मातृहृदयी साध्वी ॠतंभरा

साध्वी ॠतंभरा प्रत्यक्ष में समाज जीवन की ‘दीदी मां’ कहलाती हैं। धार्मिक क्षेत्र के अलावा सामाजिक क्षेत्र में भी उनका अनोखा योगदान है। उनका पूर्व नाम निशा था। पंजाब के लुधियाना जिले के गांव दोराह में उनका एक हलवाई के परिवार में जन्म हुआ। बचपन से ही उनमें आध्यात्मिक प्रवृत्ति थी। 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने युगपुरुष महामंडलेश्वर परमानंद स्वामी से दीक्षा ली और साध्वी बन गईं। राष्ट्र सेविका समिति और विश्व हिंदू परिषद में उनका कार्य उल्लेखनीय है।

वे वही साध्वी ऋतंभरा हैं जिनकी सिंह गर्जना ने 1989-90 के श्रीराम मंदिर आंदोलन को बल प्रदान करने का महान कार्य किया था, परन्तु उसी आक्रामक सिंहनी के भीतर वात्सल्य से परिपूर्ण मातृत्व हृदय भी है जो सामाजिक संवेदना के लिए द्रवित होता है। यही हृदय की विशालता हिन्दुत्व का आधार है, जो अन्याय का दृढ़तापूर्वक सामना करता है और संवेदना से द्रवित होकर समाज के उत्थान के लिए शक्ति प्रदान करता है।

उनका वृंदावन में स्थापित ‘वात्सल्य ग्राम आश्रम’ इसका जीवंत उदाहरण है। यह आश्रम करीब 54 एकड़ परिसर में है। इस आश्रम में पराश्रित बच्चे, महिला और वृद्धों के निवास की व्यवस्था है। आश्रम के विशाल दरवाजे के बाईं ओर एक पालना है, जहां कोई भी व्यक्ति, किसी भी समय अनचाहे या अनाथ शिशु को रखकर जा सकता है। पालने में बच्चा छोड़कर जाने वाले व्यक्ति को आश्रम से संबंधित सदस्य किसी भी प्रकार का प्रश्न नहीं पूछता। पालने में कोई बच्चा रखते ही पालने पर लगा सेंसर आश्रम के व्यवस्थापन को इसकी सूचना देता है और आश्रम का कोई अधिकारी आकर उस बच्चे को आश्रम ले आता है। आश्रम में प्रवेश होते ही वह बच्चा वात्सल्य ग्राम परिवार का सदस्य हो जाता है। अब वह अनाथ नहीं कहलाता। उसे आश्रम में ही मां, मौसी, दादा-दादी; सब रिश्तेदार मिल जाते हैं ! यहां लाकर छोड़े गए प्रत्येक बच्चे का उपनाम परमानन्द रखा जाता है। ‘परमानन्द’ यह साध्वी ऋतंभराजी के गुरु का नाम है।

आश्रम में बच्चों के लिए, सामवेद गुरुकुलम् पाठशाला है। यहां सीबीएससी के पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई के साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास के भी उपक्रम चलाए जाते ह््ैं। यहां के बगीचे में बच्चों के सामान्य ज्ञान के विकास के लिए विविध प्राणियों के पुतले रखे गए ह््ैं। बच्चों की नैतिक शिक्षा के लिए रामायण आदि महाकाव्य के प्रसंगों की झांकियां बनाई गई ह््ैं। इन बच्चों को प्राकृतिक चिकित्सा और योग की भी शिक्षा दी जाती है। लड़कों को पांचवीं तक आश्रम के गोकुलम् में रखा जाता है, फिर आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें भोसला मिल्ट्री स्कूल जैसे भारत की अच्छी निवासी शालाओं में भेजा जाता है।
इस शाला के अतिरिक्त आश्रम की दूसरी भी एक शाला है। जहां बाहर के करीब 350 विद्यार्थी मात्र 10 रुपये मासिक शुल्क देकर पढ़ते ह््ैं। इन विद्यार्थिंयों को शाला का गणवेश, एक समय का भोजन और शाला के लिए आवश्यक साहित्य नि:शुल्क दिया जाता है।

परिवार द्वारा तिरस्कृत व परित्यक्त महिलाओं के लिए भी आश्रम में गोकुलम् की व्यवस्था है। यहां तीन महिलाओं का- मां, मौसी और दादी, ऐसा एक परिवार बनाकर, प्रत्येक परिवार को निवास के लिए सभी सुविधाओं से मुक्त चार कमरों का एक फ़्लैट दिया जाता है। इस एक परिवार के साथ पांच से दस बच्चे रहते ह््ैं। इस प्रकार के तीस परिवार गोकुलम् में रहते हैं। परिवार की इन महिलाओं के द्वारा उन बच्चों को संस्कार दिए जाते ह््ैं। भारतीय रीति-रिवाज की संकल्पना को स्पष्ट करते हुए उनका पालन-पोषण किया जाता है तथा सामान्य व्यवहार की शिक्षा और आत्मरक्षा का भी प्रशिक्षण दिया जाता है।
पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए आश्रम में ‘गीता रत्न’ प्रशिक्षण केन्द्र है, जहां इन महिलाओं को बेकरी उत्पाद, एम्ब्रॉयडरी आदि स्वयं रोजगार का प्रशिक्षण दिया जाता है।

आश्रम में अतिदक्षता विभाग (आईसीयू) की सुविधा सहित सभी वैद्यकीय सुविधाओं से युक्त रुग्णालय भी है। इसकी सेवायें आश्रम के निवासियों के साथ ही बाहर के गरीब लोगों के लिए भी उपलब्ध हैं। यहां नेत्र रुग्णालय में भी नि:शुल्क चिकित्सा सेवा दी जाती है।

साध्वी ऋतंभरा कहती हैं, ‘मैंने बीस वर्ष पूर्व दिल्ली के ज्वालानगर में महिला सशक्तिकरण योजना के अंतर्गत महिलाओं को स्वयंरोजगार प्रशिक्षण देने का काम शुरू किया था। 2003 में जब मैं वृंदावन आई तब उस समय आश्रम की सहायता करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं था। लोगों ने सहायता दी और आज आप उसके परिणाम देख रहे ह््ैं।’

 

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