बारिश और पंचांग

हमारे प्राचीन साहित्य में वर्षा के बारे में अनुमानों पर विस्तार से विचार किया गया है। पराशर मुनि ने इसका एक शास्त्र ही विकसित किया था। वराहमिहिर ने अपनी वृहद्संहिता में पर्जन्य और पंचांग के परस्पर सम्बंधों पर भाष्य किया है।
हमारे यहां पंचांगों के जरिए बारिश के अनुमान व्यक्त करने की पुरानी परम्परा है। आखिर उसका आधार क्या है? वराहमिहिर की वृहद्संहिता का गहन अध्ययन करने पर निम्न निष्कर्ष निकलते हैं-

* रवि मौसम व पर्जन्य का मुख्य कारक है। उससे अन्य ग्रहों के होने वाले योगों से यह अनुमान व्यक्त किया जाता है। सभी ग्रहों के भ्रमण, राश्यांतर, नक्षत्रांतर, उदयास्त, युतियां और क्रांतियों का विचार किया जाता है।

* ग्रह, राशि व नक्षत्र का मौसम के दृष्टिकोण से उष्ण, शीतल, सजल और निर्जल के रूप में विभाजन किया जाता है।

* मेष, वृषभ, मिथुन, वृश्चिक राशि प्रवेश को अग्रक्रम और अश्विनी से स्वाति नक्षत्र तक रवि प्रवेश का उसकी कुंडलियों का विचार।

* प्रत्येक वर्ष किस मंडल का है इस पर विचार कर मोटा अनुमान लगाया जा सकता है और वह लगभग सही होता है।

फल ज्योतिष में मौसम व पर्जन्य का किस तरह विचार किया जाता है यह उदाहरण के साथ इस तरह बताया जा सकता है- बारह ग्रह, बारह राशियां व सत्ताईस नक्षत्रों का विचार हर वर्ष के ग्रह योगों के अनुसार करना होता है। रवि का उत्तर गोलार्ध में भ्रमण नक्षत्रों से होता है। इसी तरह रवि की क्रांति का भी विचार करना होता है। रवि की उत्तर क्रांति का आरंभ 21 मार्च को होता है। उत्तर क्रांति प्रति दिन बढ़ कर 20 जून को परम क्रांति तक अर्थात 23 अंश 26 कलाओं तक पहुंचती है। 23 जून से वह कम होनी शुरू होती है और अंत में 22 सितम्बर को शून्य अंश होकर रवि दक्षिण गोलार्ध की ओर मुड़ता है।

रवि मौसम का प्रधान कारक है। चार माह वर्षा ॠतु, चार माह शीत ॠतु और शेष चार माह ग्रीष्म ॠतु होती है यह सब को पता है। लेकिन ॠतुओं की तीव्रता हर साल एक सी नहीं रहती। क्योंकि अन्य ग्रहों का भी भ्रमण जारी रहता है और इसका मौसम पर असर पड़ता है। इन ग्रहों के रवि के साथ और परस्पर योग इसका कारण है। इन योगों पर विचार कर परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। मंगल, प्लूटो और गुरु गर्मी बढ़ाते हैं, शीत कम करते हैं व बारिश में भी हस्तक्षेप करते हैं। चंद्र, शुक्र और नेपच्यून पूर्ण जल ग्रह हैं और उनके योग बारिश का कारण बनते हैं। शनि व हर्षल शीत ग्रह हैं। बुध हवा का कारक है और उसके कारण बादल यहां से वहां जाते हैं। इससे बारिश होती है या नहीं भी होती। इन सभी ग्रहों के योग तथा नक्षत्र, राशियां, प्रत्येक ग्रहों की क्रांतियों, गति, वक्री, मार्गी व स्तंभी स्थिति, उदयास्त तथा ग्रहों की युतियों व अन्य योगों का विचार कर अनुमान लगाए जा सकते हैं।

इस वर्ष कम बारिश

मौसम विभाग ने इस वर्ष औसत से कम बारिश का आरंभिक अनुमान व्यक्त किया है। मौसम विभाग ने निम्न पांच घटकों के आधार पर यह अनुमान व्यक्त किया है-

