नेत्रदान, महाअभियान

अपने शरीर का हर अंग अगर हमारी मृत्य् के उपरांत दूसरे को नया जीवनदान दे सके तो यह पुण्य का कार्य प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। ‘आई प्लेज, वी प्लेज’ के महाअभियान में अब तक 50 लाख से अधिक लोग शामिल हो चुके हैं। आइए, आप भी उसका हिस्सा बनिए। यह ईश्वरीय कार्य है।

बचपन में दहिसर गांव में पहाड़ी के ऊपर से सूर्य भगवान को अस्त होते देखते समय, शुरू में दिखने वाला और रंगों की बौछारों से होने वाला विचित्र आकारों का खेल देखते-देखते समझ में नहीं आता था कि अंधेरा कब हुआ। इस रचना और रंगों का खेल मुझे बड़ा मोहक लगता था। परमेश्वर की इस अद्भुत रंगों की बौछार में जितना मैं प्रकृति के करीब होने लगा, उतना ही रंगों का नापना मुझे ज्यादा आकर्षित करने लगा। घने हरे पौधों में से झूमते रंगबिरंगे फूल, सिर पर नीला आसमान और आसमान से निहारते मजेदार आकारों के बादल! पैरों तले, कभी काली मिट्टी तो कभी भूरी।

ऐसे ही एक बार भटकते हुए मैं स्केचेस निकालने के लिए राजमाची गया था। उस जमाने में रंगीन फोटोग्राफी नहीं थी। फिर भी ‘अ‍ॅग्फा’के कृष्ण धवल कैमरे से मैं प्रकृति का वह स्वरूप कैद कर रहा था। उसके बाद पूरी तरह से भीगा हुआ मैं मुंबई वापस आने के लिए निकला। एस.टी. में बैठकर आंखें मूंदकर रंगों की वह बौछार याद करते-करते कब आंख लग गई पता ही नहीं चला। आंखें जब खुलीं तब किसी एस.टी. स्थानक पर खिड़की से बाहर लाल और सफेद छड़ी के सहारे बारिश में भी काला गॉगल पहनकर चलने वाला एक नौजवान दिखा। रास्ता पार करते उस दृष्टिहीन नौजवान को देखकर यकायक विचार आया कि अगर मैं वहां होता तो… ! कैसी होगी उस नौजवान की जिंदगी? जो रंग मैं देखता हूं, वो यकीनन नहीं देख पाता होगा। जिस उत्साह से मैं प्रकृति का सारा सौंदर्य मेरे हाथों से उतारता हूं, उसका वर्णन दूसरों को करता हूं, यह नौजवान यकीनन कर न पाएगा…मतलब मैं नहीं कर पाऊंगा क्योंकि उस पल मैं खुद को उस नौजवान में देख रहा था।

एस.टी. शुरू हुई। रिमझिम बरसते बारिश का पानी चेहरे पर गिरा और मेरी आंखों से बहने वाले पानी से एकरूप हो गया। पानी से डबडबाए आंखों से दिखता हुआ धुंधला सा दृश्य…!

कुछ साल गुजर गए। मेरे ‘सामाजिक कार्य’ की वजह से मेरा संबंध हाजी अली स्थित AIIPMR संस्था से हुआ। कहीं जाते हुए एक दिन महालक्ष्मी पुल के पास एक दृष्टिहीन व्यक्ति द्वारा चलाए जाने वाले टेलीफोन बूथ के पास आ गया। एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक ग्राहक ने टेलीफोन बिल के दो रुपये की रकम की जगह एक रुपये का नोट उस अंधे व्यक्ति को दे दिया और जाने लगा। इतने में बूथ के उस दृष्टिहीन नौजवान ने जोर से चिल्लाकर उसे कहने का प्रयास किया कि यह एक रुपये का नोट है। मैंने दौड़ते हुए जाकर उस इन्सान को बुलाया, तब उसे उसकी गलती का अहसास हुआ और उसने दो रुपये का नोट दिया। सच कहूं तो धक्का मुझे लगा था। जो देख नहीं सकता उसने केवल स्पर्श से नोट का मूल्य बताया। मैंने उसे उत्कंठा से पूछा, “आपने यह कैसे समझा कि नोट कितने रुपये का है?” उसने हंसकर कहा, “आप मुझे कोई भी नोट दो, मैं बता सकता हूं कि वह कितने रुपये का है।” उत्कंठा वश मैंने अपनी जेब से सब नोट निकालकर उसे दिखाए और उसने भी वह सही पहचाने। यहां से हमारी ‘मित्रता’ का सिलसिला शुरू  हुआ।

