूछे जा रहे हैं।

सेना के लगभग ग्यारह-साढ़े ग्यारह लाख जवानों में से कोई 40 फीसदी कश्मीर या प्ाूर्वोत्तर भारत में अलगाववादियों से जूझ रहे हैं। सेना का प्राथमिक लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करना और युध्द में विजय के लिए कठोर प्रशिक्षण करना है। सेना की संख्या 1972 से वही लगभग 12 लाख ही है, लेकिन प्ाुलिस, सीआरपीएफ, बीएसएफ की संख्या 6 लाख से 24 लाख हुई है। लेकिन क्या इससे हमारी आंतरिक सुरक्षा क्या चौग्ाुनी कुशल हुई है? बीएसएफ की संख्या इतनी बढ़ाने की अपेक्षा उससे आधे खर्च में राष्ट्रीय राइफल्स की संख्या बढ़ाकर यह किया जा सकता था।

ग्रीन हंट अभियान की समीक्षा करने का यही समय है। वरिष्ठ एवं कनिष्ठ स्तर के नेतृत्व को उचित बल प्रदान कर और आवश्यक प्रशिक्षण देकर ग्ाुप्तचर व्यवस्था का जाल आधुनिक बनाने का यही समय है। नई दिल्ली के वातानुकूलित कार्यालय में बैठने वाले प्ाुलिस और अर्धसैनिक बलों के वरिष्ठ अधिकारियों को नक्सल पीड़ित राज्यों में अपना डेरा लगाना चाहिए। नई दिल्ली से काम की चार बातें बताने और जवानों के मनोबल को घटाने की अपेक्षा वरिष्ठ वहां जाकर डेरा लगाए तो बेहतर होगा। नक्सलियों की फौजी कमान को प्ाूरी तरह ध्वस्त करना होगा। उनके रहने के ठिकानों और प्रशिक्षण स्थलों पर हमले करने चाहिए। इसके बाद कश्मीर की तरह कम्पनी या बटालियन (700-800 जवान) की चौकी स्थापित कर मक्त इलाकों पर नियंत्रण कायम रखा जाना चाहिए। लेकिन हमारी सरकार आंख बंद कर काम करती है और महत्वप्ाूर्ण निर्णय लेने से घबराती है।

फौज के अनुभव का उपयोग

माओवादियों के खिलाफ संघर्ष में सलाह देने के लिए बिगेडियर स्तर का अधिकारी गृह मंत्रालय में भेजा गया है। सीमा पर घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई करने वाली बटालियन का नेतृत्व करने वाला यह अनुभवी अधिकारी है। इस अधिकारी का जम्मू-कश्मीर व प्ाूर्वोत्तर भारत में आतंकवादियों, बागियों का सामना करने का अनुभव नक्सलियों के विरुध्द संघर्ष में उपयोगी साबित होगा। कुछ राज्यों ने इसके प्ाूर्व ही वरिष्ठ फौेजी अधिकारी की सलाह मांगी है।

फौज से निवृत्त हुए मनुष्य बल का नक्सलियों से संघर्ष में उपयोग किया जा सकता है। वर्तमान नीतियों, तकनीकों और नक्सलियों के विरुध्द कार्रवाइयों की समीक्षा करने के लिए फौज के जनरल स्तर के निवृत्त अधिकारी की सेवाएं गृह मंत्रालय को लेनी चाहिए। उसी स्तर के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को चार नक्सल पीड़ित राज्यों के राज्यपाल अथवा मुख्य फौजी सलाहकार के रूप में नियुक्ति की जानी चाहिए। बिगेडियर स्तर का अधिकारी राज्य स्तर पर, कर्नल स्तर का अधिकारी परिक्षेत्र के स्तर पर तथा फौजी जेसीओ स्तर का अधिकारी प्ाुलिस थाने में प्ाुलिस के सलाहकार के रूप में नियक्त किया जाना चाहिए। इस तरह फौजी अधिकारी प्रत्यक्ष सहयोग व सलाह प्राप्त की जा सकेगी।

भारतीय फौज में बड़े पैमाने पर विशेषज्ञ प्रशिक्षक उपलब्ध हैं। उनकी विशेषज्ञता का उपयोग किया जा सकेगा। महाराष्ट्र में गार्ड्स रेजिमेंटल सेंटर, नागप्ाुर, मराठा लाइट इंपैं÷टी सेंटर बेलगांव जैसे फौजी संस्थान हैं। मुंबई, प्ाुणे, नाशिक, भुसावल, औरंगाबाद में भी भारतीय फौज है। यहां आधुनिक प्रशिक्षण की व्यवस्था है और राज्य में ही प्ाुलिस अधिकारियों व जवानों को बेहतर ढंग से प्रशिक्षित किया जा सकेगा।

