कुशासन से सुशासन की ओर अग्रसर भारत

 राष्ट्रीय राजनीति में एक कहावत है – ‘यथा राजा तथा प्रजा’| जिस प्रकार की क्षमता, दक्षता, कार्यकुशलता, कर्तव्यपरायणता, राजा दिखाता है प्रजा भी उसी प्रकार व्यवहार करती है| एक और कहावत है- ‘राजा कालस्य कारणम्’| किसी भी राज्य में, किसी भी राष्ट्र में जो परिस्थिति निर्माण होती है उसका कारण ‘राजा’, राज्य व्यवस्था, राजकीय व्यवस्था, या शासन ही होता है| दोनों ही कहावतों में एक बात स्पष्ट है कि राजनीति, व्यवस्था, शासन, शासकीय व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि का एकमात्र कारण ‘राजा’ याने राजनीतिक व्यवस्था ही होती है|

जब हम भारतवर्ष के राज्य शासन, राष्ट्रव्यवस्था शासन, न्याय तथा सुरक्षा, संरक्षण व्यवस्था की चर्चा करते हैं तो हमें भारतीय विचारधारा, सर्वसामान्य जन मानस की मानसिकता, अपेक्षाओं का भी ध्यान रखना पड़ेगा| ‘मनुस्मृति’ के अनुसार शासकीय, शासन व्यवस्था का आधार होता है-‘उपायोस्सामो, उपप्रदान, भेद, दंड’ याने सामान्य भाषा में साम, दान, प्रदान, भेद, दण्ड| सर्व प्रथम शासन को संवाद, विचारविमर्श, परामर्श का माध्यम अपनाना चाहिए| जहां आवश्यक हो वहां जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कुछ मांगें स्वीकारनी पड़ती हैं| कुछ देना पड़ता है| गुप्तचर व्यवस्था सक्षम करनी पड़ती है और यदि इस तमाम के बावजुद भी यदि आवश्यक, अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है तो अंत में दण्ड याने शासकीय शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है| इसीलिए मनुस्मृति के अनुसार ‘दण्ड’ अर्थात शक्ति प्रयोग सब से बाद में आता है| शासकीय शक्ति याने पुलिस, अर्ध सैनिक बल या सेना का प्रयोग सब सें अंतिम विकल्प होना चाहिए| परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति से आज तक की जो स्थिति निर्माण हुई है उसका विश्‍लेषण करने से पता चलता है कि भारतीय शासन (केन्द्र या राज्य शासन) सर्वप्रथम ‘दण्ड’ शक्ति का प्रयोग करता आया है| १९६२ का चीन-भारत युद्ध तथा तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्रीजी का बयान कि ‘मैंने भारतीय सेना को आदेश दिया  है कि चीनी सेना को खदेड़ दिया जाए’| १९६५ का पाकिस्तान-भारत युद्ध, १९७१ का युद्ध, १९८६-१९८७ में भारतीय सेना को श्रीलंका में जाने के आदेश, ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि शक्ति प्रयोग पहला माध्यम था| यह सब घटनाक्रम ‘सुशासन’, सक्षम, सकुशल, कर्मशील शासकीय व्यवस्था के अभाव के कारण ही हुआ|

आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो पता चलता है कि नगालेंड , मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, असम का गृह-विद्रोह, गुरिल्ला युद्ध (INSURGENCY) कुशासन के कारण ही शुरू हुण्| उत्तर पूर्व (North east-india)भारत में भारतीय शासन के प्रति आस्था का अभाव है उसका प्रमुख कारण ‘कुशासन’ ही तो है| यदि सुशासन सक्षम, सकुशल शासकीय व्यवस्था होती तो वहां के निवासियों को भारत के विरुद्ध विद्रोह करने की, शस्त्र उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ती? ये कुशासन तथा दुःशासन के कारण ही हुआ है|

भारत में नक्सलवादी (माओवादी) विचारधारा का प्रभाव तथा कर्क रोग की तरह फैला हुआ नक्सलवाद कुशासन के कारण ही तो पैदा हुआ है| छोटे-छोटे गांवों में रहने वाले, जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को राज्य शासनों के विरुद्ध शस्त्र क्यों उठाना पड़े? राजनैतिक तथा शासकीय अकर्मण्यता, अक्षमता व अकुशलता के कारण ही कुशासन फैला और राज्य शासन तथा केद्र शासन को शक्ति का प्रयोग करना पड़ा| अपने ही नागरिकों के विरुद्ध शक्ति प्रयोग करना यह अक्षम, अकुशल शासन का उदाहरण है|

