तकनीक से होंगे दिव्यांग सक्षम

आनेवाले दशकों में मानवीय शरीर के अंतर्गत बनावटी या कृत्रिम तकनीक लगाया जाना संभव है। वह शरीर में सहजता से लग जाएगी, तादात्म्य स्थापित कर लेगी। पुराने संस्कृत सुभाषित के अनुसार अंधे देख सकेंगे, बहरे सुन सकेंगे और अपंग ट्रेकिंग करने हेतु जा सकेंगे।

प्रकृति के विविध कार्यकलापों, उसका मूल तत्व, आधुनिक मानव-निर्मित तकनीकी चमत्कार- खास कर नैनो- टेक्नोलॉजी यानी सूक्ष्म तकनीक के मिलने से एक नए विज्ञान का उदय हुआ है। बहुत जल्द वह जीवन का अविभाज्य हिस्सा बनेगी। उसे कहेंगे ‘बायोनिक्स’(Bionics)। यह शब्द दो शब्दों से बना है। बायोलॉजी यानी ‘जीवशास्त्र’ और ‘इलेक्ट्रॉनिक्स’। कई क्षेत्रों में इसके उपयोग हैं। इसकी मदद से टूटे हुए या विशिष्ट शारीरिक अंग न होने वाले व्यक्तियों में कृत्रिम हिस्से लगाए जाते हैं। यह बहुत बड़ी क्रांति है। पहले भी कृत्रिम हिस्से लगाए जाते थे। परंतु कृत्रिम साधनों की मर्यादा है। ये साधन या इंद्रिय प्राकृतिक हिस्सों जैसा काम नहीं कर सकते। ये हिस्से रबड़ के पट्टे के सहारे से लगे रहते हैं। ये हिस्से दिमाग या स्नायु से संबंधित व्यवस्था से जुड़ नहीं पाते। पर उनको न समझा जाय।

दुनियाभर में मशहूर ‘टाइम’ मासिक पत्रिका ने ‘जयपुर फुट’ की खुले आम प्रशंसा की है। हमारे यहां ‘जयपुर फुट’ की वजह से अपंगों को चलने की सुविधा मिली। ‘बायोनिक्स क्रांति’ का उदाहरण नीचे वाले चित्र में देखिए। इंग्लैड के मैथ्यू नामक लड़के को जन्म से बाया हाथ नहीं था। इसके पहले जो हाथ लगाया गया था, उसकी उंगलियों से वह हल्की वस्तुएं पकड़ सकता था। पर उसके अत्याधुनिक हाथ का यह चित्र देखिए। नकली हाथ प्राकृतिक हाथों जैसा है। मैथ्यू इस हाथ से कई किलो वजन उठा सकता है। उंगलियों में पेन पकड़ कर चित्र बना सकता है। बूट का फीता बांध सकता है। दोनों हाथों से वह काम कर सकता है। नई तकनीक इस्तेमाल कर जोड़े गए इन हिस्सों को (ङळाल) अर्थात बुद्धिमान कृत्रिम हिस्सा कहा जाता है। यह हिस्सा सस्ता नहीं है। प्रायोजक प्राप्त करने के लिए मैथ्यू को भागदौड़ करनी पडी जैसे किसी मोटर रेस में भाग लेने वाले मर्सिडीज टीम ने बहुत मदद दी। इस कारण कंपनी का प्रतीक अपने हाथों पर रंगने के लिए मैथ्यू ने अनुमति दी है। यह आय-लिम्ब बेहतरीन दर्जे के प्लास्टिक का बनाया है। मैथ्यू की बायी बाह से कोहनी तक प्राकृतिक रूप से पहुंची स्नायु व्यवस्था के संवेदनशील छोर तक वह जोड़ा गया है। हरेक उंगली में छोटी मोटर है। उसे हाथ के पंजे में स्थापित कंप्यूटर से नियंत्रित किया जाता है। स्नायु-संबधी व्यवस्था की आज्ञा के अनुसार परख कर, विश्लेषण कर उंगलियों से हलचल करवाने का काम कंप्यूटर करता है। हाथ की उंगलियों में ब्लू टूथ तकनीक होने के कारण मैथ्यू अपने हाथ से कंप्यूटर से बातचीत कर हलचल का विश्लेषण कर सकता है। इसके ऊपर का प्लास्टिक कवर पतला भी मिलता है। हाथों के जोड़ के अंतर्गत हलचलें देखी जा सकती हैं, यानी यह उस अरनाल्ड टर्मिनेटर के फिल्म जैसी।

