आधुनिकरण के प्रवाह में बदतर होते मजदूर

आधुनिकीकरण एवं वैश्‍वीकरण ने देश में विषमता को बहुत तेजी से बढ़ावा दिया है| एक बहुत अमीर वर्ग है, जबकि दूसरा निर्धन बना मजदूर वर्ग है| असंगठित क्षेत्र में तो हालत और खराब है| हमें भारतीय माहौल के अनुरूप अपनी श्रम नीतियों को संशोधित करना चाहिए, ताकि ‘सबका साथ, सबका विकास’ जमीनी घोषणा बन सके|

हमारे देश ने कुछ दिन पहले अपना ७१वां स्वतंत्रता दिवस मनाया| देश को स्वतंत्रता दिलाने में मजदूरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी| भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के लाखों मजदूरों ने अपने को समर्पित कर दिया था| १९४७ में देश स्वतंत्र हुआ, गोरे चले गए परंतु हमारे देश के तथाकथित काले लोग देश के साथ-साथ मजदूरों का शोषण करते-करते गरीब से धनवान बन गए| १९४७ से मजदूरों का मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक शोषण होते आ रहा है, जिस पर अव तक रोक नहीं लग पाई है| १९४७ से अव तक सभी सरकारें एवं राज नेता वादे पर वादे करते आ रहे हैं| मजदूरों को देश की प्रगति का मेरुदंड बताने वाले वादे से मुकरते रहे हैं|

मजाक में कहा जाता है, मजदूर वह है जो मजे से दूर होता है यानि कि मजदूर का मनोरंजन से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं होता| देखा जाए तो यह कहावत भले ही हंसी-मजाक वाली हो लेकिन यह वास्तविकता ही है| मजदूर दिन-रात श्रम करके जो भी मजदूरी पाता है उसमें वह मजे कर पाए, असंभव प्रतीत होता है| इसके बावजूद भी वह अपने परिवार के साथ उसी मजदूरी में आनंद टटोलने की कोशिश करते हुए अगले दिन के रोजी-रोटी के बारे में सोचने लगता है| वाकई मजदूरों की यह स्थिति आश्चर्यजनक है, ऐसे में प्रश्न लाजिमी है कि क्या वास्तव में मजदूर मजे से दूर रहने के लिए होता है, क्या मजदूर को मजे करने का कोई हक नहीं या फिर इनकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं होने वाला जिससे कि ये भी आनंद से जी सकें?

हमारा देश आधुनिकीकरण की ओर तेजी से बढ़ रहा है, ऐसा कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है| देश में तीव्र गति से बदलाव आ रहा है| परंतु चिंताजनक बात यह है कि आज ‘पश्चिमीकरण’ ही आधुनिकीकरण का पैमाना बनता जा रहा है| आधुनिकीकरण के नाम से देश के उद्योगों, कृषि क्षेत्रों एवं स्वरोजगार क्षेत्रों में इस तरह बदलाव आ रहा है, जिसके चलते बेरोजगारी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रही है| आधुनिकीकरण की परिभाषा श्रमिक क्षेत्र में अभिशाप बनते जा रही  है|

 १२ करोड़ लोग बेरोजगार:

भारत में खासकर युवा वर्ग में बढ़ती बेरोजगारी गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है| केंद्र सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़ों में कहा गया है कि देश की आबादी के लगभग ११ फीसदी यानि १२ करोड़ लोगों को नौकरियों की तलाश है| सब से चिंता की बात यह है कि इनमें पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद ही सब से ज्यादा है| बेरोजगारों में २५ फीसदी २० से २४ आयु वर्ग के हैं| जबकि २५ से २९ वर्ष की उम्र वाले युवकों की तादाद १७ फीसदी है| २० साल से ज्यादा उम्र के १४.३० करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है| वर्ष २०११ की जनगणना के आधार पर केंद्र सरकार की ओर से हाल में जारी इन आंकड़ों में महिला बेरोजगारी का पहलू भी सामने आया है| नौकरी की तलाश करने वालों में लगभग आधी महिलाएं शामिल हैं| कहा गया है कि बेरोजगारों में १०वीं या १२वीं तक पढ़े युवाओं की तादाद १५ फीसदी है| यह तादाद लगभग २.७० करोड़ है| तकनीकी शिक्षा हासिल करने  वाले १६ फीसदी युवा भी बेरोजागारों की कतार में हैं | इससे साफ है कि देश के तकनीकी संस्थानों और उद्योग जगत में और बेहतर तालमेल जरूरी है| इन आंकड़ों से साफ है कि पढ़े-लिखे युवा छोटी-मोटी नौकरियां करने की बजाय बेहतर मौके की तलाश करते रहते हैं| बेरोजगार युवाओं में लगभग आधे लोग ऐसे हैं जो साल में छह महीने या उससे कम कोई छोटा-मोटा काम करते हैं| लेकिन उनको स्थायी नौकरी की तलाश है| कुल बेरोजगारों में ऐसे लोगों की तादाद लगभग ३४ फीसदी यानि १.१९ करोड़ है| वर्ष २००१ से २०११ के दौरान १५ से २४ वर्ष के युवाओं की आबादी में दो गुनी से ज्यादा वृद्धि हुई है, लेकिन दूसरी ओर उनमें बेरोजगारी की दर १७.६ फीसदी से बढ़ कर २० फीसदी तक पहुंच गई है| वर्ष २००१ में जहां ३.३५ करोड़ युवा बेरोजगार थे वहीं २०११ में यह तादाद ४.६९ करोड़ पहुंच गई| वर्ष २००१ में युवाओं की आबादी एक करोड़ थी जो २०११ में २.३२ करोड़ हो गई यानि इसमें दो गुना से ज्यादा वृद्धि दर्ज हुई| इसके मुकाबले इस दौरान देश में कुल आबादी में १७.७१ फीसदी वृद्धि दर्ज हुई| इन आंकड़ों से साफ है कि युवाओं की तादाद जहां तेजी से बढ़ रही है वहीं उनके लिए उस अनुपात में रोजगार उपलब्ध नहीं हो रहे हैं|

आजादी के समय कुल जनसंख्या का लगभग ७५ प्रतिशत खेती पर आधारित था और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उसका योगदान ६१ प्रतिशत था| वर्तमान में खेती पर जनसंख्या की निर्भरता ६० प्रतिशत और सकल घरेलू उत्पाद में उसका योगदान घट कर २० प्रतिशत रह गया है| हमारे अर्थशास्त्री इन दोनों आंकड़ों को अर्थव्यवस्था की प्रगति और आधुनिकीकरण का सूचक मानते हैं, परंतु इसका एक दूसरा पक्ष भी है| वह यह कि पहले देश की ७५ प्रतिशत जनसंख्या के पास ६१ प्रतिशत आय थी, और अब ६५ प्रतिशत जनसंख्या को राष्ट्र की कुल आय के २० प्रतिशत से काम चलाना पड़ता है| इसका सीधा अर्थ यह है कि पहले कृषि में लगे प्रति व्यक्ति तथा अन्य व्यवसायों में लगे लोगों की आय में एक और दो का अंतर था, जो अब बढ़ कर एक और सात हो गया है| आंकड़ों की दृष्टि से भी ऐसा प्रतीत होता है कि खेती पर निर्भरता घटी है, जो पहले ७५ प्रतिशत थी अब ६० प्रतिशत रह गई है जबकि वास्तविकता यह है कि आजादी के समय देश की आबादी थी ३६ करोड़ थी जिसके ७५ प्रतिशत यानी २७ करोड़ लोगों का मुख्य काम खेती था| अब जनसंख्या है १३२ करोड़, जिसका ६० प्रतिशत यानी ७९ करोड़ से अधिक लोग खेती पर निर्भर हैं| यानी संख्या २७ करोड़ से बढ़ कर ७९ करोड़ हो गई है| घटी नहीं बल्कि ढाई गुणा अधिक बढ़ी है|

आज देश की जनसंख्या १३२ करोड़ से अधिक हो चुकी है| इस स्थिति में देश में रोजगार पैदा करना देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है| वैश्विकरण के चलते एक ओर देश के हजारों उद्योग बंद हो गए, जबकि दूसरी ओर आधुनिकरण के चलते उद्योगों में तकनीक बदलाव के नाम पर लाखों मजदूरों को छंटनी हुई है| भारतीय मजदूर संघ के प्रतिष्ठाता मा. दत्तोपंत ठेंगडी जी कहा करते थे, हमें ऐसी मशीन नहीं चाहिए जो लोगों का रोजगार समाप्त कर दे|westernization is not modernization |

