अफगानिस्तान : बुलेट पर भारी पड़ा बैलट

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति पद और परिषदों के लिए हुए चुनाव में तालिबानी बुलेट पर बैलट भारी पड़ा। चुनाव से पहले तालिबान ने बंदूक के बल पर मतदान रोकने की घोषणा की थी। तालिबान का तर्क था कि देश मे विदेशी सैनिकों की उपस्थिति में चुनाव बेमतलब है। पर तालिबानी धमकियों और दहशत के माहौल की परवाह न करते हुए अफगानिस्तान के करीब एक करोड़ 35 लाख मतदाताओं में से 58 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान में हिस्सा लिया। छह हजार मतदान केंद्रों पर छिटपुट हिंसा को छोड़कर शांतिपूर्ण मतदान हुआ। सबसे बड़ी बात यह रही कि एक जमाने में तालिबान का गढ़ माने जाने वाले कंधार में भी भारी मतदान हुआ।

अफगानिस्तान की जटिल चुनावी प्रक्रिया के कारण प्रथम चरण में विजयी उम्मीदवार की घोषणा लगभग असंभव हो गई है। प्रारंभिक परिणाम के मुताबिक अब्दुल्ला को सर्वाधिक 44.9 प्रतिशत मिले, जबकि 31.5 प्रतिशत मतों के साथ अशरफ गनी दूसरे स्थान पर रहे। वर्तमान राष्ट्रपति हामिद करजई के चहेते उम्मीदवार जल्मी रसूल को महज 11.5 प्रतिशत मत मिले। अफगान कानून के मुताबिक यह प्रारंभिक चुनाव परिणाम स्वतंत्र चुनाव शिकायत आयोग के पास जाएगा। आयोग चुनाव में धांधली आदि शिकायतों की जांच-पड़ताल के बाद अपना निष्कर्ष देगा। इसके बाद यदि किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिले तो संभवत: जून में दूसरे चरण का मतदान होगा। अगर यह सब सुगमता से चलता रहा तो सितंबर के अंत तक नए राष्ट्रपति शपथ लेंगे।

वैसे प्रारंभिक चुनाव परिणाम से अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि पहले दौर में किसी भी उम्मीदवार के विजयी घोषित किए जाने की कोई संभावना नहीं है। 2009 के चुनाव में अब्दुल्ला अब्दुल्ला दूसरे स्थान पर रहे थे। उन्होंने पहले स्थान पर रहे हामिद करजई पर चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए दूसरे चक्र के चुनाव में भाग लेने से इंकार कर दिया था। इस तरह हामिद करजई बिना दूसरे चक्र के मतदान के ही राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए थे।

अफगानिस्तान की जनता और विश्व शांति के हित में अच्छा होगा कि अब्दुल्ला और अशरफ गनी आपसी समझौता कर एक मिलीजुली सरकार का गठन करें। अब्दुल्ला राष्ट्रपति तथा अशरफ गनी उपराष्ट्रपति का पद संभालें। इन दोनों की मिलीजुली सरकार ही पूरे अफगान जनता की प्रतिनिधि सरकार हो सकती है। अफगानिस्तान में चार प्रमुख जातीय समूह- पश्तून, ताजिक, हाजरा और उजबेक हैं। इस चुनाव में अब्दुल्ला को मुख्यत: ताजिक और हाजरा समूहों का समर्थन मिला, जबकि अशरफ गनी को पश्तूनों और उजबेकों का समर्थन मिला। यदि अब्दुल्ला और गनी में तर्‍हा मेें भागीदारी को लेकर कोई समझौता हो जाता है तो सरकार के स्थायित्व की संभावना पुख्ता हो जाएगी।

अब्दुल्ला अफगानिस्तान के विदेश मंत्री रह चुके हैं। वे उत्तरी मोर्चे के मरहूम नेता, पंजशीर घाटी के शेर अहमदशाह मसूद के नजदीकी रहे हैं। अशरफ गनी विश्व बैंक के पूर्व अधिकारी और करजई के वित्त मंत्री रह चुके हैं। भारत के लिए यह सुखद है कि ये दोनों ही नई दिल्ली के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के इच्छुक हैं।

