आर्य समाज की वैचारिक क्रांति

7 अप्रैल 1875 को मुंबई में ऋषि दयानंद ने पहली आर्य समाज स्थापित की थी, जिसे आज 144 वर्ष हो गए हैं। धार्मिक और सामाजिक आंदोलनों के इतिहास में यह महत्वपूर्ण घटना है।

विचार क्रांतिः संसार की क्रांतियों का मुख्य आधार विचारों की क्रांति रहा है। प्रायः सब इतिहासवेत्ता आर्य समाज के संस्थापक ऋषि दयानंद को उन्नीसवीं सदी का महान क्रांतिकारी विचारक मानते हैं। उनकी प्रेरणा से आर्य समाज ने धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक, राष्ट्रीय और राजनैतिक आदि प्रायः सब क्षेत्रों में नई आकांक्षाएं, नई दिशाएं, नई आशाएं और नई संभावनाएं उत्पन्न की हैं।

धार्मिक क्रांतिः आज के वैज्ञानिक युग में ईश्वर और धर्म के प्रति अविश्वास का कारण उनके नाम पर प्रतिपादित अंधविश्वास और प्रचलित निरर्थक रीति-रिवाज है। आर्य समाज के रूप में ऋषि दयानंद ने हमें एक ऐसा जीवन-दर्शन दिया है जो हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा, मनोवैज्ञानिक आकांक्षा तथा जीवन की व्यावहारिक आवश्यकता को संतुष्ट करता है और साथ ही शाश्वत सत्यों के आधार पर प्रगति का मार्ग भी खुला रखता है। उनके द्वारा प्रतिपादित यह जीवन-दर्शन या धर्म सरल, सीधा सादा, सबके लिए समान रूप से साध्य और तर्कविहीन विश्वासों और कर्मकांडों से मुक्त है। उसकी छह विशेषताएं निम्न हैं-
1. ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक निराकार शक्ति है।