पंजाब का आतंकवाद क्यों पनपा? आतंकवादी वृत्ति क्यों पनपी? किसने उसे बढ़ावा दिया? क्षणभंगुर, सूक्ष्म राजनैतिक स्वार्थी दृष्टिकोण के कारण ही अलगाववादी, आतंकवादी प्रवृत्ति को पनपने दिया गया, बढ़ने दिया गया| इस आतंकवाद का दुष्परिणाम पूरे भारत पर पड़ा| देश की प्रधान मंत्री की हत्या उन्हीं के निवास स्थान, उन्हीं को सुरक्षा प्रदान करने वाले तत्वों ने की| पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री की हत्या उनके ही कार्यालय में किसने की? भारत के सेनाअध्यक्ष जनरल अरुण वैद्य की हत्या क्यों की गई? ये सब शासकीय कुशासन, अकर्मण्यता के कारण ही तो हुआ! पंजाब के तरुण मादक द्रव्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं- ये सब पंजाब में आतंकवादी काल में ५-५ साल के बच्चे होंगे| आतंकवाद के साये में पले बच्चे मादक पदार्थों तथा हिंसा की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्शित होते हैं| आज वही हो रहा है|

मैंने १९६५ के पाकिस्तान से भारत के युद्ध में भाग लिया था| उस समय मैं कश्मीर के गुलमर्ग क्षेत्र में था| कश्मीर के ग्रामीण घुसपैठियों को ढूंढ़ने में हमारी सहायता करते थे| हमें दिशा निर्देश देते थे| १९७१ के पाक-भारत युद्ध में भी जम्मू- कश्मीर के निवासियों ने सकारात्मक भूमिका निभाई| सेना की सहायता की थी| फिर क्या कारण है कि उसी कश्मीर के निवासियों को भारत के विरुद्ध गुमराह कर दिया गया, भड़काया गया तथा हिंसा का मार्ग दिखाया गया तथा १९८७-१९८९ के समय में कश्मीर वादी में अलगाववाद भड़क उठा तथा आतंकवाद में बदल गया| इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं? इसके लिए जिम्मेदार तत्कालीन जम्मू-कश्मीर का राज्य शासन तथा तथाकथित राजनीतिज्ञ ही हैं| यदि इस समय सुशासन होता, चुनावों में जानबूझकर धांधली न की होती तो हालात खराब न होते| तत्कालीन केंद्र शासन ने भी कश्मीर की हालत पर आवश्यक ध्यान नहीं दिया| इस राजनैतिक अकर्मण्यता, अक्षमता, अयोग्यता के कारण आज भी हम उसके परिणाम भुगत रहे हैं| इसीलिए कहते हैं- ‘घर को लगा दी आग घर के चिराग ने|’ हमारे राष्ट्रीय तथा राजनीतिक कुशासन ने कश्मीर के हालात खराब कर दिए| हालात खराब होने पर इस राज्य के तथाकथित नेता कश्मीर छोड़ कर भाग गए| कुछ लोगों ने तो लंदन में जाकर पनाह ली| जब हालात कुछ सुधरे तो ये लोग फिर वापस आए और अपनी अक्षमता तथा अकर्मण्यता के कारण फिर हालात बिगाड़ दिए| पारिवारिक राजनीति पिता, पुत्र में ही चलती रही| इसका परिणाम आज हम सब को भुगतना पड़ रहा है| पाकिस्तान ने इसका पूरा फायदा उठाया और कश्मीर की वादी में आग लगा दी| आतंकवाद भड़का दिया| इसीलिए कहते हैं-

आग दुश्मन ने तो लगा दी है

                दोस्तों ने मगर हवा दी है

             जिसमें जितना हमें भरोसा था

                 उसने उतनी बड़ी दगा दी है|

इसी प्रकार की अकर्मण्यता, अक्षमता, असहायता तथा लाचारी हमारी विदेश नीति में दिखाई दी| हमारे प्रधान मंत्री तथा अन्य राजनीतिज्ञ स्वयं को अंतरराष्ट्रीय पटल पर व्यक्तिगत कारणों से देखते थे| उनमें ‘नोबल शांति पुरस्कार’ प्राप्त करने की प्रबल अपेक्षा थी| हमारे ही प्रधान मंत्री ने मुंबई में २६/११ को हुए हमले के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधान मंत्री को ‘शांतिदूत’ का सम्मान दिया! केंद्र शासन की अयोग्यता के कारण भारत को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों में अपमानित होना पड़ा| ‘‘india was described as soft state” भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया| सेना के लिए आवश्यक युद्ध सामग्री की खरीद तथा आयात में कितने घोटाले हुए? बोफोर गन से लेकर अगस्टा हेलिकॉप्टर तक कितने भ्रष्टाचार सम्बन्धित होने की संभावना या शंका थी| उन्हें सुरक्षा व आश्रय देने के लिए राजभवनों में रख दिया गया ताकि जांच प्रक्रिया उन तक न पहुंच सके व उन्हें कुशासन की सहायता से संरक्षित रखा जाए| कई लोग जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे और आज भी हैं, उन्होंने ही मंत्री पद पर नियुक्त लोगों को पद, गोपनीयता तथा ईमानदारी की शपथ दिलाई!!!

