सिविल सोसायटी: वामपंथ के पुनर्जागरण का साधन

अस्सी के दशक में ब्राजील से प्रारम्भ हुये सिविल सोसायटी संगठनों के लोक-लुभावन आंदोलनों के पूरे लैटिन अमेरिका में फैल जाने के फलस्वरूप, विगत दशक में एक दर्जन लैटिन अमेरिकी देशों के 17 चुनावों में वामपंथी सरकारों के लिये सत्ता में आना सम्भव हुआ है। अन्य लैटिन अमेरिकी देशों में भी क्रांतिधर्मी कम्यूनिस्ट दलों से भिन्न ‘नव वामपंथी सिविल सोसायटी संगठनों’ के ऐसे ही लोक-लुभावन आंदोलनों के माध्यम से वामपंथियों को समाज जीवन की मुख्य धारा में आने का अवसर मिला है। इसके फलस्वरूप आज दो तिहाई लैटिन अमेरिकी देशों में एक नव वामपंथ की लहर चल पड़ी है, जिसे सामयिक समालोचक ‘गुलाबी लहर’ कह रहे हैं। नब्बे के दशक में चली इस गुलाबी लहर से 1998 में वेनेंजुला और 2002 में ब्राजील सहित उत्तरवर्ती अवधि में एक दर्जन देशों में बनी वामपंथी सरकारों की सफलता के प्रयोग से प्रेरणा पाकर वामपंथियों ने सिविल सोसायटी के लोक-लुभावन आंदोलनों और सिविल सोसायटी के वैश्विक गठजो़ड़, वर्ल्ड सोशल फोरम के माध्यम से यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका व एशिया सहित अरब जगत में (अरब में अरब राष्ट्रवाद व नाहदा विरासत (अरब पुनर्जागरण) के नाम से नव वामपंथ की गुलाबी लहर को सबल बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी है।

भारत में सिविल सोसायटी

विश्व के अन्य भागों की तरह भारत में भी नव वामपंथ के घटक अनेक सिविल सोसायटी आंदोलन देश में कई लोक-लुभावन या अल्पसंख्यक वाद के अभियान विगत 20-25 वर्षों से चला रहे हैं। यथा बाबरी ढांचे के ध्वस्त होने के समय बने कई सिविल सोसायटी संगठनों के गठजोड़ से बने अकेले ‘नेशनल एलायन्स ऑफ पीपुल्स मूवमेण्ट’ जैसे एक सिविल सोसायटी समूह/आंदोलन में मेधा पाटकर के ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ (NAPM) जैसे 150 सिविल सोसायटी संगठन घटक के रूप में सक्रिय हैं। और NAPM आज 15 राज्यों में सक्रिय है। इसी प्रकार मूल निवासी वाद, एचआईवी-एड्स, अल्पसंख्यक सुरक्षा, सूचना के अधिकार, भूमि अधिग्रहण, साम्प्रदाकियता आदि अनगिनत मुद्दों पर अनेक आंदोलन व उनके असंख्य संघटक सिविल सोसायटी संगठन विगत दो दशकों से सक्रिय हैं।

आदर्श सोसायटी व 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर उभरी जन भावनाओं का उपयोग कर वैश्विक नव वामपंथ के घटक सभी आंदोलनों व उनके संगठन अनगिनत सिविल सोसायटी संगठनों ने अपने आंदोलन को प्रामाणिकता प्रदान करने हेतु अन्ना हजारे को साथ लेकर जन लोकपाल विधेयक पर लक्ष्य सापेक्ष आंदोलन छेड़कर सिविल सोसायटी के लिये देश के समाज जीवन में एक अहम स्थान बनाने में आंशिक सफलता भी प्राप्त की है। सिविल सोसायटी की टीम में समय से पूर्व फूट व कुछ सदस्यों पर लगे आरोपों की दुर्घटना नहीं घटी होती तो ढाई दशक से छिटपुट चल रहा सिविल सोसायटी आंदोलन आज पर्याप्त शक्ति प्राप्त कर चुका होता। देश में सिविल सोसायटी के अन्ना की आड़ में चलाये जा रहे इस आंदोलन एवं जन लोकपाल विधेयक पर आगे चर्चा करने के पूर्व एक बार अंतरराष्ट्रीय सिविल सोसायटी द्वारा वर्ल्ड सोशल फोरम के गठन एवं वैश्विक नव वामपंथ के परिदृश्य पर यहां पहले चर्चा कर लेना उचित होगा।