कुछ दिनों बाद उसे मेरे नाट्यप्रेम के बारे मे पता चला और उसने नाटक में अभिनय करने के प्रति बहुत उत्साह दिखाया। उसे मद्देनजर रखकर मैंने एक मराठी नाटिका (एकांकी) लिखी जिसका नाम था – ‘आंधळी कोशंबिर!’ यह चार नौजवानों की कहानी थी जिनमें से दो दृष्टिहीन और दो दृष्टिवान थे। स्पर्धा में इस नाटिका को प्रथम क्रमांक से नवाजा गया। मुझे भी अभिनय एवं दिग्दर्शन का प्रथम पारितोषिक मिला। यही नाटिका राज्यस्तर पर चुन ली गई, तब परीक्षकों में से एक मेरे करीब आया और बहुत बड़ी सलाह देने के अंदाज में मेरे कान में बोला, “तेरी नाटिका बहुत सुंदर है, बस जो अभिनेता अंधों की भूमिका कर रहे हैं, उन्हें बदल दो। वे अंधे लगते नहीं।” मेरे लिए यह बहुत बड़ा झटका था। उस विद्वान व्यक्ति को मुझे यह समझाना पड़ा कि नाटिका के ये अभिनेता वास्तव में दृष्टिहीन हैं।

इस घटना के बाद मुझे जाने अनजाने में लगने लगा कि जो दुनिया मैं देख रहा हूं, उसकी अपेक्षा ये द़ृष्टिहीन ‘दृष्टि’ के पार की दुनिया देखते हैं। हम खुद को ‘दृष्टिवान’ मानते हैं पर सच में हम क्या देखते हैं? बहुत साल बीत गए। इस दौरान योगसाधना के प्रशिक्षण के दौरान मैंने बहुत से नेत्रहीनों को योगविद्या सिखाई। उनके साथ संगीत के कार्यक्रम किए और महत्त्वपूर्ण ये है कि उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। समाज उनकी तरफ दया से न देखे, इतनी ही उनकी तहे दिल से भावना होती है। आत्मनिर्भरता क्या है, यह हमें नेत्रहीनों से सीखना होगा। जिद, मेहनत और संघर्ष करते हुए जिस तरह से मेरे ये सारे भाई-बहन रहते हैं, उनकी जितनी प्रशंसा करें, कम है। उन्होंने मुझे नित्य भर-भर के  प्यार दिया। रक्षाबंधन के दिन मेरी सगी बहनों ने शायद ही मेरी कलाई पर राखी बांधी होगी, परंतु  इन नेत्रहीन बहनों ने सैकड़ों की संख्या में अपने इस भाई के दोनों हाथों पर राखी बांधकर अपना प्रेम व्यक्त किया है। इस नि:स्वार्थ प्रेम की भावना को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