  ‘सु’की जगह ‘स्व’ की प्रधानता

पिछले ६० वर्षों का यदि लेखाजोखा किया जाए तो अनेक प्रश्‍न तथा तथ्य सामने आते हैं-

* हमें ‘स्वतंत्रता’ मिलने का दावा किया गया परंतु क्या ‘सुतंत्रता’ मिली?

*हमें ‘संरक्षण’ देने के नाम पर कुछ लोगों ने ‘स्वरक्षण’ कर लिया|

*हमने ‘सुरक्षा’ के नाम पर ‘स्वयंरक्षा’’ की व्यवस्था कर ली|

*हमने ‘सुशासन’ को नहीं देखा, नहीं समझा| हमने स्वशासन की व्यवस्था कर ली|

*हमने प्रजातंत्र के नाम पर ‘पारिवारिक तंत्र’ शासकीय प्रक्रिया में ‘बपौती’ की व्यवस्था कर ली|

*हमने ‘मानवता’, ‘मानववाद’ के नाम पर ‘मनुवाद’ को आश्रय दिया|

*भ्रष्टाचार को हमने ‘पारिवारिक उद्योग’ बना लिया तथा शासकीय सहायता से, शासन पद्धति, शासकीय व्यवस्था का पारिवारिक उपयोग करके ‘भ्रष्टाचार’का केंसर पूरे भारत में फैला दिया| आज पूरी भारतीय शासकीय तथा सुरक्षा व्यवस्था से सम्बन्धित क्या एक भी विभाग है जो भ्रष्टाचार से मुक्त है?

*ये सब क्यों हुआ? कैसे हुआ? यह अकर्मण्यता, अक्षमता, अराजकता का कर्क रोग कुशासन व दुष्शासन के कारण ही फैला, पनपा तथा संरक्षित रहा|

 एक नई सुबह की शुरूआत

सन २०१४ के आम चुनावों के बाद एक नए अध्याय का आरंभ हुआ| नया नेतृत्व शासन में आया है| इतने सालों से एकत्रित ‘कचरा’ साफ करने के लिए ‘स्वच्छ भारत’ अभियान का प्रारंभ हुआ| लोगों में कुछ जागरूकता आ रही है| परन्तु स्वच्छता का अभियान सड़क पर कचरा साफ करके फोटो छापने से नहीं चलेगा| ‘स्वच्छ अभियान’ को सफल बनाने के लिए हमें पहले अपनी मानसिकता को स्वच्छ करना पड़ेगा| ‘मानसिकता’ ही अक्षमता, अकर्मण्यता का कारण होती है| संभवत: इसीलिए यह स्पष्ट करना पड़ा कि ‘न मैं खाऊंगा, न ही खाने दूंगा’| इसीलिए लोगों तक सही मानसिकता पहुंचाने के लिए ‘मन की बात’ कही जाती है| भ्रष्टाचार से प्रदूषित भारतीय शासन पद्धति की गंगा को स्वच्छ करने के लिए ‘स्वच्छ गंगा’ अभियान चलाया जा रहा है| मानसिकता को स्वच्छ करने में समय तो लगेगा| कुशासन तथा भ्रष्टाचार के कर्क रोग को खत्म करने के लिए हमें इसकी जड़ों तक जाना होगा| मस्तिष्क तथा हृदय के बीच एक महत्वपूर्ण अंग है मन, मानसिकता| मानसिकता को बदलने के लिए, सुधार लाने के लिए अथक परिश्रम करने पड़ते हैं व इसमें समय लगता है| इसीलिए कहा गया है कि:

     जिस्म की बात नहीं है, उनके दिल तक जाना है,

       लम्बी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है!

