सिंध हमारी जननी

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सिंध, हम समस्त सिंधियों (सिंध के सिंधी, हिंद के सिंधी एवं शेष विश्व के प्रवासी सिंधियों) की जननी है, मां है, माता है। क्योंकि, सभी सिंधियों की धमनियों में प्रवाहित रक्त, सिंध भूमि के अन्न एवं जल से निर्मित, माता सिंध के दूध से ही उत्पन्न हुआ है। अत: मां सिंध की सभी औलादों की नस्ल एक ही है- सिंधी प्रजाति।

सिंधी राजनैतिक एवं आर्थिक मजबूरियों के कारण, माता सिंध का पैतृक घर छो़डकर विश्व भर में बस गए हैं। परंतु पैतृक घर को पूरी तरह से भूल नहीं पाए हैं। वे अपनी माता सिंध के कुशलक्षेम जानने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं। दुर्भाग्यवश सरकारी प्रतिबंधों के कारण, अधिकतर सिंधी, सिंध नहीं जा पाते। मीडिया में भी सिंध के समाचार नगण्य ही आते हैं। अत: अधिकांश, माता सिंध की सुख सुविधा से बेखबर हैं। परंतु अब इंटरनेट पर जानकारियां मिलने लगी हैं। आइए, इनके आधार पर सिंध की आंतरिक स्थिति का अवलोकन करें। वर्तमान में, सिंध में सिंधी प्रजाति के सम्मुख मुख्यत: निम्न संकट हैं :

1) सिंधी नस्ल के लोगों का अपनी ही भूमि पर अल्पसंख्यक बनने का खतरा 2) सिंध की भौगोलिक अखंडता को खतरा 3) सिंधी प्रजाति की पूर्ण गुलामी का खतरा 4) सिंधुत्व गंवाने का खतरा।

1) अल्पसंख्यक बन जाने का खतरा

न्यायोचित तो यह था कि विभाजन के उपरांत भारत से आए मुहाजिरों को पाकिस्तान के सभी प्रांतों में बसाया जाता, परंतु पाकिस्तानी पंजाब ने केवल भारतीय पंजाब से आए पंजाबियों को ही आने दिया। अन्य सभी मुहाजिरों को केवल सिंध में लाया गया। परिणामत: 1947 में सिंधियों की 97 प्रतिशत जनसंख्या घटकर मात्र 60 प्रतिशत रह गई है। भारत से आए मुहाजिरों के अतिरिक्त कालांतर में तीस लाख अन्य मुस्लिम भगोड़ों, बर्मीयों, अफगानों, पठानों आदि को भी कराची में झोंका गया। वर्तमान में, सिंध में सिंधी 60 प्रतिशत तथा गैर सिंधी 40 प्रतिशत हैं। सिंध के सभी प्रमुख नगरों- कराची, हैदराबाद, सकवर, नवाबशाह और मीरपुर खास में सिंधी प्रजाति अल्पमत में आ गई है। जनसंख्या के इस 20 प्रतिशत के अंतर को भी समाप्त करके संपूर्ण सिंध में सिंधियों को अल्पसंख्यक बनाने के लिए गैर सिंधियों की आंखें अब सिंधी बहुल छोटे नगरों जैरुबाबाद, घोटकी, पन्याकुल आदि पर गड़ी हैं। तदनुसार सिंधी प्रजाति के एक महत्वपूर्ण अंश सिंधी हिंदुओं को निशाना बनाया गया है। मजहबी जुनून को भ़डकाकर इन नगरों के सिंधी मुसलमानों के माध्यम से हिंदुओं पर अत्याचार कर उन्हें वहां से पलायन हेतु मजबूर कर दिया गया है। हिंदू कन्याओं का मुसलमानों से जबरन निकाह कराने, लूट-पाट, डकैती, फिरौती के लिए अगवा करने की मुसीबतों से बचने के लिए उन्हें धर्म परिवर्तन करने अथवा अपना वतन छोड़ने हेतु बाध्य किया जा रहा है। अधिकांश हिंदुओं ने धर्म परिवर्तन से बचने के लिए पलायन का रास्ता चुना है। सिंधी प्रजाति को अल्पसंख्यक बनाने की इस योजना में सहयोग करके सिंध से गद्दारी करने वाले सिंधी मुसलमानों को हमारी सिंधु माता कभी माफ नहीं करेगी।

