सिंधी समाज की देवता – झूलेलाल

झूलेलाल सिंधी समाज के धर्मसंस्थापक अर्थात इष्टदेव हैं। उनका जन्मदिवस चैत्र मास की द्वितीया को आता है। उसे सिंधी समाज ‘चेती चांद’ उत्सव के रूप में मनाता है। विश्व में सिंधी समाज जहां कहीं भी हो वहां पारम्पारिक रूप से, उल्लास के साथ यह उत्सव मनाता है। सिंधी समाज के इस इष्टदेव का इतिहास क्या है?

जिन्हें झूलेलाल अर्थात जलदेवता कहा जाता है उनका अवतार सिंध प्रांत में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। जब भारत का विभाजन नहीं हुआ था तब यह प्रांत सप्तसिंधु का प्रांत अर्थात सात नदियों का प्रांत कहलाता था। सिंधु के तीर पर बसे इस समाज की सिंधु नदी जीवनदायिनी थी।

सिंध पर सामरा का शासन था, जो हिंदू धर्म से मतांतरित होकर मुसलमान बन गए थे। वे शासक धर्मांध नहीं थे। लेकिन एक राज्य इसमें अपवादस्वरूप था। मुख्य राजधानी से दूर डट्टा नामक प्रांत ने अपना अलग अस्तित्व बनाए रखा था। इस प्रांत का शासक मिरकशाह एक तानाशाह तो था ही साथ में वह धर्मांध भी था। अन्य धर्मांध मुस्लिम शासकों की तरह मिरकशाह के इर्दगिर्द इस्लाम प्रसारकों का ही घेरा था। उन्होंने मिरकशाह को एक दिन सलाह दी कि, ‘हमें जी-जान से इस्लाम का प्रसार करना चाहिए।’

मिरकशाह ने इसका प्रण लेकर हिंदू समाज के पंचों को बुलावा भेजा और उनसे कहा, “इस्लाम का स्वीकार करो अथवा मरने के लिए तैयार हो जाओ!” इस शाही परमान पर सोचविचार करने के लिए भयभीत हिंदू पंचों ने मिरकशाह को कुछ समय की मोहलत मांग ली। उस घमंडी मिरकशाह ने हिंदुओं को अपनी देवता की प्रार्थना करने के लिए चालीस दिन का समय दिया।

सारे हिंदुओं को अब अपनी मौत नजर आ रही थी। तब उन लोगों वरुण देवता को अपनी सहायता के लिए आने का आवाहन किया। सब ने मिलकर चालीस दिन तक कठोर तपाचरण किया। इस कालावधि में किसी ने अपनी दाढ़ी तक नहीं बनाई और न नए कपड़े पहने। सब लोग एकत्रित होकर वरुण देवता की आराधना करने लगे और गीत गाकर उनकी प्रार्थना करने लगे। इस जुल्मी शासक के क्रोध से अपनी रक्षा करने हेतु सब वरुण देवता को मनाने लगे।

चालीसवें दिन आकाशवाणी हुई – “घबराओ मत! जुल्मी मिरकशाह से मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा! नरसफूर के रतनचंद लोहानो की पत्नी देवकी की कोख से मैं शीघ्र ही अवतार लूंगा!”

चैत्र मास की द्वितीया अर्थात चेती चांद को माता देवकी ने एक बच्चे को जन्म दिया। इस बालक के जन्मदिन पर एक चमत्कार हो गया। इस बालक ने अपना मुंह खोला और उसमें से सिंधु नदी बहने लगी। इस नदी में एक पाल नामक मछली पर एक बूढ़ा मनुष्य आसन लगाकर बैठा था। इस मछली की यह विशेषता है कि वह प्रवाह की विरूद्ध दिशा में तैरती है। ज्योतिषि ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक बड़ा होकर महान योद्धा बनेगा और अपना नाम रोशन करेगा। इस बालक को लोग ‘उदरोलाल’ कहने लगे अर्थात जल से जन्मा हुआ। नरसफूर के निवासी इस बालक को बड़े प्रेम से ‘अमरलाल’ भी कहने लगे। जिस झूले में बालक उदरोलाल को रखा गया था वह झूला अपने ेआप हिलने लगा, इसी कारण यह बालक ‘झूलेलाल’ नाम से विख्यात हो गया।

