दक्षिण में जड़ें जमाने की भाजपा की कोशिश

दक्षिणी राज्यों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू बनकर अपनी दशा सुधारने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा खाता खुलवा कर भविष्य की राजनीतिक रणनीति का नक्शा तैयार करने में लगी है। कर्नाटक में भाजपा हावी है ही, अन्य राज्यों में भी जड़ें जमाई जा रही हैं।

दक्षिण भारत के 6 राज्यों में होने रहे लोकसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियां पूरे दमखम से 130 सीटों पर अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर  सफलता हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगा रही हैं। दक्षिणी राज्यों की राजनीति में यह उछाल अचानक ही नहीं आया है। यद्यपि इन 6 में से 5 राज्यों में भाजपा और कांग्रेस की स्थिति तो क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू बन कर रहने की ही रही है। भाजपा की स्थिति में सुधार कर्नाटक की राजनीति में 80 के दशक से आया और यहां कांग्रेस की राजनीति उस समय भी ऊंचाइयों पर थी, जब आपात्काल के बाद आम चुनाव में जनता पार्टी पूर्व, पश्चिम उत्तर और मध्य भारत में स्थित राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करने में लगी थी तो उस समय भी कांग्रेस को कर्नाटक से ही अधिक सीटें मिलीं थी। कांग्रेस के वर्चस्व को उस राजनीतिक परिवर्तन के दौर में भी विपक्षी नहीं समाप्त कर सके थे। लेकिन इसके अपवादस्वरुप अन्य राज्यों में कांग्रेस से इतर दलों का उदय भी हो चुका था और उन्होंने कांग्रेस के वर्चस्व को धराशायी कर दिया था। तब से 2019 के लोकसभा चुनाव तक कर्नाटक को छोड़कर अन्य राज्यों में कांग्रेस केवल क्षेत्रीय दलों के सहारे ही राजनीतिक साख बचाने में लगी हुई है। आंध्र प्रदेश में भी क्षेत्रीय दल तेलुगू देशम से उसकी सीधी लड़ाई थी, परंतु आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद कांग्रेस का दो फाड़ हो गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई.एस.राजशेखर रेड्डी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु के बाद कांग्रेस द्वारा उनके परिवार की उपेक्षा करने के कारण राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन मोहन रेड्डी ने अपने पिता के नाम पर अलग वाईएसआर पार्टी का गठन किया। इसके बाद कांग्रेस आंध्र प्रदेश में भी हाशिए पर चली गई। 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान उसे तेलुगू देशम पार्टी से सीटों पर समझौता कर चुनाव में भाग लेना पड़ा।

2019 के चुनाव के पूर्व भाजपा की राजनीतिक जड़ें पांच (पुदुचेरी, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल) राज्यों में इतनी नहीं जमी थीं कि उसे कोई भी पार्टी अपना प्रतिद्वंद्वी माने। यह ऐसा भी कहा जाए कि वह अपने ही बल पर विधान सभा या लोकसभा में अपना प्रतिनिधि पहुंचा सके। लेकिन यह माना जा सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण भारत में जहां स्थानीय पार्टियों में अपना वर्चस्व बनाए रखने की कशमकश जारी है वहीं राष्ट्रीय पार्टियां, भाजपा एवं कांग्रेस भी अपनी प्रतिष्ठा को कायम रखने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के सहारे इन राज्यों से लोकसभा में अपना प्रतिनिधि भेजने के लिए तैयारी कर चुकी हैं।