विकास में सेना का उपयोग

नक्सल पीड़ित क्षेत्रों का सर्वेक्षण, प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना जैसे कदमों से जनता में आत्मबल पैदा किया जा सकेगा। इसी तरह फौज व्दारा आयोजित साइकलिंग, राफिटंग जैसे अभियानों से भी खूब सहायता मिलेगी। इसी तरह नक्सली इलाकों में सड़कों के निर्माण में सीमा सड़क संगठन बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है। निवृत्त जवानों की प्ाुलिस बल में सीधी भर्ती भी बहुत उपयोगी होगी। फौज मानवरहित निगरानी विमान या हेलिकॉप्टरों से फौज की आवाजाही, जख्मी जवानों को अस्पताल में पहुंचाने, संघर्ष के समय जवानों को रसद पहुंचाने का काम हो सकेगा। अधिकांश राज्यों में मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ प्ाुलिस अधिकारियों को नक्सल पीड़ित क्षेत्रों में ले जाने में दुरुपयोग किया जाता है। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। इससे प्ाुलिस जवानों के मनोबल पर बुरा असर पड़ता है। यही संकट के समय आम नागरिकों को भी इसका उपयोग हो सकता है। नक्सलियों को समुद्री मार्ग से होने वाली हथियारों की रसद को रोकने के लिए नौसेना का उपयोग किया जा सकता है। सेना के पदाति, तोपखाना अथवा अभियंता दलों के प्रशिक्षण केंद्रों में जो अतिरिक्त क्षमता है उसका उपयोग किया जा सकेगा।

1994 से नक्सलवाद बहुत तेजी से बढ़ा है। इसके लिए जिम्मेदार राजनीतिक नेताओं, नौकरशाहों अथवा प्ाुलिस नेतृत्व से कौन जवाब तलब करेगा? लड़ने की मानसिकता, लड़ने के प्रशिक्षण व सही नेतृत्व के अभाव में प्ाुलिस नक्सलियों से सीधी लड़ाई लड़ नहीं सकते। इसी कारण सीमा पार से घुसपैठ रोकने के लिए नियंत्रण रेखा पर तैनात फौजियों के साथ प्ाुलिस को भी तुरंत प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। प्रशिक्षण की वर्तमान आवश्यकता तथा उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं में अंतर को पाटने के लिए केंद्र सरकार ने 20 नए प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना का निर्णय किया है। इस बीच, फौजी प्रशिक्षण केंद्रों व विशेषज्ञ प्रशिक्षकों से सहायता ली जा सकती है। हर राज्य में हजारों प्ाुलिस जवान सुरक्षा व प्रशासन के काम में लगाए जाते हैं। गृह मंत्रालय को उसके अधीन 24 लाख प्ाुलिस व अर्धसैनिक जवानों को कड़ा संघर्ष करने का अवसर देना चाहिए। फिर भी यदि स्थिति नियंत्रण में नहीं आई तो भारतीय सेना तत्पर है ही।

सेना ही अंतिम उपाय

नक्सलवाद आगामी कुछ समय तक तेजी से बढ़ेगा। इसे रोकने का अंतिम उपाय सेना ही है। सेना नक्सलियों से कैसे लड़ेगी? इसके लिए सरकार के पास विकल्प है। वह यह कि कश्मीर में जूझ रही राष्ट्रीय राइफल्स का विस्तार किया जाए और उसे नक्सली इलाकों में तैनान किया जाए। विशेष बलों को नक्सली इलाकों में तैनात कर उनमें समन्वय स्थापित करने पर उसके अच्छे परिणाम दिखाई देने लगेंगे। नक्सलियों के अड्डों की सही जानकारी मिलने पर फौज के विशेष बलों की टुकड़ियों का चुनिंदा समय पर उपयोग करने पर बहुत सफलता प्राप्त की जा सकती है। 40 से 50 हजार सैनिकों का इस्तेमाल कर कुछ हफतों में ही प्ाूरे दण्डकारण्य पर सरकार का प्ाूरा नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है। सेना जैसे ही सेना जंगल में घुसेगी, नक्सली अपने हथियार छिपाकर सामान्य नागरिकों में समाहित होने की कोशिश करेंगे। सेना के साथ लड़ने की उनकी कुवत ही नहीं है। इसके बाद अर्धसैनिक बलों को प्ाूरे इलाके में अपनी चौकियां स्थापित करनी होगी। इसीके साथ सेना के नियंत्रण में विकास सेना भेज कर रास्तों, प्ाुलों, अस्पतालों, स्कूलों, कुओं, जलाप्ाूर्ति योजनाओं का निर्माण किया जा सकेगा। ये विकास काम प्ाूरे होने पर सेना अपनी छावनी में लौट सकेगी।
————————

 

आपकी प्रतिक्रिया...