वेदों में मातृत्व

वेदों मेें मां और उसके शिशु के संबंध के विषय में कई पहलुओं से वर्णन किया गया है। केवल जन्म देने के उपरांत ही मातृत्व आता है ऐसा नहीं है। दुर्बलों को प्रेमपूर्वक आधार देनेवाला और उनका पालन-पोषण करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति मां की ही भूमिका में होता है। अत: जन्म देने वाली अपनी माता के समान ही प्रेम से हमारा संगोपन करनेवाले ईश्वर को भी वैदिक मानव मातृतुल्य ही मानता है।

वेदों में उल्लेखित ‘मातृ’ शब्द का तत्कालीन संस्कृत भाषा में अर्थ है ‘निर्माण करने वाली’। वेदकालीन समाज की कुटुंब व्यवस्था मेें मां की भूमिका इसी से मिलती जुलती थी। बच्चों का संगोपन करने वाली और उनके व्यक्तित्व को आकार देनेवाली मां को पुरुषप्रधान संस्कृति में भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

अथर्ववेद में भी सुखी परिवार को माता का अन्य सदस्यों से सौहार्द्रपूर्ण संबंध होने का उल्लेख मिलता है। वेद कालीन लोगों की यह धारणा थी कि माता गृहस्वामिनी और पूरे परिवार की विधात्री है। विद्वान और स्वतंत्र महिलाओं को अपने बच्चों का प्रथम गुरु माना जाता था।

‘अनुव्रत: पितु: पुत्रो मात्रा भवतु संमना:।’ (अथर्ववेद 3.30.1)
वैदिक ऋषि कहते हैं कि बच्चों का व्यवहार माता के अनुकूल और उसके मन को अल्हादित करनेवाला होना चाहिये।
‘सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि व:। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥’ (अथर्ववेद 3. 30. 2)
इसमें परिवार के सदस्य एक दूसरे पर निरपेक्ष प्रेम करने की कामना करते हैं जिस तरह एक गाय अपने बछड़े पर करती है। सभी रिश्ते मां और बेटे के संबंधों जितने ही पवित्र और दृढ़ हों यह कहने से परोक्ष रूप में यह सिद्ध होता है कि वैदिक लोगों के जीवन में इस रिश्ते का कितना महत्व था।

विवाह का मुख्य उद्देश्य संतान उत्पन्न करते हुए वंश को आगे बढ़ाना था। अत: यह उम्मीद की जाती थी कि विवाह बंधन में बंधी स्त्री अच्छी और वीर पुत्र को जन्म देने वाली माता हो। इसके लिये विभिन्न संस्कार भी किये जाते थे।
यह नववधु सभी को अपने गर्भ में समा लेनेवाली पृथ्वी के समान, वीर पुत्रा इन्द्राणी के समान सुदृढ़ गर्भ धारण करें, सभी देवता गर्भ का यथायोग्य पोषण करें और योग्य समय पर जन्म लेनेवाला पुत्र अपनी माता का रक्षण करने वाला, वीर और श्रेष्ठ हो। वेदों में यह सदिच्छा व्यक्त की गई है।

पुत्रवती होना स्त्री के भाग्य का परमोत्कर्ष माना जाता था। मातृत्व का आदर करने वाली वेदकालीन लोगों की प्रवृत्ति अथर्ववेद की निम्नांकित पंक्तियों में उल्लेखित है। ‘हे कन्या, तुम्हें जन्म देने वाला मातृपक्ष और तुम्हारे पति को जन्म देनेवाली सास और उसका परिसर दोनों का तुम मिलन करो।

