किसानों की आत्महत्याएं और कर्जमाफी

कसानों आत्महत्या  को रोकने के लिए  कर्जमाफी ही अंतिम विकल्प नहीं है| किसानों की आत्महत्याएं रोकने की सरकार की वाकई इच्छा होगी तो कर्जमाफी न देकर सहकारी क्षेत्र को अपनाकर किसानों को उनका योग्य हक दिलाया जा सकता है| इससे देश की अनेक घातक परंपराएं नष्ट होकर भारत एक बलवान राष्ट्र बन सकेगा|

हमारा देश स्वतंत्रता-प्राप्ति से ही कृषि प्रधान देश माना जाता है| किसान अनाज की जितनी पैदावार करता था, वह देश के सारे नागरिकों के लिए काफी होती थी| अनाज का कुछ हिस्सा बचाकर दूसरे देशों को भी भेजा जाता था| स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद प्रथम प्रधान मंत्री ने पहली पंचवार्षिक योजना में कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता दी| इसके पश्‍चात सरकार ने इस क्षेत्र की जरूरतों को अनदेखा किया| औद्योगिक क्षेत्रों को प्रधानता दी गई तथा उन्हें ही आगे लाने की कोशिशें हुईं|

इस देश के लोकप्रिय प्रधान मंत्री सम्माननीय लालबहादुर शास्त्रीजी ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया| उन्होंने किसानोें की महत्ता भारत के सामान्य नागरिकों के सामने लाई| भारत के किसान और जवान कई बार स्वयं भूखे रह कर भी जनता के लिए पेटभर अनाज उपजाते थे| इस कालखंड में उन्होंने नागरिकों से बिनती की कि वे सोमवार की शाम यानी एक समय का खाना न खाएं| शास्त्रीजी की आदर्श जीवन शैली की ओर देख कर जनता ने उनकी बात मानी| बाद के साठ वर्षों में खेती और खेतिहरों को अनदेखा किया गया| भारत के छोटे से गांव में रहने वाला किसान कई सालों तक बैंक में नहीं जा सकता था|

इस हालात से बाहर आने के लिए उस समय के प्रधान मंत्री ने देश के प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उन बैंकों को छोटे-छोटे गांवों में शाखाएं खोलने के लिए बाध्य किया| इससे यह फायदा हुआ कि गांव में रहने वाला किसान, मजदूर बैंक में अपना खाता खोलने लगे| उस काल की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिराजी गांधी ने सारे राष्ट्रीयकृत बैंकों को किसानों, मजदूरों, छोटे उद्योगों को ऋण देणे हेतु बाध्य किया| सारे बैंकों को बिना पूछे सारा कर्जा माफ करने का अध्यादेश निकाला| तब से सारे किसानों की यह मानसिकता बन गई है कि वे बैंकों से कर्जा लेने पर सरकार उन्हें कर्जमाफी दिलाती है तथा कर्जा चुकाने  की आवश्यकता नहीं होती| अनेकों साल केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों ने किसानों की किसी भी समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया| सरकार ने तत्पश्‍चात उन्हें पैसा ज्यादा मिले इसलिए कुछ वर्ष रासायनिक खाद ज्यादा पैमाने पर इस्तेमाल करें, जैसी सलाह दी| इससे किसानों ने उनकी बात मान कर रासायनिक खाद इस्तेमाल की| अनाज का उत्पादन बढ़ गया| अनाज उत्पादन में अग्रसर राष्ट्र का सम्मान भारत को मिलने लगा|

इस रासायनिक खाद के कारण किसानों को जमीन की उर्वरा क्षमता कम होने लगी, जमीन बंजर होने लगी| यह बात दो-तीन सालों में ही किसानों के ध्यान में आई| गेहूं की खेती करने वाली जमीन बंजर हो गई| पंजाब और उत्तर प्रदेश की जमीन का उपजाऊपन कम हुआ| वहां के किसान उनकी खेती में कोई अनाज न उगा सके| यह गलती ध्यान में आने पर सरकार ने रासायनिक खाद का इस्तेमाल बंद करें तथा जैविक खाद इस्तेमाल करें जैसा प्रचार किया| जैविक खाद की उपयोगिता बाद में दिखाई ही दी| सारे किसान प्राकृतिक खाद उपयोग में लाने लगे| भारत की ८०% खेती बारिश पर निर्भर है| इस बात की ओर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया| कुछ स्थलों पर अति वर्षा और कुछ स्थलों पर बहुत कम वर्षा के कारण किसानों को कई सालों से बहुत हानि पहुंचती है| किसानों के लिए बारहों महीने पानी मिले इसके लिए सरकारों ने कोई ठोस उपाय नहीं किए, ना कोई योजना बनाई|

