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बच्चों को चित्रकला तो सिखाई; लेकिन चरित्र-कला सिखाना भूल गए; जीवशास्त्र तो सिखाया; लेकिन जीवनशास्त्र को हमने अनदेखा कर दिया। बच्चे हमारे साथ समय बिताना चाहते हैं लेकिन हम स्वयं समय नहीं दे पाते और फिर समस्याएं खड़ी होने पर जनरेशन गैप का बहाना बनाते हैं। असल में ये जनरेशन गैप नहीं है ये कम्युनिकेशन गैप है।’
तालियों से सभागृह गूंज उठा। लगभग डेढ़ घंटे का व्याख्यान और आधे घंटे का प्रश्नोत्तर काल खत्म हुआ। व्याख्याता मंच से उतरे और दसवीं का एक विद्यार्थी उनके पास आया। उसने कहा कि ‘आपका व्याख्यान सुन कर मुझे लगा कि मेरी समस्या का समाधान आप ही कर सकते हैं। मुझ पर इतना दबाव है कि मुझे घर में रहने का मन नहीं करता और कभी- कभी तो आत्महत्या तक करने का ख्याल आता है। आप मेरे पापा से बात कीजिए। ये सब उनकी वजह से ही है।’ व्याख्याता ने लड़के की बात सुनी, उसके पिताजी से मुलाकात की। अभिभावक और बालक के बीच संवाद स्थापित किया। दसवीं में पढ़ने वाला यह विद्यार्थी तीन व्याख्याता के साथ ही रहने आता है। दसवीं में वह डिस्टिंक्शन मार्क्स से उत्तीर्ण होता है। आज वह विद्यार्थी बायोटेक इंजीनियर है और एक प्रसिद्ध कंपनी में ऊंचे पद पर कार्यरत है। व्याख्याताने बालक और अभिभावक के बीच सेतु का काम किया।
‘संगमनेर कॉलेज में बार-बार अनुशासन तोड़ने के कारण विधि विभाग के एक छात्र को बहिष्कृत करने का निर्णय कॉलेज के चेयरमैन रोक देते हैं। एक शर्त जीतने के लिए छत की ढलान पर चढ़ कर नाचने का दोषी यह ‘दुस्साहसी’ छात्र जब चेयरमैन के संपर्क में आता है तो जैसे उसके जीवन की दशा और दिशा दोनों ही बदल जाती है। दुस्साहस में छिपे उसके साहस को सकारात्मक रुझान मिलता है। विधि-स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद इसी साहस और आत्मविश्वास के बल पर वह सीधे मुंबई हायकोर्ट में मुश्किल से मुश्किल केस अपनेे हाथ में लेता है और सफलता की सीढियां चढ़ता जाता है। युवकों की ऊर्जा को रचनात्मक दिशा में प्रवाहित करने का कार्य कॉलेज के कार्याध्यक्ष करते हैं।’
वर्ष २०१२ में ‘‘द बेस्ट सोशल आर्किटेक्ट ऑफ द इयर’’ सम्मान से सम्मानित ध्रुव अकादमी नामक इस विद्यालय का घोषवाक्य इसके अनूठेपन की गवाही दे देता है – ‘‘इन्फ्रास्ट्रक्चर ऑफ इंटरनॅशनल स्टैंडर्ड बट इनकल्केट इंडियन व्हैल्यूज’’। शिक्षित और सुसंस्कारित नागरिकों का निर्माण कर विद्यालय के संस्थापक-अध्यक्ष परमवैभवसम्पन्न राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न सार्थक करना चाहते हैं।
शिक्षा और संस्कार के बीच सेतु का कार्य करने वाले इस विद्यालय के संस्थापक, दिशाहीन युवक की ऊर्जा को सृजनात्मक दिशा देने वाले कॉलेज के चेयरमैन और पिता-पुत्र के बीच सुसंवाद स्थापित कर निराश मन में आशा का संचार कर देने वाले व्याख्याता हैं सुप्रसिद्ध वक्ता और शिक्षाशास्त्री डॉ संजय मालपाणी।