स्कॉटलैण्ड की ‘टच बायोनिक्स कंपनी’ ने 2007 से हाथ पांव का व्यावसायिकता से उत्पादन करना शुरू किया। 2010 तक दुनिया के 1200 व्यक्तियों को ऐसे हाथ लगाए गए हैं। प्लास्टिक आवरण हटाने के बाद हाथ इस प्रकार (चित्र में दिखाए गए अनुसार) नजर आता है। मूलत: शरीर का हिस्सा जहां से टूट जाता है वहां के संवेदनशील छोर पर, मांसपेशियों को हाथ की उच्च तकनीकी इलेक्ट्रॉनिक यंत्रणा के तार जोड़े जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को जब इस कृत्रिम हाथ से कुछ काम करवाना पड़ता है तब वैसा ही विचार अनजाने से उसके मन में आता है, जैसा सक्षम व्यक्ति के मन में आता है। दिमाग में उठी संवेदना ये जोड़े इलेक्ट्राड्स महसूस करते हैं। वे इस संदेश का विश्लेषण कर उसके अनुसार उंगली अथवा कलाई मोटर को सही आज्ञा देते हैं। इस बात को यहां पर संक्षेप में कहा गया है; पर प्रत्यक्ष रूप में यह क्लिष्ट प्रक्रिया है। फिर भी अत्यंत कम समय में यह क्रिया करवाई जाती है। सचमुच सूक्ष्म तकनीक कितना विकसित है। इस प्रकार का हाथ लगाया हुआ व्यक्ति अपने कपड़े अच्छी तरह से तह करके रख सकता है। इस हाथ की उंगलियां प्राकृतिक उंगलियों की तरह थोड़ा सा टेढ़ापन लिए होती हैं। यह विज्ञान इसी तरह विकसित होता रहा तो संस्कृत सुभाषित की तरह बहुत जल्द अंधे देख सकेंगे, बहरे सुन सकेंगे और पंगु टे्रकिंग करने जाएंगे। ‘कोचलर इंप्लाट’ के नाम से पहचाना जाने वाला कृत्रिम हिस्सा कान में लगाया जा  सकता है। इससे कान के अंदर के यानी आंतर कर्ण में स्थित स्नायु बंधों के छोर, बाह्यकर्ण पर टकराने वाली ध्वनि लहरियों की तीव्रता के अनुसार उद्दीपित किए जाते हैं। इससे उस रोगी की सुनने की क्षमता में सुधार आता है।

आइए, इसके कुछ उदाहरण देखें। ऊपर आंखों के बारे में बताया गया है। आंखें कमजोर होना अथवा अधिक नंबर का मोटे कांच का चश्मा लगाना कितनी बड़ी सजा है, यह संबंधित व्यक्ति ही जान सकता है। अब इस पर ईलाज सहजता से संभव है। ऐसे व्यक्ति के गॉगल में विशिष्ट प्रकार का वीडियो कैमरा लगाया जाता है। दिखने वाला सारा दृश्य वह कमर पट्टे के कंप्यूटर को बिना तार की व्यवस्था से भेजता है। प्रकाश किरणों  की तीव्रता के अनुसार इलेक्ट्रोड्स आंखों के दृष्टिपटल को उद्दीपित करता है, इस संदेश का (यानी दृश्यों का) मस्तिष्क के द्वारा अर्थ लगाया जाता है।

