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****गार्गी रानी******

भारत का लोक संगीत ग्रामीणांचल, वनांचल और गिरिअंचलों में पसरा पड़ा है। जितने विविध क्षेत्र उससे भी अधिक तरह के नृत्य, उतने ही तरह के गीत और वाद्य तंत्र होते हैं। इन नृत्यों, गीतों और वाद्यों में उस अंचल की स्पष्ट विशेषता परिलक्षित होती है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक शताधिक प्रकार के वाद्य यंत्र, गायन पद्धति, नृत्य शैली तथा गीत पाए जाते हैं।

भा रत में संगीत की सर्वप्रथम व्युत्पत्ति हजारों वर्ष पूर्व वैदिक काल में हुई मानी जाती है। वेद अपौरुषेय हैं, इसलिए संगीत की उत्पत्ति को किसी एक व्यक्ति से नहीं जोड़ा जा सकता। वेदों की ऋचाओं का अनुसरण श्रुतियां करती हैं। इन श्रुतियों को गेयता के साथ प्रस्तुत करने से ही संगीत की रचना हुई। ‘सामवेद ’ के मंत्रों को बड़ी सहजता से गाया जाता है। आडवीं शताब्दी में रचित ‘छन्दोग्य उपनिषद ’ में शंख, वीणा और वंशी के साथ वेद की ऋचाओं को गान रूप में प्रस्तुत करने का वर्णन मिलता है। उस समय के गायकों को ‘शिक्षा ’ अर्थात ज्ञान और ‘छंद ’ अर्थात लय का पूरा अभ्यास होता था। सामवेद में संगीत के सप्तस्वरों – कुष्ट, प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, मन्द्र और अतिस्वर का विस्तार के साथ उल्लेख मिलता है। वर्तमानकाल के सप्तस्वरों – शदजा, रिषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निशाद (सा रे ग म प ध नी ) से जोड़ा जा सकता है। सामवेद में ही सबसे पहले वंशी या बांसुरी का वर्णन मिलता है। बांसुरी संगीत के सप्त स्वरों की एक साथ प्रस्तुति का सर्वोत्तम वाद्ययंत्र है। वैदिक युग के उपरांत भारत में संगीत का वर्णन आगे चलकर वाल्मीकीय रामायण में मिलता है। वीणा उस कालखण्ड का सर्वाधिक प्रचलित वाद्य माना जाता है। रामायण में ‘नारद वीणा ’, ‘रावण वीणा ’, ‘सरस्वती वीणा ’ के साथ ही गंधर्वों की ‘सोम रास ’ की प्रारंभिक अवस्था का विवरण मिलता है। विष्णु धर्मोेत्तर पुराणों में नागा राजा अश्वतरा को सरस्वती द्वारा स्वर की शिक्षा प्रदान करने का वर्णन भी मिलता है।

तीसरी शताब्दी में संगीत – नृत्य, नाट्य, वाद्य, गायन की उच्च कोटि की प्रस्तुति भरतमुनि द्वारा विरचित ‘नाट्यशास्त्र ’ में मिलती है। इसमें ‘दत्तिलम् ’ का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह गंधर्व संगीत पर प्रकाश डालता है और स्वर के विभिन्न स्वरुपों का वर्णन मिलता है। गुप्त काल में महाकवि कालिदास ने अपने ग्रंथों में वीणा, मृदंग, वंशी, शंख का उल्लेख किया है। बारहवीं सदी के अंतिम दशक में रचित नारदीय संगीत के ग्रंथ ‘संगीत मकरंद ’ में सर्वप्रथम प्राचीन संगीत को अधुतातन रूपों में बताया गया है। तेरहवीं शताब्दी में सारंगदेव ने ‘संगीत रत्नाकर ’ की रचना की जिसमें उन्होंने ‘तुरुक्षहोड़ी ’ को प्रस्तुत किया। मध्य काल में संगीत के वाद्य यंत्रों का खूब विकास हुआ। उस समय सितार, सारंगी, तबला का प्रयोग खूब बढ़ा और रागों को भक्ति एवं उपासना के गीतों से जोड़ा गया। तानसेन, नानक, कबीर, विद्यापति, तयदेव, चण्डीदास, मीराबाई इत्यादि ने गायकी के साथ वादन का उत्तम संयोग प्रस्तुत किया।

भारत का संगीत दो प्रधान रूपों में प्रचलित है – शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत। शास्त्रीय संगीत का अपना एक शास्त्र होता हैं। उसके नियम उपनियम होते हैं। इन नियमों से बद्ध संगीत आगे बढ़ता है। गायन, वादन और नर्तन थोेड़े – बहुत अंतर के साथ एक ही नियम के अंतर्गत होते हैं। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक उनके स्वरूप अलग अवश्य होंगे, किन्तु शास्त्र एक जैसे ही हैं।