राष्ट्रपति कोई भी बने, भारी मतदान से अफगानी जनता के बढ़े मनोबल की पुष्टि हुई है। ज्ञातव्य है कि यह वही अफगानिस्तान है, जहां राजधानी काबुल सहित अनेक भागों में लोग अपने घर से बाहर निकलने में डरते रहे हैं। अफगानिस्तान का 5 अप्रैल का मतदान शांति, स्थिरता और खुशहाली के लिए मतदान है। वहां की जनता ने स्पष्ट तौर से यह संदेश दिया है कि वह हिंसा की राजनीति और विदेशी हस्तक्षेप से मुक्त होकर नवनिर्माण करना चाहती है। लंबे समय तक बुरी तरह हिंसाग्रस्त रहे एक देश में यह परिवर्तन ऐतिहासिक महत्व रखता है। अब जबकि अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने के लगभग 7 महीने ही रह गए हैं, अफगान बलों ने एकजुटता, अनुशासन और उच्च मनोबल का परिचय दिया है। करीब साढ़े तीन लाख सैनिकों की मोर्चा बंदी के कारण ही तालिबान मतदान में कोई बड़ी रुकावट नहीं पैदा कर पाए।

पाकिस्तान और पश्चिमी मीडिया के एक वर्ग में यह माहौल बनाने का फैशन है कि अमेरिकी सैनिकों के हटने के बाद अफगान सुरक्षा बलों के बिखरने और एक बार फिर देश पर तालिबान के काबिज होने में अधिक समय नहीं लगेगा, इस संदर्भ में अफगानिस्तान के इतिहास के एक दिलचस्प घटनाक्रम को स्मरण रखना चाहिए। 1990 में सोवियत रूस के सैनिकों के हटने से कई महीने पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए तैयार की गई रिपोर्ट में बताया था कि सोवियत रूस सैनिकों की वापसी पूर्ण होने से पहले ही नजीबुल्लाह सरकार का पतन हो जाएगा। पर सोवियत सैनिकों के हटने के बाद तीन साल तक नजीबुल्लाह सरकार चलती रही। यदि सोवियत संघ का विघटन न होता और मास्को से सहायता जरी रहती तो सोवियत सेना की वापसी के बाद भी शायद अफगानिस्तान मेें तालिबानी सत्ता पर कब्जा न जमा पाते पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की सक्रिय सहायता से अफगानिस्तान में तालिबानों के हौसले बढ़े और अफगान सेना का मनोबल टूट गया। हालत यह हो गई कि सेना के एक वरिष्ठ कमांडर अब्दुल रशीद दोस्तम ने अपने पूरे उजबेक दस्ते के साथ बगावत कर दी थी। परिणामस्वरूप नजीबुल्लाह सरकार का काबुल में पतन हुआ। नजीबुल्लाह फांसी पर लटका दिए गए और तालिबानी सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रहे।

