विकास का आधार जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान

‘लाल बहादुर शास्त्री जी ने कहा था- जय जवान, जय किसान! मानो हर व्यक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरा है, एक-दूसरे के बिना अपूर्ण है। मैं अब इसमें नया जोड़ रहा हूं- ‘जय विज्ञान!’ इक्कीसवीं सदी में देश की रक्षा, देश का विकास पिछली सदी के साधनों से नहीं किया जा सकेगा।”

मेरे प्रिय देशवासी भाइयों-बहनों और बच्चो!

अपने देश की स्वतंत्रता की 51वीं वर्षगांठ पर आप सभी को मेरी ओर से बहुत-बहुत शुभेच्छाएं! देखते-देखते आधी सदी बीत गई। लगता है जैसे यह कल की ही बात है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसी स्थान से पहली बार अपना तिरंगा ध्वज फहराया था। बाद में हर स्वतंत्रता दिवस पर इस ऐतिहासिक लाल किले से राष्ट्रध्वज फहराने की परम्परा जारी है। मुझे कभी यह नहीं लगा था कि एक दिन यह भाग्य मुझे मिलेगा। एक गरीब स्कूल अध्यापक के धूल और धुएं से भरी बस्ती से आए एक लड़के का, लाल किले की प्राचीर तक पहुंचना और स्वतंत्रता के पवित्र पर्व पर तिरंगा ध्वज फहराना भारतीय लोकतंत्र की शक्ति और क्षमता को प्रदर्शित करता है।

हम सब जानते हैं कि यह स्वतंत्रता हमें सस्ते में नहीं मिली है। एक ओर महात्मा गांधी के अहिंसात्मक स्वतंत्रता संग्राम में लाखों स्त्री-पुरुषों को जेल में यातनाएं सहन करनी पड़ी हैं, तो दूसरी ओर हजारों क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते फांसी के तख्त पर अपने प्राणों का बलिदान किया है। हमारी स्वतंत्रता इन या सभी ज्ञात-अज्ञात हुतात्माओं और स्वातंत्रसैनिकों की देन है।

आइये, हम सब मिलकर उन्हें अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और यदि इस स्वतंत्रता के लिए अपने सर्वस्व को होम करना पड़ा तब भी हम इस स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे यह प्रतिज्ञा करें।  अपना देश विदेशियों के आक्रमणों का शिकार होता रहा है। पचास वर्ष के इस अल्पकाल में भी हम चार बार आक्रमणों का शिकार हुए हैं। फिर भी हमने अपनी स्वतंत्रता अखंड व अबाधित रखी है। इसका सबसे अधिक श्रेय है हमारे सेना के जवानों को। अपना घर व अपने प्रियजनों से दूर, अपना सिर हाथ में लिए वे दिनरात अपनी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, ताकि हम अपने घर में निश्चिंत होकर सो सकें। सियाचिन के शून्य से नीचे 32 डिग्री तापमान के बर्फीले पर्वतों की घाटियां हों अथवा पूर्वोत्तर का घना जंगल हो, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तानी इलाका हो अथवा हिंद महासागर का गहरा पानी- सब जगह हमारे सैनिक सन्नद्ध हैं। इन सभी जवानों का- थल सेना, वायुसेना और नौसेना समेत रक्षा से जुड़े सभी लोगों का मेरी ओर से और आप सभी की ओर से बहत-बहुत अभिनंदन करता हूं और इतना ही कहता हूं कि हे भारत के वीर जवानों हमें आप पर गर्व है।

सेना को जनता का समर्थन चाहिए। पिछले पचास वर्षों में किसानों और कामगारों ने किसानी और कारखानों में देश का दूसरा मोर्चा मजबूत किया है। हम यह नहीं भूल सकते। श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने कहा था- जय जवान, जय किसान! मानो हर व्यक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरा है, एक-दूसरे के बिना अपूर्ण है। मैं अब इसमें नया जोड़ रहा हूं- ‘जय विज्ञान!’ इक्कीसवीं सदी में देश की रक्षा, देश का विकास पिछली सदी के साधनों से नहीं किया जा सकेगा।

