अयोध्या और घुसपैठ चिंता के विषय

‘मैं नहीं जानता कि इस तरह की समस्या (अयोध्या) के बारे में सर्वोच्च न्यायालय कोई फैसला (दें तो वह)…. एक पक्ष की भूमिका का समर्थन करने वाला हो सकता है अथवा इस फैसले से अनिश्चितता (की स्थिति) भी निर्माण हो सकती है। अदालत के बाहर मैत्रीपूर्ण चर्चा के जरिए क्या इस समस्या का समाधान नहीं खोजा जा सकता?”

सम्माननीय उपाध्यक्ष महोदय,

राष्ट्रपति के अभिभाषण में पड़ोसी देशों के साथ अपने सम्बंधों का उल्लेख है। उन राष्ट्रों से हम सभी मैत्रीपूर्ण सम्बंध चाहते हैं। किंतु हर तरह के प्रयास करने के बावजूद पाकिस्तान और बांग्लादेश से हमारे सम्बंधों में सुधार नहीं हो रहा है। इन देशों में 6 दिसम्बर के बाद जो विस्फोटक घटनाएं हुई हैं, उनसे भारत को खतरे का संकेत मिल चुका है। अयोध्या की समस्या भारत की आंतरिक समस्या है। और उस समस्या का उचित तरीके से समाधान करने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। हमारे पड़ोसियों को इसमें हस्तक्षेप करने की इजाजत हम नहीं दे सकते। उन देशों में मंदिरों को ध्वस्त करना, हिंदुओं के घरों में आग लगाकर उन्हें उजाड़ देना और भारत के राष्ट्रध्वज को जलाने का काम सरकारी स्तर पर होता है। फैसलाबाद में जब एक मंदिर ध्वस्त किया जा रहा था तब पाकिस्तान का एक मंत्री आराम से उसे देख रहा था। लाहौर में तो बुलडोजर से एक मंदिर ध्वस्त किया गया। यह सब पूरी तरह गलत है।

पाकिस्तान की केंद्र सरकार व राज्य सरकारों ने कुछ नहीं किया। 409 मंदिर वहां ध्वस्त करना क्या कोई सामान्य घटना है? भारत सरकार ने इस बारे में क्या किया? मैंने सदन में केवल मंदिरों को ध्वस्त किए जाने का उल्लेख किया है, लेकिन व्यापारी प्रतिष्ठानों और औद्योगिक संकुलों को आग लगाई गई क्या इसका उल्लेख नहीं करना चाहिए? इसी कारण हमारे प्रधानमंत्री को ढाका का दौरा रद्द करना पड़ा और बदले में यह धमकियां दी जा रही हैं कि उन्हें सार्क सम्मेलन के लिए ढाका में कदम भी रखने नहीं दिया जाएगा।

सम्माननीय राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि, हाल में जब बांग्लोदश की प्रधानमंत्री भारत के दौरे पर आई थीं तब उनसे अत्यंत सौहार्दपूर्ण माहौल में समझौता हुआ। विवादास्पद ‘तीन बीघा’ इलाका भारत का होने के बावजूद बांग्लादेश को दे दिया गया। सरकार की इच्छा हो तो यह सरकार बांग्लादेश को और कुछ दे देगी, लेकिन ऐसा लेनदेन करने के बावजूद उस देश से रिश्तें मैत्रीपूर्ण नहीं होंगे। पड़ोसी देशों से समझौते करते समय हमें अत्यंत दृढ़ और सीधी भूमिका लेनी चाहिए। अपने पड़ोसी देशों के साथ हमारे मैत्रीपूर्ण सम्बंध रहे इसका कोई विरोध नहीं करेगा। हाल में दुनिया में बहुत बदलाव हुए हैं और विश्व शांति की दिशा में अनेक कदम उठाए गए हैं। लेकिन पश्चिम एशिया अब भी संघर्ष की आग में जल ही रहा है।

मैंने इस सदन से यह भी कहा था कि, हम अयोध्या की समस्या हल कर लेंगे, लेकिन विश्व के मुस्लिम देशों को भारतीय मुस्लिमों के हितों की रक्षा के नाम पर भारत की आंतरिक समस्या में हस्तक्षेप नहीं करने देना चाहिए। यह एक महाभयंकर भूल होगी।

बांग्लादेश से होनेवाली घुसपैठ

सम्माननीय उपाध्यक्ष महोदय, बांग्लादेश से भारत में होनेवाली बढ़ती घुसपैठ उपर्युक्त समस्या का ही एक पहलू है। बांग्लादेश के अनेक नागरिकों ने भारत की मतदाता सूची में अपने नाम घुसेड़ने में सफलता पाई है। ऐसा होने पर भी दिल्ली में इस बारे में विरोध का एक शब्द भी नहीं उछला। मतदाता सूची से इन घुसपैठियों के नाम तुरंत हटाए जाने चाहिए। राष्ट्रहित की यह मांग किस तरह साम्प्रदायिक हो सकती है? क्या किसी भी देश को अपने पड़ोसी देशों के नागरिको को घुसपैठ की छूट देनी चाहिए?