इस चमत्कारी बालक के जन्म की खबर मिरकशाह को मिल गई। उसने हिंदू पंचों को वापस बुलाया और इस्लाम का स्वीकार करने के लिए धमकाया। लेकिन अब सारे हिंदुओं को यह विश्वास हो गया था कि अब स्वयं जलदेवता वरुण उनके तारणहार बन गए हैं। इन हिंदुओं को अपनेे क्रोध से एक छोटा बालक बचाएगा, यह सुनकर मिरकशाह मजाक में हंसने लगा। मिरकशाह ने अहंकार से कहा,‘मुझे कोई नहीं मार सकता और आप लोगों को यहां से कोई जिंदा नहीं बचा सकता! आप सब लोग कैसे इस्लाम को गले नहीं लगाते हैं यह मैं अवश्य देखूंगा।’ मिरकशाह की हिंदुओं को यह एक तरह से चुनौती ही थी।

मौलवियों ने मिरकशाह से कहा कि अब हिंदू अपनेे चंगुल से नहीं बचने चाहिए। अहंकारी राजा को भी लग रहा था कि एक बालक अपना क्या बिगाड़ सकता है। उसने मौलवियों से कहा, आगे क्या होता है यह हम देखेंगे। लेकिन आवश्यक सावधानी बरतने के लिए उसने अपनेे अहिरीओ नामक एक मंत्री को बुलाया और स्वयं नरसफूर जाकर देखने का उसे आदेश दिया। अहिरीओ कोई मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता था इसलिए वह एक गुलाब जहर में डुबो कर अपनेे साथ लेकर नरसफूर चला गया। लेकिन वह बालक की पहली झलक देखकर ही विस्मित हो गया। इतना आकर्षक और मनमोहक बालक उसने पहले कभी नहीं देखा था। वह थोड़ा हिचकिचाया, मगर बाद में उसने साहस जुटाकर वह गुलाब उस बालक को दिया। गुलाब को अपनेे हाथ में लेते हुए वह बालक मुस्कुराया। एक ही सांस में उस बालक ने गुलाब को दूर फेंक दिया। यह गुलाब वापस अहिरीओ के पैेरों में आकर गिर गया। उसीके साथ उस छोटे से बालक ने एक बड़ी दाढ़ीवाले वृद्ध फुरुष का रूप धारण किया। एक ही पल में वह वृद्ध पुरुष सोलह साल का नौजवान बन गया। अब उदरोलाल एक घोड़े पर सवार हो गया था और उसके हाथ में चमकती तलवार थी। उसके पीछे सैनिकों की बड़ी कतार लगी थी। अहिरीओ कांपनेे लगा और उसने उदरोलाल के सामने अपना सिर नवाया। उसने कहा, “हे सिंधु देव, मैं आपकी शरण में आ गया हूं। आप मेरी रक्षा कीजिए।”

अहिरीओ ने यह सब चमत्कार वापस जाकर मिरकशाह को बताया। लेकिन मिरकशाह का इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने कठोर बन कर कहा, “एक छोटा बालक वृद्ध पुरुष का रूप कैसे ले सकता है? कोई जादुई करतब देखकर तुम घबरा गए हो!” पर मन में वह भी थोड़ा डर गया था। उस रात उसने पाया कि एक बालक उसके छाती पर बैठ कर उसका गला दबा रहा है। बालक ने देखते-देखते ही वृद्ध पुरुष का रूप धारण किया और रणभूमि में वह चमकती तलवार लेकर मिरकशाह की ओर बढ़ने लगा। दूसरे दिन उसने अहिरीओ को बुलाकर यह सब बताया। तब मंत्री ने उसे धीरज से काम लेने की सलाह दी।

इस दौरान जैसे जैसे यह बालक बड़ा होने लगा उसके चमत्कार भी बढ़ने लगे और वह दीनदुखियों की सहायता करने लगा। नरसफूर के निवासियों को गोरखनाथ जी से अलख निरंजन का गुरुमंत्र भी प्राप्त हुआ।

इधर हिंदुओं को इस्लाम की शरण में लाने के लिए मौलवियों का मिरकशाह पर दबाव बढ़ने लगा। उन्होंने आखिर में कह डाला, “या तो उन हिंदुओं को मुस्लिम बनाओ या फिर स्वयं को काफिरों के हिमायती घोषित कर दो!” उनके गुस्से से डर कर मिरकशाह ने उदेरोलाल से मुलाकात करने की ठान ली। अपनेे मंत्री अहिरीओ को बुलाकर इस मुलाकात का आयोजन करने के लिए कहा।