गीता परिवार के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष, पुणे विश्वविद्यालय के सर्वोत्तम ग्रामीण कॉलेज संगमनेर महाविद्यालय के कार्याध्यक्ष और ध्रुव अकादमी विद्यालय के संस्थापक-अध्यक्ष के रूप में डॉ मालपाणी पिछले ३० वर्षों से संस्कार और शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का कार्य कर रहे हैं।
व्यक्तिगत जीवन में डॉ. मालपाणी एक सफल उद्योगपति हैं। ओंकारनाथ एवं ललितादेवी की चौथी संतान हैं संजय। उनके पिताजी स्व. ओंकारनाथ जी मालपाणी एक अलौकिक व्यक्तित्व थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वे वरिष्ठ कार्यकर्ता थे। अखिल भारतीय माहेश्वरी महासभा के महामंत्री के रूप में उन्होंने समाज के संगठन और विकास का अभूतपूर्व कार्य किया। संस्कार और आध्यात्मिकता के साथ सामाजिक जागरूकता का स्मरण रखना डॉ. मालपाणी को जैसे जन्मघूंटी में ही मिल गया था। परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरिजी (तत्कालीन आचार्य किशोर जी व्यास) के सहवास के कारण संजय में धर्म और अध्यात्म के प्रति विशेष रूचि और जिज्ञासा का निर्माण हुआ। एम्.कॉम. की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने ‘डिप्लोमा इन मार्केटिंग’ का पाठ्यक्रम पूर्ण किया। इसके बाद पारिवारिक व्यापार में कदम रखने से पहले उन्होंने ‘किर्लोस्कर कन्सलटंटस्’ में दो वर्ष तक नौकरी की। शिक्षा और नौकरी के अपनेे अनुभव के साथ उन्होंने औद्योगिक क्षेत्र में पदार्पण किया और मार्केटिंग विभाग की जिम्मेदारी संभाल ली। इस विभाग में तब ५ लोग काम करते थे। अल्पकाल में ही उन्होंने तीव्र गति से व्यापार का विस्तार किया। आज उनके नेतृत्व में सिर्फ मार्केटिंग विभाग में ४०० से अधिक लोग काम कर रहे हैं। पारंपरिक व्यवसाय में विस्तार के साथ अपनेे भाइयों -राजेश, मनीष, गिरीश और आशीष – के साथ मिल कर उन्होंने नए उद्योगों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, थीम पार्क, एम्यूजमेंट पार्क, हाउसिंग और लैंड डेवलपमेंट, पैकेज्ड फुड इत्यादि क्षेत्रों में अपने उद्योग समूह का विकास किया। अपनेे परिवार के व्यावसायिक दायित्व का निर्वाह करते हुए भी संजय के मन में शिक्षा और सामाजिक विषयों पर चिंतन चलता रहता है। संजय के संगठन कौशल और वक्तृत्व कला की प्रथम अभिव्यक्ति गीता परिवार के माध्यम से होती है।
१९८६ में संगमनेर में प.पू. स्वामी गोविंददेवगिरीजी और स्व. ओंकारनाथ मालपाणी ने गीता परिवार की स्थापना की। उनके मार्गदर्शन में बाल संस्कार के उपक्रमों में संजय सहभागी हुए। गीता परिवार के पहले संस्कार वर्ग में बच्चों को शिवाजी महाराज की कहानी सुनाने के साथ यह बाल संस्कार साधना शुरू हुई। बच्चों के बीच लोकप्रिय होते उनको देर नहीं लगी और उनको नया नाम मिला ‘संजू भैया’। मुंबई, जलगांव, कोलकाता, सूरत, सरदारशहर, कोटा, ग्वालियर, बंगलुरु, दिल्ली, हैदराबाद आदि स्थानों पर संस्कार शिविरों के माध्यम से हज़ारों बच्चों से संवाद स्थापित करते हुए उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि बच्चों और माता-पिता के बीच कहीं न कहीं संवाद और सामंजस्य का अभाव है। इसी संवाद और सामंजस्य की स्थापना के लिए उन्होंने ‘दो शब्द मां के लिए, दो शब्द पिता के लिए, इस