मुहब्बती नगमों के शायर: फिराक

फिराक की सोच के मुताबिक मुहब्बत के शायर होने के लिए केवल आशिक और शायर होना ही काफी नहीं है। प्रेमी का मन भावुक होने के साथ साथ कोमल, सच्चा तथा नेक होना भी आवश्यक है। सद्गुणों के प्रति उसे आस्था होनी चाहिए। उसका दिलोदिमाग संस्कारों से रचाया सजाया हो। …जोश मलिहाबादी लिखते हैं कि मीर और गालिब के बाद उस कोटि का सबसे बड़ा शायर एक ही है, और वह है फिराक गोरखपुरी!

हैरां हुए न थे जो अपने तसव्वुर में कभी
तस्वीर हो गए तेरी तस्वीर देखकर…

प्रेमिका के हुस्न की बात कहते हुए शायर फिराक गोरखपुरी ने अपने अलग अंदाज में कहा है, जो लोग अपनी कल्पना में भी कभी आश्चर्यचकित नहीं हुए थे, उन लोगों ने जब उस महजबीं की तस्वीर देखी तो वे आश्चर्य में इस तरह डूबे कि वे खुद ही एक तस्वीर की तरह चुप हो गए; कुछ कहने-करने के बजाय एक पुतले जैसे हो गए। और यह हके ालत सिर्फ उस हुस्नपरी की तस्वीर देखने से हुई है। अगर सचमुच वे उसे देख लेते तो उन पर क्या गुजरती इसकी तो कल्पना ही करना कठिन है!

सुंदरता का वर्णन करते हुए अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग उर्दू शायरी में बहुत सुंदरता से किया जाता है। हुस्न और इश्क तो शायरी के प्रमुख विषय हैं ही। एक शायर ने कहा था प्रेमिका ने जो लिबास पहना है, वह पहले बिल्कुल सफेद था। लेकिन उस के पहनने के बाद वह एकदम रंगीनियों में डूब गया, रंगबिरंगा हो गया।

फिराक गोरखपुरी को मुहब्बत का शायर माना जाता था। आधुनिक उर्दू शायरी के सबसे बड़े गजलगो शायर थे फिराक। वैसे तो प्रेम, हुस्न, मिलन (वस्ल), या वियोग (हिज्र) आदि शायरी के प्रमुख विषय परंपरा से चलते आए हैं। मगर फिराक ने इन्हें परंपरागत ढांचे से निकालकर अलग ढंग से पेश किया। तब तक की शायरी तवायफ के कोठे के आसपास ही घूमती थी। और हमेशा बेवफा प्रेम नायिका अपने प्रेमी को दुख देकर तड़पाती थी! उसका प्रेमी, जो प्रेम करने के अलावा कुछ काम शायद ही करता था; अपने दुख को लेकर चौबीसों घंटे प्रेमिका की याद में वक्त गुजारा करता था। ऐसा ही चित्र शायरी में दिखाई पड़ता था। फिराक ने यह चित्र बदल दिया।

फिराक की सोच के मुताबिक मुहब्बत के शायर होने के लिए केवल आशिक और शायर होना ही काफी नहीं है। प्रेमी का मन भावुक होने के साथ साथ कोमल, सच्चा तथा नेक होना भी आवश्यक है। सद्गुणों के प्रति उसे आस्था होनी चाहिए। उसका दिलोदिमाग संस्कारों से रचाया सजाया हो।

फिराक बिल्कुल ऐसे ही शायर थे।
कहां का वस्ल! तनहाई ने शायद भेस बदला है
तेरे दमभर के आ जाने को हम भी क्या समझते हैं….

्र्रतुम आए, मगर पलभर के लिए! आकर चले भी गए। इसको क्या आना कहते हैं? यह शायद आभास है। लगता है, हमारी तनहाई ही शायद भेस बदल कर हमारे सामने आई और गायब हो गई। यह कहां का मिलन है?

शायर ने सिर्फ ‘आना’ क्रिया का इस्तेमाल नहीं किया; ‘आ जाना’ कहा है। इस में आकर तुरन्त निकल जाने का भाव गहरा हो जाता है।

थी यूं शामे-हिज्र मगर पिछली रात को
वो दर्द उठा ‘फिराक’ कि मैं मुस्करा दिया…..