लेकिन इस दौरान मंत्री अहिरीओ तो उदेरोलाल अर्थात दर्याशाह का अनुयायी बन गया था। वह सिंधु नदी के तट पर चला गया और उसने जल देवता की आराधना की। तब यकायक उसने उसी वृद्ध पुरुष को पाला मछली पर सवार होकर नदी में तैरते हुए देखा और विस्मयचकित हो गया। अहिरीओ ने अपना सिर झुकाकर उनको नमन किया। वह यह बात जान गया कि उदेरोलाल ही असल में ख्वाजा खिज्र का अवतार है। फिर उसने देखा कि उदेरोलाल एक हाथ में चमकती तलवार और दूसरे हाथ में ध्वज लेकर घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़ रहा है।
उदेरोलाल सीधा जाकर मिरकशाह के सामने खड़ा हो गया और उसने कहा, “जो अपनी चारों ओर तुम देख रहे हो यह सब एक ही ईश्वर ने बनाया है, जिसे तुम ‘अल्लाह’ कहते हो और हिंदू ‘भगवान’ कहते हैं।” मौलवी कहने लगे, उदेरोलाल की धर्मविरोधी बातों की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए और उसे गिरफ्तार करना चाहिए। उनकी बातें सुनकर मिरकशाह ने अपनेे सैनिकों से उदेरोलाल को गिरफ्तार करने का आदेश दिया।

लेकिन उस समय बड़ा चमत्कार हो गया। जैसे ही मिरकशाह के सैनिक उदेरोलाल की ओर आगे बढ़े दरबार में जलप्रलय हो गया और पानी की तेज लहरों में मिरकशाह और उसके दरबारी डूेबने लगे। उसी समय राजमहल को आग की लपटों ने घेर लिया और वह जल कर खाक हो गया। मिरकशाह के लिए भागने का कोई मार्ग नहीं था। उदेरोलाल ने पूछा, “मिरकशाह, जरा सोचो! तुम्हारा खुदा और मेरा भगवान एक ही है। फिर तुम मेरे लोगों को क्यों सता रहे हो?”

मिरकशाह भयभीत होकर उदेरोलाल की शरण में आ गया और बोला, “महाराज, मेरी मूर्खता मेरे ध्यान में आ गई है।” अचानक सारा पानी गायब हो गया और आग भी बुझ गई। मिरकशाह ने हिंदू और मुसलमानों से समान व्यवहार करने का वादा किया और उदेरोलाल को प्रणाम किया।

अंतर्धान होने से पहले उदेरोलाल ने यह बात ध्यान में रखने को कही कि आग और पानी में मेरा निवास है। मिरकशाह के हृदय परिवर्तन को ध्यान में रखकर वहां सारे हिंदुओं को एक मंदिर बनाने को कहा। उदेरोलाल ने कहा, “इस मंदिर में हमेशा ज्योति जलाकर रखना चाहिए तथा यहां पर हर समय पानी उपलब्ध रहना चाहिए।”

तिजाहर नामक स्थान पर उदेरोलाल ने अपना अवतार विसर्जन किया। इस मौके पर वहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग भारी मात्रा में उपस्थित थे। मिरकशाह के प्रतिनिधि भी वहां पधारे थे। जब उदेरोलाल के प्राण इस नश्वर शरीर को छोड़ कर चले गए तब मिरकशाह के प्रतिनिधियों ने उस पार्थिव शरीर पर अधिकार बताकर वहां इस्लामी प्रथा के अनुसार ‘तुर्बत’ खड़ी करने की बात कही। लेकिन उस स्थान पर हिंदू समाधि बनाना चाहते थे। जब दोनों समुदाय में बहस छिड़ गई तब अचानक जोरदार वर्षा होने लगी और आकाशवाणी हुई-“बहस मत करो! मेरा स्मृतिस्थल हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए खुला होना चाहिए। एक ओर से यह समाधि जैसा दीखना चाहिए और दूसरी ओर से इसका आकार दरगाह जैसा लगना चाहिए। मैं आप सब लोगों का हूं।”

झूलेलाल सिंधी समाज के सारी सांस्कृतिक कार्यों के केंद्र हैं तथा सब को एकसाथ लाने के लिए महान शक्ति है। जब सिंधी विश्व में जहां कहीं एक दूसरे के साथ मिलते हैं तब ‘झूलेलाल’ कह कर अभिवादन करते हैं।

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