भारत में लोक संगीत का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। बहुत से विद्वानों का तो यहां तक मानता है कि शास्त्रीय संगीत की उत्पति लोक संगीत से ही हुई है। इसका प्रमाण यह है कि लोक संगीत का प्रभाव शास्त्रीय संगीत पर स्पष्टत : परिलक्षित होना है। लोक संगीत लोक गीतों की आत्मा है। भारतीय लोक जीवन का सुंदरतम् प्रतिबिम्ब लोक गीत और लोक संगीत में दिखाई पड़ता है। लोक गीत सरल, सुंदर, अनुभूतिमय और संगीतमय होते हैं। संगीत के बिना लोक जीवन प्राण रहित शरीर के समान है। लोक जीवन का स्वास्थ, उनके आनंद का रहस्य लोक गीतों और उनके संगीत में अंतर्निहित है। लोक संगीत का कोई निर्धारित – लिखित विधान नहीं है। कोई विशेष नियम भी नहीं बनाए गए हैं। किंतु लोक गीतों और लोक संगीत की एक विशेष पद्धति अवश्य होती है। जो लोग इस विधि से परिचित नहीं होते, वे इसकी पद्धति को समझ नहीं सकते। लोक संगीत ‘पिंगल शास्त्र ’ के सांचे में ढ़ालकर तैयार नहीं किया जाता। प्रत्युत उनका प्रवाह स्वच्छंद गति से होता है।

भारत का लोक संगीत ग्रामीणांचल, वनांचल और गिरिअंचलों में पसरा पड़ा है। जितने विविध क्षेत्र उससे भी अधिक तरह के नृत्य, उतने ही तरह के गीत और वाद्य तंत्र होते हैं। इन नृत्यों, गीतों और वाद्यों में उस अंचल की स्पष्ट विशेषता परिलक्षित होती है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक शताधिक प्रकार के वाद्य यंत्र, गायन पद्धति, नृत्य शैली तथा गीत पाए जाते हैं। क्षेत्रवार ये संगीत की विधाएं व्यवसाय, मौसम (ऋतु ), जाति, संस्कार तथा वर्ग के अनुरूप भिन्न – भिन्न होती हैं।

भारत के लोक गीतों में शास्त्रीय गीतों – ध्रुपद, खयाल, तराना, टप्पा, ठुमरी, गज़ल इत्यादि की तरह कसा हुआ विधान नहीं होता, अपितु लोक जीवन की तरह उनमें उन्मुक्तता और स्वभावगत स्वतंत्रता होती है। इन गीतों में मात्रा, छंद, काव्य शास्त्र का विधान भी लागू नहीं होता। गायक स्वर के उतार – चढ़ाव तथा वाद्य तंत्रों की मनोरम ध्वनि के बीच इस प्रकार से गीतों की कमीं (दोष ) को छिपा लेते हैं कि उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है।

उत्तर भारत के लोक गीतों को – खेल के गीत, कृषि के गीत, संस्कार के गीत, जाति के गीत, क्षेत्र के गीत, ऋतु के गीत, बाल गीत, देवी देवता के गीत, लोक गाथा के गीत इत्यादी विभागों में बांटा जा सकता है। ये गीत प्राय : सभी बोलियों, अंगिका, मैथिली, मगही, भोजपुरी, अवधि, बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, ब्रज, कनौजी, मेवाड़ी, मालवी, निमाड़ी, कौरवी, हरियानी, गढ़वाली, कुमायुनी, इत्यादी में समान रूप से गाया जाता है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की सत्तर प्रतिशत से अधिक जनसंख्या प्रत्यक्ष मा परोक्ष रूप से कृषि कार्य में लगी रहती है। खेती सम्बंधी कार्यों को करते समम समूह में इन गीतों को गाया जाता है। इनमें रोपनी (धान की रोपाई ) के गीत, सोहनी (खेत से घास निकालना ) के गीत, निरवाही के गीत, कहनी के गीत, पितनी के गीत, मल्हौर (कोल्हू चलाते समय ) बरसाती इत्यादी प्रमुख हैं। संस्कार सम्बंधी गीतों में जन्म के गीत (सोहर ), मुण्डन गीत, जनेऊ गीत, तिलक के गीत, विवाह के गीत, विदाई के गीत, मृत्यु के गीत इत्यादि उल्लेखनीय हैं। ऋतु सम्बंधी – रसिया, कजली, फगुआ, चैता, बारहमाता, बरसाती, हिंडोला गीत, तथा जातिगत गीत – गड़ेरिया गीत, नऊआझाकर, धोबी गीत, चमार गीत, दुसाध गीत, अहीर गीत प्रमुख हैं। बाल गीतों में लोरी, ओक्का – बोक्का, पालना गीत, गुट्टी, गुल्ली -ठंडा गीत गाए जाते हैं, तो देवी – देवता गीतों में भजन, कीर्तन, पचरा, शीतला देवी, मुंबा देवी, माता भवानी गीत हैं। लोक गाथा के अंतर्गत बिरहा, आल्हा, वीरगाथा काव्य, घटना प्रधान कथात्मक गीत आते हैं। वनवासी गीतों में करमा गीत, सुआ गीत, ठंडा, ददरिया, बैगा, गोंडिया, माझी, बड़िया, सैला, अटारी, हिंगला, नैनगुगाली इत्यादि नृत्य गीत प्रमुखता से गाए जाते हैं। इन विविधता भरे गीतों को संगीत की सात स्वर लहरियों में गाया जाता है। इनके साथ ही नटका, बन्ना, गाली, प्रेम परक (प्रेमाख्यान ) गीत भी गाए जाते हैं। इसी तरह पश्चिम तथा दक्षिण भारत में सभी गीत गाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में गीतों के स्वरूप में थोड़ा – बहुत अंतर अवश्य होता है, किंतु उनकी प्रकृति एवं विशेषता समान होती है।