2. आत्मा अनादि और अमर है किन्तु कर्म करने में वह सर्वथा स्वतंत्र है, स्वस्थ तथा संपन्न शरीर उसका आवश्यक साधन है।
3. स्थूल जगत या प्रकृति का भी अस्तित्व पृथक और अनादि है।
4. कर्म और उसका परिणाम पुनर्जन्म है किन्तु उनका आधार भाग्य या केवल ईश्वर इच्छा न होकर पुरुषार्थ और कर्म की स्वतंत्रता है।
5. सब प्रकार की समानता पर आधारित व्यक्तिगत और सामाजिक कल्याण एक दूसरे के पूरक है।
6. ईश्वर और मनुष्य के बीच में किसी पैगम्बर, गुरु या मसीहा अथवा दूत की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है।
सामाजिक क्रांतिः आज का सुधरा हुआ हिन्दू समाज आर्य समाज की ही देन है। जन्मगत जातपात, छुआछूत, बालविवाह, पर्दा, दहेज आदि का विरोध तथा खान-पान और चौके-चूल्हे के बंधनों के विरुद्ध सैद्धांतिक प्रचार और व्यावहारिक आंदोलन आर्य समाज का ही कार्य है। अंतरजातीय विवाह, विधवा-विवाह, स्त्री शिक्षा, विदेश यात्रा आदि पर लगे प्रतिबंधों की जड़ें आर्य समाज ने ही खोखली की हैं।
हिन्दू तब और अबः आर्य समाज की एक बड़ी सेवा यह है कि उसने हिन्दू धर्म, हिन्दू समाज को उसकी अनेक कमजोरियों से मुक्त करके न केवल संगठित और सुनिश्चित करने का ही प्रयत्न किया अपितु उसके दरवाजे अहिंदुओं के लिए भी खोल कर उसे वास्तविक अर्थों में व्यापक और उदार बनाने का यत्न किया। अपने स्वधर्मी भाइयों को सांप और बिच्छु के समान अछूत समझने वाला और ईसाई-मुसलमान आदि परधर्मियों को म्लेच्छ कह कर उनका छुआ हुआ पानी तक पीने से घबराने वाला हिंदू अपने धर्म, संस्कृति और स्वाधीनता की रक्षा करने में असमर्थ था। गाय जैसा गरीब और सबसे शरण मांगने वाला हिन्दू, कह कर उसका जो लोग उपहास करते थे, आर्य समाज के कारण वह साहसी और आक्रामक हिन्दू समझा जाने लगा। ‘दी पीपुल्स ऑफ इंडिया’ के प्रसिद्ध लेखक सर जान सीलि को इसीलिए यह स्वीकार करना पड़ा कि ‘जो हिन्दू धर्म अपनी दार्शनिक समझौते तथा स्वरूपविहीन अनिश्चितता की ठंडी राख के कारण राष्ट्रीय एकता की आग उत्पन्न करने में असमर्थ था उसे दयानंद ने एक निश्चित स्वरूप देकर उसमें साहस और पौरुष उत्पन्न करने का प्रयास किया।’
स्वराज्य और स्वदेशीः भारत में राजनैतिक चेतना और राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने में अंग्रेजी शिक्षा के साथ, सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों का प्रमुख योगदान रहा है, किन्तु राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज के विपरीत आर्य समाज का यह सुधार आंदोलन सर्वथा भारतीय और राष्ट्रीय था। 1885 में कांग्रेस के जन्म से दस वर्ष पूर्व 1875 में स्वराज्य का पहला उद्घोष करने वाले स्वामी दयानंद थे। अपने सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने निर्भयतापूर्वक यहां तक लिखा है कि माता-पिता के समान होने पर भी विदेशी राज्य स्वदेशी राज्य की बराबरी नहीं कर सकता। पाश्चात्य विचारकों का ‘सुराज्य, स्वराज्य का विकल्प नहीं है।’ इस आधुनिक सिद्धांत की स्वामी जी ने इतने पहले घोषणा कर दी थी। इसी प्रकार बंग-भंग से बहुत पूर्व स्वामी जी ने सदा स्वदेशी वस्तुओं का स्वयं व्यवहार करके तथा दूसरों को भी ऐसा ही आग्रह करके स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया था। अंगे्रज सरकार आर्य समाज को एक राजद्रोही आंदोलन समझती थी जैसा सर वेलेन्टाइन शिरोल ने ‘अनरेस्ट इन इंडियन’ में स्वीकार किया है। स्वाधीनता के आंदोलन और गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलनों में लाला लाजपतराय और स्वामी श्रद्धानंद जैसे आर्य नेता और हजारों आर्य समाजी जेल गए। क्रांतिकारियों में भाई परमानंद, भगत सिंह और रामप्रसाद बिस्मिल आदि फांसी की सजा पाने वाले अनेक शहीद आर्य समाज से संबंधित थे।
नमस्तेः आर्य समाज द्वारा देश की भावनात्मक एकता के प्रयत्न का एक छोटा प्रतीक ‘नमस्ते’ है। पहले यही आर्य समाजियों की पहचान थी। दूसरे लोग यहां तक कि हिंदू भी इससे चिढ़ते थे। आज यह सर्वसम्मत भारतीय संबोधन गया है।
शिक्षा प्रसारः शिक्षा के क्षेत्र में आर्य समाज का योगदान सर्व परिचित और प्रसिद्ध है। सरकार के बाद सबसे अधिक शिक्षण संस्थाएं आर्य समाज की है। उसके डी.ए.वी. स्कूल और कॉलेज, संस्कृत कन्या पाठशालाएं और गुरुकुल सारे उत्तरी हिन्दुस्तान में तथा हैदराबाद और महाराष्ट्र के अतिरिक्त, मारीशस, पूर्व व दक्षिणी अफ्रीका आदि विदेशों में फैले हुए हैं। इनकी संख्या एक हजार से अधिक है जिनमें दस लाख से अधिक विद्यार्थी हैं। शिक्षा प्रसार के अतिरिक्त धार्मिक शिक्षा तथा राष्ट्रीय वातावरण इन संस्थाओं की विशेषता है।