शायर कहता है, वह शाम तो बिछोह की शाम थी। बाद में जो रात आई, वह इतनी दर्दभरी थी कि रोने के बजाय मुझे हंसी आ गई।
हम कभी-कभी यह अनुभव जरूर करते हैं, कि मुश्किलें इतनी बढ़ जाती हैं कि हम हंस पडते हैं।

28 अगस्त 1896 में उप्र के गोरखपुर में पैदा हुए फिराक गोरखपुरी। वहीं प्रारंभिक शिक्षा पाने के बाद वे इलाहाबाद कॉलेज में दाखिल हुए। जहां प्रो.नासरी से मिलने पर उनकी साहित्य और विशेषकर शायरी में रुचि बढ़ी। उत्तम अंकों से बी.ए. पास करने के बाद एक ही प्रयास में वे डिप्टी कलक्टर बने। लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ कांग्रेस के आंदोलन में सहभागी होने पर उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। जेल भी जाना पड़ा। इसके पश्चात कुछ समय के लिए उन्होंने कानपुर कॉलेज में उर्दू पढ़ाने का काम किया। एम.ए. की उपाधि भी ली। फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्राध्यापक हुए; और रिटायर होने तक वहीं रहे।

जाने माने लेखक प्रकाश पंडित लिखते हैं, कि फिराक की शायरी में ऐसी भावुकता मिलती है, जिसमें चिंतन तत्त्व शामिल पाया जाता है।

कैद क्या रिहाई क्या, है हमीं में हर आलम
चल पडे तो सहरा है, रुक गए तो जिन्दा है

कैद और रिहाई! ये दो अवस्थाएं तो हमारे मन की ही उपज हैं। हमारा मन चल पड़ता है तो सामने सहरा (रेगिस्तान) भी हो तो बिना झिझक चलने में कोई तकलीफ नहीं होती। लेकिन अगर हम रुक गए तो मन एक ही जगह अटका रहे, तो वह अवस्था जेल(जिंदा) में बंद रहने जैसी ही होगी।

यहां एक संस्कृत श्लोक मुझे याद आ रहा है, जिसका अर्थ है, अगर मन का इरादा हो तो मामूली चींटी भी मीलों का फासला तय कर जाती है; लेकिन मन ना करता हो तो सब से सक्षम गरुड़ जैसा पंछी भी वहीं का वहीं रह जाता है। हमारी बाहरी अवस्था हमारे मन की अवस्था पर निर्भर रहती है।

कैद का जिक्र आया तो फिराक का और एक शेर याद आ गया; कहा है-

कुछ कफस की तीलियों से छन रहा है नूर सा
कुछ फजा, कुछ हसरते-परवाज की बातें करो….

माना कि हम कफस में कैद है; परंतु देखिए, पिंजरे की इन सलाखों से कुछ प्रकाश भी अंदर आ रहा है। उस पर गौर करो। बाहर बड़ी उत्साहपूर्ण फजा (वातावरण) होगी। कुछ उसी बारे में बात करो। हमारे मन में उड़ान भरने की, आज़ाद होने की जो इच्छा है उसे बढ़ावा देनेवाली कुछ बातें कहो। सिर्फ पिंजरे में रहकर जो दुख मन में भरा है उस दुख की बातों को मत दोहोराओ। यह सकारात्मकता जगानेवाला भाव जीवन-तत्त्व ही सिखाता है।

किसीका यूूं तो हुआ कौन उम्रभर फिर भी
ये हुस्नो-इश्क धोखा है सब मगर फिर भी…..
हजार बार जमाना इधर से गुजरा है
नई नई सी है कुछ तेरी रहगुजर फिर भी…..

्र्रहजारों बार जमाना इसी रास्ते से गुजरा है। एक दो-चार व्यक्ति ही नहीं, सारा जमाना इसी प्यार के रस्ते से गुजरा है। अपवाद कोई भी नहीं। फिर भी यह रास्ता हर व्यक्ति के लिए नया ही साबित होता है। क्योंकि, हर व्यक्ति का अनुभव अलग होता है।