भारतीय लोक संगीत में गीतों के समान ही वाद्य यंत्रों का बड़ा महत्व होता है। इनमें स्वर वाद्य, थाप वाद्य, तार वाद्य, छड़ी वाद्य इत्यादि होते हैं। प्राचीन काल से अधुनातन काल तक वाद्य यंत्रों का क्रमिक विकास हुआ है। गीतों की तरह ही वाद्य यंत्रों को शास्त्रीय और लोक वाद्यों की श्रेणियों में विभक्त किया जाता है। शास्त्रीय संगीत के वाद्य यंत्रों के शास्त्रों के विधान के अनुरूप नियमों – उपनियमों के अंतर्गत बजाया जाता है। शास्त्रीय वाद्यों में तबला, बांसुरी, हारमोनियम, संतूर, शहनाई, वीणा, मृदंग, सरोद, सितार, तम्बूरा, इत्यादि आते हैं। इन वाद्य यंत्रों को आरोह – अवरोह के स्वर और ताल – लय के साथ बजाया जाता है।

लोक वाद्यों को क्षेत्र और समय के साथ भिन्न – भिन्न स्वरूपों में पाया जाता है। अति प्राचीन काल से ढ़ोल, मंजीरा, डफली, झांझ, बीन, मृदंग, एकतारा, सांरगी, खझड़ी, नगाड़ा, तुम्बी, वीणा, तार शेहानी, गुबगुबा, झल्लरी, लेझिम बजाए जाते हैं। ये वाद्य यंत्र स्थानीय कलाकरों द्वारा बनाए और विकसित किए गए हैं। कुछ वाद्य यंत्र ऐसे भी होते हैं, जो गीत विरोध के साथ ही बजाए जाते हैं। उदाहरणार्थ – बिरहा, कहरवा के साथ ‘फार ’ (हल के फाल के समान ) बजाया जाता है। ऐसे भी अनेक गीत गाए जाते हैं, जिनके साथ कोई वाद्य यंत्र नहीं बजाया जाता, बल्कि उंगलियों की चुटकी, हथेलियों की ताली, सीटी तथा पैरों की धमक का प्रयोग किया जाता है। उत्तर से दक्षिण तक पूरे देश में इन लोक वाद्य यंत्रों के थोड़े -बहुत अंतर के साथ पाया जाता है। कुछ यंत्र स्थानीय होते हैं -जैसे केरल में नारियल की तुरही, तमिलनाठु में शंख, बंगाल तथा असम में बांस के वाद्य यंत्र पाऐ जाते हैं।

भारत का लोक जीवन उत्सवों एवं तिथि – त्योहारों से भरा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उत्सव मनाए जाते हैं। लगभग हरेक महीने में कोई न कोई त्योहार होता है। इसलिए यह उत्सवप्रिये समाज हर पल प्रसन्नता के क्षणों में जीता है। अपनी उत्सवप्रियता को वह गीत – संगीत के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। इसलिए हर कालखण्ड में इन गीतों, वाद्य यंत्रों तथा लोक नाट्यों का महत्व हमारे जीवन में बना रहेगा और समय तथा आवश्यकता के अनुसार इनमें परिवर्तन तथा परिशोधन होता रहेगा।

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