हे मृत्युंजय!

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर… स्वातंत्र्यवीर और संघटक… साहित्यिक एवं समाजसुधारक… जैसे भविष्यद्रष्टा व्यक्तित्व को केवल राजनीतिक स्वार्थवश भारत में हमेशा के लिए उपेक्षित किया गया। परंतु उनके राष्ट्रभक्ति से जाज्वल्यमान विचार आज भी नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक हैं।

हमारा भारतीय समाज वर्तमान में अनेक समस्याओं से ग्रासित है। आतंकवाद से लेकर सामान्य युवकों को तुरंत आने वाली निराशा तक आज अनेक समस्याएं हमारे समाज को खोखला कर रही हैं। युवकों में निराशा, उदासीनता को लेकर आत्महत्या सरीखी बातों का प्राबल्य समाज में हो गया है। इसलिए आज आवश्यकता है सावरकर जी को याद करने की, सजग रह कर उन्हें स्वीकार करने की एवं उनके विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की। “हे मृत्युंजय” यह ऐसा ही एक प्रामाणिक प्रयत्न है। इस दृष्टि से स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक, सावरकर जी के प्रेरणादायी विचार पुन: समाज के सामने लाने का प्रयत्न कर रहा है।

अंडमान याने साक्षात मृत्यु! अंडमान में होने वाले अत्याचारों को सहन करने की अपेक्षा आत्महत्या करना वहां के कैदी स्वतंत्रता सेनानियों को ज्यादा अच्छा लगता था। सावरकर जी को भी इसी कारागृह में रखा गया था। वहां जेलर क्रूर डेविड बेरी ने सावरकर जी पर भी असीम अत्याचार किए। मानसिक कष्ट कर उनका मानिसक संतुलन बिगाड़ने का प्रयत्न किया गया। परंतु सावरकर जी ने यह सब सहन किया और मृत्यु को आह्वान देते हुए मृत्युंजय बने। मृत्यु एवं सावरकर जी के बीच के संघर्ष की अद्वितीय गाथा है “हे मृत्युंजय”!

मृत्यु एवं सावरकर के बीच के संवादों के रास्ते यह नाटक आगे बढ़ता है। अंडमान में कई बार सावरकर जी के मन में आत्महत्या का विचार आया था। मृत्यु के प्रति आकर्षण बढ़ा था। परंतु इस मन:स्थिति को उन्होंने मात दी, यही नहीं अपने साथी क्रांतिकारियों को सांत्वना देकर इस प्रकार की आत्मघात की प्रवृत्ति से परावृत्त किया था। अंडमान के क्रांतितीर्थ में क्रांतिकारियों द्वारा अत्याचारों के विरूद्ध दिल दहलाने वाली कहानी है “हे मृत्युंजय!”

स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक एवं अनामिका नामक प्रसिद्ध संस्था की ओर से विशेष तौर पर युवकों के लिए यह नाटक निर्मित किया गया है।

“फर्जंद” जैसी अद्वितीय मराठी फिल्म बनाने वाले दिग्पाल लांजेकर ने इस नाटक का लेखन एवं निर्देशन किया है। स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर अर्थात एक अद्वितीय व्यक्तित्व। नासिक, पुणे, लंडन, अंडमान इन सारी जगहों पर मृत्यु को ‘चुनौती’ देने वाले “मृत्युंजय” हैं अद्वितीय महायोद्धा! सावरकर इस नाम में ही प्रचंड ऊर्जा और रोमांच समाहित है। सावरकर प्रेरणा के कितने विशाल स्रोत है इसका अनुभव हमें “हे मृत्युंजय” के 30 नाट्य प्रयोगों से हुआ। इन नाट्य प्रयोगों को प्रचंड प्रतिसाद मिला। परिश्रम करने वाले हमारे बंधुओं, महाविद्यालयीन विद्यार्थियों से लेकर बड़े-बड़े साहित्यिकों, कलाकारों, सरकारी अधिकारियों तक यह नाटक बहुत परिणामदायक रहा है। युवकों को इतिहास पसंद नहीं है इसका उत्तर इस नाटक को युवकों से मिला प्रचंड प्रतिसाद है। थोड़े ही कालावधि में इस नाटक को बहुत ज्यादा लोकप्रियता प्राप्त हुई है। अनेक समीक्षकों ने “आजतक रंगमंच पर कभी न खेला गया ऐसा अद्वितीय कारागृह नाट्य” इन शब्दों में नाटक का गौरव किया है। सभी समाचार पत्रों द्वारा अपने अपने समाचार पत्रों में इस नाटक को स्थान दिए जाने के कारण इस नाटक के माध्यम से सावरकर जी को हम मुंबई, पुणे के घर-घर में पहुंचाने में सफल रहे हैं।
इस नाट्य प्रयोग की विशेषता है युवामन का पसंदीदा आधुनिक संगीत तथा प्रकाश योजना। दूरदर्शन धारावाहिक के लोकप्रिय कलाकारों का सहभाग भी उल्लेखनीय है।

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