2012 के फरवरी महीने की बात है। मेरे बहुत ही निकट के स्नेही, परम मित्र और उस समय के जे. जे. अस्पताल के डीन पद्मश्री डॉ. तात्याराव लहाने, जिनका आंखों की साढ़े तीन लाख शस्त्रक्रियाओं का विश्व रिकॉर्ड है, ने मुझे बताया कि कॉर्नियल अंधेपन से ग्रस्त लोगों की संख्या 33 लाख है और साथ ही आवाहन किया कि इन नेत्रहीनों को दृष्टि प्रदान की जा सकती है, पर उसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को मृत्यु पश्चात नेत्रदान करना चाहिए। अंधश्रद्धा की वजह से मृत्यु के उपरांत लोग आंखें जलाते हैं अथवा दफनाकर नष्ट कर देते हैं। इसकी बजाय मृत्यु के पश्चात छ: घंटों के अंदर नेत्रदान किया तो आंखों का यह कॉर्निया नेत्रबैंक के लोग जमा करते हैं और कॉर्नियल अंधेपनसे पीड़ित रूग्णों को शस्त्रक्रिया कर दे सकते हैं। इससे रूग्ण इस दुनिया की खुबसूरती को देख सकता है। तात्याराव ने खेद के साथ यह बताया कि आज भारत में लगभग 33 लाख नेत्रहीनों के लिए नेत्र चाहिए, मगर नेत्रदान से उपलब्ध होने वाले नेत्र संख्या में अत्यल्प हैं। आप आगे बढ़कर इस ‘अभियान’ को  चलाएं और उसका नेतृत्व करें क्योंकि लोग अंध श्रद्धालु हैं। एक कॉर्निया की आयु करीबन 200 साल है और एक कॉर्निया के दो हिस्से करके दो नेत्रहीनों को दृष्टि मिल सकती है। अर्थात् एक व्यक्ति चार लोगों को दृष्टि दे सकता है।

उस दिन मैं रातभर सो नहीं सका,  बेचैन था। इतने सालों में कितने लाख लोगों के नेत्रदान न करने की वजह से कितना नुकसान हुआ। बस्स! मैंने सोच लिया। 12 मार्च 2012… शुभारंभ का समारोह – ‘आय प्लेज, वी प्लेज’! बहुत से नामचीन लोग इस समारोह में उपस्थित रहे। शुभारंभ में ही सबको आश्चर्य का धक्का था। एक लाख चौदह हजार लोगों ने नेत्रदान की शपथ ली। अखंड भारत में यह अभियान फैलता गया। देश के हर एक प्रदेश में से मेरे किए हुए आवाहन को लोगों ने जबरदस्त प्रतिसाद दिया। इतना ही नहीं, बल्कि विविध कार्यक्रमों में जिन्हें दृष्टि प्राप्त हुई है, ऐसे नेत्रहीनों को हमने मंच पर आमंत्रित किया और उनका भावपूर्ण मनोरथ सुना। उनमें से एक …यह सृष्टि बहुत सुंदर है। इतनी  रंगबिरंगी दुनिया भगवान का दिया हुआ दान ही है।

‘आय प्लेज, वी प्लेज’ अभियान 49 लाख प्रतिज्ञा पूर्ण कर के 50 लाख की ओर उड़ान भर रहा है। मुझे यकीन है कि एक दिन जरूर आएगा जब संपूर्ण भारत में एक भी कॉर्नियली नेत्रहीन व्यक्ति नहीं होगा। पीछे म़ुडकर देखते हुए वह घटना फिर से याद आती है…राजमाची से देखा हुआ सुंदर निसर्ग का रंगबिरंगा दृश्य, उसकी ली हुई कृष्णधवल तस्वीरें! आज उस तस्वीर में रंग भरने लगे हैं और यह सौंदर्य देखने का अधिकार सबको है! रोज की कश्मकश भरी जिंदगी में से तनावग्रस्त व्यक्ति को सामने सुंदर निसर्ग होते हुए आंखें नहीं बंद करनी चाहिए और किसी भी नेत्रहीन को स्वयं को किसी से कम नहीं समझना चाहिए; क्योंकि सृष्टि के विधाता ने ही अब सबको दृष्टि देने की ठान ली है। अपने शरीर का  हर अवयव अगर हमारी मृत्यु के उपरांत दूसरे को नया जीवनदान दे सके तो यह पुण्य का कार्य प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए।

दृष्टि के परे की सृष्टि अद्भुत है। जीवन के बाद भी जिएं हम…दूसरों को जीवन देकर! हम सब इस अभियान रूपी महासागर में एक छोटी बूंद बनें।

हरि ॐ।

 

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