सम्माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के प्रधान मंत्री बनने पर देश की सारी नदियां आपस में जोड़ने की बात जनता के सामने रखी, उन्होंने उस दिशा में कोशिशें भी शुरू कीं| इस बात को किसी ने भी गंभीरता से नहीं सोचा| अब यह सरकार इस दिशा में सोच-विचार कर रही है| आगे बढ़ रही है| इस ७० वर्ष की अवधि में महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने मिल कर सहकारी संस्था स्थापित की| खेती उत्पादन को सही कीमत मिले, इसलिए सहकारी शक्कर कारखाने, सहकारी सूती कपड़ों की मिलें जैसी सहकारी संस्थाओं का निर्माण किया| उस विशिष्ट प्रदेश के किसानों को संस्था का सदस्य बनाया| किसानों के खेत का उत्पाद और उनके द्वारा उत्पादित अनाज कारखानों के लिए इस्तेमाल कर उद्योग रोजगार बढ़ाया, पर इसमें से कुछ लोगों ने स्वयं तो बहुत पैसा कमाया पर संस्था के सदस्य किसान भाइयों के हालात ज्यों के त्यों गरीब बने रहे| इस काल में सरकार ने अनाज का बहुत उत्पादन होने पर भी गोदाम, शीतगृह या उनके लिए जरूरी तकनीक नहीं विकसित की| सरकार ने उस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया, इससे उत्पादन का ५०% से ६०% हिस्सा नष्ट होता रहा| इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा| किसान स्वंतत्रता प्राप्ति से पूर्व जिस हाल में था उसी हाल में यानी गरीबी रेखा के नीचे ही बना रहा|

अनाज की पैदावार से संबंधित कानून पर अमल करने वाला अनाज सुरक्षा और मानक कानून २००६ में लागू हो पाया| उसके बाद जहां गांव वहां तालाब यानी छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण धीमी गति से होता रहा| देश के कई भागों में पानी की कमी रहने के कारण किसानों की आत्महत्याओं की घटनाएं बढ़ने लगीं| सरकारी आंकड़े बताते हैं कि आजतक देश के ३ लाख किसानों ने आत्महत्या की है| यह ७० साल के सत्ताधीशों के कार्य के रूप में सामने आया है|

इसमें से उपाय खोजने हेतु किसान आंदोलन शुरू हुआ| इसके नेताओं ने भी किसानों के हालात कैसे सुधारें, उनकी प्रगति कैसी होगी, इस ओर ध्यान न देकर सिर्फ कर्जमाफी की रट लगाई| दो साल बारिश की कमी, बाद में एक साल अतिवृष्टि| जो किसान प्रकृति पर निर्भर थे उनकी खेती पर दुष्प्रभाव पड़ा| इससे किसान संगठन और राजनीतिक संगठनों को एक ही उपाय मिला वह है- संपूर्ण कर्ज माफी योजना| इस कर्जमाफी के कारण किसानों का ‘सातबारा’ रिक्त कराया जाय (जिस पर कुछ लिखा न हो याने पूरी कर्जमाफी) जैसी मांगे होने लगीं| किसानों की माफी दिलाने पर ‘सातबारा’ कैसे रिक्त होगा? मेरे जैसे आम आदमी की समझ में यह बात आज तक नहीं आई| जैसे हर साल बारिश का मौसम आना है| यह प्राकृतिक नियम है| उसी प्रकार यह कर्जमाफी तो हमेशा ही रहेगी, यह किसानों की मानसिकता बन गई|

उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस साल हंगामा हुआ| चुनाव में दिए गए आश्‍वासनों की पूर्ति करने हेतु राज्य सरकार ने कर्जमाफी दिलाने की घोषणा की| इसी बात को लेकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात व कर्नाटक राज्यों में कर्जमाफी के लिए आंदोलन होने लगे| मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सो में इस आंदोलन ने हिंसात्मक रूप ले लिया| राजनीतिक दलों ने एक दूसरे पर दोष मढ़ना शुरू कर दिया|

क्या इस पर कर्जमाफी देना सही उपाय है? मैं आम आदमी की तरह  सोचता हूं| मेरी सोच के अनुसार विकास के लिए सरकार आवश्यक है| इस महत्वपूर्ण बात को ध्यान में रखें तो निश्‍चित रूप से हमारे किसान भाइयों का आर्थिक स्तर ऊंचा उठ सकता है| महाराष्ट्र में अनेक सहकार महर्षि हुए हैं| कुछ सहकार महर्षियों ने कोशिश करके अपने-अपने क्षेत्रों के किसानों का आर्थिक स्तर सुधारा है| इसके मुख्य उदाहरण हैं महाराष्ट्र के वारणा, गोकुल जैसे यशस्वी दुग्ध-व्यवसाय|

