भूतकाल की भड़ास, भविष्य की चिंता

नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले लोगों पर आशंकाओं की अनेक उंगलियां उठ सकती हैं। या तो विरोध करने वाले ये लोग अनधिकृत रूप से भारत में रह रहे हैं, या ये भविष्य में रहना या रखना चाह रहे हैं, या इनमें से किसी ने भी कानून को ठीक से पढ़ा और समझा ही नहीं या फिर ये अन्य कुछ मुद्दों की भड़ास निकाल रहे हैं।

केंद्र की सरकार ने जैसे ही नागरिकता संशोधन कानून को पास किया, पूरे देश में विरोध प्रदर्शन का दौर चलने लगा। ये प्रदर्शनकारी अधिकतर महाविद्यालयों के विद्यार्थी हैं। इस बात की खुशी मनाई जा सकती थी कि भारत की युवा पीढ़ी, जिस पर हमेशा यह आरोप लगता है कि उन्हें देश या समाज की कुछ पडी नहीं रहती। वे बस अपने में मशगूल रहते हैं, उन विद्यार्थियों ने यह कानून जैसे अरोचक विषय को पढ़ा, उसे समझा और उसके प्रदर्शन में सडकों पर उतर आए। परंतु वास्तविकता इससे कोसों दूर हैं क्योंकि विरोध करने वाले इन विद्यार्थियों में से अधिकतर को तो यह पता ही नहीं कि कानून है क्या। अगर उन्हें सच में पता होता और कानून को समझने में उन्होंने अपनी बुद्धी का थोडा भी प्रयोग किया होता तो इस प्रकार के विरोध प्रदर्शन की आवश्यकता ही नहीं पडती।

क्या है कानून

अगर आगे दी गई सारिणी के बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाए तो आपको समझ में आएगा कि मूलत: यह कानून नागरिकता देने के लिए बनाया गया है, छीनने के लिए नहीं। किसी अन्य को नागरिकता देने से अपनी नागरिकता खतरे में नहीं आती, यह बात गांठ बांध लेनी होगी। अफगानिस्तान, बांगलादेश और पाकिस्तान से धार्मिक आधार पर प्रताडित किए जाने के कारण जो हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी या ईसाई भारत आए हैं, केंद्र सरकार के अनुमान के अनुसार ऐसे लोगों की संख्या केवल तीस हजार है। 130करोड की जनसंख्या वाले देश में 30 हजार लोग तो किसी छोटे से कस्बे में समा जाएंगे। उनसे इन विरोध करने वालों को क्या नुकसान होने वाला है? यथार्थ में नुकसान तो तब होगा जब केंद्र सरकार एनआरसी लागू करेगी।

भूतकाल की भडास, भविष्य का डर

2019 के लोकसभा चुनाव जीतकर आने के बाद मोदी सरकार ने तीन तलाक, धारा 370 और 35 ए को हटाने में सफलता प्राप्त कर ली। रामजन्मभूमि का फैसला भी आ गया। ये सब वैसे ही कुछ विशिष्ट वर्ग की गले की हड्डी थे, कि नागरिकता संशोधन कानून भी पास हो गया। अब उस विशिष्ट वर्ग का धधकना को लाजमी था। वे तो बस इस ताक में बैठे थे कि कब कुछ और उन्हें नागरिकता संशोधन कानून का मुद्दा मिल गया। देश में फैलाया जा रहा यह विद्रोह केवल नागरिकता संशोधन कानून के कारण नहीं है, बल्कि यह पुराने सभी फैसलों के विरोध में निकल रही भडास है।

इन विद्रोहियों को यह भी पता है कि आगे सरकार एनआरसी और कॉमन सिविल कोर्ट भी लाने वाली है। इनसे सही मायनों में इनकी समानांतर व्यवस्था पर खतरा मंडरा रहा है। अत: अब इन्हें अपने भविष्य की चिंता रही है। एनआरसी के कारण उन सभी लोगों को खतरा है जो अवैध रूप से भारत में आकर बस गए हैं और भारत के संसाधनों तथा सुविधाओं का उपयोग कर रहे हैं। इनकी संख्या तो शरणार्थियों की तीस हजार के सामने कई गुना होगी। इन घुसपैठियों को वैध बनाकर कई पार्टियां अपना वोट बैंक बढ़ाती रही हैं। परंतु अब यह समझने के आवश्यकता है कि ये घुसपैठिए हमारे देश में घुसकर हमारी सम्पत्ति का उपयोग कर रहे हैं, हमारी नौकरियों पर अधिकार जमा रहे हैं, इतना ही नहीं ये लोग कई संगीन अपराधों में भी शामिल हैं, परंतु अभी तक यह बात सामान्य जनता की समझ में नहीं आ रही थीं और इनका वोट प्राप्त करने वाली पर्टियां जानबूझकर लोगों को समझा नहीं रही थीं। लेकिन अब आम जनता धीरे-धीरे घुसपैठियों के कारण होनेवाली राष्ट्रीय समस्याओं को समझ रही है और यही कारण है कि कुछ राजनैतिक पार्टियों के पेट में मरोड उठने लगी है। अत: उन्होंने देश की सबसे नाजुक नस ‘धर्म’ को दबा दिया है।

