भाषा के नाम पर अलगाववाद क्यों?

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भारत की राष्ट्रीय एकात्मता के लिए आवश्यक है कि भाषा, प्रांत, धर्म के नाम पर अलगाववाद की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दलों के नेताओं को नकार दिया जाए और इसके लिए दक्षिण भारत के जागरूक नागरिकों को समाज सुधार हेतु पहल करनी होगी।

वास्तुशास्त्र और शिल्पशास्त्र का अनूठा संगम

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नवनिर्मित राम मंदिर में ‘नागर शैली’ का उपयोग किया गया है। मुख्य गर्भगृह 20 गुणा और 20 फीट का अष्टकोणीय आकार में है, जो भगवान विष्णु के 8 रूपों को दर्शाता है। मंदिर में 366 स्तंभ होंगे। प्रत्येक पर 16 मूर्तियों को दर्शाया गया है। जिसमें शिव के विभिन्न अवतारों, दशावतारों, चौसठ योगिनियों से लेकर देवी सरस्वती के बारह रूपों तक की दिव्य आकृतियां प्रदर्शित होंगी।

कर्नाटक जीत से मिली कांग्रेस को संजीवनी

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कांग्रेस की रणनीतिक तैयारी और उसके द्वारा राज्य सरकार पर 40 प्रतिशत कमीशन के आरोप का प्रत्युत्तर देने में भाजपा विफल रही। आगे चलकर लोकसभा चुनाव हैं। राज्य की भाजपा सरकार और संगठन इसकी काट में सशक्त रूप से कोई पहल ही नहीं कर सकी। कर्नाटक के चुनाव परिणाम ने…

आगामी विधानसभा चुनाव और कर्नाटक की राजनीति

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कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं। भाजपा-कांग्रेस एक दूसरे को भ्रष्टाचार और टीपू सुल्तान जैसे मुद्दों को लेकर घेरेंगे। यद्यपि भाजपा के पास येदियुरप्पा जैसा अनुभवी लिंगायत नेता है और कांग्रेस का राज्य नेतृत्व आपसी झगड़ों में उलझा हुआ है। इसके बावजूद चुनावी मुकाबला चुनौतिभरा हो सकता है। कर्नाटक की…

हब्बा हरिदिनगळल्ली बदुकु नेलेसिदे (उत्सवों में बसी है जान)

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संस्कृति की नींव हमारे उत्सव-त्यौहार हैं और कर्नाटक की तो जान ही उत्सवों में बसती है। कर्नाटक के राजा-महाराजों के समय से चली आ रही उत्सव प्रथाओं को यहां की जनता आज भी पूरे विश्वास और उसी उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है। मैसूर का दशहरा हो या नागमण्डला का लोकनृत्य जनता की सहभागिता हर उत्सव में रहती है। विशेष बात यह है कि यहां उत्सवों को सामूहिक रूप से मनाने का ही प्रचलन अधिक है।

ज्ञानवापी में बाबा ही व्याप्त हैं…

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जैसे-जैसे देश की मस्जिदों की खुदाई हो रही है वैसे-वैसे उनके मंदिर होने के साक्ष्य मिल रहे हैं। काशी के ‘कंकर में शंकर है’ की कहावत चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। अयोध्या से शुरू हुआ हिंदुओं के प्रतीकों तथा श्रद्धा स्थानों के पुनर्जागरण का कार्य अब केवल किसी आध्यात्मिक संस्था तक सीमित नहीं रहा, वह जनमानस की आकांक्षा बन चुका है।

सीयराम मय सब जग जानी

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अयोध्या को आध्यात्मिक नगरी का स्वरूप इसलिए भी मिला कि यहां के अधिसंख्य मंदिरों में राम नाम संकीर्तन की परम्परा अनवरत 24 घंटे चलती रही है। इस कीर्तन की परम्परा से अयोध्या में आने वाले ऐसे लोगों के लिए आवास और खाने पीने की व्यवस्था की जाती थी तथा कुछ राशि उनकी निजी आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति के लिए दी जाती थी। अयोध्या में यह कभी नहीं पूछा जाता था कि कीर्तन करने वाले लोगों की क्या जाति है।

सरकारी नियंत्रण से कब मुक्त होंगे मंदिर?

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देश के साधु संतों ने अब इस कमान को संभाल लिया है तो हमें विश्वास है कि हिन्दुओं के आस्था केन्द्र मंदिरों पर से सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिलेगी और इसका आगाज उत्तराखंड की सरकार के इस आदेश से हो गया है कि राज्य के चारों धाम में आने वाले मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाता है। 

कर्नाटक में कोरोना से बचाव के उपाय तेज

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कोरोना संक्रमित रोगियों को समय से समुचित उपचार मुहैया कराने के लिए सभी जिला एवं तालुका अस्पतालों में उच्च प्रवाह ऑक्सीजन सुविधा मुहैया कराई गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा की सरकार के प्रयास का ही असर रहा है कि यह राज्य देश के अन्य राज्यों के बीच आदर्श राज्य बनने में सफल रहा है। वास्तव में सरकार ने मेडिकल से जुड़े चिकित्सकों, विशेषज्ञों की एक समिति का गठन कर उसकी बताई गई सलाह को अक्षरशः लागू करना शुरू किया, जिससे सरकार को पहली लहर की महामारी में जनधन की हानि को कम करने में सफलता हासिल हुई।

येडियूरप्पा के बाद कर्नाटक का मुख्यमंत्री कौन ?

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                                                                                                 बी.एस.येडियूरप्पा भाजपा…

संघ एवं मंदिरों का सेवा कार्य

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ये ऐसे लोग हैं जिन्हें मंदिरों में चढ़ावे तो दिखाई पड़ते हैं परन्तु सामाजिक और प्राकृतिक विपदाओं के समय जिस तरह से मंदिरों की ओर से आर्थिक और सामुदायिक सेवा की जाती है वह दिखाई नहीं देती। हमारे यहां मंदिरों को केवल धार्मिक स्थल के रूप में ही नहीं विकसित किया गया है बल्कि वहां नर और नारायण दोनों की सेवा की बातें की जाती हैं।

मंदिरों पर सरकारी एकाधिकार क्यों?

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आज अनेक हिन्दू संगठनों और अन्य धर्माचार्यों द्वारा सरकारी एकाधिकार से मंदिरों को मुक्त कराने का आन्दोलन आरंभ किया जा चुका है। जब हम मंदिरों के सम्पत्तियों से सम्बंधित कानून की बात करते हैं तो हमें यह पता चलता है कि यह काम जहां अंग्रेजों ने आरंभ किया था वहीं, देश के विभाजन के बाद यहां की लोकतांत्रिक सरकारों ने इस एकपक्षीय कानून को समाप्त करने की दिशा में कोई काम ही नहीं किया।

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