कुछ शक्कर के कारखाने भी सच्चाई या ईमानदारी से चलाए जाने के कारण उस विशिष्ट प्रदेश के किसानों की आर्थिक स्थिति अच्छी है| इस बारे में देश का सर्वोत्तम उदाहरण है| गुजरात राज्य की ‘अमूल’ परियोजना| इसी के कारण ‘आनंद’ और ‘खेड़ा’ जिले के किसान भाई खुश हैं| उनका आर्थिक स्तर सचमुच ऊंचा हुआ है|

नि:स्वार्थ भाव से जिन्होंने सहकारिता क्षेत्र में काम किया उस प्रदेश के किसानों का आर्थिक स्तर सुधर गया| हमारे देश की खेती बारिश पर अवलंबित है| इसी के कारण किसानों का नुकसान होता है और वे आत्महत्या करने के लिए बाध्य होते हैं| उन्हें उनके उत्पाद की सही कीमत नहीं मिलती| इससे सिर पर कर्जे का बोझ बढ़ता है| सरकार योजना लाती है परंतु वह भाव किसानों को नहीं मिलता| आर्थिक मुसीबतें आती हैं, जिसकी वजह से वे आत्महत्या के लिए प्रवृत्त होते हैं| अगर ये हालात सुधारने हैं, तो सिर्फ कर्जमाफी देकर समस्या नहीं सुलझेगी| इस साल उत्तर प्रदेश सरकार नेे ३५,००० करोड़ की कर्जमाफी दे दी| जिन राज्यों में भाजपा सरकार है उन राज्यों में विरोधी पक्षों ने किसानों का आंदोलन शुरू किया| उसमें मध्यप्रदेश के आंदोलन को जानबूझकर हिंसात्मक बनाया गया|

महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना सरकार सत्ता में आई, तभी उनके सिर पर ३० हजार करोड़ का कर्जा था| कर्जे का बोझ पिछली सरकार ने वर्तमान सरकार को दिया है| उस समय के उच्चपदस्थ मंत्री मांग करने लगे कि किसानों को कर्जमाफी दिलाई जाय तथा किसानों को उनके उत्पाद का सही दाम दिया जाए| इस संदर्भ में शिवसेना ने भी आश्‍चर्यजनक रास्ता अपनाया और सारे किसानों का ‘सातबारा‘ (वह पत्र जिस पर जमीन की जानकारी होती है) रिक्त कराने की मांग की| जो मांग पिछले सत्तर सालों से नहीं पूरी हुई उसे पूरा करने के लिए उन्हें उपाय ढूंढ़ना चाहिए था| सारे राजनीतिक दलों का किसानों की ओर देखने का नजरिया राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित होता है| ऐसा दिखाई पड़ता है|

किसान भाइयों को संगठित कर, उनका प्रबोधन कर, उन्हें भारतीय संविधान के अनुसार प्राप्त, सहकारिता के मूल हक का उपयोग कैसे करें? इसका प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए| ऐसे किसानों की सहकारी संस्था स्थापित करनी चाहिए| उसके लिए लगने वाला मूल धन सरकार या जिला सहकारी बैंक दें| जरूरी चींजे यानी बीज, खाद, खेती के लिए लगने वाली आधुनिक यंत्र सामग्री खरीद कर, उन्हें कर्जा देकर, किसानों को इन चीजों के उपयोग का सही अवसर प्रदान करना चाहिए| सारे किसानों को समानता का अवसर देकर, सहकारिता के माध्यम से खेती होगी, तो खेत का मालिकाना हक कोई नहीं छीन सकेगा| अपने-अपने प्रदेश के तापमान के अनुसार किसान खरीफ की फसल तथा रबी की फसल उगा सकते हैं| कुछ और प्रकारों से वे अपनी आय या उत्पादन बढ़ा सकते हैं|  फसलें तैयार होने पर किसानों के लिए आवश्यक गोदाम, शीतगृह आदि के लिए सरकार से मदद मिलनी जरूरी है| बल्कि किसान भाइयों को उनके माल का सही दाम मिले इसलिए आवश्यक सरकारी सुविधाएं अस्तित्व में लानी चाहिए| इसके कारण किसानों का इसमें आवश्यक सहभाग होगा, तथा उनको अपनी मेहनत का फल मिलेगा| ७०% से ८०% किसानों का योग्य संगठन सहकारिता के तत्व का अनुकरण कर बनाए| जिसके कारण किसानों की आर्थिक क्षमता का स्तर ऊंचा उठेगा यह वर्तमान समय की जरूरत है|