2. सिंध की भौगोलिक अखंडता पर संकट

हाल ही में, गैर सिंधी शासकों द्वारा निम्न सिंध विरोधी कार्रवाइयां की गईं-

1) कराची की निकटवर्ती समुद्रीय सीमा में स्थित दो द्वीपों को बेचकर वहां गैर सिंधियों को बसाने का षड्यंत्र रचने की कार्रवाई।

2) सिंध के समुद्र के तटीय जिले ठट्टा एवं समीपवर्ती इलाके को मिलाकर जुल्फिकारबाद नामक नए जिले का गठन एवं उसमें केवल गैर सिंधियों को बसाने की योजना।

कोटड़ी से कराची तक का इलाका तो पहले से ही केवल नाममात्र सिंध प्रांत का अंश है। उपरोक्त दोनों योजनाओं की सफलता के उपरांत लगभग आधे सिंध के बराबर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को उर्दू प्रांत (यू. पी.) का नाम देकर सिंध से अलग कर सिंध का विभाजन करने का खतरा बढ़ गया है।

3. सिंधी प्रजाति की पूरी गुलामी का खतरा

1947 में पाकिस्तान की राजधानी कराची शासन का केंद्र होने के कारण, वहां स्थित केंद्रीय सचिवालय एवं अन्य राजकीय संस्थानों के कर्मचारियों के हाथों में ही प्रशासन की ताकत निहित थी। इन कर्मचारियों में बहुमत मुहाजिरों का हो गया, क्योंकि नई भर्ती में, मुहाजिर प्रधानमंत्री लियाकत अली खां के प्रभाव से प्राथमिकता मुहाजिरों को दी गई। इस प्रकार प्रशासन पर गैर सिंधियों के कब्जे के उपरांत, राजनैतिक वर्चस्व हेतु मुहाजिरों ने अपने को संगठित करने के लिए सर्वप्रथम मुहाजिर कौमी मूवमेंट नामक सामाजिक संस्था और कालांतर में उसको मुलहिद कौमी मुराज (एम. यू. एम.) नामक राजनैतिक पार्टी में परिवर्तित करके बड़े स्तर पर चुनावों में भाग लेना आरंभ कर दिया।

कराची और सिंध के अन्य बड़े नगरों में कलेक्टरों के दफ्तरों में मुहाजिर मुसलमानों के बहुमत का लाभ उठाकर मुलहिद द्वारा मतदाता सूचियों में ब़डे पैमाने पर हेराफेरी करवाकर प्रत्येक चुनाव में अपने बहुमत की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित कर ली। परिणामत: सिंध असेम्बली में मुलहिद के विजयी सदस्यों के सहयोग बिना कोई भी सरकार बन ही नहीं पा रही थी। अत: सिंध के सिंधी मुख्यमंत्री को कुर्सी हेतु एम. ब्लू. एम. की हर जायज नाजायज शर्त मानने के लिए बाध्य होना पड़ा। इसी मजबूरी के रहते हुकूमत को मुलहिद के पसंदीदा गवर्नर की तैनाती की शर्त भी माननी प़डी। एम. ब्लू. एम. वाले हमेशा ऐसे दबंग व्यक्ति को गवर्नर बनवाते थे जिसके आगे सिंध मुख्यमंत्री की एक न चलेे। प्रशासन और शासन दोनों पर गैर सिंधियों का कब्जा, सिंधियों की पूर्ण गुलामी की ओर पहला कदम था।

तत्पश्चात 1958 में सभी प्रांतों को समाप्त करके प. पाकिस्तान का एक यूनिट बनाकर पंजाबी दबंगों एवं पूंजीपतियों के लिए सिंध के द्वार खोल दिए गए। सिंध की कृषि योग्य जमीनों को सेवानिवृत्त पंजाबी फौजियों को तथा औद्योगिक प्लाटों को पंजाबी उद्योगपतियों को आवंटित कर दिया गया। उन्होंने अपनी सहायता हेतु सिंधियों की बजाय, पंजाबी मजदूरों और किसानों को प्राथमिकता दी। सिंधियों की पूरी गुलामी की ओर यह दूसरा कदम था।

बांग्लादेश से विस्थापित बिहारियों तथा अफगानिस्तान से भागे पठानों, अफगानों ने भी कराची में आकर अपना गढ़ स्थापित कर लिया। परिणामत: कराची में प्रति दिन गोलीबारी, और अन्य हिंसक वारदातों की झ़डी सी लग गई। ऐसे माहौल में भला हमारे शांतिप्रिय सिंधी किस प्रकार आजादी से रह पाते?