  विदेश नीति की सफलता

नवीन केन्द्रीय शासन की शपथविधि के समय हमारे पड़ोसी देशों के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्रियों को निमंत्रित करके एक नए अध्याय का प्रारंभ हुआ| फ्रांस, जापान, चीन, अमेरिका आदि प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भारत का प्रवास किया| इसी प्रकार हमारे प्रधान मंत्री ने भी विश्‍व के बहुतांश देशों को भारत के समीप लाने का प्रयत्न किया और ये चालू रहेगा| इसके अच्छे परिणाम आने शुरू हो गए हैं| प्रत्येक माह हमारे राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, उपराष्ट्रपति, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश व्यापार मंत्री तथा अन्य अनेक देशों में जाते हैं| अतंरराष्ट्रीय सम्बंधों को प्रबल बनाने के लिए एक दूसरे को जानना, समझना बहुत आवश्यक होता है| यह एक नई शुरूआत है|

अभी तक विचारधारा की saling india Abroad अब इस विचारधारा में परिवर्तन आया है तथा नई विचारधारा “Projecliuy india abroad” ’’ बन गई है| बेचने में तथा प्रदर्शित करने में बहुत अंतर होता है| हमे व्यवसाय, व्यापार, औद्योगिक क्षेत्रों में आशातीत सफलता मिल रही है| हमारा विदेश व्यापार बढ़ रहा है| निर्यात बढ़ रहा है| विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ रहा है| हमें परमाणु शक्ति, परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए आवश्यक साधन तथा ईंधन प्राप्त होने लगा है| यह औद्योगिक प्रगति के लिए बहुत आवश्यक है| हम पर विदेशों से लगे प्रतिबंध समाप्त हो रहे हैं| भारत एक बहुत बड़ा व्यापारिक देश, बाजार बन रहा है|

“make in india” ’ अर्थात ‘भारत में बनाइए’ इस औद्योगिक कार्यक्रम की अच्छी शुरूआत हो गई है| इससे हमारा विदेशों से आयात कम होगा| मेरी मान्यता है कि हमारे ‘”make in india”  के आव्हान में थोड़े बदलाव की आवश्यकता है| हमारा प्रयास होना चाहिए “make in india, make it for the world”| विश्‍व की आवश्यक्ताओं को पूरा करने के लिए भारत में निर्माण करें तभी  हमारा विदेशी व्यापार बढ़ेगा तथा आर्थिक संतुलन हमारे पक्ष में होगा| आज की वास्तविकता है कि अमेरिका की जनसंख्या ३१ करोड़ के आसपास है, जबकि भारत में मध्यम वर्ग middle income Group जिनकी आर्थिक क्षमता बढ़ रही है, करीब ५२ करोड़ के आसपास है| विश्‍व के अनेक उद्योग प्रधान, निर्यात करने वाले देश इस वास्तविकता को समझ रहे हैं| आर्थिक, औद्योगिक, तकनीकी, शैक्षणिक तथा बौद्धिक सामर्थ्य ही किसी भी राष्ट्र को प्रधान बनाता है| आर्थिक शक्ति तथा सामर्थ्य के आधार पर ही हम एक बड़ी, सशक्त, सक्षम सैन्य शक्ति बन सकते हैं| केवल संख्या के आधार पर सैन्य शक्ति का आकलन नहीं किया जा सकता है| युद्ध शास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है- ‘ेलशीळश्रू स र्छीालशीी लरप पेीं ुळप र ुरी‘ अर्थात संख्या के आधार पर युद्ध नहीं जीता जा सकता है| क्षमता, योग्यता तथा रण कौशल के आधार पर ही युद्ध जीता जा सकता है| सामर्थ्यवान व्यक्ति, सामर्थ्यवान समाज, समुदाय तथा सामर्थ्यवान राष्ट्र को कोई तिरछी नजर से नहीं देखता है| रामायण में कहा है-समरथ को नहीं दोष गुसाई|

सामर्थ्यवान भारत की ओर कोई गलत दृष्टि से नहीं देखेगा| हिम्मत ही नहीं करेगा| रामायण में ही कहा गया है-स्वारथ लाग करही सब प्रेति| अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए ही लोग आपके पास आते हैं, आपसे अच्छे सम्बंध बनाते हैं, आपका सम्मान करते हैं| आज पूरे विश्‍व में भारत की प्रतिष्ठा में एक नया स्वागत योग्य परिवर्तन आया है|

make in india” को सफल बनाने के लिए हमें भारतीय युवा वर्ग की मानसिकता, गुणवत्ता, बुद्धिमत्ता, तकनीकी योग्यता का निर्माण करना होगा|if we want to succeed in make in india we must first make and develop copable, mindsel to make in india&| हमेें  make in india की मानसिकता बनानी होगी| इस में शिक्षण संस्थाओं की अहम भूमिका होगी| केवल डिग्री, उपाधि ना देकर ज्ञान, तकनिकी योग्यता देनी होगी| तभी  make in india का प्रयास सफल होगा| केवल नारे लगाने से, भाषण देने से  make in india सफल नहीं होगा|