स्लाइड-शो एवं व्याख्यान की संकल्पना की। संस्कार शिविरों के माध्यम से बाल संस्कार करना – संस्कार शिविरों में बच्चों के सहवास के समय उनसे गप्पे मारते हुए बच्चों की समस्याओं को समझना – दो शब्द व्याख्यान के माध्यम से बच्चों की बात को माता-पिता तक पहुंचाना – व्याख्यान के पश्चात प्रश्नोत्तर के द्वारा माता-पिता की समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना – और इन सब से प्राप्त अनुभव के आधार पर गीता परिवार के कार्यकर्ताओं को बाल संस्कार और बाल विकास के विषय में प्रशिक्षित करना – सतत चलते रहने वाली यह प्रक्रिया संजय मालपाणी के जीवन का अहम् हिस्सा बन गई।
गीता परिवार के कार्याध्यक्ष के रूप में उन्होंने ‘बाल संस्कार’ को नए रूप से परिभाषित किया। धार्मिक और सांस्कृतिक संस्कार के साथ-साथ उन्होंने बच्चों के सर्वांगीण और बहुमुखी विकास को गीता परिवार के कार्य का अंग बनाया। परमपूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी के मार्गदर्शन में उन्हीं के द्वारा दी गई ‘पंचसूत्री’ के आधार पर उन्होंने बाल संस्कार कार्य में नए-नए प्रयोग किए।
प्रात्यक्षिकों द्वारा प्रबोधन उनके शुरूआती प्रयोगों में से एक है। ‘प्रात्यक्षिकों द्वारा प्रबोधन’ अर्थात खेल या एक्टिविटीज के सहारे बातचीत करते हुए बच्चों तक अपनी बात पहुंचाना। कथाकथन में भी उन्होंने पपेट के माध्यम से कहानी सुनाने का प्रयोग किया। बच्चों को जादू देखना प्रिय है। उन्होंने जादूगरी की कला भी सीखी और इसमें ऐसी महारत हासिल की कि अच्छे- अच्छे पेशेवर जादूगर भी मात खा जाएं। जादू के प्रयोंगों को भी उन्होंने गीता परिवार के संस्कार कार्य का साधन बनाया।
नाट्य-संस्कार अर्थात नाटकों के माध्यम से बाल संस्कार भी ऐसा ही एक प्रयोग है। संत ज्ञानेश्वर, छत्रपति शिवाजी, वीर हनुमान, समर्थ रामदास, अष्टावक्र, नचिकेता, शहीद ऊधमसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद इत्यादि महापुरुषों के जीवन को नाटकों के माध्यम से बच्चों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इन नाटकों के कलाकार भी बालक ही होते हैं। नाटक के अभ्यास के दौरान बच्चों को विशेष व्रत दिया जाता है।
देश का प्रत्येक बालक और तरुण शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ, सबल और सक्षम हो इस उद्देश्य के साथ उन्होंने सूर्यनमस्कार का प्रचार किया। सबसे पहले गीता परिवार की संगमनेर शाखा ने विद्यालयों में विद्यार्थियों को एक महीने तक सूर्यनमस्कार का प्रशिक्षण देने के पश्चात् एक करोड़ सामूहिक सूर्यनमस्कार का संकल्प पूर्ण किया। इसके पश्चात् देश भर में अनेक शाखाओं ने यह संकल्प लिया। पुणे शाखा ने तो १७ करोड़ सामूहिक सूर्मनमस्कार का लक्ष्य प्राप्त किया।
बच्चों में योग के प्रचार-प्रसार हेतु ‘योग सोपान’ नाम से योग का एक पाठ्यक्रम तैयार किया गया। आज संगमनेर ही नहीं बल्कि देश के अनेक विद्यालयों में गीता परिवार के माध्यम से बच्चे योग का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।

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