अछूतोद्वारः छुआछूत, हिन्दू समाज का कलंक है। आर्य समाज ने इसे मिटाने के लिए सबसे अधिक संघर्ष किया और बलिदान तक दिए हैं। आर्य समाज की शिक्षण संस्थाओं में उन्हें सवर्णों से अधिक सुविधाएं दी जाती रही हैं। वेद और संस्कृत पढ़ने का ही नहीं, पढ़ाने का भी अधिकार उन्हें आर्य समाज ने ही दिया। कई आर्य समाजों में हरिजन कुलोत्भव पंडित, पुरोहित आज भी विवाह, यज्ञोपवीत, हवन आदि संस्कार कराते हैं। मेरा विवाह भी जाट कुल से उत्पन्न पंडित जी ने कराया था।
विदेशों में प्रचारः एक सर्वेक्षण के अनुसार जहां सारे भारत में चार हजार (4000) आर्य समाजें हैं जिनमें से एक हजार ग्रामीण क्षेत्रों में हैं वहां मारीशस, फिजी, अफ्रीका आदि में भी 200 से अधिक आर्य समाजें तथा स्कूल, कॉलेज व पाठशालाएं हैं। लाखों प्रवासी भारतीयों में आज हिन्दू धर्म, संस्कृति और हिंदी भाषा का प्रचार इन्हीं आर्य संस्थाओं के कारण है।
राष्ट्रभाषा हिंदीः स्वयं गुजराती होते हुए भी हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने की सबसे पहले स्वामी दयानंद ने ही दूरदर्शिता दिखाई। आर्य समाज का सारे कार्य और प्रकाशनों, अहिंदी शिक्षा संस्थाओं में सर्वत्र हिंदी अनिवार्य है। हिंदी साहित्य के विकास में भी आर्य विद्वानों का प्रमुख स्थान रहा है।
वेद और संस्कृतः वेदों के हिंदी में सरल भाष्य और उनके प्रचार का कार्य आर्य समाज का प्रमुख उद्देश्य रहा है। इसी प्रकार संस्कृत के अध्ययन और यहां तक कि उसे शिक्षा का मुख्य विषय और माध्यम बनाने के लिए आर्य समाज ने प्राचीन गुरुकुल प्रणाली को पुनः प्रचलित किया। इससे भी अधिक महत्व की बात यह है कि वेद, शास्त्र और संस्कृत के नाम पर हमारी धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों का समर्थन किए जाने के कारण जहां इन्हें कभी प्रतिक्रियावाद का गढ़ समझा जाता था वहां आर्य समाज ने वेद और संस्कृत शास्त्रों के प्रमाण देकर और उनका आधुनिक शास्त्रों के प्रमाण देकर और उनका आधुनिक अर्थ करके आज उन्हें ही धार्मिक और सामाजिक क्रांति का साधन बना दिया।
महिला समानताः स्वामी जी केवल स्त्रियों की समानता के ही समर्थक नहीं थे अपितु मातृशक्ति कह कर उन्हें कई क्षणों में पुरुषों से श्रेष्ठ मानते थे। स्त्रियों को न पढ़ाने की पुरानी हिंदू मान्यता के विपरीत आर्य समाज ने उनकी शिक्षा के लिए जितने स्कूल, पाठशालाएं और गुरुकुल तक खोले उतने स्वाधीनता से पूर्व सरकार द्वारा भी नहीं खोले गए थे। आर्य समाज की मान्यता रही है कि वेद और संस्कृत के अध्ययन का महिलाओं को भी अधिकार है। स्त्रियों को यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार केवल आर्य समाज ही देता है। पर्दा, दहेज, बहुविवाह बाल-विवाह के विरुद्ध आंदोलन और अंतरजातीय विवाह तथा विधवा विवाह का समर्थन सबसे पहले और सबसे अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से आर्य समाज ने ही किया।
विश्वव्यापी लक्ष्यः यद्यपि आर्य समाज का कार्य क्षेत्र मुख्य रूप से भारत और हिंदू समाज रहा है किन्तु उसने ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का लक्ष्य अपने सामने रखा। उसके छठे नियम में ‘संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है’ यह घोषणा की गई है। प्रथम तीन नियमों में ईश्वर और वेद के संबंध में ऋषि दयानंद के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख है, किन्तु बाकी के सात नियम इतने व्यापक और उदार हैं कि उन्हें आसानी से विश्वव्यापी मान्यता दी जा सकती है। दसों नियम केवल 22 पंक्तियों में आ जाते हैं। नए नियम में ‘सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझने’ तथा दसवें नियम में ‘व्यक्तिगत मामलों में परतंत्रता के सिद्धांत’ व्यक्ति और समाज के समन्वय और एक आदर्श समाजवादी की आधारशिला बन सकते हैं। स्वयं स्वामी जी ने बार-बार लिखा है कि ‘सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग के लिए मैं सदा तत्पर हूं।’ चौथे नियम में यही आदेश उनके अनुयायियों को दिया गया है। अपने प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ रखा और ‘सत्यमेव जयते’ यह उनका सर्वप्रिय जयघोष था। इसे अब हमारे संविधान में भारत का आदर्श स्वीकार कर लिया गया है।

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