 रक्षा एवं सुरक्षा

केन्द्र शासन ने पिछले दो सालों में संरक्षण व्यवस्था में परिवर्तन करना शुरू किया है| रक्षा मंत्री श्री मनोहर पर्रिकर एक शिक्षित, कुशल व अत्यंत ईमानदार व्यक्ति हैं| दूरदर्शिता के लिए वे जाने जाते हैं| उन्होंने भारतीय रक्षा व्यवस्था में भारतीयकरण की पहल करने का नया अध्याय शुरू किया है| सुरक्षा व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन लाए जा रहे हैं| रक्षा संयंत्र, उपकरण, शस्त्र, विमान भारत में ही बनाए जाएंगे यह निर्णय लिया गया है| इसके कारण हमारी विदेशों पर निर्भरता कम हो जाएगी| भारत युद्ध उपकरणों का तथा शस्त्रों का निर्यात भी करेगा| यह एक अच्छी शुरूआत है| इसका स्वागत करना चाहिए| भारतीय सैन्य शक्ति किसी विदेशी आयात पर निर्भर नहीं रहेगी| इससे सेना का मनोबल भी बढ़ेगा|

१९वीं सदी शारीरिक शक्ति की सदी थी| २०वीं सदी  आर्थिक शक्ति की सदी थी| २१वीं सदी ज्ञान शक्ति की सदी है| हम ज्ञान के आधार पर ही सत्ता, शासन, कूटनीति, राजनीति तथा रणनीति में सफल हो सकेंगे| २१वीं सदी में पारिवारिक नीति, पारिवारिक मानसिकता सफल नहीं होगी यह निश्‍चित है| २१वीं सदी इंद्रिय-प्रधान सदी होगी| मानसिकता-प्रधान सदी होगी| अब राघवेंद्र, धर्मेद्र, मानवेंद्र, देवेंद्र तथा नरेंद्र का युग होगा| इंद्र वही होगा जिसने अपनी इंद्रियों को वश में किया हो| इसी कारण हमारे अच्छे दिन आने की संभावना प्रबल होती जा रही है| करीब १५० वर्ष पूर्ण एक ‘नरेन्द्र’ (स्वामी विवेकानंद) ने घोषणा की थी, भविष्यवाणी की थी कि “I can see india Risinp”,, में भारत का उत्कर्ष, भारत का स्वर्णिम भविष्य, जागृत भात देख रहा हूं| २०१४ से एक दूसरे ‘नरेन्द्र’ ने स्वामी विवेकानंद की भविष्यवाणी को सार्थक, सफल करने का प्रयास शुरू किया है| इस स्वप्न को सफल बनाने, साकार करने के लिए ‘नरेंद्र’ की सहायता करने के लिए घर-घर से हमें ज्ञानेंद्र, महेंद्र, राघवेंद्र तथा देवेंद्र तैयार करना होंगे| तभी हम भारत को विश्‍वपटल पर अग्रिम देश, सफल देश, सक्षम देश साकार करके, हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वर्णिम भारत दे सकेंगे|

स्वप्न वे नहीं जो हम सोते समय देखते हैं, स्वप्न वे होते हैंै जो हमें तब तक सोने नहीं देते जब तक कि हम उन स्वप्नों को साकार न कर दें, सत्य न कर दें| हमारा सब का यह दायित्व बनता है, कर्तव्य बनता है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, सकुशल, शक्तिशाली, प्रभावशाली, भाग्यशाली स्वर्णिम भारत का निर्माण करें तथा विश्‍व शांति, विश्‍व कल्याण में भारत का योगदान हों|

हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान को एक ही आवाहन है| निम्नलिखित पंक्तियां बहुत महत्वपूर्ण हैं पाकिस्तान की शांति, स्थायित्व, उन्नति तथा खोई हुई राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त करने के लिए-

     माना कि इस जहां को तुम गुलशन न करोगे

       बस कांटे ही करो निकलो जिधर से तुम| 

और

     अच्छोह की करोगे सोहबत तो वो शोहरत मिलेगी तुम्हें,

       चूमेगी कदम बहार निकलोगे जिधर से तुम!!

भारत के साथ शांति तथा अच्छे सम्बंध बनाए रखने में ही पाकिस्तान की भलाई है| अन्यथा विनाशकालीन परिस्थिति निर्माण होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा| अभी भी समय है सम्हलने का

 

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