सिविल सोसायटी, वर्ल्ड सोशल फोरम व नव वामपंथ 

ब्राजील की ‘लेबर पार्टी’ के नेतृत्व में एवं ब्राजील के पोर्टो एलेग्रे की तत्कालीन लेबर पार्टी की ही स्थानीय सरकार की पहल पर 2001 में विश्व की राष्ट्रीय भू-राजनीतिक सीमाओं से परे विश्व भर के पूंजीवाद विरोधी एवं मुक्त चिंतन के पक्षधर, वामपंथी विचारधारा वाले सिविल सोसायटी संगठनों को वर्ल्ड सोशल फोरम के माध्यम से एक मंच पर लाने का प्रयत्न आरंभ हुआ था। पोर्टो एलेग्रे में 2001 में 25-30 जनवरी 2001 को हुये वर्ल्ड सोशल फोरम के पहले सम्मेलन में 60 देशों से 12,000 प्रतिभागियों ने भाग लिया व 2002 में 31 जनवरी से 5 फरवरी तक हुये दूसरे सम्मेलन में 123 देशों से 60,000 प्रतिभागियों ने भाग लिया था, जहां 652 कार्यशालाएं व 27 बड़े व्याख्यान हुये थे। तीसरा सम्मेलन भी पोर्टो एलेग्रे में ही जनवरी 2003 में सम्पन्न हुआ। इसमें हुयी अनेक कार्यशालाओं के साथ-साथ”Life after capitalism’ पर हुयी कार्यशाला प्रमुख थी, जिसमें गैर-पूंजीवादी व गैर-कम्यूनिस्ट (वर्ग संघर्ष, सर्वहारा की अधिनायकता, एक दलीय कम्यूनिस्ट शासन व हिंसक क्रांति की कम्यूनिस्ट विचारधारा से वर्ल्ड सोशल फोरम कथित रूप से अपने आपको अलग रखते हुये स्वयं को लोकतंत्र व खुले संवाद का पक्षधर बतला कर गैर-कम्यूनिस्ट वामपंथी विकल्प की बात करता है)। इस सम्मेलन का दूसरा प्रमुख आकर्षण अंतरराष्ट्रीय वामपंथी विचारक नोम चोम्स्की का मुख्य भाषण था। इस सम्मेलन की सबसे प्रमुख उपलब्धि इसके आहवान पर ‘ग्लोबल डे ऑफ एक्शन’ पर हुयी व्यापक वैश्विक जन भागीदारी थी, जिसमें विश्व के 60 देशों के 700 शहरों में एक साथ 1 करोड़ 20 लाख लोगों के विरोध प्रदर्शन का व्यापक वैश्विक शक्ति प्रदर्शन था। वर्ल्ड सोशल फोरम की तीन वर्ष में ही यह एक बड़ी उपलब्धि थी।

भारत में व्लर्ड सोशल फोरम

वर्ल्ड सोशल फोरम का मुंबई में जनवरी 16-21, 2004 में हुआ चौथा सम्मेलन, ब्राजील के बाहर व भारत में पहला सम्मेलन था। इस सम्मेलन के ठीक पूर्व नवम्बर में हुए एशियन सोशल फोरम ने इसको सफल बनाने में भारी योगदान दिया था। इस चतुर्थ वर्ल्ड सोशल फोरम में 90,000 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया था। वर्ल्ड सोशल फोरम प्रवर्तित ‘वैश्विक नव वामपंथ’ कहने को तो कट्टर कम्यूनिस्ट दलों से परहेज रखता है, तथापि इसे सफल बनाने के लिये यूरोप व एशिया के 18 कट्टर पूंजीवाद विरोधी वामपंथी दलों ने 5 दिसम्बर 2003 को एक संयुक्त आह्वान किया था।