* उत्तर अटलांटिक व उत्तर प्रशांत महासागर की सतह पर तापमान में अंतर

* विषुवृत्तीय दक्षिण हिंदी महासागर की सतह का तापमान

* पूर्व एशिया में समुद्री सतह के करीब का हवा का दबाव

* उत्तर पश्चिम यूरोप की सतह का हवा का तापमान

* विषुवृत्तीय प्रशांत महासागर पर उष्ण पानी की मात्रा

इस वर्ष औसत के 95 फीसदी के करीब बारिश का अनुमान है। इसकी श्रेणियां निम्नानुसार बांटी गई हैं- कम बारिश अर्थात औसत से 90 फीसदी के कम वर्षा- 23 प्रतिशत, औसत से कम अर्थात औसत से 90 से 96 प्रतिशत के बीच वर्षा- 33 प्रतिशत, औसत अर्थात 96 से 104 फीसदी- 35 प्रतिशत तथा अतिवृष्टि अर्थात औसत से 100 प्रतिशत से ज्यादा वर्षा- 1 प्रतिशत।
वर्ष 1951 से 2000 तक के आंकडों के अनुसार देश में जून से सितम्बर के वर्षा काल में औसत 890 मिमी वर्षा होती है। इस वर्ष की बारिश में इसमें से 95 प्रतिशत का अनुमान है। बारिश पर विपरीत परिणाम करने वाला ‘एल-नीनो’ घटक सक्रिय होने की इस वर्ष 60 प्रतिशत संभावना है। 1991 से अब तक वर्षा काल में ‘एल-नीनो’ घटक 16 बार अपना प्रभाव दिखा चुका है। जून में संशोधित अनुमान घोषित किए जाएंगे। वे ज्यादा सटीक होंगे।

सत्ताईस नक्षत्रों में से अश्विनी पहला नक्षत्र व बारह राशियों में से मेष पहली राशि है। इनमें रवि जिस दिन व जिस समय आता है तब से मौसम विचार शुरू होता है। प्रति वर्ष 13-14 अप्रैल को रवि का मेष- अश्विनी प्रवेश जिस समय होता है उस समय की कुंडली बनानी होती है। कुंडली जिस स्थान की बनानी हो उस स्थान के अक्षांश-रेखांश का विचार करना होता है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र का विचार करते समय महाराष्ट्र के मध्य पर स्थित 19 अक्षांश व 76 रेखांश की कुंडली बनाई जाती है। यह महाराष्ट्र तक सीमित है। अन्य प्रदेशों व क्षेत्रों के बारे में भी यही व्यवस्था लागू होती है। बारिश के लिए मृग से स्वाति तक 11 नक्षत्र प्रवेश कुंडलियों, ग्रीष्म के लिए अश्विनी, भरणी, कृत्तिका व रोहिणी नक्षत्र प्रवेश कुंडलियों पर विचार करना होता है। इसके अलावा अप्रैल से अक्टूबर तक ग्रहों के नक्षत्रांतर, राश्यांतर व युतियों का भी विचार करना होता है। अश्विनी-मेष कुंडली में लग्न में कौनसा नक्षत्र है इस पर उस क्षेत्र में बारिश का अनुमान निर्भर होता है। भारत में सभी स्थानों पर लग्न में एक ही नक्षत्र नहीं होता। इसलिए हर क्षेत्र के पूर्वानुमान अलग-अलग होते हैं।

वराहमिहिर की वृहद संहिता में 40वें ‘सम्यजातक’ अध्याय में फसलें किस समय अच्छी होती हैं और कब खराब होती हैं आदि जानकारी दी गई है। वृषभ और वृश्चिक में रवि का जब प्रवेश होता है तब रवि से दूसरे स्थान में अर्थात पापस्थान में पापग्रह होने पर जल्द बुआई किए बीजों का नाश होता है लेकिन देर से बुआई किए गए बीज उत्तम साबित होते हैं। गर्मी कब बढ़ेगी और उष्माघात के शिकार कब होंगे इसका भी अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके लिए मंगल की उत्तर क्रांति, उसका वक्रीत्व व उनकी रवि, प्लूटो व गुरू से होने वाली युति व प्रतियोग का विचार करना होता है। ग्रहों के भ्रमण नक्षत्रों व राशि से चलते समय उनकी क्रांतियों, अस्त, उदय, वक्री, मार्गी व स्तंभी स्थिति, अमावस्या, पौर्णिमा, तिथि और ग्रहों के राश्यांतरों पर भी गौर करना होता है।