८० के दशक के  प्रारंभ से भारतीय मजदूर संघ ने कम्यूटरीकरण का विरोध किया था| उस ज़माने में ठेंगडी जी ने भी कई लोगों के विरोध का सामना किया था| उस समय भारतीय मजदूर संघ ने कंप्यूटर का विरोध नहीं, अपितु indiscriminate computerization विरोध किया था | जिसके चलते बेरोजगारी को बढ़ावा मिलेगा| तत्कालीन सरकार को शायद लगता था कि सिर्फ मजदूरों के अडंगे के कारण देश का आर्थिक विकास रुका हुआ है| ९० के दशक में LPG  नीतियों के चलते देश में बहुत सारे उद्योग बंद हो गए| बैंकों, छोटे-बड़े कारखानों, अस्पतालों, डाक, शिक्षा सेवा संस्थाओं में लोगों की छंटनी कर दी गई| आजकल मशीन को भगवान माना जाता है| मशीन को चलाने वाले को वस्तु यानि commodity जैसा ब्यवहार किया जाता है| आदमी आदमी से नफ़रत करता है| आदमीयों का विभाजन ऊच, निम्न, छोटे, बड़े, कुशल, अर्धकुशल उच्च कुशल श्रेणी इत्यादि में किया जाता है|

 आकलन यह कहता है…

देश में केवल १० प्रतिशत श्रमिक ही संगठित क्षेत्र में हैं| ९० फीसदी कामगार असंगठित क्षेत्र में हैं| जानकारों के अनुसार असंगठित क्षेत्र के कामगारों में भी ६० प्रतिशत कामगारों की स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जाती है| करीब ५० फीसदी श्रमिक केजुअल वेज पर काम कर रहे हैं वहीं केवल १६ प्रतिशत मजदूर ही नियमित रोजगार से जुड़े हुए हैं| खेती में आधुनिकीकरण के चलते मानव श्रम की कम आवश्यकता के कारण कोई ३६ फीसदी लोगों ने खेती पर निर्भरता छोड़ अन्य कार्यों को अपनाया है| गृह उद्योगों का जिस तरह से विस्तार होना चाहिए था वह अपेक्षाकृत नहीं हो पा रहा है| इसके चलते सामाजिक विषमता बढ़ती जा रही है| हालांकि महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना- मनरेगा- में निश्चित रोजगार की बात की जा रही है पर इसमें भी रोजगार के क्षेत्र में विषमता पनपी है और धीरे-धीरे यह भी भ्रष्टाचार और आलस्य को बढ़ावा देने वाला बनता जा रहा है| सूक्ष्म, लघु, और मध्यम उद्यम (MSME) जो ८५% रोजगार कभी देते थे, वे पिछले २८ सालों में लगभग बंद हो गए| इन उद्योगों से ७५% निर्यात होता था, जो १९९१ के बाद LPG  नीतियों के चलते संपूर्णत: प्रभावित हुआ है|

देश के आर्थिक विकास में असंगठित श्रमिकों की भागीदारी को नकारा नहीं जा सकता| सरकार द्वारा समय-समय पर इनके लिए सामाजिक सुरक्षा उपायों की घोषणा भी की जाती रही है| पर इसका पूरा लाभ असंगठित श्रमिकों को प्राप्त नहीं हो पाता है| असंगठित श्रमिकों के कौशल को विकसित करने के लिए नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था, कच्चे माल की उपलब्धता, स्वास्थ्यबीमा जैसी सुरक्षा और विपणन सहयोग के माध्यम से असंगठित क्षेत्र के बहुत बड़े वर्ग को लाभान्वित किया जा सकता है| संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के हालातों में काफी सुधार हुआ है और सामाजिक सुरक्षा में इजाफा होने से संगठित क्षेत्र के श्रमिक अब सुकूनभरी जिंदगी जीने लगे हैं| इन सारे उपक्रमों को भी बंद करने पर  सरकार तुली हुई है|

बढ़ती मंहगाई से सब से अधिक प्रभावित असंगठित क्षेत्र के कामगार ही होते हैं| जहां तक कर्मचारियों का प्रश्न है उन्हें मंहगाई भत्ते के रूप में थोड़ी बहुत भरपाई हो जाती है, वहीं संगठित क्षेत्र के श्रमिकों को भी कुछ राहत मिल ही जाती है| ले-देकर असंगठित क्षेत्र के कामगारों के सामने दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किलभरा काम होता जा रहा है| असंगठित क्षेत्र में भी खास तौर से दुकानों, ठेलों, खोमचों, चाय के स्टॉलों, होटलों-ढाबों पर काम करने वाले आदमियों की मुश्किलें अधिक हैं| इसके अलावा रिक्शा-टैक्सी चलाने वाले, माल ढोने वाले, कारीगर, प्लम्बर, सेनेटरी का काम करने वाले, बिजली सुधारने वाले, साइकिल आदि से सामान बेचने वाले और ना जाने कितनी ही तरह के असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की समस्याओं का अंत नहीं है| रोजमर्रा के काम करने वाले लोगों की समस्याएं अधिक हैं| कल-कारखानों में भी ठेके पर श्रमिक रखने की परंपरा बनती जा रही है और तो और अब तो सरकार भी अनुबंध पर रख कर एक नया वर्ग तैयार कर रही है|