From Asia Pacific region there were three Marxist-leninist Communist Parties, from India (CPI-ML Liberation, CPI-ML, CPI-ML Red Flag) and two Pakistani organizations (Labour party LPP, and PKMP), the New Left Front (Sri Lanka), the DSP (Democratic Socialist Perspectives) from Australia, two movements from South Korea (Power to the Working Class and All together) and the Filipino parties: the Marxist Leninist party of the Philippines (MLPP), the Philippine Worker’s party (PMP) and the Revolutionary Worker’s Party-Mindanao (RMP-M). The invitation was signed in Europe by the Left Bloc (Portuagal), the United and Alternative left (Cataluna), the Revolutionary Communist League (France), the United and Alternative left (Cataluna), the Revolutionary Communist League (France), the Scottish Socialist Party, the Socialist Worker’s Party (Britain) and Solidarites (Switzerland).
विलम्ब से किये इस कट्टर वामपंथियों के आह्वान के परिणामस्वरूप भी इसमें अच्छी भागीदारी रही जिनमें कुछ प्रमुख वामपंथी धड़े भी उपस्थित थे। निम्न प्रमुख थे:-

Three Brazilian components including Democracia Socialista (DS of the PT), the United States (the International Sociallist Organization (ISO), and Solidarity, Canada and Quebec (including the Union of Prograssive Forces from Quebec); and to the African continent with South Africa and for Niger the Revolutionary Organization for New Democracy (ORDN). We should also note for Europe and Asia the presence of Communist Refoundation (Italy), the Alternatifs (Farnce), Akbayan!! And other Filipino movements, and organizations from the Spanist states, Japan Egypt…..

मुंबई में आयोजित इस वर्ल्ड सोशल फोरम के सम्मेलन में 90,000 प्रतिभागी सम्मिलित हुये थे जिनमें 111 देशों के 15,000 अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागी भी सम्मिलित हुये थे। इसमें अरूंधती रॉय, मेधा पाटकर, जैसे धुर हिन्दुत्व विरोधी लोगों के अतिरिक्त असमा जहांगीर, समीर अमीन जैसे वामपंथी के भी अहम भाषण हुये थे। इनमें अर्जेण्टाइना की मदर्स ऑफ प्लाजा डी मायो की नोरा कोण्टिनास, राधिका कुमारस्वामी आदि के अनेकानेक भाषण उल्लेखनीय रहे थे। सम्मेलन में जनवरी 19, 2004 को हुये अरूंधति रॉय के मुख्य भाषण में उन्होंने भारतीय सेना पर कश्मीर में 80,000, जिनमें अधिकांश मुस्लिम हैं, की हत्या का अतिरंजित लांछन लगाने से लेकर पोटा तक अनेक मुद्दों पर खूब विषवमन किया। गुजरात को लेकर भी उन्होंने गोधरा के बाद वहां डेढ़ लाख लोगों के विस्थापन, 2000 मुस्लिमों की हत्या के साथ बड़ी संख्या में सड़कों पर पुलिस की देख-रेख में महिलाओं से बड़े पैमाने पर सामूहिक बलात्कार व बच्चों को जिंदा जलाने के अतिरंजित आरोपों से खूब तालियां व अंतरराष्ट्रीय संचार माध्यमों का आकर्षण बटोरा।