वैदिक साहित्य में कुछ उपमायें भी मातृत्व के विशेष गौरव का उल्लेख करनेवाली दिखाई देती हैं।
‘पुत्रवती स्त्री के चारों ओर जैसे उसके बच्चे जमा हो जाते हैं, वैसे ही ये ॠत्विज भी सोम के चारों ओर जमा हो गए।’ अथवा ‘गाय जिस तरह वात्सल्य भाव से अपने बछड़े को चाटती है उस तरह हमारे स्तोत्र इन्द्र को स्पर्श करें।’ तथा, ‘जिस तरह रात माता की तरह रक्षण करनेवाली है। दिन हमें रात के स्वाधीन करता है और स्वयं आराम करता है।’

वेदों की जिन चुनिंदा सूक्तियों में विश्व की उत्पत्ति का चिंतन किया गया है, इस चरावर के अस्तित्व के विषय में कौतुहल व्यक्त किया गया है, उससे भी वैदिक काल के लोगों का देवताओं और प्रकृति के संदर्भ में ममतापूर्ण भाव प्रकट होता है।
ऋग्वेद में देवों के साथ ही देवियों की भी प्रार्थना की गई है। गिनती में देवियों की संख्या कम होने के बावजूद भी जनमानस में उनका महत्वपूर्ण स्थान था। इन में से कुछ को मां के रुप मेें पूजा जाता है।

इन देवियों में अदिती का नाम प्रमुख रूप से लिया जाना चाहिये। आदिती का वर्णन देवमाता के रूप में किया जाता है। आदित्यों की माता अर्थात देवों की जन्मदात्री अदिती सभी राजाओं और विश्व की सभी श्रेष्ठ और सामर्थ्यशाली पुत्रों की माता है। इतना ही नहीं विश्व के चराचर पर नियंत्रण करने वाली अर्थात वैश्विक नियमों की भी स्वामिनी वही है। अदिती सभी का संरक्षण करनेवाली है। सभी का कुशलता से मार्गदर्शन करनेवाली है। उसके पुत्रों अर्थात आदित्यों के साथ किया गया उसका स्तवन दुखों से रक्षा और कल्याण की कामना के साथ किया जाता है। पापों से और अपराधबोध से मुक्ति के लिये उसकी सर्वाधिक प्रार्थना की जाती है। इस वर्णन से यह कहा जा सकता है कि इस प्रार्थना के पीछे का स्थायी भाव यही है कि हम चाहें कितनी भी गलतियां करें, कोई हमें क्षमा करे न करे हमारी माता हमें अवश्य क्षमा कर देंगी।

अदिती शब्द की व्याख्या ‘न दीयते खण्ड्यते बध्यते बृहत्वात्’ के रूेप में की जाती है। सभी बंधनों से मुक्त और अपने आराधकों को भी बंधनों से मुक्त रखने वाली माता के रूप में अदिती की प्रतिमा है।

कई जगहों पर अदिती की कल्पना पृथ्वी के रूप में की गई है। वेदों के ऋषि कहते हैं कि यह पृथ्वी या अदिती ही माता, पिता, पुत्र, देव आदि है। जो उत्पन्न हुआ है, हो रहा है और होगा वह पृथ्वी से ही। अन्न उत्पन्न करनेवाली पृथ्वी का भूमाता के रूप में ऋषि गुणगान करते हैं।

भूमिसूक्त मेें पृथ्वी माता का स्तवन करनेवाले सूक्त में ऋषि पृथ्वी के साथ अपने संबंधों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:। (अथर्ववेद 12.1.12)

साथ ही यह आशा करते हैं कि जिस तरह माता अन्न के सार के रूप में दूध पिलाकर अपने बेटे का पोषण करती है उसी तरह पृथ्वीमाता भी हमें पुष्ट करें। हमारी कामना सफल करें। वे पृथ्वी से प्रार्थना करते हैं कि तुम्हारे अंदर जीवों को पुष्ट करनेवाले जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं उनका लाभ मुझे मिले।