शहरीकरण, गांवों में खेती में आधुनिक साधनों के उपयोग व परंपरागत व्यवसाय में समयानुकूल बदलाव नहीं होने से भी गांवों से पलायन होता जा रहा है| हालांकि सरकार असंगठित क्षेत्र के कामगारों को भी सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कदम उठा रही है पर अभी इसे नाकाफी ही माना जाएगा| भारत में रोजगार की उतनी समस्या नहीं है जितनी वेतन अनुपात को लेकर है| कम उत्पादकता वाली इकाइयों के चलते यहां काम करने वाले मजदूरों का पारिश्रमिक भी काफी कम है| टेक्नॉलॉजी की ज़माने में भविष्य में रोजगार की स्थिति के बारे में अभी से कोई अनुमान लगा पाना लगभग असंभव है| केवल यही कहा जा सकता है कि भविष्य में उच्च जीवन प्रत्याशा और तीव्र तकनीकी विकास के दौर में कौशल विकास ही इकलौता आसरा होगा| तकनीक को अपनाने से पहले हमारे देश की भौगोलिक, सामाजिक, संस्कृतिक तथा आर्थिक पहलुओं पर भी विचार करना होगा|

भारत में एक ओर २२ हजार रुपये प्रति प्लेट भोजन पर खर्च करने वाले लोग हैं, वहीं दूसरी ओर एक बड़ी आबादी है, जिसको इतना कमाने में वर्षों लग जाते हैं| सड़कों, प्लेटफार्मों पर जूठन इकट्ठा कर खाने को मजबूर हैं| प्रति दिन २० रुपये से कम कमाने वाले लोगों की आबादी ४८ फीसद से अधिक है| वहीं ६७ फीसद लोग भुखमरी के शिकार हैं| जिस देश की समृद्धि की जानकारी पाकर सात समुद्र पार से आकर लोगों ने यहां का धन लूटा, आज वहां आर्थिक तंगी से १.२३ लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली है| यह कैसी प्रगति है? अपने आपको यह प्रश्न करना चाहिए| क्या बदलाव के लिए सिर्फ अपने पूर्वजों के यश, बल और ज्ञान के स्मरण की जरूरत है? पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्मवाद से ही आर्थिक व सामाजिक विषमता दूर होगी| जरूरत भाव में आत्मीयता, वाणी में विनम्रता और व्यवहार में समानता की जरूरत है| सिर्फ नारों एवं भाषणबाजी से ‘सवका साथ, सवका विकास’ कहने के बजाए कामगारों की जमीनी आवश्यकताओं को देखते हुए सख्त नीति के प्रणयन एबं उसके अनुपालन से ही कामगारों की भाग्य निर्माण के साथ-साथ देश की प्रगति सुनिश्चित की जा सकती है|

दुनिया के विकास के साथ, अगर हमारा सब से छोटा आदमी चल सके तव माना जा सकता है कि हम आधुनिकीकरण के साथ है| लेकिन हमारे यहां दुनिया एक तरफ ओर हम प्रगति की विपरीत दिशा में चल रहे हैं| अगर आज मजदूर को परिभाषित करना है तो  यह है कि, भीख मांगने के बजाय मजदूरी करके पेट पालने वाला व्यक्ति! शरीर में ताकत है तो असामाजिक कार्य करने के लिए जो मजबूर होता है, जो अपने परिवार के प्रतिपोषण के लिए मजबूरी में कुछ करता है उसे मजदूर/कामगार/श्रमिक/कर्मकार/टोलीअली/उद्योगुलू/नौकरारू/कर्मचारी इत्यादि के नाम से पुकारते हैं| आधुनिकरण के इस ज़माने में जहां हमारे देश की एक छोटे जनसंख्या मजे में है तो दूसरी ओर ९५% लोग मजे से दूर हैं| इस प्रकार स्थिति से देश के विकास की दिशाएं किस तरफ हैं इसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है| आज ऐसी स्थिति है कि जिस उद्योग में मजदूर काम करता है, उसी उद्योग का उत्पाद खरीदी न करने वाला ब्यक्ति ही मजदूर है|

 

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