इस दृष्टि से कोशिश न करने के कारण कम बरसात से सूखा और ज्यादा बरसात से हानि होती है| किसान कर्जे के बोझ से कभी बाहर नहीं आता| इस कारण उनकी आत्महत्याएं रुकती नहीं| किसानों को कर्जमाफी से राहत देने की सुविधा देना उनके परिवार जनों के लिए हानिकारक है तथा देश की तरक्की के लिए भी| सहकारिता के हक का अधिकार ही किसानों को कर्जमाफी से मुक्ति दिला सकता है, उनका ‘सातबारा’ रिक्त हो सकता है|

आगे की सीट पर बैठ कर किस प्रकार विचार व्यक्त किए जा सकते हैं, इसका उत्कृष्ट उदाहरण है पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम| उन्होंने १५ अगस्त २०१७ के ‘लोकसत्ता’ में सत्तर सालों में भारत की आर्थिक स्थिति पर लेख लिखा है| इस संदर्भ में हमने क्या-क्या सुयश प्राप्त किया इसकी सूची लिखी है| इसके महत्वपूर्ण मुद्दे निम्नलिखित हैं-

१) भारत की जनता की जीवन रेखा बढ़ कर ६८.३४ वर्ष हो गई है|

 २) व्यक्ति की सालाना आय (आजकल के हिसाब से १,०३,२१९ रुपये हो गई है|)

 ३) साक्षरता ७३% तक बढ़ी है|

 ४) गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या घट कर २२% कम हो गई है|

 ५) अनाज के उत्पादन में देश सक्षम हो गया है, जिसके कारण अकाल का संकट नहीं आएगा|

 ६) प्लेग, कॉलरा, चेचक जैसे रोगों को मात दी जा सकती है|

 ७) विज्ञान, प्रोद्यौगिकी के क्षेत्र में देश ने प्रगति की, उसके लिए कम साधन सामग्री का इस्तेमाल कर अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा परियोजना कार्यान्वित की|

ये पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम जी की बनाई सुयश की सीढ़ियां हैं| मुझे लगता है कि अगर ऐसे ही हालात होते और हर व्यक्ति की अपनी आय बढ़ गई होती तो किसानों को आत्महत्या नहीं करनी चाहिए थी| कर्जमाफी की समस्या सुलझाना आसान हो जाता था| इनके जैसे अर्थशास्त्री जब आगे की बेंच पर बैठ कर इस प्रकार के नतीजों पर पहुंचते हैं तब ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति को देश की आर्थिक स्थिति की सही जानकारी है या नहीं? या फाइव स्टार होटल में बैठ कर ये नतीजे निकाले गए हैं? ऐसे सवाल आदमी के मन में उठ खड़े होते हैं|

इन घटनाओं की ओर देखने का रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का दृष्टिकोण अलग है|  सहकारी क्षेत्र का बैंक बड़ा हो या छोटा, एक ही मानदंड या कसौटी राष्ट्रीयकृत बैंक और निजी बैंकों को लगाई जाती है| उनके आला अफसरों का यही कहना होता है कि आप सब बैंकों के नियमों का सख्ती से पालन करें, व्यवसाय करें| सहकार केंद्र मूल तत्व का फायदा स्वयं कम लेकर उसका लाभ समाज को दें? यह मूल तत्व जब तक आर.बी. आई. नहीं मानता तब तक सहकारी बैंक को उनका कहना मानना पड़ता है| सहकारिता क्षेत्र के बैंकों के साथ आर.बी.आई. अलग बर्ताव तथा इसमें काम करने वाले लोगों के साथ भेदभाव करता है| इससे सहकारिता क्षेत्र में सारे लोगों को मिलने वाला मूल अधिकार, इससे सहकारिता क्षेत्र की प्रगति न होना इत्यादि बातें आज ऐसी हालत  में हैं कि यह विचार मन में आता है कि क्या इस क्षेत्र को नष्ट करने का प्रयत्न आर.बी.आई. कर रहा है?

उपरोक्त विश्‍लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि किसानों की आत्महत्याएं रोकने की सरकार की वाकई इच्छा होगी तो कर्जमाफी न देकर भी और सहकारी क्षेत्र को अपना कर किसानों को उनका योग्य हक दिलाया जा सकता है| इससे देश की अनेक घातक परंपराएं नष्ट होकर भारत एक बलवान राष्ट्र बन सकेगा, यही मेरा विश्‍वास है|

‘बिना सहकार नहीं उद्धार!’

आपकी प्रतिक्रिया...