पृथ्वी को संतुष्ट करने के लिये चावल के दानों को स्मरण कर ऋषि कहते हैं कि उचित मंत्रपाठों के साथ तुम्हें अग्नि में समर्पित करता हूं। जिस तरह मां अपने बेटों के करीब होती है उसी तरह तुम भी अपनी मां अर्थात पृथ्वी के करीब रहो।
पृथ्वी मनुष्य और सभी जीवों का पोषण करती है। यह वैज्ञानिक सत्य है। परंतु अपना सब कुछ हमें देने वाली पृथ्वी को माता के समान मानकर उसकी अमूल्य सम्पदा को नष्ट न कर अत्यंत संयत और कृतज्ञ भाव से स्वीकार करने की वैदिक मानसिकता अनुकरणीय है। इसके अलावा भटकने वाले वैदिक लोगों की स्थिरता पूर्ण जीवन यात्रा जिनके कारण सुलभ हुई उन नदियों को भी माता का स्थान दिया गया है। ऋग्वेद की एक सूक्ति में सरस्वती नदी का उल्लेख ‘अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति’ के रूप में किया गया है। जिसमें उसे ‘अम्बितमे’ कह कर गौरवान्वित किया गया है।

ऋषि विश्वामित्र विपाश और शुतुद्री नदियों की स्तुति करते हुए उन्हें मातृतुल्य कहते हैं। वे उन नदियों से अनुरोध करते हैं कि वे अपना प्रवाह कम करें जिससे आगे मार्गक्रमण किया जा सके। उनके इस निवेदन पर नदियां भी उसी तरह नीचे झुक जाती हैं जैसे कोई मां अपने शिशु को स्तनपान कराने के लिये नीचे झुकती है।
वेदों में मातृका नाम से जिन देव समूहों का उल्लेख किया जाता है वे सात-आठ हैं। उनमें से अष्टमातृकाओं का वर्णन अग्रांकित है।

ब्राह्मी माहेश्वरी चण्डी वाराही वैष्णवी तथा।
कौमारी चैव चामुण्डा चर्चिकेत्यष्टमातर:॥

इन मातृकाओं के मंदिर या मूर्तियां आज भी भारत में विभिन्न स्थानों पर दिखती हैं। दक्षिण भारत, नेपाल जैसी जगहों पर आज उनकी आराधना की जाती है। माता के रूप में पूजन की जाने वाली इन देवियों में स्त्री के संगोपन और संहार करने वाले दोनों रूप दिखाये गये हैं। इससे स्पष्ट होता है कि माता अपने बच्चे के हित के लिये प्रसंगानुरूप मृदु और कठोर हो सकती है। इसके अलावा वेदों में उषा, वाक् यानि वाणी, ईडा, पृष्णी, बृहद्दिवा, एकाष्टका इत्यादि का भी सभी देवों की या अग्नि इत्यादि देव की माता के रूप में वर्णन मिलता है। साथ ही वेदमाता के रूप में गायत्री या छन्दा की भी स्तुति दिखाई देती है।
वेदों के बाद पुराणकाल में और आज भी जिनकी प्रमुखता से उपासना की जाती है वे लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती आदि देवियों की ओर भी माता के रूप में ही देखा जाता है। उनकी आराधना करके हम यही मनीषा रखते हैं कि उनका मातृवत् कृपाछत्र हमें प्राप्त हो।

अर्धनारीनटेश्वर जैसी देवता की उपासना भी यही सिद्ध करती है कि किसी भी देवता को माता रूपी स्त्रीत्व के बिना पूर्णता प्राप्त नहीं होती। प्रकृति के मूर्त अमूर्त आविष्कारों के आगे नतमस्तक होकर उसमेें माता का प्रेम देखने वाले वैदिक ऋषियों से लेकर हमारे सारे अपराधों को क्षमा कर प्रेम की छाया देने वाले विट्ठल भगवान को मां (माऊली) मानका उनके दर्शन हेतु जानेवाले वारकरी समाज तक सभी को भगवान के अंदर के देवत्व से अधिक मातृत्व भाव आकर्षित करता है।
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