सम्माननीय उपाध्यक्ष महोदय, उपर्युक्त घुसपैठ की गंभीर समस्या की जांच होने पर हजारों बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इस मामले की जांच अभी चल ही रही है। मैं हाल में असम के दौरे से लौटा हूं। हमारी पार्टी की गुवाहाटी में आयोजित जनसभा पर आरंभ में पाबंदी लगाई गई और बाद में उसे हटा दिया गया। यह होने पर भी मैं इस सदन को नम्रतापूर्वक सूचित करना चाहता हूं कि असम में उत्पन्न गंभीर स्थिति की ओर तुरंत ध्यान दिया जाना चाहिए। आमतौर पर ऐसी समस्याएं उलझती ही रखी जाती हैं। वोटबैंक की राजनीति के कारण अयोध्या की समस्या इसी तरह उलझती रखी गई, यह देख ही चुके हैं।

असम की जनसंख्या में होनेवाली वार्षिक 10% वृद्धि

मैं जब असम के दौरे पर था तब मेरे ध्यान में यह बात आई कि पिछले एक वर्ष में 105 विधान सभा क्षेत्रों में जनसंख्या में 10% की वृद्धि दर्ज हुई है। इतनी वृद्धि कैसे हो सकती है? लेकिन जब हम असम सरकार की मतदाता सूचियों के बारे में कोई कार्रवाई करते हैं तो वोटबैंक की राजनीति आड़े आती है और देश की सुरक्षा और एकात्मता को खतरा पैदा होता है। वास्तव में यह एक अत्यंत गंभीर समस्या है। हम इस समस्या को हिंदू-मुसलमान की समस्या नहीं बनाना चाहते। नेपाल से असंख्य नागरिक भारत में आए हैं। वे नागरिक भी अनेक समस्याएं पैदा कर रहे हैं। सरकार इस तरह से होनेवाले अवैध प्रवेश को स्वीकार नहीं कर सकती।

अयोध्या पर समाधान खोजें

सम्माननीय उपाध्यक्ष महोदय, सम्माननीय राष्ट्रपति के अभिभाषण में अयोध्या समस्या का भी उल्लेख है। यह समस्या सर्वोच्च न्यायालय को सौंपे जाने का भी जिक्र है। मैं नहीं जानता कि इस तरह की समस्या के बारे में सर्वोच्च न्यायालय कोई फैसला सुना पाएगा या नहीं। कुछ भी हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय इस समस्या पर फैसला सुनाने में अपनी असमर्थता प्रकट कर सकता है या उसके बारे में फैसला भी दे सकता है। ऐसा फैसला एक पक्ष की भूमिका का समर्थन करनेवाला होगा अथवा इस फैसले से अनिश्चितता भी निर्माण हो सकती है। अदालत के बाहर मैत्रीपूर्ण चर्चा के जरिए क्या इस समस्या का समाधान नहीं खोजा जा सकता? क्या संसद इस बारे में कोई ठोस भूमिका अदा कर सकती है? इसके पूर्व ही संसद यदि उचित भूमिका अदा करती, अदालत यदि अपना फैसला तुरंत सुनाती और राजनीतिक दल यदि वोटबैंक की राजनीति से आगे बढ़कर कोई स्थायी समाधान खोजने का प्रयास करते तो ……. (होहल्ला)।

मुस्लिम समाज की भूमिका में कुछ बदलाव हुआ है। यह परिवर्तन उस समाज को महसूस होनेवाले भय के कारण हुआ है। बहुसंख्य समाज की भावना इस बारे में कितनी तीव्र है, इसका अनुमान होने से उस समाज की भूमिका में यह बदलाव आया है। अब मुझे यह सुझाना है कि सरकार इस बदलाव की पृष्ठभूमि में इस समस्या को हल करने का हर प्रयास करें। अडियल भूमिका लेने से यह समस्या हल नहीं की जा सकेगी। अब भी समय नहीं गया है और मेरी भावना है कि चंद्रशेखरजी ने इस बारे में जो अगुवाई की है, उसी तरह की अगुवाई शासन करें। यह बात दिगर है कि चंद्रशेखरजी ने टीकास्त्र हम पर ही चलाया है।