बारिश रोकने वाले योग

* रवि के आगे मंगल का होना।

* शुक्र के आगे मंगल होने पर युद्ध, अनावृष्टि, उत्तर के लोगों के लिए कष्टकर, पीड़ादायक होना।

* शुक्र के आगे रवि आने पर ओले गिरते हैं।

* बुध व शुक्र के बीच रवि आने पर बारिश नहीं होती।

* शनि वक्री होने पर।

* गुरू व मंगल एक दूसरे से 30 अंश के भीतर होने पर बरसात नहीं होती।

बारिश के विशेष योग

* रवि, बुध, शुक्र नक्षत्र में करीब आने पर।

* बुध व शुक्र की युति।

* जिस ग्रह की नाडी में पौर्णिमा का चंद्र होने पर उस ग्रह से वह युक्त व दुष्ट होने पर बारिश होती है। सजल नाडी में होने पर अच्छी वर्षा होती है।

* वर्षा काल में मंगल जलराशि में या वृश्चिक में आने पर बारिश होती है।

नक्षत्र प्रवेश कुंडलियों में सभी ग्रहों की छह नाडियों में किस तरह विभाजन हुआ उस पर गौर कर कितनी मात्रा में वर्षा होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। आश्लेषा, मघा श्रवण व धनिष्ठा नक्षत्र अमृत नाडी के हैं। वहां चंद्र जलग्रह से युक्त व दुष्ट हो तो क्रमशः 1 दिन, 3 दिन, 7 दिन लगातार वर्षा होती है। इसके लिए शुक्र, बुध, गुरू व नेपच्यून के योग जरूरी होते हैं। पुष्य, पूर्वा, अभिजित व शततारका नक्षत्र जलनाडी के और बुध के अधिपत्य में हैं। ऐसी नाडी में चंद्र विद्ध होने पर आधा दिन, साढ़े तीन दिन व तीन दिन क्रम से वर्षा होती है। पुनर्वसु, उत्तरा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपदा जैसे नीर नाडी के नक्षत्र शुक्र के अधिपत्य में हैं। सौम्य नाडी से चारों नाडियों में सभी ग्रहों से चंद्र विद्व होने पर क्रमशः 3-4-12 व 18 दिन वर्षा होती है। कोई भी ग्रह जलनाडी में होने पर उसका उदय, अस्त, वक्री, मार्गी जैसे योग आए तब अथवा उस ग्रह के नक्षत्रांतर या राश्यांतर हो तब वृष्टि होती है। जैसे जैसे बुध, शुक्र एक राशि में करीब आने लगे वैसे वैसे अच्छी बारिश होती है, लेकिन उनके बीच में रवि आने पर ‘रविमध्ययोग’ बनने से वर्षा खंडित होती है।

शुक्र का अस्त या उदय किस नक्षत्र में होता है और उस समय शुक्र उस नक्षत्र के उत्तर से दक्षिण की ओर अथवा उस नक्षत्र के ऊपर से जाने पर वर्षा की मात्रा निर्भर होती है। उदय व अस्त के समय शुक्र उस नक्षत्र के उत्तर से जा रहा हो तो अच्छी बारिश होती है और फसल भी अच्छी आती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर्षा के अनुमान यदि सही होते हों तो उसके पीछे के रहस्य को खोजना जरूरी है। उसके विज्ञान का पता लगाना आवश्यक है। पुराना मानकर उसकी अवहेलना करना उचित नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं है कि आधुनिक मौसम विज्ञान को तिलांजलि दे दे। उसका भी अपना महत्व है।

लेखक पंचांग और ज्योतिष के गहरे अध्येता थे। कृषि ज्ञानकोश का सम्पादन उनकी अमूल्य देन है।
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