पारसमणि सा स्पर्श हैं वीरेन्द्र याज्ञिक

साधारण सा सफेद कुरता पायजामा, भाल पर लाल टीका और व्यक्तित्व में चुंबक सा आकर्षण यह परिचय है श्री वीरेन्द्र याज्ञिक का, जिनके बगैर मुंबई का हर धार्मिक आयोजन अधूरा सा लगता है।  उनके सानिध्य में आने वाला हर व्यक्ति स्वयं को पारस के स्पर्श का अनुभव करने लगता है।

मुंबई के किसी भी धार्मिक समारोह का कोई मंच हो, कोई धार्मिक या सामाजिक आयोजन हो, इस आयोजन में जब श्री वीरेंद्र याज्ञिक बोलने खड़े होते हैं तो अपनी वाणी और शब्द-संपदा से पूरे वातावरण में एक ऐसा आभा मंडल पैदा कर देते हैं कि श्रोता सुध-बुध खोकर रह जाते हैं। साधारण सा सफेद कुरता पायजामा, भाल पर लाल टीका और व्यक्तित्व में चुंबक सा आकर्षण यह परिचय है श्री वीरेन्द्र याज्ञिक का, जिनके बगैर मुंबई का हर धार्मिक आयोजन अधूरा सा लगता है। रामायण, महाभारत, श्रीमद् भागवत गीता और भागवत से लेकर भारतीय वैदिक आख्यान का कोई भी विषय हो या दुनिया के किसी देश में घटने वाली कोई घटना, किसी वैज्ञानिक का कोई नया शोध हो या भारतीय जीवन मूल्यों से जुड़ा कोई विषय, जब श्री वीरेंद्र याज्ञिक उस पर बोलना शुरू करते हैं तो ऐसा लगता है मानो वाणी की गंगोत्री से सरस्वती प्रवाहित हो रही है। वर्तमान में वे मुंबई के राजस्थान विद्यार्थी गृह में रहने वाले सीए की पढ़ाई करने आए 600 से अधिक छात्र-छात्राओं को अध्यात्मिक मार्गदर्शन देने के साथ ही कुलगुरू की जिम्मेदारी सम्हाल रहे हैं।

इलाहाबाद के दारागंज क्षेत्र में महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के ठीक पड़ोस में रहने वाले याज्ञिक जी मात्र 3 वर्ष की आयु से ही अपने दादाजी विश्वनाथ जी नागर और महाप्राण निराला जी के साथ सुंदरकांड की चौपाईयां सुनते हुए गंगा में डुबकी लगाने जाते थे। बचपन के इन संस्कारों से ही याज्ञिकजी का परिचय तुलसी के मानस से हुआ और आज रामचरित मानस की एक एक चौपाई, छंद और दोहे की जो व्याख्या याज्ञिक जी करते हैं, उसका अनुभव वही कर सकता है जो उनको सुन पाता है।

याज्ञिकजी सुंदर कांड को प्रबंध कौशल का श्रेष्ठतम उदाहरण मानते हैं और जब सुंदर कांड की एक-एक चौपाई का वे प्रबंधन सूत्रों के के रूप में विश्लेषण करते हैं तो बड़ी-बड़ी कंपनियों में प्रबंधन सम्हाल रहे कॉर्पोरेट जगत के दिग्गज भी चमत्कृत रह जाते हैं। याज्ञिकजी का मानना है कि सुंदर कांड को देश के मैनेजमेंट संस्थानों में कोर्स के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।

मात्र 16 साल की आयु में याज्ञिक जी ने प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी रीडर डॉ. हरिदेव बाहरी के निर्देशन में वृहद हिन्दी शब्दकोश को तैयार करने में अपना योगदान दिया। परिवार को आर्थिक संबल देने के लिए मात्र 19 वर्ष की आयु में दिल्ली आए और यहां संघ लोक सेवा आयोग में शोध सहायक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। 1982 में संघ लोक सेवा आयोग से त्यागपत्र देकर ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दीं। परिवार, नौकरी और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए भी याज्ञिक जी अपने अनुज अजय याज्ञिक व मित्रों के साथ मिलकर दिल्ली में मानस परिषद के माध्यम से नियमित रूप से सुंदर कांड का पारायण करते थे।

मुंबई वासियों का यह सौभाग्य था कि याज्ञिकजी 27 नवम्बर 1984 को दिल्ली से स्थानांतरित होकर मुंबई आ गए। मुंबई में विश्व हिन्दू परिषद, भारत विकास परिषद, वैश्विक संस्कृति परिवार, श्रीहरि सत्संग समिति, जागृति केंद्र जैसे कई संगठनों व संस्थाओं के मंच से याज्ञिकजी के व्यक्तित्व का जादू मुंबई वासियों को सम्मोहित करने लगा। पूज्य रमेश भाई ओझा, आचार्य धर्मेंद्र, पूज्य दीदी मां साध्वी ऋतुंभरा जी, पं. विजय कौशलजी महाराज, कर्ष्णि गुरूशरणानंदजी जैसे संतों के मंच पर याज्ञिकजी की वाणी ने इन संतों को भी चमत्कृत कर दिया। आकाशवाणी और दूरदर्शन मुंबई पर आपकी कई वार्ताओं और कार्यक्रमों का प्रसारण भी हुआ।