एक बार सिंधी राष्ट्रपति, तीन बार सिंधी प्रधानमंत्री तथा हर बार सिंध के सिंधी मुख्यमंत्री के बावजूद, असली ताकत गैर सिंधियों के हाथों में चलती आ रही है। सिंध असेम्बली में सिंधी सदस्यों के बहुमत के बावजूद, एम. ब्लू. एम. वाले अक्सर सिंध विरोधी बिल पास कराने में सफल हो जाते हैं तथा सिंधी हित वाले कानूनों का क्रियान्वयन रोकने में भी कामयाब हो जाते हैं, क्योंकि क्रियान्वयन करने वाले कर्मियों का बहुमत गैर सिंधी होता है।

हाल ही में एक. ब्लू. एम. वालों ने अपनी चालबाजियों से दोहरे प्रशासन वाला, सिंध पीपुल्स लोकल गवर्नमेंट एक्ट पास करवाया। इसके अंतर्गत, सिंध के नगरों का शासन मेयर के हाथों में तथा केवल सिंध के गांवों का शासन सिंध के मुख्यमंत्री के पास रहेगा।

दोहरे शासन वाले इस कानून, सिंधी द्वीपों की बिक्री तथा जुल्फिकार परियोजना के सफल क्रियान्वयन के बाद हमारी सिंध माता पूरी तरह से गुलाम हो जाएगी, इसमें तनिक सा भी संदेह नहीं है। अलबत्ता इसमें गहरा संदेह है कि इन योजनाओं को सिंधियों का जबरदस्त विरोध रुकवा पाएगा।

4. सिंधुत्व गंवाने की आशंका

हाल ही में सिंधी साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की कराची गोष्ठी में निम्न प्रस्ताव पारित हुआ :-
“सिंधी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर ‘कौमी बोली’ का दर्जा देते हुए, इसकी सरकारी और दफ्तरी हैसियत स्थापित करने हेतु प्रभावशाली कदम उठाए जाएं। सिंध के समस्त राजकीय एवं निजी शिक्षा संस्थानों में अंग्रेजी के साथ सिंधी भाषा को भी लागू किया जाए।

उपरोक्त प्रस्ताव से आभास होता है कि सिंध में सिंधी शिक्षा की तो समुचित व्यवस्था है, परंतु सिंधी शिक्षा अनिवार्य नहीं है और न ही सरकारी नौकरी हेतु सिंधी अनिवार्य है

यदि वास्तव में ऐसा है तो अभिभावक बच्चों को सिंधी शिक्षा के लिए उत्साहित नहीं करेंगे और वे सिंधी के स्थान पर उर्दू और अंग्रेजी शिक्षा को प्राथमिकता देंगे; विशेषकर बड़े नगरों में, जहां मुहाजिर बहुमत में हैं, और जहां गांवों की अपेक्षा सिंधी माहौल नगण्य है।

सिंध की आंतरिक परिस्थितियों के उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हमारी मां सिंध सुखी नहीं है, अपितु घोर पीड़ा में है। अत: सिंध की औलादों को अब गंभीरता से सोचना होगा कि क्या अपनी मां की दुर्दशा देखकर, वे अपने को सुखी मान पाएंगे? माता सिंध की एक औलाद सिंध में गुलाम, दूसरी औलाद हिंद में जलावतन तथा तीसरी विश्वभर में खानाबदोश है। तीनों को एक साथ मिल बैठकर प्रभावी कार्यवाही हेतु ठोस निर्णय लेना होगा

सिंधी प्रजाति के लगभग आठ करोड़ सिंधीजनों के लिए कोई भी मंजिल कठिन नहीं है, कुछ भी असंभव नहीं है। आवश्यकता है पक्के इरादे की, अटूट इच्छाशक्ति की।
जिये सिंध, जिये सिंधियत।
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