पोखरण परमाणु विस्फोट

हमें अपनी सेना को अत्याधुनिक बनाना होगा ताकि हम किसी भी संकट का सक्षमता से सामना कर सकें। अपनी स्वतंत्रता एवं अखंडता कायम रख सकें। इस लक्ष्य से और केवल इसी लक्ष्य से हमने 11 व 13 मई को पोखरण में परमाणु विस्फोट किया। पोखरण का विस्फोट एक रात का खेल नहीं था। हमारे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तंत्रज्ञों व सेना की अनेक वर्षों की तपस्या का यह फल है। पच्चीस साल पूर्व इंदिरा गांधी ने इस कार्य की बुनियाद रची थी। उस कार्य की इमारत खड़ी करने का मैंने प्रयास किया। मैं जानता हूं कि मैं केवल निमित्तमात्र हूं। इस परियोजना का श्रेय वैज्ञानिकों की कुशाग्र बुद्धि और जवानों के अतुलनीय परिश्रम को है। मैं इन सभी को इस अत्यंत शुभ प्रसंग पर खूब-खूब शुभेच्छाएं देना चाहता हूं।

आप सभी का मैं अत्यंत आभारी हूं। क्योंकि कसौटी के समय आपने मुझे अपना समर्थन देकर मेरा साहस बढ़ाया है। कुछ गुटों को छोड़कर, हर भारतीय ने, फिर वह विश्व के किसी भी कोने में हो इस कृति का स्वागत किया है। मानो हममें से प्रत्येक का माथा उस दिन ऊंचा उठा और सीना फूल गया। हम एक स्वर से ऊंची आवाज में बोलने लगे- ‘गर्व से कहो, हम भारतीय हैं।’ क्योंकि उस दिन पोखरण में केवल परमाणु शक्ति का नहीं, राष्ट्रशक्ति का प्रकटीकरण हुआ है। इस अवसर पर मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत हमेशा शांति का पुजारी था, है और रहेगा! हम शस्त्रों का उपयोग स्व-रक्षा के लिए करना जानते हैं और करना चाहते हैं। हम परमाणु अस्त्रों का उपयोग आक्रमण के लिए नहीं करेंगे और इसलिए हमने नए परमाणु परीक्षण पर अपनी ओर से पाबंदियां लगाई हैं। हमने स्वयं ही परमाणु अस्त्रों का प्रयोग न करने का विश्व को आश्वासन दिया है।

किसी के दबाव में हम यह नहीं कर रहे हैं अथवा किसी के डर से यह नहीं कर रहे हैं। हम केवल अपनी इच्छा से कर रहे हैं। क्योंकि विश्व शांति और परमाणु अस्त्रों का प्रयोग न करने पर हमारी गहरी श्रद्धा है। परमाणु अस्त्रों से मुक्त विश्व हमारा सपना है, उसे हम साकार करना चाहते हैं।

सिंहावलोकन का क्षण

व्यक्तिगत जीवन हो या राष्ट्र का जीवन हो, 51वीं वर्षगांठ पिछली अर्धसदी के जीवन का पुनरावलोकन करने का स्वर्णिम क्षण होता है। हम सभी के लिए यह सिंहावलोकन का क्षण है। आज हम एक क्षण के लिए सिंह की तरह पीछे मुड़कर देखें और 21वीं सदी में ऊंची छलांग लगाने के लिए अपने को तैयार करें।

पुनरावलोकन करते समय अक्सर एक गलती होती है। हम हमारे पास की चीजों को कम आंकते हैं और खामियों की जुगाली करते रहते हैं। इससे देश में निराशा का माहौल पैदा होता है। कभी-कभी देश में निराशा का स्वर अधिक बढ़ता दिखाई देता है। बात थोड़ी-बहुत बिगड़ी होगी, लेकिन इतनी बिगड़ी नहीं होती कि उसे सुधारा न जा सके। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि आत्मस्तुति मूर्खों का लक्षण है। परंतु अनावश्यक आत्मनिंदा आत्महत्या जैसी है। मैं यथार्थवादी दृष्टि से पचास वर्ष का पुनरावलोकन करना चाहता हूं।

हम जब स्वतंत्र हुए तब कुछ पश्चिमी पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि हम लोकतंत्र व स्वतंत्रता के योग्य नहीं हैं। शीघ्र ही हम बिखर जाएंगे और नष्ट होंगे। लेकिन आज हम गर्व से कह सकते हैं कि हमने केवल स्वतंत्रता व अखंडता की ही रक्षा नहीं की, अपितु विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र सफलतापूर्वक चलाकर दिखाया। जो राष्ट्र हमारे साथ ही स्वतंत्र हुए वे कभी न कभी तानाशाही या फौजी हुकूमत के शिकार हुए; लेकिन हमने लोकतंत्र का दीप सदा प्रज्वलित रखा।