नागरिकता और धार्मिकता

हमारे देश का हमेशा से ही यह दुर्भाग्य रहा है कि उसे धर्म के आधार पर बांटना आसान रहा है। आज भी राष्ट्र विरोधी शक्तियां यही कर रहीं हैं। जिन कानूनों के पास होने का डर दिखाकर लोगों को उत्तेजित किया जा रहा है, उनका आधार धर्म है ही नहीं। उनका आधार तो भारतीय होना है। भारतीयता यह संकल्पना किसी धर्म पर आधारित नहीं है। परंतु भडास और डर ने लोगों की सोचने-समझने की शक्ति पर पर्दा डाल दिया है। जब इंसान के सोचने समझने की शक्ति खत्म हो जाती है तो उसे किसी भी राह की ओर मोडना बहुत आसान हो जाता है फिर वह राह भले ही आत्मघाती क्यों न हो।

समाज का जो वर्ग नागरिकता संशोधन कानून या एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन कर रहा है, वह यह नहीं समझ रहा है कि उसने अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मार ली है। उसे तो बस धर्म का चष्मा पहनाकर मोहरों की तरह प्रयोग किया जा रहा है। अगर इन लोगों के पार भारतीय होने के प्रंमाण हैं तो कोई भी इन्हें भारत से बाहर नहीं कर सकता, चाहे वे किसी भी धर्म के हों। परंतु केवल धर्म को आधार बना कर, अल्पसंख्यक के नाम पर हाय तौबा मचाकर जोर जबरजस्ती से देश में घुसना और घुसाना दोनों ही दंडनीय अपराध की श्रेणी में आते हैं। ये अपराध विद्रोह करने वाले लोग तो कर ही रहे हैं, साथ ही वे भी कर रहे हैं जिन्होंने इन्हें मोहरा बना रखा है।

केंद्र सरकार द्वारा बनाए जा रहे कानून देश की 130 करोड जनसंख्या को ध्यान में रखकर बनाए जा रहे हैं। किसी विशिष्ट जाति या धर्म को आधार बनाकर नहीं। परंतु एक बात अवश्य है कि जो इसका विरोध कर रहे हैं वे अधिकतर एक ही धर्म के हैं। अब यह देश की बाकी जनता को समझना है कि कहीं ये विशिष्ट धर्म के लोग इसलिए तो विरोध नहीं कर रहे हैं कि घुसपैठिये भी इसी धर्म के हैं और देश में अपने धर्म के लोगों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से ही इन्हें अवैध तरीके से देश में घुसाया जा रहा है।

नागरिकता संशोधन कानून की वास्तविकता

अफगानिस्तान, पाकिस्तान या बांग्लादेश से जो हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई धार्मिक भेदभाव या अत्याचार के कारण भारत में शरण लेते हैं, वे इस आधार पर भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं।

उन्हें 11 की बजाय 5 साल के बाद नागरिकता मिल सकती है। उन्हें यह साबित करना पड़ेगा कि उन्हें धार्मिक आधार पर अत्याचार के कारण जान का खतरा था, इसलिए वे भारत आए हैं।

नागरिकता केवल उन्हीं लोगों को मिलेगी, जो 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत में शरण लेने आए थे। कोई व्यक्ति अगर इस तारीख के बाद भारत में आया था, तो उसे इस कानून के तहत नागरिकता नहीं मिलेगी, चाहे वह हिन्दू ही क्यों न हो।

सरकारी अनुमान के अनुसार ऐसे लोगों की संख्या लगभग तीस हजार है। इसका अर्थ यह है कि इस कानून के कारण केवल तीस हजार लोगों को नागरिकता मिलने वाली है।

यह केवल नागरिकता देने वाला कानून है, छीनने वाला नहीं। इसलिए जो लोग पहले से ही भारत के नागरिक हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हैं, उनकी नागरिकता पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

यहां तक कि किसी पाकिस्तानी या बांग्लादेशी ने अगर फर्जी दस्तावेज बनाकर भी भारत की नागरिकता हासिल कर ली थी, तो भी इस संशोधन के द्वारा उसकी नागरिकता जाने वाली नहीं है।

कहां लागू नहीं

असम और पूर्वोत्तर राज्यों के लोग भी खूब जोर-शोर से इसका विरोध कर रहे हैं। वह विरोध भी अनावश्यक और निरर्थक है। ऐसा इसलिए क्योंकि परसों संसद में जो कानून पारित हुआ है, उसमें साफ लिखा हुआ है कि असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों में यह कानून लागू नहीं होगा।

इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और नागालैंड के जिन इलाकों में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट लेना पड़ता है, वहां भी यह कानून लागू नहीं होगा।

9 दिसंबर को ही सरकार ने यह भी घोषित कर दिया था कि मणिपुर में भी यह कानून लागू नहीं होगा। 11 दिसंबर को ही सरकार ने 1873 के बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन में संशोधन करके इस घोषणा को कानूनन लागू भी कर दिया है।

 

आपकी प्रतिक्रिया...