अनुच्छेद 370 हटाओ

‘जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन जम्मू-कश्मीर का संविधान अब भी अलग है। जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा है, लेकिन जम्मू-कश्मीर का नागरिकत्व अलग है। कश्मीर को हम भारत माता का मुकुट कहते हैं- मुकुटमणि कहते हैं, लेकिन कश्मीर का ध्वज अलग है। इसका कारण क्या है?”

उपाध्यक्ष महोदय,

अभी अभी हमने मद्रास राज्य का तमिलनाडु नामकरण करने का संकल्प व्यक्त किया है। तमिलनाडु सुदूर दक्षिण में है, जहां हिंद महासागर भारत-भू के चरण पखार रहा है। तमिलनाडु में कन्याकुमारी है, जो अनादिकाल से भारत की अखंडता की साधना में निमग्न है। सदन को मैं अब कन्याकुमारी से कश्मीर की ओर ले जाता हूं। सच में एक ही दिन तमिलनाडु और कश्मीर की चर्चा भारत का सम्पूर्ण चित्र ही हमारे समक्ष उपस्थित करती है।

जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन जम्मू-कश्मीर का संविधान अब भी अलग है। जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा है, लेकिन जम्मू-कश्मीर का नागरिकत्व अलग है। कश्मीर को हम भारत माता का मुकुट कहते हैं- मुकुटमणि कहते हैं, लेकिन कश्मीर का ध्वज अलग है। इसका कारण क्या है? वह मैं जानना चाहता हूं। भारत का संविधान शेष राज्योंं के लिए उपयुक्त है, लेकिन कश्मीर राज्य के लिए ही क्यों उपयुक्त नहीं है? भारत का जो नागरिकत्व पचास करोड़ लोगों के लिए गौरवास्पद है, वही नागरिकता क्या जम्मू के चालीस लाख नागरिकों को गौरवास्पद नहीं है? हमारा तिरंगा सबको प्यारा है, लेकिन तिरंगे के साथ कश्मीर ने अपना अलग ध्वज रखा है। सारी देशी रियासतों के ध्वज भूतकाल के गर्भ में विलीन हो गए, फिर अकेले कश्मीर का ही पृथक ध्वज रखने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता।

प्रश्न यह है कि, जम्मू-कश्मीर एवं शेष भारत में यह द्वैत कब तक चलेगा? यह दुविधा की स्थिति कब तक चलेगी? जहां दुविधा की स्थिति है वहां पृथक्करण है, पृथकता की भावना है। हम संसद में घोषणाएं करते हैं कि कश्मीर भी अन्य राज्यों की तरह भारत का एक हिस्सा है। लेकिन हम ही जम्मू-कश्मीर के साथ कुछ भेदभाव कर रहे हैं। इस पर सदन को सोचना चाहिए। कितना आश्चर्य है न? सीमा पर भारत का जो जवान, हमारी सेना का वीर जवान जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए अपने प्राणों का आहुति देता है वह जम्मू-कश्मीर का निवासी नहीं हो सकता? वहां जमीन नहीं खरीद सकता। भारतीय जनता की पसीने की कमाई पानी की तरह बहाई जाती है। उसका हिसाब मांगने का अधिकार इस संसद को नहीं है। क्या यह विचित्र स्थिति नहीं है? भारत के राष्ट्रपति कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते क्या यह बात लज्जास्पद नहीं है? अब एक मुकदमा अदालत में आया था कि राष्ट्रपति कश्मीर के नागरिक नहीं हैं, जम्मू-कश्मीर की ‘प्रजा’ नहीं है, इसलिए वे जमीन नहीं खरीद सकते। राजा-महाराजा चले गए, उनके ताज भी लुप्त हो गए, लेकिन कश्मीर में अब भी राजा-प्रजा की बात होती है। पृथक नागरिकता के नाम पर वहां के प्रजाजनों को इस तरह की सहूलियतें मिलती हैं, जिनसे शेष देश को वंचित किया जाता है।