राष्ट्रीय एकता व पंथनिरपेक्षता

आज की लोकसभा बारहवीं लोकसभा है। हिंदुस्तान का मैं बारहवां प्रधानमंत्री हूं। गांव की छोटी चौपाल से संसद तक हुए सभी परिवर्तनों को मैंने देखा है। इस सभी का श्रेय आप सभी को है। इस चुनाव में आपने ऐसा चमत्कार कर दिखाया है कि सभी पंडित-ज्ञानी हतप्रभ रह गए। आप सभी का अभिनंदन! जब तक आप जागरूक हैं, तब तक हमारे लोकतंत्र की कोई हानि नहीं होगी। आज स्वर्ण जयंती के समापन के अवसर पर एक महत्वपूर्ण सत्य के बारे में सम्पूर्ण राष्ट्र को विचार करना है। स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) ये चारों तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं। किसी भी स्थिति में हमें स्वतंत्र रहना है। स्वतंत्रता की एक अनिवार्य शर्त है- राष्ट्रीय एकता। राष्ट्रीय एकता के लिए लोकतंत्र आवश्यक है। पंथनिरपेक्षता लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता का अभिन्न अंग है। मैं और मेरी सरकार इन चारों तत्वों के प्रति प्रतिबद्ध है। हम किसी भी तरह की साम्प्रदायिकता के विरुद्ध हैं और जो अल्पसंख्यक हैं उनकी पूरी सुरक्षा और विकास में भागीदारी निश्चित कर हम सभी एक राष्ट्र के नागरिक हैं इसे हमें कभी भूलना नहीं चाहिए। लद्दाख से निकोबार तक फैलाा यह देश हे। गारो पर्वत से गिलगिट तक इसका विस्तार है। यह एक प्राचीन देश है। इसकी सभ्यता व संस्कृति पांच हजार वर्षो से अधिक प्राचीन है। इतना विशाल देश, इतना विविधतापूर्ण देश, भाषा, उपासना पद्धति, रहन-सहन, खाना-पीना में भिन्नता होने के बावजूद लोकतंत्र के सूत्र में बंधकर, सामाजिक व आर्थिक न्याय स्थापित करने के लिए कमर कसकर जुटा हुआ है। इसके साथ हमें यह भी भूलना नहीं चाहिए कि हमें लोकतंत्र की विकृति से बचना है।

अन्नदाता सुखी भव

एक समय ऐसा था कि इस देश को सोने की खान कहा जाता था। बाद में स्थिति बिगड़ी और हमारी गणना गरीब राष्ट्रों में होने लगी। पिछले कुछ वर्षों में हमारे किसान और कामगार भाइयों ने अत्यंत परिश्रम से देश को अनाज के उत्पादन में स्वयंसिद्ध किया है। भूखे पेट कोई भी सेना नहीं लड़ सकती। भूखा देश शांति से सो नहीं सकता। हमारे किसान-कामगार भाइयों ने अनाज के बारे में देश को आत्मनिर्भर बनाकर अपनी अन्नदाता की उपाधि सार्थक की है। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना कर सकता हूं कि, ‘अन्नदाता सुखी भव!’

कहना आसान, करना कठिन

व्यापार, उद्योग व सेवा क्षेत्र में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। हमारे कुछ उद्योग तो वैश्विक स्पर्धा में अपना झंड़ा गाड़े हुए हैं। इस सफलता के लिए मैं सभी मजदूरों, कर्मचारियों, प्रबंधकों, उद्योगपतियों और व्यापारियों को खूब बधाई देता हूं। लेकिन हम जानते हैं कि यह एक चरण है, अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं। हमारा अंतिम लक्ष्य है- भारत को विश्व की एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में खड़ा करना। मैं जानता हूं कि यह कहना जितना आसान है, उतना करना कठिन है। इसके लिए हमें अपार परिश्रम, ईमानदारी व आत्मनिर्भरता का मार्ग स्वीकार करना होगा। वैश्विक स्तर के माल का उत्पादन करना होगा, जो घरेलू और वैश्विक बाजार की स्पर्धा में टिक सके। अर्थव्यवस्था में सुधार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने की जरूरत है। लेकिन उदारीकरण का हम अनुचित लाभ नहीं लेने देंगे। आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में हमने परियोजनाओं को तीव्रता से लागू करने का निर्णय किया है। ‘स्वदेशी’ का अर्थ कूपमंडूक होना नहीं है। विश्व एक छोटा देहात बन चुका है। हम सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इस खुली अर्थव्यवस्था में भी हम अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर वैश्विक स्पर्धा में खड़े रह सकते हैं।