पुदुचेरी

पुदुचेरी एक ऐसा राज्य है जो तमिलनाडु की राजनीति से प्रभावित है। यहां से कभी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) कभी कांग्रेस और कभी आल इंडिया अण्णा द्रमुक मुन्नेत्र कषगम (एआईएडीएमके) लोग लोकसभा में पहुंचते रहे हैं। भाजपा की राजनीति का यहां पर कोई असर नहीं रहा है। राज्य से एक ही लोकसभा सदस्य चुना जाता है। 2014 के चुनाव में एआईएडीएमके का कब्जा था, परन्तु इस बार डीएमके के साथ चुनाव लड़ने के कारण कांग्रेस यह सीट लड़ रही है। और एआईएडीएमके के राजग में शामिल होने के बाद यहां की पुदुचेरी की क्षेत्रीय पार्टी आल इंडिया एन आर कांग्रेस (एआईएनआरसी) जो विधान सभा में विपक्षी दल है, के खाते में आई है। एन रंगास्वामी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना ली थी, भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में यह पार्टी भी शामिल है। पुदुचेरी के 2019 के लोकसभा के चुनाव में 18 से 19 साल के पहली बार मतदान करने वाले 31205 युवा मतदाताओं ने मतदान किया। उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा और सीमावर्ती सुरक्षा को लेकर मतदान किया है। यही नहीं, वे चाहते हैं कि देश में एक मजबूत सरकार बने। तमिलनाडु के साथ ही यहां भी 18 अप्रैल को दूसरे चरण में मतदान हुआ।

तमिलनाडु

तमिलनाडु का चुनाव इस बार क्षेत्रीय पार्टियों, डीएमके और एआईएडीएमके तथा कांग्रेस और भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है, यहां के क्षेत्रीय पार्टियों के नेता एम.करुणानिधि और जे. जयललिता का निधन हो चुका है। डीएमके के आजीवन अध्यक्ष रहे, करुणानिथि ने जहां अपनी दूसरी पत्नी के पुत्र एम. के. स्टालिन को पार्टी का अध्यक्ष बना कर भावी मुख्यमंत्री घोषित कर दिया था, परन्तु जे. जयललिता की राजनीति ने उन्हें विपक्षी नेता ही बने रहने दिया। विधान सभा के चुनाव में डीएमके तीन संख्या तक भी नहीं पहुंच सकी। और जे.जयललिता की सरकार बनी। यहां यह उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि जहां राज्य की राजनीति में दोनों ही क्षेत्रीय दलों को हर चुनाव में विकल्प के रूप में तमिलनाडु की सत्ता जनता सौंपती थीं वहीं 2016 के विधान सभा चुनाव में मतदाताओं ने जयललिता को दुबारा सत्ता सौंप दी। चूंकि 2014 में भी जयललिता ही राज्य की मुख्यमंत्री थीं तो उस चुनाव में उनकी पार्टी एआईएडीएमके को मतदाताओं ने 39 लोकसभा सीटों पर विजयी बना कर भेज दिया था। परंतु जयललिता की मृत्यु के बाद राज्य की राजनीति के समीकरण में परिवर्तन साफ दिखने लगा है। अब 2019 के आम चुनाव में जहां दोनों ही पार्टियों के दिग्गज नहीं हैं वहीं उन पार्टियों में विघटन होने के बाद राज्य की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा को अपनी राजनीतिक पैठ बनाने का अवसर मिल गया। डीएमके के नेतृत्व में बने गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल हो गई है और वहीं एआईएडीएमके साथ भाजपा खड़ी है।

2019 के लोकसभा चुनाव में राजग और यूपीए भी सभी 39  सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। राजग में शामिल 5 दलों का नेतृत्व एआईएडीएमके और यूपीए का नेतृत्व यहां डीएएम के हाथ में है। 18 अप्रैल को दूसरे चरण के दिन राज्य की 38 लोकसभा और 18 विधान सभा सीटों के लिए मतदान हुआ। लगभग 71 प्रतिशत मतदान हुआ है। राज्य में सीधी लड़ाई एनडीए और यूपीए के बीच है। भाजपा के लिए यह चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में जड़ें जमाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2019 का आम चुनाव हिन्दी भाषी राज्यों की पार्टी कहे जाने वाली राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी भाजपा के लिए आश्चर्यजनक परिणाम लाने वाला जरूर साबित होगी।

उधर राज्य राजनीति में 60 के दशक से ही पार्श्व में चली जाने वाली पार्टी कांग्रेस को भी अपनी राजनीतिक जड़ों को फिर से जमाने का अवसर तो मिलेगा परन्तु उसे कितनी सीटें मिलती हैं इस पर कोई विश्लेषण नहीं किया जा सकता है। यहां के राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय पार्टियों के उनके अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद ही दिखाई देती है।