भारत में वर्ल्ड सोशल फोरम में व्यापक जन भागीदारी जुटाने में हैदराबाद में हुये जनवरी 2-7, 2003 के एशियन सोशल फोरम की भी महती भूमिका थी, जिसमें 22,000 की भागीदारी हुयी। इनमें 42 देशों के 780 संगठनों के 860 विदेशी प्रतिभागी भी पंजीकृत हुये थे। एशियन सोशल फोरम के तत्काल बाद, फरवरी 14-16, 2004 को ‘वर्ल्ड सोशल फोरम भारत’ की एक बड़ी बैठक दिल्ली में हुयी। जिसमें वर्ल्ड सोशल फोरम की अंतरराष्ट्रीय परिषद के इस प्रस्ताव को स्वीकृति दी गयी कि अगला सम्मेलन भारत में आयोजित किया जाये। वर्ल्ड सोशल फोरम-भारत की अगली बैठक तब स्थान निर्धारण हेतु नागपुर में मार्च 21-22, 2004 को हुयी, जिसमें 2004 का वर्ल्ड सोशल फोरम मुंबई में आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इस हेतु एक त्रिस्तरीय रचना खड़ी की- (1) इण्डिया जनरल काऊन्सिल (2) इण्डिया वर्किंग कमिटी व (3) इण्डिया आर्गेनाजजिंग कमिटी और साथ ही 8 कार्य दल भी बनाये गये। सभी प्रमुख प्रदेशों के प्रादेशिक व प्रमुख विषयों के लिये विषय वार अनेक यथा, महिला, दलित, मूल निवास, कृषि, श्रमिक, युवा सोशल फोरम भी गठित किये गये। अंतरंग क्षेत्रों में आंदोलन को सबल बनाने व देश भर में छोटे-बड़े सभी स्थानों से जन भागीदारी जुटाने व व्यापक संगठन रचना खड़ी करने हेतु देश भर में अनेक जत्थों के आयोजन कर, स्वास्थ्य, शिक्षा, जल, मूल निवासी, अल्पसंख्यकवाद आदि पर हजारों छोटी-बड़ी सभाएं कर भीड़ जुटाने व सिविल सोसायटी संगठन खड़े करने के पूरे प्रयत्न किये गये थे। पोखरण के परमाणु विस्फोटों की भी खूब निंदा 2003 के एशियन सोशल फोरम में की गयी थी।

वर्ल्ड सोशल फोरम का पांचवां सम्मेलन 2005 में पोर्टो एलेग्रे (ब्राजील) में 26-31 जनवरी को हुआ। इसमें 1,55,000 प्रतिभागी पंजीकृत हुये। सम्मेलन के अंत में जिन 19 प्रमुख आंदोलन प्रमुखों की ओर से संयुक्त घोषणा-पत्र जारी हुआ उनमें मार्क्सवादी विचारक समीर अमीन भी एक थे। वर्ल्ड सोशल फोरम का छठा बहु केन्द्रीय सम्मेलन 2006 में तीन स्थानों, कारकास-वेनेंजुला (जनवरी 2006) बामाको-माली (जनवरी 2006) व कराची-पाकिस्तान (मार्च 2006) में सम्पन्न हुआ। सातवां सम्मेलन जनवरी 2007 में केन्या में नैरोबी में हुआ। इसमें 110 देशों के 1400 सिविल सोसायटी आंदोलनों एवं 66,000 लोगों ने भाग लिया। आठवां सम्मेलन जनवरी 26 के आसपास ‘ग्लोबल कॉल फॉर एक्शन’ के रूप में विश्व के 100 से अधिक देशों के 1000 से अधिक स्थानों पर समानांतर सम्मेलनों के रूप में हुआ।

नवां वर्ल्ड सोशल फोरम, जनवरी 27 से फरवरी 1, 2009 को बेलेम (ब्राजील) में हुआ, जहां भारत सहित कई देशों में मूल निवासी आंदोलन के प्रवर्तक 190 समूहों ने भी भाग लिया था। दसवां विकेन्द्रित वर्ल्ड सोशल फोरम 2010 में 35 राष्ट्रीय, क्षेत्रीय व स्थानीय वर्ल्ड सोशल फोरम के रूप में सम्पन्न हुआ। इसमें पोर्टो एलेग्रे में हुयी सेमिनार में, वामपंथ के विस्तार की आगामी 10 वर्ष की वैश्विक रूपरेखा तैयार की जिसमें विश्व के 70 ख्यातनाम विद्वानों के भाषण हुए। अन्य 35 क्षेत्रीय वर्ल्ड सोशल फोरम भी अत्यंत विशाल थे यथा मिचीगन में डेट्राइट में हुये यू एस सोशल फोरम में 18,000 प्रतिभागी थे। ग्यारहवां वर्ल्ड सोशल फोरम सेनेगल की राजधानी डाकार में फरवरी 6-11, 2011 को हुआ। इसमें 132 देशों के 75,000 लोगों ने भाग लिया जहां, 1200 कार्यक्रम सम्पन्न हुये। डाकार में चीन के सत्ताधारी कम्यूनिस्ट पार्टी का प्रचार पण्डाल भी लगा था, जबकि वर्ल्ड सोशल फोरम स्वयं को ‘गैर कम्यूनिस्ट वामपंथ’ कहता है। दूसरी ओर यहां यूएस-एड का पण्डाल भी था जो अन्य बातों के साथ-साथ मिशनरी सिविल सोसायटी संगठनों को भी बड़ी मात्रा में सहयोग करता है।