अनुच्छेद 370 अस्थायी है

जब राज्य संविधान बन रहा था और अनुच्छेद 370 पर चर्चा हुई तब संविधान सभा में जो कुछ बताया गया उसका पुनः उल्लेख करने की आवश्यकता है। मैं आपका और इस सदन का इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि अनुच्छेद 370 ‘टेंपररी एण्ड ट्रांजिशनल प्रोविजन’ के अंतर्गत आता है। हमारे संविधान का एक हिस्सा अस्थायी एवं अंतर्कालीन उपबंधों से सम्बंधित है और अनुच्छेद 370 इसीके अंतर्गत आता है। स्पष्ट है कि यह अनुच्छेद तात्कालिक और कुछ समय के लिए है, जो भारतीय संविधान का सार्वकालीन हिस्सा नहीं बन सकता।

डॉ.गोपालस्वामी अय्यंगार जब अनुच्छेद 370 पर बोल रहे थे तब मौलाना हजरत मोहानी ने पूछा था कि जम्मू-कश्मीर के बारे में भेदभाव क्यों किया जा रहा है? मैं उनसे सहमत हूं कि अनुच्छेद 370 कश्मीर को विशेष दर्जा नहीं देता। वह जम्मू-कश्मीर से भेदभाव करता है, वह उन्हें अन्य राज्यों के स्तर पर आने नहीं देता। डॉ. गोपालस्वामी अय्यंगार ने जो उत्तर दिया उसे मैं उद्धरित करता हूं, “कश्मीर के बारे में यह भेद कश्मीर की विशेष स्थिति के कारण पैदा हुआ है। यह विशेष राज्य ऐसे उपायों के लिए तैयार नहीं था। यहां हम यह आशा करें कि जम्मू-कश्मीर भी ऐसे उपायों के लिए शीघ्र तैयार होगा, जो अन्य राज्यों को भी उपलब्ध है।”

डॉ. अय्यंगार ने जब संसद में यह घोषणा की तब पूरी संविधान सभा में तालियों की गड़गड़ाहट हुई। संविधान सभा की अपेक्षा थी कि अनुच्छेद 370 तात्कालिक व्यवस्था हो और शीघ्रताशीघ्र ऐसी स्थिति उत्पन्न हो कि यह अनुच्छेद रद्द किया जा सके।

मुझे याद है कि 27 नवम्बर 1963 को मेरे मित्र श्री प्रकाशवीर शास्त्री के एक प्रश्न के उत्तर में स्व.नेहरू ने कहा था कि, “हमारी यह राय है कि अनुच्छेद 370 संविधान के उल्लेख के अनुसार ट्रांजिशनल अथवा अस्थायी है।” फिर किसी सदस्य के अनुरोध पर उन्होंने अंग्रेजी में यही बताया। मैं उसे पुनः उद्धरित करता हूं, “यह सदन ध्यान में रखें कि अनुच्छेद 370 एक परिवर्तनीय क्षेत्रीय करार है, यह संविधान का सार्वकालिक रूप नहीं है। यह करार जब तक लागू है तब तक यह हिस्सा संविधान में होगा।”

पूर्व विदेश मंत्री श्री छागला ने कश्मीर के बारे में संयुक्त राष्ट्रसंघ में हमारा पक्ष दृढ़ता से, उचित ढंग से और विद्वत्तापूर्वक रखते हुए कहा कि वर्तमान स्थिति में अनुच्छेद 370 की जरूरत नहीं है, उसे रद्द ही किया जाना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री सादिक भी अनुच्छेद 370 रद्द करने के पक्ष में हैं। 28 नवम्बर 1963 को उन्होंने एक वक्तव्य में कहा है कि अनुच्छेद 370 से जम्मू-कश्मीर और शेष भारत में एक खाई पैदा हुई है। एकीकरण को वास्तविक रूप देने के लिए यह खाई पाटना जरूरी है। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी 1 मार्च और 20 मई को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में भी उन्होंने अनुच्छेद 370 रद्द करने के पक्ष में ही अपनी राय प्रकट की।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद  भी, जो इस सदन में उपस्थित हैं, अनुच्छेद 370 खत्म करने के लिए कह चुके हैं। आज वे क्या कहेंगे यह मैं नहीं कह सकता।