यह जादू अब सिर्फ कान और आंखों के लिए सीमित दायरे में नहीं रही। पांवों का कोई हिस्सा या पांव न होने वाले व्यक्ति को चलता बनाने का इस विज्ञान का निश्चय है। मनुष्य के चलने की नकल उतारना आज तक किसी यंत्रमानव (रोबोट) के लिए संभव नहीं हुआ। चाहे वह मनुष्य से कितना भी तेज, सक्षम या जुझारू क्यों न हो? दो पैरों पर खड़ा होना, सीधा चलना, दौड़ना, छलांग मारना ये सारी बातें आधुनिक मानव वंश ने प्राकृतिक सहायता से प्राप्त की मुश्किल बातें हैं। आज के अत्याधुनिक यंत्रमानव की परख करते समय उन्हें कुछ कदम दौड़ कर फूटबॉल को किक मारने के लिए कहा जाता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दो साल का बालक भी जिस प्रकार छलांग मारता है, उस प्रकार छलांग यंत्रमानव नहीं मार सकता। इस प्रकार का सॉफ्टवेयर बनाना या उसे यंत्रमानव के अंदर बिठाना बहुत मुश्किल काम है। चलने वाली व्यक्ति की एड़ी में तथा टखने की मांसपेशियों के अंतर्गत हलचलों का निरीक्षण कर तैयार किए पॉवर एंकल के स्प्रिंग का पैरों के नीचे का कठिन पृष्ठभाग उस पर पड़ने वाला बल इलेक्ट्रोनिक तरीके से बढ़ाया या घटाया जाता है। इससे पांव लगाया गया अंपग मनुष्य चल सकता है। सूक्ष्म तंत्रज्ञान और प्राकृतिक कार्यपद्धति से यह संयुक्त (या हयब्रीड) हिस्से मानवीय शरीर के सारे निकम्मे, कमजोर या खो चुके जोड़ों में लगाए जा सकते हैं। उदा. टखना, कंधा, कोहनी, घुटना, कलाई और विशिष्ट जोड़ों में रोग संक्रमण को रोकने हेतु इन जोड़ों को ढंकना बेहद जरूरी है।

कृत्रिम त्वचा निर्माण करने की जोरदार कोशिशें जारी है। आंखों और कान के कार्यों में होने वाली सहायता को हमने ऊपर जाना है। इतना ज्ञान हमें था कि हृदय की गति नियंत्रित करने के लिए ‘पेसमेकर’ लगाया जाता है। अब शरीर के आंतरिक हिस्सों पर नजर रखने वाली कार्यप्रणाली विकसित हुई है, मस्तिष्क तक पहुंची है। अब कृत्रिम मांसपेशियां यानी ‘आर्टिफिशियल न्यूरॉन्स’ मस्तिष्क की बनती-बिगड़ती बातों की जानकारी डॉक्टर को दे सकते हैं।

बायोनिक्स पद्धति के साधनों के एक्टिव और पैसिव जैसे दो प्रकार हैं। पैसिव यानी सिर्फ आज्ञा पालन करने वाले हिस्से प्रमुख रूप से सहारा देने का काम करते हैं। एक्टिव हिस्से स्थिति का निरीक्षण कर उसके अनुसार स्वयं की कार्यपद्धति में थोड़ा बहुत बदलाव और समायोजन कर सकते हैं।

इसमें कोई शक नहीं है कि इस तरह के होशियार बायोनिक्स हिस्से बहुत खर्चीले हैं। तकनीकी प्रगति की तीव्रता, सस्ते हो रहे उपकरण, उनके खुले पुर्जें, मुख्य रूप से अपंगों की समस्याओं के प्रति  सामाजिक जागृति इन सबके कारण भविष्य के ऐसे साधनों की शल्यक्रियाएं, आम आदमी के लिए भी सहज सुलभ होगी।

लेखक अपंग कल्याणकारी शिक्षण संस्था के कार्याध्यक्ष हैं।

 

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