वैश्विक नव वामपंथ की रीति-नीति व भारत

इस प्रकार वैश्विक नव वामपंथ आज विश्व के सबसे व्यापक, सर्वाधिक सुग्रठित व समन्वित अन्तर्जाल के रूप में उभर रहा है। जहां एक ओर यह इस्लामी जगत में अत्यंत सोच-विचार पूर्वक अरब राष्ट्रवाद के आंदोलन से इस्लामी समाजों को अपने साथ गूंथ रहा है तो दूसरी ओर पश्चिमी देशों में निरस्त्रीकरण आंदोलनों से जन समाजों को जोड़ रहा है। वहीं भारत में भी जल के लिये, बड़े बांधों से विस्थापित के अधिकारों के लिये, मूल निवासी वाद, अल्पसंख्यक वाद, महिला सशक्तिकरण, जैसे सैकड़ों मुद्दों पर छोटे-छोटे स्थानीय समाजों को जोड़ कर काम कर रहा है।

भारत में वैश्विक नव वामपंथ के सशक्तिकरण के लिये जान सेम्युअल ने निम्न त्रिसूत्री रीति-नीति सुझाई है। (इसके अंतर्गत नीचे दिये बिन्दु क्रमांक (a) के अनुसार ही अरूणा राय, तीस्ता सीतलवाड सहित सिविल सोसायटी आंदोलन के अनेक कार्यकर्ताओं ने श्रीमती सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में अपनी पकड़ बनायी हैं।

जॉन सेम्युअल के अनुसार यह त्रि-सूत्री नीति अग्रानुसार है :-

The fact of the matter is that India needs a vibrant and board-based Left movement.
This has to happen at three levels:
a) At the level of the Congress Party- as a network party, it is possible to revitalize leftits philosophy in the name of the ideals and ideas of Nehru.
b) At the level of communist and socialist parties- it is time they rethink their strategies and position themselves as an integrated and board based Left alternative.
c) At the level of civil society initiatives and social movements of a dense net work of NGOs and Popular activist movements have to be generated beyond party and politics.
All these three forces, though in different locations, will have to co-ordinat and work togather rather than undermine each other . They have to work to rise the capture of the Indian state by the elite, and against communal fascism, inequallity, marginalization ans corruption.

इस रणनीति के अनुरूप देश में असंख्य सिविल सोसायटी संगठन भिन्न-भिन्न कार्यों में लगे हैं। ये पुन: समन्वय की दृष्टि से अनेक समूहों में के घटक बने हुये हैं। इनके प्रत्येक समूह में पुन: शताधिक सिविल सोसायटी आंदोलन हैं। ऐसे प्रत्येक आंदोलन में पुन: शताधिक सिविल सोसायटी संगठन हैं। उदाहरणार्थ नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेण्ट (NAPM), जिसमें 150 से अधिक सिविल सोसायटी संगठन हैं, जो बाबरी ढांचे के ध्वस्त होने के समय उभरा व आज भारत के 15 प्रदेशों में कार्यरत है। मेधा पाटकर का नर्मदा बचाओ आंदोलन भी इसी छअझच का 150 में से एक घटक संगठन है। उनकी राजनीति को स्पष्ट करने हेतु उनके (NAPM की) वेब साइट पर दिये उनके एक उद्देश्य को यहां उद्धत कर रहा हूं : –

The focus of NAPM is to develop linkages across the various sections of dalits and other backward castes, minorities, adivasis, unprotected workers, laboring poor, as well as sensitive intellectuals and other professionals. NAPM has gained strength and made significant impact through its allies- the organization of fishworkers, farmers, farm labourers and forest workers, dam affected and development induced displaced, hawkers and construction and domestic workers, and other oppressed women and youth across all classes struglling for annihilation of caste system to various organizations challenging imperial global powers like the WTO, IMF, World Bank and other IFIs; and national international and global MNCs that cause privatization of services and forced acquisition and exploitation of agricultural lands, rivers, forests, minerals, and other natural resources.