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश में कमोबेश दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां अपने दमखम पर नहीं उतरी हैं। यहां 11 अप्रैल को पहले चरण में ही 25 लोकसभा और 175 विधान सभा की सीटों पर मतदान हो चुका है। राजग से विद्रोह कर तेलुगू देशम पार्टी के साथ कांग्रेस छोटी पार्टी के रूप में मैदान में उतरी थी। इस यूपीए का सीधा मुकाबला जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर पार्टी से है। गौरतलब है कि जगनमोहन की पार्टी ने 2014 के विधान सभा चुनाव में 67 सीटों और लोकसभा की 04 सीटों पर जीत हासिल की थी। राज्य में कांग्रेस का लगभग सफाया ही हो गया था। राजग में तेलुगू देशम के शामिल होने के बाद वाईएसआर ने राज्य की राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ा लिया। जगन मोहन की पार्टी ने लोकसभा के 25 स्थानों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। राजग छोड़ने के बाद तेलुगू देशम ने कांग्रेस के साथ लोकसभा के लिए चुनाव उम्मीदवार उतारे। इसी बीच कांग्रेस में ही रहे प्रख्यात फिल्मी सितारे चिरंजीवी के भाई पवन कल्याण ने प्रजा राज्यम का गठन किया। इस लोकसभा चुनाव में मायावती की बसपा के साथ मिल कर उनकी पार्टी ने सभी 25 लोकसभा क्षेत्रों से अपने उम्मीदवार उतारे हैं।

राज्य की राजनीति में तेलुगू देशम और वाईएसआर के बीच सीधी टक्कर है। यहां भी भाजपा अपनी जड़ें जमाने के लिए चुनाव में तो उतरी है लेकिन जानकारों का मानना है कि यदि भाजपा को चुनाव में उसकी ताकत सीटों में नहीं बदलती है तो भी  उसके साथ जगनमोहन की पार्टी आ सकती है। इसी आशय का एक बयान चुनाव के बाद जगनमोहन ने यह कह कर दिया कि हमारे लिए राज्य के विकास और देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। हमारे दरवाजे किसी भी पार्टी के लिए खुले हैं। परिणाम आने के बाद हम यह तय करेंगे।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भले ही भाजपा को सफलता न मिले लेकिन भाजपा के रणनीतिकार यह मानते हैं इन दोनों राज्यों में भी उनकी जड़ें मजबूत होने से कोई रोक नहीं सकता है। वे यह मानते हैं कि जब त्रिपुरा जैसे राज्य में भाजपा का परचम लहरा सकता है तो इन दोनों राज्यों में भी संगठन को मजबूत करके उसी तरह का अवसर पैदा किया जा सकता है।

कर्नाटक भी भाजपा के लिए एक प्रयोगशाला ही रही है। भाजपा के रणनीतिकारों की बात पर इसलिए विश्वास करने का कारण तो है। आज से चार दशक पहले कर्नाटक में भी कांग्रेस और कांग्रेस से ही निकले हुए लोगों की राज्य की राजनीति में सरकारें बनतीं और बिगड़ती थीं। 18 सीटों से 210 सीटों तक पहुंचने में भाजपा को तीन दशक से भी अधिक समय लग गया। आज यहां भाजपा की साख इतनी बढ़ी कि कांग्रेस का धुर विरोध करने वाले जनता दल सेकुलर को कांग्रेस के ही गोद में बैठ कर मिलीजुली सरकार का गठन करना पड़ा और लोकसभा के लिए आपस में सीटों का बंटवारा करना पड़ा।

कर्नाटक में लोकसभा चुनाव के लिए सीधी लड़ाई कांग्रेस-जद (से) के गठबंधन के साथ है। कर्नाटक की राजनीति में क्षेत्रीय दल जनता दल सेकुलर को जनता ने कभी भी अकेली सत्ता नहीं सौंपी। लेकिन उसे सत्ता का सुख मिलता रहा। जिसके कारण उसने अपने गौडा समुदाय के समर्थकों की एक फौज ही तैयार कर ली। यही कारण है कि इस पारिवारिक पार्टी के सुप्रीमो पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के दो पुत्र, दो बहुएं और दो पौत्र राजनीति में छाये हुए हैं। लोकसभा के चुनाव में से 8 सीटों में  से 3 पर दादा और पोते मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। इनके क्षेत्र में मतदान 18 और 23 अप्रैल को हो चुका है। राज्य में लोकसभा की कुल 28 सीटें है।