जून 2015 में याज्ञिकजी ने व्यासपीठ पर पहली बार कांदिवली में ठाकुर विलेज में हनुमंत पंचामृतम के माध्यम से श्री हनुमानजी के चरित्र की विविधताओं को प्रस्तुत किया तो उनके साथ रहने वाले और उनके सहयोगियों को पहली बार उनके व्यक्तित्व के इस विलक्षण पहलू का पता चला। इस कार्यक्रम में पहली बार याज्ञिकजी को सुनने वाले बोनांज़ा समूह के श्री एस पी गोयल का कहना है कि याज्ञिकजी को सुनने के बाद मैं रामचिरत मानस और श्री हनुमानजी के व्यापक स्वरूप को इतनी गहराई से समझ पाया।

याज्ञिकजी ने कई पुस्तकों का लेखन व अनुवाद भी किया है। बिहार के पूर्व राज्यपाल न्यायमूर्ति जॉईस की पुस्तक भारतीय सांस्कृतिक  मूल्य एवं धर्म, वैश्विक आचार संहिता का अनुवाद आपने किया है। आपने स्वामी विवेकानंद प्रश्नोत्तरी एवं भारतीय संविधान व सामान्य ज्ञान पर कई पुस्तकें लिखी हैं। आप अपने मंच संचालन की प्रतिभा से श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी अपना मुरीद बना चुके हैं।

वर्ष 2000 में याज्ञिकजी आचार्य धर्मेंद्र और श्री नरेन्द्र मोदी के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ में धर्म सम्मेलन में भाग लेने गए। तब से आज तक श्री नरेंद्र मोदी से उनका आत्मीय रिश्ता अनवरत बना हुआ है।

वर्ष 2007 में याज्ञिकजी मॉरिशस के रामायण केंद्र के निमंत्रण पर मॉरिशस गए। तब मॉरिशस में एक भव्य राम मंदिर के निर्माण की कल्पना की गई। इस मंदिर के निर्माण के लिए मॉरिशस की संसद ने प्रस्ताव पारित किया। मॉरिशस के रामायण केंद्र के संस्थापक और राम मंदिर के निर्माण से जुड़े श्री राजेंद्र अरुण की पांच दिन की राम कथा पंचामृत का आयोजन कर मंदिर के लिए एक करोड़ की धनराशि एकत्र की। अगस्त 2017 में मारीशस के प्रधान मंत्री से लेकर भारत से गए सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में इस मंदिर में प्रभु श्रीराम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। आज यह राम मंदिर मॉरिशस का प्रमुख आकर्षण बन चुका है।

आप भारत विकास परिषद से भी जुड़े रहे और हिंदी पत्रिका विवेक के माध्यम से विवेकानंद के विचारों को समाज में संप्रेषित करने के लिए अपना योगदान दे रहे हैं। मुंबई में विविध धार्मिक आयोजनों के माध्यम से भारतीय जीवन मूल्यों, संस्कृति, सामाजिक समरसता और पारिवारिक एकता को बनाए रखने के लिए याज्ञिकजी पूरे प्रण-प्राण से सक्रिय हैं। मुंबई में मारवाड़ी समाज के सुप्रसिध्द होस्टल राजस्थान विद्यार्थी गृह में मुंबई में सीए की पढ़ाई के लिए आने वाले देश भर के छात्रों को याज्ञिकजी आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हैं। बच्चों को संस्कारित करने के लिए याज्ञिकजी ने मुंबई के गोरेगांव व मीरा रोड क्षेत्र में ‘सांदिपनी प्रिस्कूल एण्ड लर्निंग सेंटर’ की स्थापना की है जिनका सफल संचालन उनकी पत्नी श्रीमती गीता याज्ञिक, पुत्रवधू मोनिका याज्ञिक व पुत्र विवेक पूरे समर्पण भाव से कर रहे हैं।

श्री भागवत परिवार के माध्यम से याज्ञिकजी मुंबई के आसपास के आदिवासी क्षेत्रों के सैकड़ों जोड़ों के लिए सामूहिक विवाह समारोह का आयोजन कर उन्हें आदिवासी समाज की कई कुरीतियों से बचाते हैं और उनका जीवन सुखमय बनाने में योगदान देते हैं। याज्ञिकजी की पहल पर मुंबई और सूरत के संपन्न व्यवसायी, उद्योगपति, भवन निर्माता आदि इन सामूहिक विवाहों का खर्च उठाते हैं और इन नवविवाहित जोड़ों को जीवन यापन के लिए आवश्यक वस्तुएं प्रदान करते हैं।

मान-सम्मान से कोसों दूर और मुंबई के संपन्न से संपन्न व्यक्ति से निकट संबंध होते हुए भी महाकवि निराला जी की तरह फक्कड़ शैली में कभी बस में, कभी लोकल ट्रेन में तो कभी ऑटो में यात्रा करते हुए याज्ञिकजी जहां भी जाते हैं अपनी ऐसी छाप छोड़ आते हैं कि उनसे पहली बार मिलने वाला हर व्यक्ति बार-बार उनसे मिलना चाहता है। श्री भागवत परिवार द्वारा शुरू किए गए ‘गीतामृतम’ के माध्यम से हर माह वे गीता के गूढ़ रहस्यों को सहज-सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं। इस श्रृंखला के अभी तक 11 पड़ाव पूरे हो चुके हैं। याज्ञिकजी के श्रीमुख से गीता के श्लोकों की व्याख्या सुनना व समझना अपने आप में एक दुर्लभ व अप्रतिम अनुभव है।

यह याज्ञिकजी का ही पावन संकल्प है कि श्री भागवत परिवार द्वारा प्रकाशित ‘अतुल्य भारत’ ग्रंथ और ‘अप्रतिम भारत’ ग्रंथ के एक-एक शब्द के लिए उन्होंने जिस धैर्य, निष्ठा, संकल्प और समर्पण के साथ अपना समय दिया है, उस योगदान को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।

 

 

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