श्री गुलाम मोहम्मद ः “हां, मैं बोल चुका हूं और मैं उस पर कायम हूं।”

अनुच्छेद 370 में कुछ विचित्र बातें हैं। पहली यह कि अनुच्छेद 238 के प्रावधान कश्मीर को लागू नहीं हो सकते। आज अनुच्छेद 238 का अतापता नहीं है। उसका सम्बंध ‘ब’ श्रेणी के राज्यों से आता था। वे राज्य खत्म हुए, उसीके साथ यह अनुच्छेद भी खत्म हो गया।

दूसरी बात यह कि, अनुच्छेद 370 में ‘डॉमिनियन ऑफ इंडिया’ के बारे में कहा गया है। अब भारत डॉमिनियन नहीं है। भारत एक संघराज्य है। अनुच्छेद 370 में कश्मीर के ‘महाराजा’ का भी उल्लेख है। अब कश्मीर के महाराजा भी नहीं रहे। अन्य राज्यों की तरह वहां भी राज्यपाल हैं। इस तरह यह अनुच्छेद निष्प्रयोजित है। उसका प्रयोजन भी खत्म हो चुका है।

अनुच्छेद 370 रद्द करने की प्रक्रिया भी उसी अनुच्छेद में बताई गई है। संविधान निर्माताओं ने इस बारे में क्या लिखा है उसे मैं यहां उद्धरित करता हूं- “राष्ट्रपति सार्वजनिक सूचना के जरिए घोषणा कर सकते हैं कि यह अनुच्छेद इन अपवादों के साथ, संशोधनों के साथ, इस दिन से जैसा उन्होंने निर्धारित किया है, वैसा लागू हो सकता है अथवा लागू होने से रोका जा सकता है।”

अनुच्छेद 370 राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वे एक आदेश जारी कर घोषित करें कि अनुच्छेद 370 अब अमल में नहीं रहेगा अथवा कुछ मामलों में ही उसके उपयोग की अनुमति होगी। अर्थात, संविधान के अनुसार यह काम राज्य सरकार की सम्मति से हो- राज्य सरकार, जो जम्मू-कश्मीर विधान सभा के प्रति जवाबदेह है और इस परिवर्तन के लिए उसकी सहमति आवश्यक है।

यह प्रस्ताव रखने का मेरा उद्देश्य केवल इतना ही है कि यह सदन अपनी यह मनीषा, इच्छा प्रकट करें, उद्घोषित करें कि अब अनुच्छेद 370 को राष्ट्रपति के आदेश से ‘इन ऑपरेटिव- निष्प्रभावी’ करने का समय आ गया है।

इस अनुच्छेद के आधार पर राष्ट्रपति ने अनेक आदेश जारी किए हैं, जिसके अंतर्गत जम्मू-कश्मीर प्रशासन के सम्बंध में, आर्थिक व अन्य बातों के बारे में शेष भारत से अधिक करीब आ चुका है। अब सर्वोच्च न्यायालय का अधिकारक्षेत्र जम्मू-कश्मीर को लागू है और भारत का चुनाव आयोग वहां के चुनावों को नियंत्रित करता है। वित्तीय एकीकरण हो चुका है। बहुत बातें हो चुकी हैं। पूर्ण एकीकरण की दृष्टि से यह अच्छा ही है। हम उसका स्वागत करते हैं। लेकिन मेरा निवेदन है कि एक ही बार में एक ही झटके में यह काम पूरा करने का समय आ गया है।