भ्रष्टाचार की समस्या

देश में और एक समस्या है भ्रष्टाचार की। भ्रष्टाचार का रोग देश को कैंसर की तरह कुतर रहा है। हमने उससे लड़ने का निर्णय किया है। उसका आरंभ ऊपर से किया है। लोकसभा में पेश लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री को भी नहीं छोड़ा है। इससे उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार से लड़ने की हमारी नीति और हेतु स्पष्ट है।

सूचना प्रौद्योगिकी

21वीं सदी सूचना प्रौद्योगिकी की सदी होगी। भारत की सबसे बड़ी शक्ति है भारत की प्रतिभा। विज्ञान और तंत्रज्ञान के प्रशिक्षित लोगों में हम विश्व में तीसरे स्थान पर हैं। हमें इस शक्ति का दोहन करना होगा। मेरी सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनेक नए कदम उठाए हैं।

अंतरिक्ष एक नया क्षेत्र

अंतरिक्ष एक ऐसा नया क्षेत्र है, जो आनेवाली सदी में मानवजाति को नई-नई संभावनाओं को खोजने का अवसर देती है। अंतरिक्ष तकनीकी ज्ञान के बहुत लाभ हैं, इसलिए भारत को अपनी युवा पीढ़ी की आकांक्षाएं पूरी करने के लिए उसे उपयोग में लाना होगा। मेरी सरकार ‘जय विज्ञान’ की घोषणा के जरिए युवकों का स्वप्न साकार करना चाहती है। इस दिशा में हम ‘स्वर्ण जयंती’, ‘विद्या विकास’, ‘अंतरिक्ष उपग्रह योजना’ नामक एक उपग्रहों पर आधारित कार्यक्रम आरंभ करनेवाले हैं।

सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौता नहीं

मुझे प्रधानमंत्री पद सम्हाले पांच माह हो चुके हैं। संसद में हमारा बहुमत बहुत कम है। मैं जानता हूं कि मोर्चा सरकार की सीमाएं होती हैं। मैं जानता हूं कि आज की व्यवस्था में संन्यासी को सत्तापिपासू फांसी पर चढ़ा देते हैं। लेकिन मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि मैंने जीवन में कभी सत्ता के लिए सिद्धांतों से सौदा नहीं किया और भविष्य में भी कभी नहीं करूंगा। सत्ता का सहवास और विपक्ष का वनवास मेेरे लिए एक जैसा है। मैं चालीस साल तक विपक्ष में रहा, और अपने कर्तव्य का पालन करता रहा। मेरे विरोधी भी उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। मैं कुर्सी पर बैठा हूं, अब मुझे वैसा विरोध आज नहीं दिख रहा है। यह परिवर्तन कैसे हुआ? आज मुझे डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की एक कविता याद आ रही है-

क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं।

कर्तव्य पथ पर जो मिले, यह भी सही, वह भी सही।

वरदान मांगूंगा नहीं, वरदान मांगूंगा नहीं।

मित्रो, मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि चाहे जितने संकट आए परंतु हम झोली नहीं फैलाएंगे। अंतिम क्षण तक वरदान को खोजेेंगे नहीं। संघर्ष का मार्ग मैं छोडूंगा नहीं। केवल मुझे आपका साथ चाहिए। जीवन में ऐसा क्षण आता है जब व्यक्ति एक मोड़ पर खड़ा रहकर सोचता है-

राह कौनसी जाऊं मैं?

चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर।

चलूं आखिरी चाल कि, बाजी छोड़ विरक्ति रचाऊं मैं,

राह कौनसी जाऊं मैं?

फिर लगता है, नहीं खेल छोड़कर मैं विरक्त नहीं हो सकता। मुझे जूझना चाहिए। लाल किले से मैं फिर अपना संकल्प दुहराता हूं-

हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,

काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं।

गीत नया गाऊंगा।

(स्वतंत्रता की 51वीं वर्षगांठ पर 15 अगस्त 1998 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के रूप में अटलजी के देश को प्रथम सम्बोधन का सम्पादित अंश। इस भाषण के तात्कालिक मुद्दों को शब्द-सीमा के कारण छोड़ दिया गया है।)

 

 

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