(काबुल में नई सरकार के लिए स्थितियां अनुकूल हैं। 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में तालिबान की जो ताकत थी, आज उससे बहुत कम है। सोवियत कठपुतली की छवि वाले नजीबुल्लाह के खिलाफ लड़कों को एकजुट करना अपेक्षाकृत आसान था। नए निर्वाचित होने वाले राष्ट्रपति पर नास्तिक या विदेशी समर्थन पर टिके होने का आरोप लगाना उतना आसान नहीं होगा। हालांकि इस बात की पूरी संभावना है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई अफगानिस्तान में बदअमनी फैलाकर वहां अपना प्रभाव दृढ़ करने की कोशिशोें से बाज नहीं आएगी। पाकिस्तान की हर संभव कोशिश रहेगी कि अफगानिस्तान में फिर से तालिबान का ही परचम लहराए। इससे उसे दोहरा लाभ होगा। एक तरफ वह अपने परंपरागत प्रतिद्वंद्वी भारत को अफगानिस्तान से दूर रखते हुए क्षेत्र में सामरिक तौर पर अपनी चौधराहट जमा सकेगा। दूसरी तरफ, वह अपने मित्र चीन की बढ़ती ताकत के साए में रहते हुए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर पिछले अनेक दशक से मिल रही अमेरिकी आर्थिक मदद का दोहन भी करता रहेगा। मगर आज पाकिस्तान खुद गहरे संकट से जूझ रहा है। अफगान तालिबान के सहोदर, तहरीक-ए-तालिबान की जड़ें पाकिस्तान के कई हिस्सों में फैल चुकी हैं। नवाज शरीफ सरकार की उनसे समझौते की कोशिशें अभी तक नाकामयाब साबित होती रही हैं। खिसियानी बिल्ली की तरह पाक सरकार समय-समय पर इस आशय की खबरें छपवाती रहती है कि तहरीक-ए-तालिबान की पीठ पर ‘विदेशी एजेंसियों’ (इशारा भारत, अफगानिस्तान और ईरान की तरफ) का हाथ है।

2014 के अंत तक अमेरिका और उसके साथी देशों की फौजें अफगानिस्तान से हट जाएंगी। इस बात की पूरी संभावना है कि करजई की उत्तराधिकारी सरकार अमेरिका के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर कर देगी क्योंकि दोनों ही प्रमुख उम्मीदवारों अब्दुल्ला और अशरफ गनी ने इस समझौते पर अपनी सहमति व्यक्त की है। प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका 2014 के बाद अफगानिस्तान में 10 हजार सैनिक रख सकेगा। ये सैनिक अफगान सुरक्षा बलों को ट्रेनिंग देंगे और खास तरह की कार्रवाइयों में उनकी सहायता भी करेंगे।

दुर्भाग्य की बात यह है कि अफगानिस्तान में न तो व्यापक प्रभाव वाली राजनीतिक पार्टियां हैं और न सार्वजनिक संस्थाएं। वहां कबीले हैं, कबीलाई निष्ठाएं और महत्वाकांक्षाएं हैं, जंगखोर सरदार हैं, हेरोस उत्पादक और व्यापारी हैं तथा तरह-तरह के रंगों वाले जेहादी हैं। इस माहौल में वहां काम करने वाली एक ही संगठित संस्था है और वह है सेना। यह सेना एक ऐसी सरकार के तहत काम करेगी, जो अभी भी अपने करीब 90 फीसदी बजट के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर होगी।

दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के लिए अफगानिस्तान का सामरिक महत्व है। यहां अपार खनिज संपदा है। अमेरिका के भूगर्भीय सर्वेक्षण अमेरिकी रक्षा मंत्रालय और अफगान सरकार के संयुक्त सर्वे के मुताबिक अफगानिस्तान में लोहा, तांबा, सोना, कोबाल्ट और लीथियम की विशाल संपदा है। ज्ञात इतिहास में इसका दोहन नहीं हुआ है। सर्वे में बताया गया है कि इस अछूती संपदा के बूते अफगानिस्तान दुनिया के सबसे दौलतमंद देशों में अपना स्थान बना सकता है।

अफगानिस्तान में लोकतंत्र की स्थिरता और सफलता भारत के लिए नितांत जरूरी है। भारत ने अफगानिस्तान मे अरबों रुपए का निवेश कर रखा है। 2011 में दोनों देशों ने सामरिक सहकार के समझौते पर हस्ताक्षर किए। पहली बार हेरात, कंधार, जलालाबाद और मजार-ए-शरीफ में भारतीय वाणिज्य दूतावास खुले। भारत को करजई के बाद अफगानिस्तान में जो भी नेतृत्व आएगा, उसके साथ काम करने को लेकर एक ऐसा खाका तैयार करना होगा, जो यह विश्वास दिला सके कि भारत का मकसद वहां सिर्फ शांति और सुरक्षा कायम करना है, अपना वर्चस्व बनाना नहीं।

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