कश्मीर और शेष भारत में दीवार

जम्मू-कश्मीर और शेष भारत में अभी एक दीवार खड़ी है। इस दीवार से जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता निर्माण होती है। भारत विरोधी तत्वों को बल मिलता है। यह दीवार एकीकरण की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करती है। अब समय आ गया है कि यह मनोवैज्ञाानिक बाधा दूर की जानी चाहिए व जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों की तरह भारतीय गणराज्य में लाना चाहिए व बराबरी का स्थान मिलना चाहिए।

अध्यक्ष महोदय, अब मैं अपना वक्तव्य समापन की ओर ले जाता हूं। मेरी मांग यह है कि राष्ट्रपति महोदय अनुच्छेद 370 का उपयोग कर राज्य सरकार की अनुमति से इस अनुच्छेद को निष्प्रयोजित घोषित कर दें। राष्ट्रपति के आदेश से यह हो सकता है। यह काम अब होना चाहिए। राज्य में अब मानसिक परिवर्तन करने का समय आ गया है और यह प्रक्रिया दिल्ली से श्ाुरू होनी चाहिए।

दूसरी बात- भारतीय संविधान जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह लागू किया जाए। जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा है। हम उससे भेदभाव नहीं कर सकते। वहां के नागरिकों को भारतीय संविधान के मूल अधिकारों से भारतीय नागरिकत्व के गौरव से वंचित नहीं किया जा सकता। उन नागरिकों को समानाधिकार देने के लिए यह मानसिक खाई पाटनी चाहिए। भारतीय संविधान जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए।

मेरी तीसरी मांग यह है कि एक सर्वदलीय समिति गठित की जानी चाहिए। केंद्र ने जम्मू-कश्मीर को जो पैसा दिया है, वह किस प्रकार खर्च किया जाता है इसकी जांच यह समिति करें। भविष्य में उसे दिया जानेवाला पैसा राज्य के आर्थिक व औद्योगिक विकास के लिए खर्च किया जाना चाहिए। इस दृष्टि से जांच होना आवश्यक है।

मेरी चौथी मांग यह है कि सरकार निःसंदेह यह घोषणा करें कि जब तक शेख अब्दुल्ला व उनके सहयोगी स्वयं को भारतीय नहीं कहते, कश्मीर भारतीय संघराज्य का अभिन्न अंग है यह स्वीकार नहीं करते, पाकिस्तान को हमलावर नहीं कहते, तब तक उनसे समझौते की कोई वार्ता नहीं की जाए।

मेरी पांचवीं मांग यह है कि जम्मू और लद्दाख प्रांतों के बारे में भेदभाव की जो नीति अपनाई जाती है, गजेंद्रगडकर कमीशन पर अमल के समय जो नीति अपनाई जाती है उसे खत्म करना आवश्यक है। नौकरियों, आर्थिक नियोजन, उद्योग-धंधों में जम्मू और लद्दाख की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

स्वायत्तता की मांग

कुछ लोग जम्मू की स्वायत्तता की घोषणाएं दे रहे हैं। हम इसे खतरनाक मानते हैं। भाषा के आधार पर जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन की मांग की जा सकती है। जिन्होंने भाषा के आधार पर पंजाब का पुनर्गठन किया वे जम्मू-कश्मीर में यही प्रक्रिया आगे आए तो उसे रोक नहीं सकते। लेकिन मेरा और मेरी पार्टी का मत है कि अब इस समय भाषा के आधार पर जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बारे में बात करना संकट को निमंत्रण देना है। जम्मू और लद्दाख को न्याय नहीं मिला तो वहां क्षेत्रीयता को प्रोत्साहन मिलेगा।

(कश्मीर की स्थिति पर चर्चा के समय लोकसभा में 22 नवम्बर 1968 को अनुच्छेद 370 को रद्द करने के लिए पेश प्रस्ताव पर अटलजी के भाषण के सम्पादित अंश)

 

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