भारत में नव वामपंथ की प्रतिष्ठापना

भारत में आदर्श सोसायटी व 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले जैसे प्रकरणों से उपजी जन भावनाओं का उपयोग करते हुये, जन लोकपाल बिल के रूप में आंदोलन का एक मूर्त लक्ष्य रखते हुये और अन्ना जैसे चेहरे का कुशल उपयोग करते हुये राष्ट्रव्यापी आंदोलन का संचालन किया। आंदोलन का प्रारभ्मिक स्तर राष्ट्रवादी विचार परिवार द्वारा चलाये अनेक विशाल आंदोलनों से अत्यंत छोटा होने पर भी संचार माध्यमों में आज जो 30-45 प्रतिशत तक वामपंथी हैं। उन्होंने सभी संचार माध्यमों में निरंतर अभूतपूर्व स्थान देकर इससे हर आम व खास व्यक्ति को जोड़ दिया। इसके कारण राष्ट्रवादी विचार परिवार के कार्यकर्ता भी विद्यार्थी परिषद के ‘यूथ अगेनस्ट करप्शन अभियान’ के स्थान पर सिविल सोसायटी आंदोलन ‘इण्डिया अगेन्स्ट करप्शन’ जिसके सूत्रधार सिविल सोसायटी आंदोलन ने योजनापूर्वक अन्ना को आगे कर रखा था, को ही बल देते चले गये। अब अन्ना ने जो उसकी टीम में 50 से अधिक विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि जोड़ने की बात कही है, उसमें भी यही सम्भावना है कि इनमें बड़ी संख्या में सिविल सोसायटी के झण्डाबदार हो सकते हैं। अब अन्ना के आंदोलन के अगले चरण में सिविल सोसायटी ही सूत्रधार हो तब उसका और कितना सशक्तिकरण होने दें।

ऐसी स्थिति में क्या राष्ट्रवादी विचार परिवार को भ्रष्टाचार के विरुद्ध, समग्र व्यवस्था परिवर्तन हेतु कोई चरणबद्ध आंदोलन, जिसके प्रत्येक चरण में कोई सहजतापूर्वक अर्जित करने योग्य, सुविचारित पर लक्ष्य/उप लक्ष्य हो, नहीं छेड़ना चाहिये? अन्ना का जन लोकपाल विधेयक वर्तमान स्वरूप में भ्रष्टाचार के विरुद्ध समाधान के स्थान पर एक गम्भीर राष्ट्रीय संकट का जनक भी सिद्ध हो सकता है। उसके सभी प्रावधानों की सघन समीक्षा भी आवश्यक है। उस पर राष्ट्रीय बहस छिड़नी चाहिये। अन्ना आंदोलन के दौरान देश में कुछ युवाओं ने उनसे भी लम्बा अनशन, जन लोकपाल विधेयक के वर्तमान स्वरूप के विरुद्ध किया है। उसे प्रचार माध्यमों में स्थान नहीं मिल पाया था। इससे समाज को उन प्रति-आंदोलनों की जानकारी नहीं है। सिविल सोसायटी के लोग भी जन लोकपाल विधेयक पर एकमत नहीं हैं। ऐसे में जनलोकपाल विधेयक के जो आपत्तिजनक प्रावधान हैं, जिनके कारण यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक समाधान के स्थान पर और बड़ी समस्या भी सिद्ध हो सकता है, उन पर संवाद व चर्चा खड़ी करना भी आज हमारा एक अहम् दायित्व प्रतीत होता है।
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