भाजपा के रणनीतिकारों का यह मानना है कि 28 में से 22 सीटों पर वे विजयी होंगे, 2014 के चुनाव में भाजपा के पास 16 सीटें थीं।

केरल

केरल में 20 सीटों के लिए मतदान 23 अप्रैल को हुआ। 2014 में यहां सीधी लड़ाई एलडीएफ और यूडीएफ के बीच थी। भाजपा को किसी सीट पर जीत तो नहीं हासिल हुई थी परन्तु उसने 7 प्रतिशत मत प्राप्त कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। इस बार का चुनाव त्रिकोणीय माना जा रहा है। पहले जहां यूडीएफ और एलडीएफ के बीच राज्य विधान सभा को लेकर आमने सामने की लड़ाई होती थी परंतु लोकसभा में यह माना जाता था कि जिस मोर्चे का जहां पर मजबूत उम्मीदवार हो, दूसरा मोर्चा कमजोर उम्मीदवार उतार कर मजबूत उम्मीदवार को जीत हासिल कराए। यद्यपि दोनों ही मोर्चे केन्द्र की राजनीति में एक दूसरे का खुल कर समर्थन करते थे।

केरल की राजनीति पर पैनी निगाह रखने वाले पत्रकार श्याम कुमार यह तो मानते हैं कि एलडीएफ के क्षेत्र वायनाड से राहुल गांधी की उम्मीदवारी ने कुछ अंश तक दोनों ही मोर्चों की राजनीति को प्रभावित किया है; परंतु जैसा कहा जाता है कि राजनीति में कोई किसी का स्थायी शत्रु अथवा मित्र नहीं होता। केरल की राजनीति में दोनों ही मोर्चों को यहां के मतदाता विकल्प के रूप में सत्ता हस्तांतरित करते रहे हैं। परंतु इस बार के चुनाव में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। यद्यपि ये दोनों सेकुलरिटी की राजनीति करने वाले कांग्रेस और सीपीआई (एम) के नेता इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं।

राजनीतिक विश्लेषक यह कहने से नहीं चूकते कि सबरी माला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर जिस तरह से सत्तारूढ़ एलडीएफ सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को लागू करने के लिए नृशंस कार्रवाई की और हजारों शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों को जेल में डाल दिया उससे सरकार की सेकुलरिटी पर से यहां के हिन्दुओं का विश्वास उठने लगा है।

इसका उदाहरण 18 अप्रैल को तिरुवनंतपुरम में आयोजित भारतीय जनता पार्टी की जनसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुनने के लिए लाखों की भीड़ एकत्र होना अपने आप में एक आश्चर्यजनक घटना ही है, उसे इस बात का उदाहरण भी माना जाता है कि राज्य में भाजपा की राजनीतिक पैठ बन चुकी है। प्रधानमंत्री ने बड़े ही साफगोई से कहा कि सबरी माला का मुद्दा भावनात्मक और हमारी परंपरा से जुड़ा हुआ है। इसी  भावनात्मक मुद्दे के प्रति लोगों को जागरूक करने की कोशिश की गई है, जिसका प्रभाव राज्य की राजनीति में अवश्य ही पड़ेगा। भाजपा ने यहां से 16 उम्मीदवार उतारे हैं और उसके सहयोगी दलों ने बीडीजेएस और टीएलकेसी 4 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं।

तो अब यह मान लेना चाहिए कि देश की राष्ट्रीय पार्टियों के लिए दक्षिणी राज्यों की 130 सीटें भारत सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली हैं। कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू बनकर अपनी दशा सुधारने की कोशिश कर रही है वहीं, भाजपा दक्षिणी राज्यों में खाता खुलवा कर भविष्य की राजनीतिक रणनीति का नक्शा तैयार करने में लगी है। देखना है कि कांग्रेस की दशा किस हद तक सुधरती है और भाजपा की राजनीतिक रणनीतिक नक्शे में क्या बढ़ोतरी होती है।

 

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