माननीय उपाध्यक्ष महोदय, इस समस्या का एक पहलू मैंने सदन के समक्ष रखा है। आप वह उचित है या अनुचित इसे तय करें। अब भी समय है। इस देश के सभी नागरिकों को साथ-साथ रहना है। वोटबैंक की राजनीति के कारण स्थिति काफी बिगड़ चुकी है (होहल्ला)। हम तो राजनीति में बहुत देर से आए हैं।

श्री चंद्रशेखरः श्री वाजपेयी का सुझाव एकदम उचित है। यदि अयोध्या के बारे में बातचीत फिर से शुरू करनी हो तो भारतीय जनता पार्टी और उस दल से सम्बंधित सभी लोग बातचीत आगे जारी रहे इसके लिए क्या अगुवाई करेंगे? मैं उनके इस मत से पूर्णतः सहमत हूं कि न्यायालय इस समस्या का सर्वमान्य समाधान नहीं खोज पाएगा। केवल बातचीत के जरिए ही ऐसा सर्वमान्य समाधान खोजा जा सकेगा। मैं श्री अटलजी से अनुरोध करता हूं कि, वे ऐसा समाधान खोजने के लिए जनता को तैयार करें और बातचीत का मार्ग प्रशस्त करें।

चर्चा से समाधान निकलेगा

श्री वाजपेयीः सम्माननीय उपाध्यक्ष महोदय, बातचीत आरंभ करने का प्रयास यदि होता है तो हम उस प्रयास में शामिल होंगे। लेकिन ऐसा प्रयास सदिच्छापूर्वक होना चाहिए और वह स्थायी समाधान खोजने के लिए होना चाहिए। अबतक अनेक बार बातचीत हुई है। लेकिन हर बार नई-नई समस्या उत्पन्न हुई है और परेशान होकर आखिर हमने इस समस्या को अदालत को सौंपने का सुझाव दिया। अब यह समस्या न्यायालय के अधीन है। सुनवाई आरंभ होगी और निर्णय भी दिया जाएगा। निर्णय चाहे जो आए लेकिन एक पक्ष असंतुष्ट ही रहेगा- ऐसा होना ठीक नहीं है। इस स्थिति में बातचीत के जरिए यदि कोई समाधान न निकलता हो तो यह समस्या अदालत को ही सौंपी जाए और उसका निर्णय सभी को बिना किसी विरोध के स्वीकार करना चाहिए। ऐसी स्थिति बनने के लिए देश में सौहार्दपूर्ण वातावरण निर्माण करने की आवश्यकता है। मा. चंद्रशेखर अपने सहयोगियों से चर्चा कर उचित मार्ग निकालें, हम तो एकाकी हो गए हैं।

सदन में मैंने एक मुद्दा उपस्थित किया है। इस मुद्दे की ओर सभी कृपया उचित दृष्टिकोण से देखें। भारत के इतिहास और जनभावनाओं से सुसंगत दृष्टिकोण होना चाहिए। लेकिन इस समस्या में अवांछित मोड़ आया है। क्योंकि इस समस्या के विभिन्न पहलुओं का अलग-अलग विचार हुआ। हिंदू और मुसलमान एकसाथ रहें इतना कहने से ही काम नहीं चलेगा। हमारे महापुरुष कौन थे? उनके आचार-विचार क्या थे? इसलिए मैंने यह प्रश्न उपस्थित किया और मुझे इस बारे में आपकी राय जानने की इच्छा है। हमें किसी को अलग-थलग रखना नहीं चाहते। सब को साथ लेकर आगे बढ़ना है। लेकिन ऐसा करते समय हमारे जो मूलाधार हैं उनसे हमें बिछुड़ना नहीं है। सदन में महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज का उल्लेख हुआ है। इसके पूर्व भी इस सम्बंध में कुछ वक्तव्य आए हैं। यह भी कहा गया कि ये देशभक्त मुसलमानों के खिलाफ लड़े। लेकिन सच्चाई यह है कि वे मुसलमानों के खिलाफ नहीं लड़े। वे एक आक्रामक शासन के खिलाफ लड़े। जब हमारे मुस्लिम बंधु उनसे नाता जोड़ते हैं, तब समस्या निर्माण होती है। प्रभु रामचंद्र और बाबर को एक-दूसरे के दुश्मन समझने की क्या आवश्यकता है? इन दोनों में क्या साम्य है?

(राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा में 2 मार्च 1993 को दिए गए भाषण के सम्पादित अंश।)

 

 

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