यहां दिया हुआ पहला शेर गज़ल का मतला है, जो जीवन का एक सच सामने रखता है। कौन किसी का उम्रभर हुआ है? कड़वा है, मगर यह सच है। कोई भी रिश्ता हो, वह बंधन जिंदगी भर एक जैसा नहीं रहता। समय के साथ उस में बदलाव आता है। मतले की दूसरी पंक्ति कहती है, यह हुस्न, यह इश्क, सब धोखा है मगर फिर भी….. यह कह कर शायर ने बात जैसे अधूरी छोड़ दी है। छिपा हुआ अर्थ है, कि यह जानते हुए भी सभी (जमाना) इश्क के जाल में फंसते हैं; हुस्न की ओर आकर्षित होते हैं। अंजाम की परवाह न करते हुए, चपेट में आ ही जाते हैं!
फिराक की इस गज़ल में ‘फिर भी’ शब्दों का प्रयोग हर शेर के अंत में आता है। और मतले की दोनों पंक्तियों में आता है। इसे गज़ल का रदीफ कहते हैं। हर शेर में इस रदीफ का अलग-अलग तरह से उपयोग किया गया है। अर्थ सनिकालने का काम पढ़नेवाले पर छोड़ दिया है। इससे पढ़ने का मज़ा और बढ़ जाता है।

फिराक साहब ने ऐसी भी कुछ गजलें लिखी हैं जो बेमतला हैं। मतला गज़ल का आवश्यक अंग माना जाता है। आजकल के शायर गज़ल के अनेक नियमों में परिवर्तन लाने पर जोर देते हैं, ताकि गज़ल लिखना आसान हो। इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि इस तरह के परिवर्तन की शुरुआत फिराक ने पहले ही कर रखी है। कुछ गज़लों में सौती काफिया का इस्तेमाल भी किया है। और वैसे काफिये के बाद रदीफ रखना भी जरूरी नहीं समझा है। फिराक को आधुनिक साहित्य का सब से बड़ा शायर माना जाता है। अपने जीवनी ‘यादों की बारात’ में जोश मलिहाबादी लिखते हैं कि मीर और गालिब के बाद उस कोटि का सबसे बड़ा शायर एक ही है, फिराक गोरखपुरी!!
फिराक तखल्लुस लेनेवाले इस शायर का मूल नाम था रघुपति सहाय, जो एक हिंदू परिवार से थे। इनके पिता गोरखप्रसाद ‘इबरत’ भी अपने जमाने के प्रसिद्ध शायर थे। फिराक के अनेक मज्मुएं प्रसिद्ध हैं, जैसे गुले-नग्मा, रूह-ए-कायनात, शबिस्तान, बज्मे जिन्दगी..इत्यादि। उन्हें 1968 में पद्मभूषण उपाधि से नवाजा गया था। ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी अवार्ड इत्यादि पुरस्कार भी उन्हें प्राप्त हुए थे।

उम्मीदो-यास,वफा-ओ-जफा, फिराक-ओ-विसाल
मसाइल इश्क के इन के सिवा कुछ और भी है?

फिराक मुहब्बत के शायर माने जाते हैं। लेकिन मुहब्बत के बारे में उनका क्या खयाल है? वे इस शेर में कहते हैं, प्रेम में आशा-निराशा, वादा निभाना या अत्याचार करना, जुदाई और मिलन इन बातों से लेकर जुड़ी समस्याओं के सिवा कुछ और है ही क्या ?
ऐसे ही दो पंक्तियों में जिन्दगी के बारे में लिखते हैं,

मौत का भी इलाज हो शायद
जिन्दगी का कोई इलाज नहीं….
कुछ अशआर देखिए..
हम से क्या हो सका मोहब्बत में
तुम ने तो खैर बेवफाई की…
हमें भी देख इस दर्द से कुछ होश में आये हैं
अरे, दीवाना हो जाना मोहब्बत में तो आसां है….
औरों का तजुर्बा जो कुछ हो मगर हम तो ‘फिराक’
तल्खी-ए-जीस्त को जीने का मज़ा कहते हैं….

्र्रऔरों का अनुभव कुछ भी हो मगर हम तो जीवन की कड़वाहट पीने को ही जीवन का मज़ा समझते हैं।

फिराक रुबाइयों के लिए भी जाने जाते हैं। अंत में एक रुबाई…
करते नहीं कुछ तो काम करना क्या आये
जीते जी जां से गुजरना क्या आये
रो-रो के मौत मांगने वालों को
जीना नहीं आ सका तो मरना क्या आये….

3 मार्च 1982 को, लंबी बीमारी के बाद फिराक ने, 85 वर्ष की आयु में इस दुनिया से विदा ले ली। लेकिन उनकी शायरी का एक सितारा उर्दू शायरी के आसमां पर आज भी झिलमिलाता है।

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